अपनी डाइट में ये तीन चीजें कर लें शामिल, प्रोटीन के लिए नहीं पड़ेगी नॉनवेज खाने की जरूरत

अपनी डाइट में ये तीन चीजें कर लें शामिल, प्रोटीन के लिए नहीं पड़ेगी नॉनवेज खाने की जरूरत


High Protein Diet: भागदौड़ भरी इस जिंदगी में लोगों को आराम के साथ-साथ बैलेंस्ड डाइट की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन लोग अक्सर अपनी डाइट ही भूल जाते हैं जिससे उनके शरीर को सभी जरूरी मिनरल्स नहीं मिल पाते. नॉन-वेज खाने वाले लोगों को तो कहीं न कहीं काफी हद तक प्रोटीन मिल जाता है, लेकिन जो लोग नॉन-वेज नहीं खाते वो लोग अपनी डाइट में ऐसा क्या खाएं जिससे उनको पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन मिले. वैसे तो काफी सारे वेज विकल्प मौजूद हैं, लेकिन आज आपको बताते हैं सबसे बेहतरीन विकल्प जिनसे आप अपने शरीर को पर्याप्त प्रोटीन दे सकते हो.

सोयाबीन

सोयाबीन एक हाई प्रोटीन वाला खाना है, शाकाहारी लोगों के लिए यह प्रोटीन का एक बेहतरीन सोर्स है. इसमें आवश्यक अमीनो एसिड, फाइबर और हेल्दी फैट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. सोयाबीन से सोया दूध, टोफू, सोया चंक्स और सोया ऑयल जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं, जो रोजाना की डाइट में आसानी से शामिल किए जा सकते हैं. लगातार सोयाबीन खाने से नॉन-वेज खाने की जरूरत काफी हद तक कम हो जाती है, यह आपकी मांसपेशियों और हड्डियों को मजबूत बनाता है.

यह भी पढ़ेंः सुबह उठते ही एड़ियों में होता है दर्द, जानें यह किस बीमारी का है संकेत?

दूध और डेयरी चीजें

दूध, दही, पनीर और चीज जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स प्रोटीन का एक बेहतरीन स्रोत हैं. एक गिलास दूध में लगभग 5-8 ग्राम प्रोटीन होता है, जबकि पनीर और दही में यह मात्रा और भी अधिक मानी जाती है. इसके अलावा, ये हड्डियों के लिए जरूरी कैल्शियम भी देते हैं. यदि आप रोजाना डेयरी उत्पादों को अपनी डाइट में शामिल करते हैं, तो आप नॉन-वेज खाने को काफी हद तक कम कर सकते हैं.

नट्स और सीड्स

बादाम, काजू, अखरोट, सूरजमुखी और कद्दू के बीज छोटे लेकिन प्रोटीन और हेल्दी फैट्स का एक बेहतरीन सोर्स हैं. ये स्नैक्स की तरह खाने में आसान हैं और शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देते हैं, इन्हें अपने पास रखना काफी आसान है आप अपना काम करते हुए भी इन्हें खा सकते हैं. दिन में एक मुट्ठी नट्स और सीड्स खाने से प्रोटीन की जरूरत पूरी होती है और दिल की सेहत भी अच्छी रहती है.

यह है प्रोटीन के कुछ बेहतरीन सोर्सेज जिन्हें आप अपनी डाइट में मिलाकर प्रोटीन की पूर्ति कर सकते हैं और यह बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं. साथ ही इससे आपको नॉन-वेज खाने की जरूरत भी नहीं रहेगी ये चीजें शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, ऊर्जा, और मजबूती देते हैं और आपकी मांसपेशियों, हड्डियों और हृदय की हेल्थ को बेहतर करते हैं.

यह भी पढ़ेंः पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

डायबिटीज में आम खा सकते हैं या नहीं? एक्सपर्ट से जानें सेहत से जुड़ी बात

डायबिटीज में आम खा सकते हैं या नहीं? एक्सपर्ट से जानें सेहत से जुड़ी बात


Can Diabetic Patients Eat Mango Safely: डायबिटीज के मरीज अक्सर अपने पसंदीदा फलों से दूरी बना लेते हैं, खासकर आम से. वजह साफ है कि शुगर बढ़ने का डर. लेकिन क्या सच में आम पूरी तरह छोड़ देना चाहिए? या फिर सही तरीके से खाया जाए तो इसका आनंद लिया जा सकता है? यही सवाल हर उस व्यक्ति के मन में आता है जिसे डायबिटीज है और आम बेहद पसंद है. चलिए आपको इस सवाल का जवाब देते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

 इंटीग्रेटिव लाइफस्टाइल एक्सपर्ट Luke Coutinho ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर अपने एक वीडियो में बताया कि आम से डरने की जरूरत नहीं, बल्कि समझदारी से खाने की जरूरत है. अगर आपकी शुगर कंट्रोल में नहीं है, या आप जरूरत से ज्यादा आम खा रहे हैं, खासकर रात में, तो यह नुकसानदायक हो सकता है. लेकिन अगर आप संतुलन बनाए रखें, तो आम को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है.

