क्या आपका शरीर मां बनने के लिए तैयार है? हाई फर्टाइल महिलाओं में दिखते हैं ये पांच लक्षण

क्या आपका शरीर मां बनने के लिए तैयार है? हाई फर्टाइल महिलाओं में दिखते हैं ये पांच लक्षण


Natural Signs Your Body Is Ready For Pregnancy: फर्टिलिटी की बात आते ही ज्यादातर चर्चा टेस्ट, ट्रीटमेंट या फिर नियमित पीरियड्स तक ही सीमित रह जाती है. लेकिन सच यह है कि कई बार हमारा शरीर बहुत हल्के इशारों में बता देता है कि रिप्रोडक्टिव सिस्टम ठीक से काम कर रहा है. ये संकेत इतने सटल होते हैं कि अक्सर महिलाएं इन्हें नजरअंदाज कर देती हैं या किसी परेशानी का लक्षण मान लेती हैं. असल में, ये बदलाव शरीर के नेचुरल फर्टाइल रिदम का हिस्सा होते हैं. ऐसे ही पांच अहम संकेत, जो बताते हैं कि शरीर फर्टाइल है. चलिए आपको इनके बारे में बताते हैं.

साइकल के बीच अचानक एनर्जी बढ़ना

कई महिलाओं को पीरियड साइकल के बीच अचानक ज्यादा एनर्जी महसूस होती है. यह कोई यूं ही अच्छा दिन नहीं होता, बल्कि ओव्यूलेशन का संकेत हो सकता है. इस समय एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन अपने पीक पर होते हैं, जिससे शरीर गर्भधारण के लिए तैयार होता है. खुद को ज्यादा एक्टिव, फोकस्ड या सोशल महसूस करना भी इसी फर्टाइल फेज का हिस्सा हो सकता है.

रात में शरीर का हल्का गर्म महसूस होना

ओव्यूलेशन के बाद शरीर का बेसल टेम्परेचर थोड़ा बढ़ जाता है. कई बार यह बदलाव सुबह उठने पर या रात में हल्की गर्माहट के रूप में महसूस होता है. आमतौर पर महिलाएं इसे मौसम या थकान से जोड़ देती हैं, जबकि यह शरीर के फर्टाइल विंडो का एक भरोसेमंद संकेत हो सकता है.

निचले पेट में हल्का सा दर्द या खिंचाव

पीरियड्स से अलग, साइकल के बीच पेट के निचले हिस्से में हल्का दर्द या चुभन महसूस होना भी ओव्यूलेशन से जुड़ा हो सकता है. इसे मेडिकल भाषा में मिटलशमर्ज कहा जाता है. यह उस समय होता है जब ओवरी से अंडा रिलीज होता है, जिसे अक्सर मामूली गैस या पेट दर्द समझ लिया जाता है.

सर्वाइकल म्यूकस में नेचुरल बदलाव

ओव्यूलेशन के आसपास सर्वाइकल फ्लूइड ज्यादा स्लिपरी और स्ट्रेची हो जाता है, जिससे स्पर्म को आगे बढ़ने में मदद मिलती है. कई महिलाएं इसे किसी इंफेक्शन या असंतुलन का संकेत मान लेती हैं, जबकि यह फर्टिलिटी का सबसे नेचुरल और मजबूत संकेतों में से एक है.

 पीरियड्स का नियमित और संतुलित होना

सिर्फ समय पर पीरियड आना ही नहीं, बल्कि उसका फ्लो और दर्द का स्तर भी फर्टिलिटी की कहानी बताता है. अगर पीरियड्स बहुत ज्यादा दर्दनाक या असामान्य रूप से भारी नहीं हैं और नियमित हैं, तो यह संकेत है कि हार्मोनल बैलेंस सही है और ओव्यूलेशन ठीक से हो रहा है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

चंडीगढ़ के एक निजी हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की डॉक्टर अमृता गुप्ता के मुताबिक फर्टिलिटी को समझना हमेशा आसान नहीं होता. कई संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि महिलाएं उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देती हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रोटीन और विटामिन्स का पावरहाउस… जानें कटहल खाने के 5 फायदे, जो आपको चौंका देंगे

प्रोटीन और विटामिन्स का पावरहाउस… जानें कटहल खाने के 5 फायदे, जो आपको चौंका देंगे


Health Benefits Of Jackfruit Vegetable: कटहल ऐसी सब्ज़ी है जिसे शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों ही पसंद से खाते हैं. इससे कई तरह की स्वादिष्ट रेसिपी बनाई जाती हैं. दरअसल, कटहल सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज़ से भी बेहद फायदेमंद माना जाता है. इसमें प्रोटीन, विटामिन A और C, थायमिन, पोटैशियम, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नायसिन, फाइबर और ज़िंक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं. आइए जानते हैं किन लोगों के लिए कटहल का सेवन फायदेमंद हो सकता है.

