भारत में नशे की लत की समस्या तेजी से गंभीर होती जा रही है. लोकसभा में पेश ताजा आंकड़ों के अनुसार, हैदराबाद के ड्रग ट्रीटमेंट क्लिनिक (DTC) में नशे के आदी मरीजों की संख्या पिछले पांच साल में 1300 प्रतिशत बढ़ गई है. 2020-21 में जहां 701 मरीज थे, वहीं 2024-25 (जनवरी तक) यह आंकड़ा बढ़कर 9,832 तक पहुंच गया. विशेषज्ञों का कहना है कि इस बढ़ोतरी के पीछे कई कारण हैं, जैसे नशे के पदार्थों की आसान उपलब्धता, सस्ते दाम, महामारी के बाद बढ़ा तनाव और चिंता और उपचार सुविधाओं की मौजूदगी.

किस तरह के नशे का है असर?

इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ (IMH) के डॉक्टरों के मुताबिक, नशे की गिरफ्त में आने वाले ज्यादातर मरीज शराब, मिलावटी ताड़ी और गांजे के आदी होते हैं. हाल ही में जब आबकारी विभाग ने ताड़ी के ठिकानों पर छापेमारी की, तो withdrawal symptoms वाले मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई. एक समय ऐसा भी था जब यहां रोजाना करीब 100 मरीजों का इलाज किया जा रहा था.

देशभर में बढ़ रहा है नशे का जाल

हैदराबाद ही नहीं, देश के कई बड़े शहरों में भी नशे के मामलों में खतरनाक बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इंदौर में नशे के आदी मरीजों की संख्या 973 प्रतिशत बढ़ी है. मुंबई के गोकुलदास तेजपाल अस्पताल में यह बढ़ोतरी 775 प्रतिशत, नागपुर में 421 प्रतिशत और चेन्नई में 340 प्रतिशत तक पहुंच गई है. ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि नशे की समस्या केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरे देश में फैल रही है.

नशे के कारण और खतरे

नशे की बढ़ती लत के पीछे कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण है ड्रग्स और शराब की आसान उपलब्धता. दूसरा कारण है महामारी के बाद लोगों में बढ़ा तनाव और चिंता, जिसने उन्हें नशे की ओर धकेला. इसके अलावा नशे के नुकसान और इलाज के बारे में लोगों में जागरूकता की कमी भी एक बड़ी वजह है.

नशे का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, यह शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालता है. शराब और गांजा लिवर, हार्ट और ब्रेन को नुकसान पहुंचाते हैं. वहीं, LSD, MDMA जैसे सिंथेटिक ड्रग्स से मानसिक विकार, डिप्रेशन और सिज़ोफ्रेनिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं. लगातार नशा करने से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है.

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का हल केवल डिटॉक्स सेंटर बढ़ाने से नहीं होगा. इसके लिए निवारक कदम उठाने जरूरी हैं. स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए. मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग को बढ़ावा देना होगा. NDPS एक्ट के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. साथ ही परिवार और समाज को भी सहयोगी माहौल तैयार करना होगा.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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