आम में नेचुरल शर्करा जरूर अधिक होती है, लेकिन इसमें कई पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं. खास बात यह है कि इसमें मैंगिफेरिन नाम का एक तत्व पाया जाता है, जिसे एंटी-डायबिटिक गुणों के लिए जाना जाता है. यानी सही तरीके से खाया जाए तो यह शरीर को नुकसान पहुंचाने के बजाय फायदा भी दे सकता है.

किन बातों का रख सकते हैं ध्यान?

Luke Coutinho सलाह देते हैं कि आम को अकेले खाने के बजाय इसे संतुलित तरीके से लिया जाए. जैसे आप इसे मेवे, बीज या दही के साथ खा सकते हैं. इससे शरीर में शुगर का लेवल अचानक बढ़ने से बचता है और ग्लूकोज धीरे-धीरे रिलीज होता है. यही तरीका आम खाने को ज्यादा सुरक्षित बनाता है.

इसे भी पढ़ें-Washing Machine Stain Problem: क्या आपकी वॉशिंग मशीन भी लगा रही कपड़ों पर दाग, जानें क्यों होता है ऐसा?

सबसे जरूरी बात है मात्रा और समय का ध्यान रखना. एक बार में बहुत ज्यादा आम खाना सही नहीं है. अगर आपका शरीर सहन करता है तो एक छोटा हिस्सा खाया जा सकता है, और अगर शुगर बढ़ती महसूस हो तो मात्रा और कम करनी चाहिए. देर रात आम खाना भी सही नहीं माना जाता, क्योंकि उस समय शरीर की प्रोसेसिंग धीमी हो जाती है.

 

अगर शुगर लेवल बढ़े तो क्या करना चाहिए?

यह भी समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति का शरीर अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है. इसलिए जरूरी है कि आप अपने शरीर को समझें और उसी के अनुसार फैसला लें. अगर आम खाने के बाद शुगर लेवल बढ़ता है, तो उसे सीमित करना ही बेहतर होगा. डायबिटीज में आम पूरी तरह वर्जित नहीं है, लेकिन लापरवाही बिल्कुल नहीं चलती. सही मात्रा, सही समय और सही तरीके के साथ आप इस फल का आनंद ले सकते हैं.

इसे भी पढ़ें-Toxic Family Members: ‘टॉक्सिक’ रिश्तेदारों से कैसे बनाएं दूरी? गौरांग दास ने बताए 3 अचूक तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?

पेन किलर लेने के तुरंत बाद कैसे खत्म हो जाता है शरीर का दर्द, कैसे काम करती है दवा?


Pain killers: जब शरीर में किसी प्रकार का दर्द होता है, तो लोग अक्सर पेन किलर का रुख करते हैं. खास बात यह है कि दवा लेने के कुछ ही समय बाद दर्द कम होना शुरू हो जाता है. आखिर यह कैसे संभव हो पाता है? शरीर में दर्द उठते ही यह एक प्रकार का संकेत होता है कि कहीं न कहीं कोई समस्या, चोट या सूजन हुई है. जब भी यह दर्द होता है, तो शरीर में Prostaglandius नामक केमिकल बनते हैं, जो नसों के जरिए दिमाग को संकेत देते हैं कि कहां दर्द हो रहा है.

कैसे काम करती है पेन किलर?

अधिकांश पेन किलर जैसे paracetamol और ibuprofen, शरीर में इन दर्द पैदा करने वाले केमिकल्स के निर्माण को कम करने में सहायक होती हैं. ये दवाइयां Prostaglandius के बनने की प्रक्रिया को रोकने में मदद करती हैं. जब ये केमिकल कम बनते हैं, तो नसों तक दर्द का संकेत कम पहुंचता है. परिणामस्वरूप, हमें दर्द में राहत महसूस होने लगती है.

क्यों दिखता है इतनी जल्दी असर?

