Rupee vs Dollar: दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश माने जाने वाले अमेरिकी Dollar की ओर रुख कर रहे हैं. इसका असर भारत जैसे उन देशों पर अधिक पड़ रहा है, जो ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं. हफ्ते के पहले कारोबारी दिन की शुरुआत में ही रुपया 46 पैसे टूटकर डॉलर के मुकाबले 92.28 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया.

अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार (Interbank Forex Market) में रुपया 92.22 प्रति डॉलर पर खुला और आगे गिरते हुए 92.28 प्रति डॉलर तक पहुंच गया. यह पिछले बंद स्तर से 46 पैसे की बड़ी गिरावट है. इससे पहले 4 मार्च को रुपया 92.35 प्रति डॉलर के अपने अब तक के सबसे निचले इंट्रा-डे स्तर तक पहुंच गया था.

रुपये में क्यों गिरावट?

विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे भारत जैसी बड़ी तेल आयातक अर्थव्यवस्था की मुद्रा पर दबाव बढ़ गया है. वैश्विक तेल मानक Brent Crude वायदा कारोबार में 25.68 प्रतिशत उछलकर 116.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. United States, Israel और Iran के बीच बढ़ते तनाव से तेल बाजार में तेज उछाल आया है. Finrex Treasury Advisors LLP के कार्यकारी निदेशक Anil Kumar Bhansali ने कहा कि तेल की कीमतों में उछाल के कारण रुपये पर दबाव बना रहेगा.

एशिया की अन्य मुद्राएं भी सोमवार को कमजोर रहीं. उनका कहना है कि यदि आने वाले कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो रुपया 93 प्रति डॉलर के स्तर तक गिर सकता है. इस बीच छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला US Dollar Index 0.66 प्रतिशत बढ़कर 99.64 पर पहुंच गया.

घरेलू शेयर बाजार में भी भारी गिरावट दर्ज की गई. BSE Sensex शुरुआती कारोबार में 2,345.89 अंक गिरकर 76,573.01 पर आ गया, जबकि Nifty 50 708.75 अंक टूटकर 23,741.70 पर पहुंच गया. शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशकों (Foreign Institutional Investors) ने शुक्रवार को शुद्ध रूप से 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे.

भारत पर क्या होगा असर?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. ऐसे में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में किसी भी बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है. चूंकि तेल का भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक स्थानीय मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. इसके अलावा तेल महंगा होने से देश का राजकोषीय घाटा भी बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव बनता है.

कमजोर रुपये का असर निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ता है. वैश्विक अनिश्चितता के दौर में निवेशक अक्सर शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश जैसे Gold और Silver की ओर रुख करते हैं. हालांकि कमजोर रुपये का कुछ क्षेत्रों को फायदा भी होता है. आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर की कंपनियों की कमाई डॉलर में होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से उनकी आय में बढ़ोतरी हो सकती है.

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