Why HbA1c Test May Be Inaccurate In India: डायबिटीज की पहचान और निगरानी के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला HbA1c टेस्ट भारत में लाखों लोगों के लिए हमेशा सटीक नतीजे नहीं दे पा रहा है. यह बात प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Lancet Regional Health- Southeast Asia में प्रकाशित एक नई रिसर्च में सामने आई है. स्टडी के मुताबिक, भारत जैसे देशों में जहां एनीमिया और खून से जुड़ी बीमारियां आम हैं, वहां HbA1c पर पूरी तरह भरोसा करना भ्रामक हो सकता है.
इन मामलों में सटीक जानकारी नहीं
HbA1c टेस्ट पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर लेवल को मापता है. आमतौर पर 5.7 प्रतिशत से कम स्तर को नॉर्मल, 5.7 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत को प्रीडायबिटीज और 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा को डायबिटीज माना जाता है. लेकिन रिसर्च में बताया गया है कि जिन लोगों में एनीमिया, हीमोग्लोबिन से जुड़ी जेनेटिक गड़बड़ियां या G6PD एंजाइम की कमी होती है, उनमें यह टेस्ट गलत नतीजे दे सकता है.
इस स्टडी का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर अनूप मिश्रा, जो फोर्टिस सी-डॉक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज के चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि HbA1c पूरी तरह हीमोग्लोबिन पर निर्भर करता है. ऐसे में अगर हीमोग्लोबिन की मात्रा, संरचना या उसकी उम्र प्रभावित हो, तो ब्लड शुगर का सही अंदाजा नहीं लग पाता. उन्होंने चेतावनी दी कि सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहने से कुछ मरीजों में डायबिटीज की पहचान देर से हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में गलत डायग्नोसिस भी हो सकता है.
देश के कई हिस्सों में 50 प्रतिशत आबादी को आयरन की कमी
स्टडी के को-राइटर डॉ. शशांक जोशी के मुताबिक, शहरी अस्पतालों में भी रेड ब्लड सेल्स से जुड़ी दिक्कतें HbA1c के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में, जहां एनीमिया बहुत आम है, वहां यह समस्या और गंभीर हो जाती है. रिसर्च में यह भी बताया गया है कि भारत के कई हिस्सों में 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आयरन की कमी से जूझ रही है, जिससे HbA1c रीडिंग्स बिगड़ सकती हैं। कुछ मामलों में G6PD की कमी वाले पुरुषों में डायबिटीज की पहचान चार साल तक देर से हो सकती है, जिससे जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है.
एक्सपर्ट क्या देते हैं सुझाव?
एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि भारत जैसे देशों में डायबिटीज की जांच के लिए HbA1c को अकेले नहीं, बल्कि अन्य टेस्ट्स के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना चाहिए. इनमें ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट, ब्लड ग्लूकोज की नियमित मॉनिटरिंग, और बेसिक खून की जांच शामिल हैं. गंभीर मामलों में CGM और फ्रक्टोसामीन जैसे विकल्प भी उपयोगी हो सकते हैं. इस स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि एनीमिया-प्रभावित आबादी में HbA1c ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ नहीं रह जाता और डायबिटीज की सही पहचान के लिए परिस्थितियों के अनुसार जांच की तरीका अपनाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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