ये दवाइयां पेट में जाते ही जल्दी से खून में जाकर घुल जाती हैं. खून के जरिए ये फिर तेजी से पूरे शरीर में पहुंचती हैं. ये खास रूप से दिमाग और दर्द वाले हिस्से पर अपना असर दिखाती हैं. आमतौर पर, अधिकांश पेन किलर 20 से 30 मिनट के भीतर ही असर दिखाना शुरू कर देती हैं.

यह भी पढ़ें – Mouth Breathing Effects: क्या सुबह उठकर आपको भी लगती है थकान? मुंह से सांस लेने की आदत हो सकती है वजह

कितने प्रकार के होते हैं पेन किलर?

पेन किलर अलग-अलग प्रकार के होते हैं और उनका काम करने का तरीका भी अलग-अलग होता है.

  • Analgesics – आम पेन किलर जैसे paracetamol, दर्द और बुखार को कम करती हैं, लेकिन सूजन पर ज्यादा असर नहीं डाल पातीं.
  • NSAIDs – ibuprofen जैसी दवाइयां, जो दर्द के साथ-साथ सूजन पर भी असर दिखाती हैं.
  • Opioids – ये तब दिए जाते हैं जब दर्द नियंत्रित नहीं हो पा रहा हो, क्योंकि ये सीधे दिमाग पर असर डालती हैं. लेकिन इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना हानिकारक हो सकता है.

पेन किलर को सही मात्रा और जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल करना चाहिए. ज्यादा या बार-बार लेने से पेट में जलन या अल्सर, किडनी या लिवर पर असर और ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.

सावधानियां बरतनी हैं जरूरी

  • हमेशा निर्धारित मात्रा में ही दवा लें.
  • खाली पेट पेन किलर लेने से बचें.
  • अगर दर्द लंबे समय तक रहे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.
  • बच्चों और बुजुर्गों को दवा देते समय विशेष सावधानी बरतें.

यह भी पढ़ें – Health Warning Signs: शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

शरीर में आयरन कम है तो हल्के में न लें, हो सकता है अल्जाइमर; इस देश में 1 करोड़ लोगों पर खतरा

शरीर में आयरन कम है तो हल्के में न लें, हो सकता है अल्जाइमर; इस देश में 1 करोड़ लोगों पर खतरा


Can Iron Deficiency Increase Alzheimer Risk: आयरन की कमी को अक्सर लोग सिर्फ कमजोरी या थकान से जोड़कर देखते हैं. लेकिन अब नई रिसर्च इस धारणा को बदल रही है. साइंटिस्ट का कहना है कि शरीर में कम हीमोग्लोबिन सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी असर डाल सकता है और यह असर धीरे-धीरे डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी की ओर ले जा सकता है. 17 अप्रैल 2026 को जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक स्टडी ने इस कड़ी को और मजबूत किया है. इसमें कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट  और स्टॉकहोम विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने 2200 से ज्यादा बुजुर्गों पर लंबे समय तक स्टडी किया.

क्या निकला रिसर्च में?

इस रिसर्च में देखा गया कि जिन लोगों में एनीमिया था, उनके खून में अल्जाइमर से जुड़े बायोमार्कर पहले से ही ज्यादा थे. इसके साथ ही, फॉलो-अप के दौरान उनमें डिमेंशिया विकसित होने का खतरा भी ज्यादा पाया गया. यानी आयरन की कमी सिर्फ एक साधारण समस्या नहीं, बल्कि दिमागी बीमारियों का संकेत भी हो सकती है. स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों में कम हीमोग्लोबिन और अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन जैसे p-tau217 दोनों मौजूद थे, उनमें डिमेंशिया का जोखिम सबसे ज्यादा था. यह संकेत देता है कि शरीर में खून की कमी और दिमागी बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं. 

आयरन की कमी से क्या होती है दिक्कत?

आयरन की कमी से शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई भी प्रभावित होती है. जब ब्रेन को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है. यही कारण है कि एनीमिया को अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल समस्या के तौर पर भी देखा जा रहा है. एक और दिलचस्प बात यह सामने आई कि पुरुषों में एनीमिया होने पर डिमेंशिया का खतरा महिलाओं के मुकाबले ज्यादा देखा गया, जबकि महिलाओं में यह समस्या ज्यादा आम होती है. रिसर्चर का मानना है कि इसके पीछे शरीर की अलग-अलग जैविक प्रतिक्रिया जिम्मेदार हो सकती है. 