कटहल खाने के तरीके

कटहल को डाइट में कई तरह से शामिल किया जा सकता है. इससे स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है, अचार भी तैयार किया जाता है. इसके अलावा कटहल के पकौड़े भी काफी पसंद किए जाते हैं. अलग-अलग तरीकों से इसका सेवन स्वाद और पोषण दोनों देता है.

कटहल खाने के फायदे

दिल की सेहत के लिए
कटहल में पोटैशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो दिल को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. पोटैशियम ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में सहायक होता है, वहीं फाइबर खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद कर सकता है. नियमित रूप से संतुलित मात्रा में कटहल खाने से दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो सकता है.

वजन नियंत्रण में सहायक
कटहल फाइबर से भरपूर होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है. इससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम होती है और ओवरईटिंग से बचाव होता है. इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर में सूजन को कम करने में मदद करते हैं, जो मोटापे से जुड़ी समस्याओं को कंट्रोल करने में सहायक हो सकते हैं.

इम्युनिटी बढ़ाने में मददगार
कटहल में विटामिन C, जिंक और अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं. नियमित सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है, जिससे सर्दी-जुकाम और अन्य संक्रमणों से बचाव में मदद मिल सकती है. बदलते मौसम में यह शरीर को अंदर से मजबूत रखने में सहायक है.

कब्ज और पाचन के लिए फायदेमंद
कटहल में अच्छी मात्रा में डाइटरी फाइबर पाया जाता है, जो पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है. यह आंतों की सफाई में मदद करता है और कब्ज, गैस और पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत दिला सकता है. जिन लोगों को पाचन से जुड़ी दिक्कत रहती है, उनके लिए कटहल फायदेमंद हो सकता है.

आंखों की सेहत के लिए लाभकारी
कटहल में विटामिन A और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो आंखों की रोशनी को बनाए रखने में मदद करते हैं. ये तत्व आंखों को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं और उम्र के साथ होने वाली आंखों की समस्याओं के खतरे को कम करने में सहायक हो सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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60 के बाद शरीर देता है साफ संकेत, जानें दर्द और असहजता में फर्क समझना क्यों है जरूरी?

60 के बाद शरीर देता है साफ संकेत, जानें दर्द और असहजता में फर्क समझना क्यों है जरूरी?


उम्र बढ़ना जीवन की एक आम प्रक्रिया है और इसके साथ शरीर में बदलाव आना भी तय है. वहीं 60 की उम्र के बाद कई लोगों को सुबह उठते ही पीठ में जकड़न, थोड़ी देर चलने पर घुटनों में दर्द या शरीर में ऐसी तकलीफ महसूस होने लगती है, जो पहले कभी नहीं थी. ऐसे में अक्सर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि यह नॉर्मल उम्र के साथ बढ़ने वाली असहजता है या किसी गंभीर बीमारी का संकेत. एक्सपर्ट्स के अनुसार समय रहते इस फर्क को समझना बहुत जरूरी है, ताकि सही इलाज सही समय पर शुरू किया जा सके.

60 के बाद दर्द और असहजता में क्या है फर्क?

एक्सपर्ट्स के अनुसार 60 की उम्र के बाद शरीर में नई तरह की अकड़न, जकड़न और हर तरह की तकलीफ महसूस होना आम बात है. लेकिन यह जानना जरूरी है कि जो महसूस हो रहा है, वह दर्द है या केवल असहजता है, क्योंकि दोनों का इलाज अलग-अलग होता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि असहजता आमतौर पर हल्की होती है, सुबह उठने पर शरीर में जकड़न, देर तक बैठने के बाद मांसपेशियों का कड़ा लगना या हल्की एक्टिविटी के बाद शरीर में दर्द महसूस होना उम्र बढ़ाने के सामान्य लक्षण है. ऐसी कंडीशन में आराम, हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग और गर्म पानी की सिकाई से राहत मिल जाती है. यह बदलाव जोड़ों, मांसपेशियों और शरीर की मुद्रा में उम्र के साथ होने वाले नेचुरल बदलावों के कारण होते हैं.

दर्द को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

वहीं दर्द की बात करें तो यह ज्यादा गंभीर और लंबे समय तक रहने वाला होता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि दर्द अक्सर नींद, चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करता है. अगर दर्द समय के साथ बढ़ता जाए, अचानक शुरू हो या उसके साथ सूजन, सुन्नता या कमजोरी महसूस हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह गठिया, नसों से जुड़ी समस्या, फ्रैक्चर या किसी अंदरूनी बीमारी का संकेत हो सकता है.

क्या कहती है इंटरनल मेडिसिन की राय?

डॉक्टरों के अनुसार 60 के बाद शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता है. इसलिए पहचानना जरूरी है कि कौन सी परेशानी नॉर्मल है और कौन सी मेडिकल समस्या का संकेत है. उनका कहना है कि असहजता आमतौर पर हल्की, धीमी और थोड़ी-थोड़ी देर में होने वाली होती है, जो आराम हल्की, कसरत या दिनचर्या में छोटे बदलाव से ठीक हो जाती है. वहीं सुबह घुटनों में जकड़न या पूरे दिन के बाद शरीर में भारीपन महसूस होना उम्र का सामान्य असर है. लेकिन अगर दर्द तेज हो लंबे समय तक बना रहे या समय के साथ बढ़ता जाए तो यह चिंता का विषय है. ऐसा दर्द नींद, भूख और  रोजाना की एक्टिविटी को प्रभावित करता है और आराम करने से भी ठीक नहीं होता है.

यह लक्षण दिखे तो तुरंत डॉक्टर से मिले

एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर दर्द के साथ तेज या चुभने वाला दर्द, सूजन, बुखार, अचानक वजन कम होना, शून्यता या कमजोरी या फिर रात में नींद से जगाने वाला दर्द दिखाई दें तो तुरंत मेडिकल सलाह जरूरी होती है. एक्सपर्ट्स भी बताते हैं कि कई बुजुर्ग दर्द को उम्र का हिस्सा मानकर सहते रहते हैं, जिससे गठिया, नसों का दबना, हड्डियों में फ्रैक्चर या अंगों से जुड़ी बीमारियों की पहचान देर से होती है.

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लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो हो जाइए सावधान, खराब हो जाएंगे शरीर के ये अंग

लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो हो जाइए सावधान, खराब हो जाएंगे शरीर के ये अंग


आज के समय में सिर दर्द, कमर दर्द जोड़ों में दर्द या हल्की चोट लगने पर पेन किलर लेना आम बात हो गई है. बहुत से लोग बिना डॉक्टर की सलाह के ही लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करते रहते हैं. वहीं शुरुआत में तो पेन किलर राहत देती है, लेकिन लगातार इसके सेवन से यह आदत धीरे-धीरे शरीर के अंदरूनी अंगों के लिए खतरनाक बन सकती है. खासतौर पर किडनी और लिवर पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है, क्योंकि दवाओं को बाहर निकलने का कम इन्हीं अंगो के जरिए होता है. वहीं अक्सर दर्द कम होते ही लोग पेन किलर को सुरक्षित मान लेते हैं और इसके साइड इफेक्ट्स को नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि अगर आप भी लंबे समय से पेन किलर ले रहे हैं तो अब आपको सावधान क्यो होना चाहिए.

पेन किलर किडनी और लिवर को कैसे पहुंचती है नुकसान?

एक्सपर्ट्स के अनुसार पेन किलर शरीर में सूजन और दर्द को कम जरूर करती है, लेकिन लंबे समय तक लेने पर यह किडनी के ब्लड वेसल्स को प्रभावित कर सकती है. इससे किडनी तक खून का प्रवाह कम हो जाता है और उसकी कार्य क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है. वहीं लिवर का काम दवाओं को तोड़कर शरीर से बाहर निकलना होता है. लगातार पेन किलर लेने से लिवर पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है, जिससे लिवर सेल्स को नुकसान पहुंच सकता है. कुछ मामलों में लिवर में सूजन फैटी लिवर या लिवर एंजाइम बढ़ने जैसी समस्याएं भी आती है. इसके अलावा पहले से किडनी या लिवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों में इसका खतरा और ज्यादा होता है.

किडनी और लीवर खराब होने के लक्षण

अगर पेन किलर का असर किडनी और लिवर पर पड़ रहा है तो शरीर कुछ संकेत देने लगता है. किडनी से जुड़ी समस्या में बार-बार थकान महसूस होना, पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब कम होना या उसके रंग में बदलाव दिखाई दे सकता है. वहीं लिवर खराब होने पर भूख न लगना, मतली, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, आंखों या त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं. कई बार बिना तेज दर्द के भी अंदरूनी नुकसान होता रहता है. इसलिए हल्के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

पेन किलर की आदत क्यों बन जाती है खतरनाक?

एक्सपर्ट्स के अनुसार भारत में दर्द निवारक दवाएं आसानी से उपलब्ध है. इसलिए लोग सिर दर्द, शरीर दर्द या हल्के बुखार में भी खुद से दवा लेने लगते हैं. खासकर पेरासिटामोल और आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं का बिना सलाह सेवन आम हो गया है. डॉक्टर बताते हैं कि पेन किलर पेट में जाकर गल जाती है और ब्लड सर्कुलेशन के जरिए पूरे शरीर में फैलती है. यह दर्द और सूजन पैदा करने वाले रसायनों को रोकते हैं, जिससे तुरंत राहत मिलती है. लेकिन यह प्रक्रिया लिवर पर एक्स्ट्रा दबाव डालती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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महिलाओं में थायरॉयड कैंसर का खतरा तीन गुना ज्यादा क्यों? जानिए इसके लक्षण, कारण और इलाज

महिलाओं में थायरॉयड कैंसर का खतरा तीन गुना ज्यादा क्यों? जानिए इसके लक्षण, कारण और इलाज


थायरॉइड कैंसर को अगर शुरुआती स्टेज में पकड़ लिया जाए तो यह सबसे ज्यादा इलाज योग्य कैंसर में से एक माना जाता है. बावजूद इसके इस बीमारी में एक चौंकाने वाला ट्रेंड लगातार देखा जा रहा है. दरअसल, इस बीमारी में देखा जा रहा है कि महिलाओं में इसका खतरा पुरुषों के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थायरॉइड कैंसर महिलाओं में खासतौर पर 40 से 50 वर्ष की उम्र में ज्यादा देखने को मिलता है, जबकि पुरुषों में यह बीमारी आमतौर पर 10 से 20 साल बाद सामने आती है.

 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि हार्मोनल कारण इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. विशेष रूप से एस्ट्रोजन हार्मोन थायरॉइड कोशिकाओं की ग्रोथ को प्रभावित करता है, जिससे महिलाओं में खतरा बढ़ जाता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि महिलाओं के जीवन में बार-बार होने वाले हार्मोनल बदलाव जैसे किशोरावस्था, गर्भावस्था और मेनोपॉज थायरॉइड कोशिकाओं के असामान्य बदलावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना सकते हैं. इसके अलावा महिलाओं में ऑटोइम्यून थायरॉइड बीमारियां भी ज्यादा पाई जाती है, वहीं लंबे समय तक थायरॉइड ग्रंथि में बनी रहने वाली सूजन आगे चलकर कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती है.

पुरुषों में कम लेकिन ज्यादा खतरनाक होता है कैंसर

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पुरुषों में थायरॉइड कैंसर देर से पता चलता है, लेकिन जब होता है तो ज्यादा गंभीर अवस्था में सामने आता है. कई मामलों में पुरुषों में इसकी पहचान तब होती है, जब वह बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है.

थायरॉइड कैंसर के लक्षणों को न करें नजरअंदाज

थायरॉइड कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें अनदेखा कर देते हैं. इसके सबसे आम संकेत गर्दन के सामने बिना दर्द की गांठ या सूजन है. इसके अलावा आवाज में लगातार बदलाव या भारीपन, निगलने में दिक्कत, गर्दन में दबाव या जकड़न महसूस होना, बिना संक्रमण के लगातार खांसी और गर्दन की लिम्फ नोड्स का बढ़ जाना इसके शुरुआती लक्षण होते हैं.

इलाज के नतीजे भी पॉजिटिव

आमतौर पर कैंसर का नाम सुनते ही लोगों में घबराहट होना स्वाभाविक होता है. लेकिन एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थायरॉइड कैंसर के इलाज के नतीजे बहुत अच्छे होते हैं. इसमें इलाज का मुख्य तरीका सर्जरी है, जिसमें बीमारी की कंडीशन के अनुसार थायरॉइड ग्रंथि का कुछ हिस्सा या पूरी ग्रंथी निकाली जाती है. वहीं कुछ मरीजों को सर्जरी के बाद रेडियोएक्टिव, आयोडीन थेरेपी की जरूरत पड़ सकती है, जो बचे हुए कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद करती है. इसके अलावा ज्यादातर मरीजों को जीवन भर थायरॉइड हार्मोन की दवाई लेनी होती है, जिससे शरीर की सामान्य क्रियाएं बनी रहती है और कैंसर दोबारा होने का खतरा कम होता है. वहीं इसमें एडवांस्ड थेरेपी की जरूरत बहुत कम लोगों को पड़ती है.

क्या थायराइड कैंसर से बचाव संभव है?

थायरॉइड कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है. लेकिन खतरे को कम जरूर किया जा सकता है. एक्सपर्ट्स अनावश्यक रेडिएशन एक्स्पोजर से बचने की सलाह देते हैं खासकर बचपन में. वहीं संतुलित आहार के जरिए पर्याप्त आयोडीन लेना भी थायरॉइड की सेहत के लिए जरूरी है, जिन लोगों को पहले थायरॉइड नोड्यूल, ऑटोइम्यून थायरॉयड बीमारी है उन्हें नियमित जांच कराते रहना चाहिए.

 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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