इसे भी पढ़ें – Hot Water Benefits: वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?

कितने लोग इससे प्रभावित?

आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में करीब 1.2 अरब लोग आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से प्रभावित हैं. वहीं यूके में ही लगभग 1 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो इसे एक बड़ी पब्लिक हेल्थ चिंता बना देता है.

क्या इसका कोई इलाज है?

अच्छी बात यह है कि आयरन की कमी को काफी हद तक रोका जा सकता है. संतुलित आहार, आयरन से भरपूर फूड, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, अनाज और रेड मीट और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लेने से इसे कंट्रोल किया जा सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते एनीमिया की पहचान और इलाज किया जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है. क्योंकि लगभग 45 प्रतिशत मामलों में सही लाइफस्टाइल और समय पर जांच से इस बीमारी को टाला या धीमा किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें –  ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत

दिनभर च्विंगम चबाते हैं तो हो जाएं सावधान, पापा बनने में आ सकती है दिक्कत


Does Chewing Gum Affect Male Fertility: ऑफिस जाते समय कॉफी लेना, दिनभर च्युइंग गम चबाना या जिम वियर पहनना, ये सब हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि ये छोटी-छोटी चीजें आपकी फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं. खासकर च्युइंग गम, जो देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है, अंदर ही अंदर बड़ा खतरा बन सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि ये कैसे आपके फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फर्टिलिटी एक्सपर्ट Dr Phoebe Howells के मुताबिक, इसके पीछे वजह है माइक्रोप्लास्टिक्स. ये बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो हमारे आसपास की चीजों, जैसे पैकेजिंग, कपड़े, और यहां तक कि च्युइंग गम से निकलकर शरीर में पहुंच जाते हैं. हालिया रिसर्च में यह सामने आया है कि एक च्युइंग गम चबाने से सैकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में जा सकते हैं, जिनमें से ज्यादातर पहले कुछ मिनटों में ही रिलीज हो जाते हैं. यही कण धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करते हैं. 

पुरुषों और महिलाओं पर क्या होता है प्रभाव?

डॉ. हॉवेल्स बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स में मौजूद केमिकल्सस जैसे BPA, फ्थेलेट्स और PFAS शरीर के हार्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं. पुरुषों में यह स्पर्म काउंट, क्वालिटी और मूवमेंट पर असर डाल सकते हैं, जबकि महिलाओं में ओव्यूलेशन और पीरियड साइकल पर असर पड़ सकता है.

इसे भी पढ़ें – Hot Water Benefits: वजन कम करने के लिए सुबह-सुबह आप भी पीते हैं गर्म पानी, क्या सच में काम करता है यह हैक?

क्या निकला रिसर्च में

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी में पेश एक 2025 की स्टडी में पाया गया कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करा रही महिलाओं के 69 प्रतिशत सैंपल और पुरुषों के 55 प्रतिशत सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद थे.  वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको की 2024 की रिसर्च में मानव टेस्टिकल टिशू में भी माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए. 

किन चीजों से होती है दिक्कत?

समस्या सिर्फ च्युइंग गम तक सीमित नहीं है। चाय के टी-बैग, टेकअवे कॉफी कप, प्लास्टिक कंटेनर और सिंथेटिक कपड़े, ये सभी माइक्रोप्लास्टिक्स के बड़े सोर्स हैं. खासकर गर्म चीजों के संपर्क में आने पर इनसे ज्यादा कण निकलते हैं, जो सीधे शरीर में पहुंच जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि प्लास्टिक को पूरी तरह से जीवन से हटाना संभव नहीं है, क्योंकि यह हर जगह मौजूद है. लेकिन छोटे-छोटे बदलाव करके इसके असर को कम किया जा सकता है. जैसे प्लास्टिक की जगह ग्लास या सिरेमिक का इस्तेमाल करना, ढीले-ढाले और नेचुरल फैब्रिक पहनना और च्युइंग गम की जगह नेचुरल विकल्प चुनना.

फर्टिलिटी सिर्फ उम्र या खानपान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारे आसपास का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. अगर आप भविष्य में पैरेंट बनने की योजना बना रहे हैं, तो इन छोटी आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. क्योंकि कई बार जो चीजें हमें सबसे सामान्य लगती हैं, वही लंबे समय में सबसे ज्यादा असर डालती हैं.

इसे भी पढ़ें –  ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इस छोटे-से ब्लड टेस्ट से ही पता लग जाएंगे कई कैंसर, बीमार होने से पहले ही करा सकेंगे इलाज

इस छोटे-से ब्लड टेस्ट से ही पता लग जाएंगे कई कैंसर, बीमार होने से पहले ही करा सकेंगे इलाज


How MethylScan Blood Test Detects Cancer Early: मेडिकल साइंस तेजी से ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां एक साधारण ब्लड टेस्ट कई बड़ी बीमारियों का संकेत दे सकता है. इसी दिशा में एक अहम कदम कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स के रिसर्चर ने उठाया है, जिन्होंने एक नया टेस्ट विकसित किया है, जो कैंसर समेत कई बीमारियों का शुरुआती स्तर पर पता लगाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि रिसर्च में क्या निकला है. 

क्या निकला रिसर्च में?

यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि सिर्फ एक ब्लड सैंपल के जरिए शरीर के पूरे सेहत का आकलन किया जा सकता है. मेडिकल फील्ड में शुरुआती पहचान सबसे बड़ी चुनौती रही है. कैंसर जैसी बीमारियां अगर समय रहते पकड़ में आ जाएं, तो उनका इलाज काफी आसान हो जाता है. लेकिन अभी तक जो टेस्ट मौजूद हैं, वे अक्सर किसी एक बीमारी पर फोकस करते हैं और कई बार महंगे या असुविधाजनक भी होते हैं.

इसे भी पढ़ें- क्या चीनी खाने से पीले होते हैं दांत, जानें इससे डायबिटीज के अलावा क्या हो सकती हैं दिक्कतें?

इस तकनीक को क्या नाम दिया गया?

इस नई तकनीक को “MethylScan” नाम दिया गया है. यह टेस्ट खून में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़ों का एनालिसिस करता है. ये डीएनए शरीर की अलग-अलग सेल्स से आते हैं और जब सेल्स नष्ट होती हैं, तो वे अपनी जानकारी खून में छोड़ देती हैं. इस टेस्ट की खासियत यह है कि यह डीएनए में मौजूद मिथाइलेशन पैटर्न को पढ़ता है. ये ऐसे केमिकल मार्कर होते हैं, जो सेल्स की स्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं. यानी स्वस्थ और बीमार सेल्स के मिथाइलेशन पैटर्न अलग होते हैं, जिन्हें पहचानकर बीमारी का संकेत मिल सकता है.

मुश्किलों से निपटने के लिए क्या किया गया?

ब्लड-बेस्ड टेस्टिंग में एक बड़ी समस्या यह होती है कि खून में ज्यादातर डीएनए सामान्य सेल्स का होता है, जिससे असली बीमारी के संकेत ढूंढना मुश्किल हो जाता है. इसे बैकग्राउंड नॉइज कहा जाता है. इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक अपनाई, जिससे अनावश्यक डीएनए को हटाकर केवल जरूरी और जानकारी देने वाले डीएनए पर फोकस किया गया. इससे टेस्ट की सटीकता बढ़ी और लागत भी कम हुई. इस स्टडी में 1000 से ज्यादा लोगों पर परीक्षण किया गया, जिनमें कैंसर मरीज, लिवर डिजीज से पीड़ित लोग और स्वस्थ व्यक्ति शामिल थे. एडवांस कंप्यूटर एनालिसिस की मदद से डेटा को समझा गया. 

क्या निकला रिजल्ट?

परिणाम काफी उत्साहजनक रहे. टेस्ट ने कुल मिलाकर लगभग 63 प्रतिशत कैंसर मामलों की पहचान की और शुरुआती स्टेज के आधे से ज्यादा मामलों को भी पकड़ लिया. खासकर लिवर कैंसर के मामलों में, हाई-रिस्क ग्रुप में इसकी पहचान दर करीब 80 प्रतिशत तक रही. इसकी एक और बड़ी खासियत यह है कि यह टेस्ट यह भी बता सकता है कि शरीर का कौन सा अंग प्रभावित है. इससे डॉक्टरों को सही दिशा में आगे की जांच करने में मदद मिलती है. हालांकि, अभी यह तकनीक शुरुआती चरण में है और इसे आम इस्तेमाल में लाने से पहले बड़े स्तर पर और परीक्षण की जरूरत है.

इसे भी पढ़ें –  दिल्ली की लेट मॉर्निंग…मुंबई की नींद गायब, जानिए भारतीय शहरों की स्लीप स्टोरी, कौन कितना सोता है?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp