Trump Tariffs से सूरत के हीरा उद्योग पर संकट, निर्यात होगा प्रभावित; 400,000 कारीगरों की आजीविका पर संकट – surat diamond industry trump tariff impact 26 percent export decline usa market indian diamonds uncertainty 2024 – बिज़नेस स्टैंडर्ड

Trump Tariffs से सूरत के हीरा उद्योग पर संकट, निर्यात होगा प्रभावित; 400,000 कारीगरों की आजीविका पर संकट – surat diamond industry trump tariff impact 26 percent export decline usa market indian diamonds uncertainty 2024 – बिज़नेस स्टैंडर्ड


प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो क्रेडिट: Pexels

गुजरात में सूरत के मध्य में ​स्थित तंग गली एक पुराने मकान के तहखाने की ओर जाती है। वहां 20 से अ​धिक मोटरसाइकल इस तरह खड़ी हैं कि पैदल चलने वालों के लिए थोड़ी भी जगह नहीं बची है। किसी अजनबी को वह मकान बिल्कुल वीरान लग सकता है लेकिन कुछ ही कदम चलने पर उस वाणिज्यिक परिसर की एक मंजिल पर हीरे तराशने का काम होता है। हीरा भारत की एक सबसे मूल्यवान निर्यात वस्तु है। इस इकाई में 26 कारीगर कंधे से कंधा मिलाकर बैठे हैं। वे कई तरह के औजार और लेंस के साथ हीरा तराशने में लगे हैं। वे कच्चे हीरों को दिल, अंडाकार, पन्ना और मार्कीज जैसे बारीक आकार में काटने के लिए तमाम संख्याओं के घने ग्रिड से भरे पन्नों को बार-बार देखते हैं।

दुनिया भर में मौजूद हर 10 में से 9 हीरों को सूरत में ही तराशा जाता है। इस प्रकार सूरत कच्चे हीरे को तैयार उत्पाद में बदलने का एक वैश्विक केंद्र बन गया है। ऐसी इकाइयां शहर के हीरा उद्योग की रीढ़ हैं और ये प्राकृतिक हीरों के अलावा प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरों को भी तराशने में माहिर हैं। सूरत की करीब 5,000 हीरा इकाइयां अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजारों पर अत्य​धिक निर्भर हैं। मगर अमेरिका की शुल्क नीतियों ने हीरा तराशने वाली इन इकाइयों की चिंता बढ़ा दी है। 

रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के क्षेत्रीय निदेशक (सूरत) रजत वानी ने कहा, ‘इस प्रकार के शुल्क ढांचे का तात्कालिक प्रभाव यह होगा कि भारत और अमेरिका के बीच हीरा एवं आभूषण व्यापार ठप हो जाएगा। लोग ​स्थिति पर नजर रखते हुए चीजें स्पष्ट होने तक इंतजार करना चाहते हैं क्योंकि कई पहलुओं पर गौर करना होगा।’

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में जवाबी शुल्क की घोषणा की थी। इसी क्रम में भारत से रत्न एवं आभूषण के आयात पर 26 फीसदी शुल्क लगाया गया।

हालांकि ट्रंप ने जवाबी शुल्क को फिलहाल 90 दिन के लिए टाल दिया है, लेकिन अ​धिकतर वस्तुओं पर 10 फीसदी का बुनियादी शुल्क बरकरार रखा है। ऐसे में भारत का रत्न एवं हीरा उद्योग असमंजस की ​स्थिति में है।

तराशे गए हीरे और प्रयोगशाला में तैयार हीरे के अमेरिका में आयात पर कोई शुल्क नहीं लगता था, जबकि सोने के आभूषणों पर 5 से 7 फीसदी का शुल्क लगाया गया था। मगर ट्रंप प्रशासन के फैसले के बाद अब इन वस्तुओं पर क्रमशः 26 फीसदी और 31-33 फीसदी का शुल्क लगेगा।

वित्त वर्ष 2025 में हीरे के निर्यात के लिहाज से अमेरिका 32.35 फीसदी हिस्सेदारी के साथ भारत का सबसे बड़ा बाजार रहा। उसके बाद 26.22 फीसदी हिस्सेदारी के साथ संयुक्त अरब अमीरात और 16.41 फीसदी हिस्सेदारी के साथ हॉन्ग कॉन्ग का स्थान है।

अमेरिकी शुल्क ने पहले से ही सिकुड़ रहे इस बाजार को दोहरा झटका दिया है। जीजेईपीसी के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के वैश्विक हीरा निर्यात बाजार में सालाना 20.16 फीसदी की गिरावट आई है। अमेरिकी बाजार को होने वाले निर्यात में ही 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और वह वित्त वर्ष 2024 में 9.82 अरब डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 8.34 अरब डॉलर रह गया।

जीजेईपीसी के गुजरात क्षेत्र के अध्यक्ष जयंतीभाई एन सावलिया ने कहा, ‘आयात के लिए 90 दिन की अवधि होने के बावजूद शुल्क के बारे में अनिश्चितता बरकरार है। अगर 26 फीसदी शुल्क पर अमल किया गया तो इन उत्पादों पर मार्जिन को तगड़ा झटका लगेगा।’ 

सूरत के हीरा उद्योग में 8,00,000 से अधिक कुशल कर्मचारी कार्यरत हैं। हीरा तराशने वाली इकाइयों के प्रबंधकों का मानना है कि बाजार में लंबे समय तक नरमी और ट्रंप शुल्क के कारण 4,00,000 से अधिक कारीगरों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। हीरा इकाइयों ने निर्यात बाजार के भागीदारों के साथ दशकों पुराने कारोबारी संबंध स्थापित किए हैं। हीरा इकाई के प्रबंधकों ने कहा कि उनका मार्जिन काफी कम है और ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि ट्रंप प्रशासन से एक अंक में शुल्क लगाएगा।

फिलहाल 25 कारीगर वाली इकाई औसतन 2,000 कैरट मूल्य के हीरे तराशने के बाद निर्यात कर सकती है। हालांकि 5 अप्रैल तक ऑर्डर लगातार मिल रहे थे और निर्यातक लगातार माल भेज रहे थे।

मगर 9 अप्रैल को ट्रंप शुल्क की घोषणा होने के बाद कई विनिर्माताओं ने अनि​श्चितता के कारण भविष्य के ऑर्डर के लिए उत्पादन लगभग बंद कर दिया है। आयातकों ने भी भारतीय निर्यातकों को 10 अप्रैल के बाद आपूर्ति को फिलहाल टालने के लिए कहा है।

सावलिया ने कहा, ‘अगर आपूर्ति के लिए उत्पादन नहीं हुआ तो सभी ऑर्डर रद्द कर दिए जाएंगे। 26 फीसदी शुल्क पर शायद ही कोई खेप अमेरिका पहुंचेगी।’

साल 2023 में वै​श्विक हीरा निर्यात 75.6 अरब डॉलर का रहा जिसमें भारत की हिस्सेदारी 22.9 फीसदी पर सबसे अ​धिक रही। गौर करने वाली बात यह भी है कि ट्रंप शुल्क के कारण भारतीय हीरा व्यापार को भले ही झटका लगेगा लेकिन इससे अमेरिका को भी नुकसान होगा क्योंकि वह काफी हद तक भारतीय हीरा आयात पर निर्भर है।


First Published – April 20, 2025 | 10:49 PM IST



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सारंगपुर-पड़ाना: साफे-पगड़ी का गढ़ अब साड़ी पर निर्भर, बुनकरों का हुनर सहेज रहा परंपरा और भविष्य – sarangpur falling stronghold of safi turban now saving the skills and future of weavers dependent on sarees – बिज़नेस स्टैंडर्ड

सारंगपुर-पड़ाना: साफे-पगड़ी का गढ़ अब साड़ी पर निर्भर, बुनकरों का हुनर सहेज रहा परंपरा और भविष्य – sarangpur falling stronghold of safi turban now saving the skills and future of weavers dependent on sarees – बिज़नेस स्टैंडर्ड


कई दशक पहले मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले का सारंगपुर कस्बा अपनी पगड़ी और साफों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। साफे और पगड़ी यहां आज भी बनते हैं मगर इनका चलन घटने के कारण बुनकर दूसरे कामों में हाथ आजमाने लगे हैं। अब यहां साड़ियां बन रही हैं और सूटिंग-शर्टिंग के लिए भी कपड़ा तैयार किया जा रहा है।

सारंगपुर से कुछ किलोमीटर के फासले पर बसा पड़ाना गांव बहुत अरसे से ‘बुनकरों का गांव’ कहलाता है। इस गांव के बुनकरों की चादरों को उम्दा सूती कपड़े और हाथ की बारीक बुनाई ने अलग ही पहचान दी है। इनमें रंगों का बेहद शानदार मेल होता है और ये चादरों गर्मी में ठंडक तथा सर्दी में गर्माहट देती हैं। पड़ाना में चादरों के साथ ही अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली गाज-पट्टी और सफेद चादरें भी बन रही हैं।

साफे का गढ़ था सारंगपुर

सारंगपुर में हैंडलूम चला रहे मोहम्मद अब्दुल गफ्फार अंसारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि रजवाड़ों के समय से ही यहां साफा-पगड़ी बनती आई हैं। देवास रियासत के मराठों के लिए साफा-पगड़ी खास तौर पर यहीं बनती थी। सारंगपुर के चांद बाबा को देवास रियासत ने इनाम में यहां जमीन दी थी। उसके बाद यहां साफा-पगड़ी बनाने का चलन बढ़ता चला गया। यहां बने साफा और पगड़ी ग्वालियर रियासत में भी जाने लगे। चूंकि व्यापारी भी साफा-पगड़ी बांधते हैं, इसलिए उनके लिए भी माल यहीं तैयार होने लगा। सारंगपुर में 50 मीटर तक लंबी पगड़ी बनाई जाती है।

स्थानीय बुनकर मकसूद अंसारी कहते हैं कि आधुनिक दौर में साफा-पगड़ी पहनने का चलन कम हुआ है। राजवाड़े खत्म हो गए हैं और नई पीढ़ी के कारोबारी भी साफा-पगड़ी नहीं पहनते। इसलिए मांग पहले से बहुत कम हो गई है मगर देहाती इलाकों में और शहरों की शादियों में साफा-पगड़ी का फैशन होने के कारण यह हुनर अब भी जिंदा है। सारंगपुर में 100 रुपये से 500 रुपये तक कीमत के साफा-पगड़ी बनते हैं।

साफे से साड़ियों तक

सारंगपुर को साफा-पगड़ी का गढ़ माना जाता है मगर मांग कम होने के साथ ही बुनकरों ने दूसरे धंधे तलाशने शुरू कर दिए। गफ्फार ने बताया कि पगड़ी की मांग घटी तो चादरें बनने लगीं। कुछ अरसा बाद साड़ियों की बुनाई भी यहां शुरू हो गई।

गफ्फार कहते हैं, ‘चादर तो सभी बना रहे थे, इसीलिए मैंने कुछ नया करने का फैसला किया। चूंकि यहां चादरें हैंडलूम पर बनती हैं तो मैंने भी हैंडलूम पर साड़ी बनाने की कोशिश की। मध्य प्रदेश में चंदेरी और महेश्वर की साड़ियां दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इसलिए मैंने कई साल पहले साड़ी ही बनाने की बात सोची और बुनाई सीखने के लिए चंदेरी और महेश्वर गया। शुरू में मुश्किल आई और वैसी साड़ी बनाने में बहुत माल बरबाद भी हुआ। मगर धीरे-धीरे मैं और मेरे हैंडलूम के बुनकर इसमें माहिर हो गए।’

बकौल गफ्फार अंसारी, इस समय इस समय सारंगपुर में 30-35 बुनकर हैंडलूम पर साड़ी बना रहे हैं और चंदेरी तथा महेश्वर के कारोबारी उनके बड़े खरीदार हैं। उनसे ऑर्डर आने पर ही साड़ियां बनाई जाती हैं क्योंकि ये बिकती चंदेरी और महेश्वर के नाम से ही हैं। 

मकसूद ने कहा कि साफा-पगड़ी के बजाय अब साड़ियां ही सारंगपुर की पहचान बन रही हैं। यहां के हैंडलूम मालिक देश भर में व्यापार मेलों में जाकर भी माल बेच आते हैं। यहां कोटा मसूरिया साड़ी भी बनती हैं। साथ ही चादरें और सूटिंग-शर्टिंग का माल भी बनता है।

बुनकरों के गांव में बनती हैं चादरें

सारंगपुर में बुनाई का काम करने वाले ज्यादातर बुनकर पड़ाना गांव के हैं। पड़ाना में घरों में इस्तेमाल होने वाली चादरों के साथ ही अस्पताल के लिए चादरें भी बन रही हैं। साथ ही घाव पर लगाने के लिए गाज-पट्टी भी यहां बड़े पैमाने पर बनती है। पड़ाना के बुनकर मोहम्मद नवाब अंसारी ने बताया कि अस्पतालों के लिए सादा सफेद चादरें बनती हैं मगर घरों में इस्तेमाल के लिए चटख रंगों वाली खूबसूरत चादरें बनाई जाती हैं। 

मुश्किलों से गुजर रहे बुनकर

सारंगपुर-पड़ाना की चादरें, साफा-पगड़ी और साड़ियां लोगों को पसंद आ रही हैं और यहां की गाज-पट्टी मरीजों के घाव भर रही हैं मगर यहां के बुनकरों का दर्द कम नहीं हो रहा। नवाब अंसारी कहते हैं कि मार्केटिंग की समस्या उन लोगों को सबसे ज्यादा सता रही है क्योंकि माल बेचना दूभर हो जाता है। इस इलाके की चादरों का सबसे बड़ा खरीदार मृगनयनी एंपोरियम है। मगर वह रेशम की साड़ी में दिलचस्पी नहीं दिखाता। गफ्फार अंसारी के मुताबिक चंदेरी और महेश्वर के कारोबारी साड़ी खरीदते हैं मगर बड़े खरीदार नहीं हैं।

इसी तरह पड़ाना के बुनकर अशफाक मंसूरी कहते हैं कि गाज-पट्टी और अस्पतालों की चादरें पूरी तरह सरकारी खरीद पर निर्भर हैं। अगर सरकार नहीं खरीदेगी तो धंधा ही चौपट हो जाएगा। नवाब को संकट दिख रहा है क्योंकि अस्पतालों को हैंडलूम से बनी चादरें या गाज-पट्टी पावरलूम से बने माल की तुलना में महंगी पड़ती हैं। सरकार शायद हथकरघों को जिंदा रखने के लिए ही अभी तक इनकी खरीद कर रही है मगर उसने जिस दिन हाथ खड़े किए, पड़ाना का हुनर मर जाएगा।


First Published – April 20, 2025 | 10:30 PM IST



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सोने पर कर्ज अब होगा महंगा! RBI के नए नियमों से बढ़ेगी लागत, NBFC और बैंकों पर दोहरा दबाव – debt on gold will now be expensive rbis new rules will increase cost nbfc and double pressure on banks – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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गोल्ड लोन पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मसौदा दिशानिर्देश अपने मौजूदा स्वरूप में ही लागू हुए तो बैंकों एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर खर्च का बोझ बढ़ सकता है। बैंकिंग क्षेत्र के लोगों एवं विशेषज्ञों ने यह अंदेशा जताया है। इस मसौदा दिशानिर्देश के अनुसार बैंक और एनबीएफसी को अपनी सभी शाखाओं में मानक कागजी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसके अलावा, सोना के बदले ऋण देने वाली इकाइयों को ठोस वसूली एवं गणना विधियां  भी अपनानी होंगी ताकि किसी तरह की चूक की गुंजाइश नहीं रहे।

गोल्ड लोन देने वाली एक बड़ी एनबीएफसी के अधिकारी ने कहा, ‘इस समय कलेक्शन, कागजी प्रक्रिया और गणना विधि आदि पर 2 प्रतिशत लागत बैठती है। मगर आरबीआई के मसौदा दिशानिर्देश अपने मौजूदा स्वरूप में लागू हुए तो यह लागत बढ़कर 4-5 प्रतिशत हो जाएगी।‘ अधिकारी ने कहा कि शाखाओं को मानकीकरण प्रक्रिया तेजी से पूरी करनी होगी जिससे स्वर्ण ऋण मंजूर करने की प्रक्रिया पर खर्च बढ़ जाएगा।

मसौदा दिशानिर्देश के अनुसार गिरवी रखे सोने की शुद्धता, इसका भार (सकल एवं शुद्ध दोनों) आदि की जांच के लिए कर्जदाता संस्थानों को एक मानक प्रक्रिया तैयार करनी होगी। यह विधि संबंधित कर्जदाता की सभी शाखाओं में समान रूप से लागू होगी। इसके अलावा संस्थानों को सोने की जांच के लिए ऐसे जांचकर्ताओं को नियुक्त करना होगा जिनका पिछला कामकाज बेदाग रहा हो। मसौदा दिशानिर्देशों के अनुसार कर्जदाता संस्थानों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सोना गिरवी लेते एवं ऋण चुकता होने के समय या भुगतान नहीं होने की सूरत में नीलामी के समय सोने की शुद्धता और उसके शुद्ध भार की गणना की विधि में किसी तरह की भिन्नता न हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन तमाम शर्तों के कारण बैंकों एवं एनबीएफसी की परिचालन लागत बढ़ जाएगी क्योंकि उन्हें समीक्षा कर्ता के तौर पर विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को नियुक्त करना होगा।

इक्रा में समूह प्रमुख (वित्तीय क्षेत्र रेटिंग्स) अनिल गुप्ता कहते हैं, ‘नए दिशानिर्देश लागू होने से अनुपालन खर्च बेशक बढ़ जाएगा क्योंकि इस समय सोने के बदले ऋण देते समय कर्जधारक की आय की जांच नहीं होती है। मगर अब उन्हें शाख मूल्यांकन ढांचे में उनकी आय का भी जिक्र करना होगा। इससे प्रक्रियागत खर्च काफी बढ़ जाएगा क्योंकि गोल्ड लोन देने वाली इकाइयों को इस काम में पारंगत लोगों को नियुक्त करना होगा। यानी इससे संचालन के स्तर पर अधिक सतर्कता बरतनी होगी और लोन टू वैल्यू (एलटीवी) 75 प्रतिशत निर्धारित होने से कारोबार पर भी असर होगा।‘

फिच रेटिंग ने कहा कि आरबीआई के मसौदा दिशानिर्देश से संचालन से जुड़ी जटिलता, खासकर छोटी कंपनियों के लिए, बढ़ जाएगी। इस रेटिंग एजेंसी के अनुसार इन बदलावों से प्रक्रियागत बोझ बढ़ जाएगा। एनबीएफसी के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में लागत बढ़ जाएगी क्योंकि वहां आय का अनुमान लगा पाना अधिक मुश्किल होता है। वित्तीय संस्थानों को गोल्ड लोन योजनाओं में बदलाव करने पड़ सकते हैं।

एक निजी बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘हमें अधिक लोग रखने होंगे। इस समय किसी शाखा में समीक्षा कर्ता के तौर पर 4-5 लोग काम करते हैं तो मसौदा दिशानिर्देश लागू होने के बाद 8-10 लोगों की जरूरत पेश आएगी। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की आय की जांच करने से भी बैंकों पर बोझ बढ़ जाएगा।’


First Published – April 20, 2025 | 10:17 PM IST



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Yogi Govt ने गन्ना किसानों, चीनी मिल मालिकों के लिए किया बड़ा एलान – yogi govt made a big announcement for sugarcane farmers sugar mill owners – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने गन्ना एवं चीनी उद्योग के सकल मूल्य उत्पादन (ग्रॉस वैल्यू आउटपुट) को 1.62 लाख करोड़ रूपये तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। प्रदेश सरकार ने इसके लिए वर्ष 2027-28 तक गन्ना उत्पादन में 7 फीसदी और गुड़ उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि का लक्ष्य रखा है।

उत्तर प्रदेश को वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य में योगदान के लिए  चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग ने कार्ययोजना तैयार की है। विभाग ने वर्ष 2027-28 तक गन्ना और चीनी उद्योग के ग्रॉस वैल्यू आउटपुट (जीवीओ) को मौजूदा 1.32 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.62 लाख करोड़ रुपये से अधिक करने का लक्ष्य रखा है।

चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में जीवीओ में लगातार वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2023-24 में यह 1,24,198 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 1,32,024 करोड़ रुपये हो गया है और 2027-28 तक इसे 1.62 लाख करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। इस दौरान गन्ना व गुड़ उत्पादन क्रमश 7 व 10 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर हासिल करने का लक्ष्य है।

विभाग द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए तैयार विस्तृत कार्ययोजना के तहत चीनी मिलों की रिकवरी दर को 9.56 फीसदी से बढ़ाकर 10.50 फीसदी तक ले जाना शामिल है। इसके अलावा, 91.54 लाख क्विंटल भण्डारित चीनी की समय पर बिक्री सुनिश्चित की जाएगी, ताकि औसत हानियों को नियंत्रित किया जा सके। भण्डारण क्षमता में 4 लाख क्विंटल की वृद्धि करने और कुशल कर्मचारियों को 15 मई 2025 तक आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त करने की भी योगी सरकार की योजना है। साथ ही, सरकार से वर्तमान में मिलने वाली लगभग 1200 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता को कम करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे उद्योग आत्मनिर्भर बने।

गन्ना एवं चीनी उद्योग विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सरकार ने 65 लाख पंजीकृत और 46.5 लाख आपूर्तिकर्ता गन्ना किसानों को सीधा लाभ पहुंचाया है। मार्च 2025 तक सरकार ने 2.80 लाख करोड़ रुपये से अधिक का गन्ना मूल्य भुगतान किया है जबकि वर्ष 2016-17 की तुलना में गन्ना क्षेत्रफल में 43 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके सथ ही उत्पादकता में 16 फीसदी और उत्पादन में 68 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, 52 चीनी मिलों का आधुनिकीकरण किया गया है और करीब 8 हजार किलो लीटर प्रति दिन की क्षमता के साथ एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है।

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First Published – April 20, 2025 | 7:49 PM IST



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गुवाहाटी में चाय नीलामी में बना रिकार्ड, 2024-25 में बिकी 17 करोड़ किलो चाय – record 2024 25 sold in tea auction in guwahati sold 17 million kg of tea – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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गुवाहाटी चाय नीलामी केंद्र (GTAC) ने वित्त वर्ष 2024-25 में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चाय की अधिक बिक्री दर्ज की, साथ ही प्रति किलोग्राम औसत कीमत में भी इजाफा हुआ है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। नीलामी केंद्र से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि बॉउट लीफ फैक्टरीज़ (BLFs) द्वारा उत्पादित चाय को भी बीते वित्त वर्ष में अच्छा और लाभदायक मूल्य मिला।

गुवाहाटी टी ऑक्शन बायर्स एसोसिएशन के सचिव दिनेश बिहानी ने बताया, “GTAC ने वित्त वर्ष 2024-25 में 169.13 मिलियन किलोग्राम चाय की बिक्री की, जिसकी औसत कीमत ₹227.70 प्रति किलोग्राम रही। यह पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले वृद्धि है, जब 166.34 मिलियन किलोग्राम चाय की औसत ₹183.20 प्रति किलोग्राम की दर पर बिक्री हुई थी — यानी ₹44.50 प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी दर्ज हुई है।”
बिहानी ने कहा कि चालू वित्त वर्ष में कुल बिक्री कारोबार लगभग ₹3,851 करोड़ आंका गया है। BLFs को पूरे वर्ष “मजबूत और लाभकारी कीमतें” मिलीं। इनमें से बेजोपाथर क्षेत्र की कुछ चाय ₹471 प्रति किलोग्राम तक बिकीं। असम के सभी जिलों में धेमाजी जिले की BLFs की चाय को बीते वित्त वर्ष में सबसे ऊंचा दाम मिला।

GTAC टी लाउंज के चेयरमैन के रूप में भी कार्यरत बिहानी ने बताया कि नीलामी केंद्र अपने इन-हाउस टी लाउंज के माध्यम से ‘सिंगल ओरिजिन’ असम चाय को सक्रिय रूप से प्रमोट कर रहा है। यह लाउंज अब पर्यटकों के लिए एक लोकप्रिय स्थान बन गया है, जहां वे असली और उच्च गुणवत्ता वाली असम चाय खरीदते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में इस टी लाउंज ने चाय प्रचार और खुदरा बिक्री से ₹1 करोड़ से अधिक का टर्नओवर दर्ज किया है।

सितंबर तिमाही में कैसा रहा था कारोबार

सितंबर तिमाही में चाय बागान कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि दर्ज की गई। इससे चाय की कीमतों में तेजी का पता चलता है। प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ जिससे कीमतों में इजाफा हुआ। अनियमित बारिश के बाद लंबे समय तक सूखे के कारण चाय उत्पादन में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 7.67 करोड़ किलोग्राम की कमी आई। उत्तर भारत से चाय उत्पादन में करीब 6.3 करोड़ किलोग्राम का नुकसान हुआ जिससे थोक कीमतों में तेजी आई। चाय के कुल उत्पादन में उत्तर भारत की हिस्सेदारी 82 फीसदी से अधिक है।

चाय बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर 2024 तक उत्तर भारत में औसत नीलामी मूल्य 247.33 रुपये प्रति किलोग्राम था जो एक साल पहले की इसी अवधि के मुकाबले 23.98 फीसदी अधिक है। दक्षिण भारतीय चाय का औसत मूल्य 126.22 रुपये प्रति किलोग्राम एक साल पहले की अवधि के मुकाबले 16.19 फीसदी अधिक था। इसी प्रकार चाय का अखिल भारतीय औसत मूल्य 215.34 रुपये प्रति किलोग्राम था जो एक साल पहले की अवधि के मुकाबले 22.01 फीसदी अधिक है।

(एजेंसी इनपुट के साथ) 

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First Published – April 20, 2025 | 4:19 PM IST



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Trump Tariffs ने आंध्र प्रदेश के झींगा किसानों को डुबोया, कारोबार में भारी गिरावट; कीमतें 15% तक गिरी – trump tariffs drowns a huge fall in andhra pradesh shrimp farmers to fall down to 15 – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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अमेरिका में झींगे को अक्सर ‘राष्ट्रीय जुनून’ माना जाता है। वहां इसे विभिन्न रूपों में खाया जाता है। उसे बैटर में पकाकर, तलकर, भाप में पकाकर, उबालकर अथवा कॉकटेल सॉस के साथ परोसा जाता है। इसलिए 2 अप्रैल को जब डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की तो देश भर के झींगा प्रेमी सबसे अ​धिक मायूस हो गए। 

अमेरिका से करीब 13,000 किलोमीटर अधिक दूर आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के लक्ष्मीपुरम-पल्लीपलेम क्षेत्र के हरेभरे इलाके में बुजुर्ग झींगा किसान केबी गंगाधर राव ने जवाबी शुल्क के बारे में कभी नहीं सुना था। लेकिन अब वह तेलुगु, टूटी-फूटी अंग्रेजी और हिंदी की मिलीजुली भाषा में ट्रंप शुल्क के प्रभाव को साफ तौर पर बता पा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘ट्रंप मेरे झींगा कारोबार को नुकसान पहुंचा रहे हैं।’ राव जैसे तमाम झींगा किसानों को हाल के वर्षों में वायरस की मार झेलनी पड़ी थी। अब उन्हें अमेरिका में उच्च शुल्क का दंश महसूस हो रहा है क्योंकि इससे झींगे की कीमतों में 10-15 फीसदी की गिरावट दिख सकती है। उन्हें लगता है कि ट्रंप शुल्क उनकी पूरी कमाई को ही खत्म कर देगा।

यह केवल राव की ही कहानी नहीं है। आंध्र प्रदेश में 1.4 लाख से अ​धिक किसान और करीब 20 लाख लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर जलीय कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। राज्य में यह क्षेत्र करीब 2.12 लाख हेक्टेयर में फैला हुआ है जहां मछली के साथ-साथ झींगे का भी पालन किया जाता है। हालांकि अमेरिका को केवल 50 से कम काउंट की सीमा में सिर्फ श्रिम्प  किस्म का ही निर्यात किया जाता है, लेकिन 100, 90, 80, 70 और 60 काउंट वाली अन्य किस्मों की कीमतों में भी भारी गिरावट देखी गई है। इन किस्मों को मुख्य तौर पर चीन, यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया, जापान एवं अन्य एशियाई बाजारों में भेजा जाता है।

राव ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘कोविड महामारी के बाद से ही हम संघर्ष कर रहे हैं। बीमारी एक प्रमुख चिंता की बात है। पिछले पांच साल के दौरान न केवल उपकरणों और दवाओं के दाम बढ़े हैं ब​ल्कि बिजली दरें भी बढ़ गई हैं। कुछ साल पहले तक 60 काउंट वाले झींगे के लिए मुझे करीब 400 रुपये मिलते थे, लेकिन अब बमु​श्किल 300 रुपये मिल पा रहे हैं।’

झींगे के आकार को प्रति किलोग्राम संख्या के आधार पर मापा जाता है। अगर एक किलोग्राम में झींगे की संख्या कम है तो उसका मतलब वह बड़े आकार में है। राव ने एक संवाददाता से बातचीत करते हुए उम्मीद जताई कि उनकी चिंताएं राज्य या केंद्र सरकार तक पहुंच सकती हैं। ट्रंप की घोषणा के बाद कीमतों में औसतन 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट आई है। मुख्य रूप से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले 30-50 गिनती वाले झींगे का भाव अब 300 से  415 रुपये प्रति किलोग्राम है।

ऑनलाइन खबरों के अनुसार, न्यूयॉर्क शहर में झींगे की कीमतें 6.99 से 39 डॉलर प्रति पौंड (लगभग आधा किलोग्राम) तक हैं। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि झींगा किसानों को वह कीमत नहीं मिल पा रही है जिसके वे हकदार हैं। झींगा उत्पादन से जुड़े एक कर्मचारी एम राम ने झिझकते हुए बताया कि उन्हें 13,000 रुपये महीना वेतन मिलता है। यह इस बात का संकेत है कि किसी उत्पाद का उचित मूल्य रास्ते में ही किस प्रकार खो 

जाता है। पल्लीपलेम से करीब 10 किलोमीटर दूर पश्चिमी गोदावरी जिले के भीमावरम मंडल में गुटलापाडु नामक एक गांव है। गुटलापाडु की यात्रा करने पर पता चलता है कि तटीय आंध्र प्रदेश में झींगा पालन का क्या मतलब है।  

पश्चिमी गोदावरी जिले के भीमावरम मंडल में गुटलापाडु में झींगा फार्म से लेकर नहरों और तालाबों तक हर जगह खारा पानी है जो तटीय आंध्र की खूबसूरती को दर्शाता है। ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था झींगा कारोबार पर ही निर्भर है। उसी इलाके के 30 वर्षीय युवा किसान हरि हर वर्मा ने झींगा व्यवसाय के उतार-चढ़ाव के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘यह एक ऐसा कारोबार है जिसके बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कभी-कभी पूरा उत्पादन ही वायरस के चपेट में आ जाता है और हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। इससे हमें काफी नुकसान होता है।’ वर्मा ने अपनी रॉयल एनफील्ड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्टिकर लगा रखा था। उन्होंने उसी बाइक पर बिठाकर हमें गुटलापाडु की संकरी, ऊबड़-खाबड़ सड़कों से होते हुए झींगा फार्मों को दिखाया। वर्मा ने अपने राजनीतिक विचार भी साझा किए। उन्होंने कहा, ‘युवाजन श्रमिक रैयतु कांग्रेस पार्टी की सरकार के कार्यकाल में हमारी सारी रियायतें छीन ली गईं। हमें बिजली सब्सिडी जैसी मदद भी नहीं मिली।’

गुटलापाडु के कोठा पुसलामारु इलाके में विश्वनाथ राजू ने आंध्र प्रदेश में झींगा पालन का इतिहास बताया। उनके पिता ने 1986 में झींगा पालन शुरू किया था। उस दौरान झींगे की वैश्विक मांग में उछाल आई थी। उन्होंने कहा, ‘1990 के दशक के आखिर में चंद्रबाबू नायडू सरकार ने झींगा कारोबार को बढ़ावा दिया जिससे हमारी जिंदगी बदल गई। अब मेरे पास करीब 60 एकड़ का झींगा फार्म है।’ जब उनके पिता ने झींगा पालन का काम शुरू किया था तो ब्लैक टाइगर झींगा (पेनियस मोनोडॉन) और कुछ हद तक भारतीय सफेद झींगा (पेनियस इंडिकस) ही बाजार में बिकते थे। बाद में इस कारोबार को व्हाइट स्पॉट सिंड्रोम वायरस ने बुरी तरह प्रभावित किया। पर्यावरण प्रेमियों की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तटीय जल में झींगा पालन पर प्रतिबंध लगा दिया। मगर संसद में पारित एक कानून के जरिये किसानों को झींगा जलीय कृषि दोबारा शुरू करने में मदद मिली।

हालांकि भारतीय किस्मों में बीमारी, सुस्त वृद्धि और आकार में भिन्नता जैसी समस्या बनी रही। इन समस्याओं से निपटने के लिए भारत ने 2008 में विशिष्ट रोगजनक मुक्त प्रशांत सफेद झींगा (लिटोपेनेअस वन्नामेई) की शुरुआत की। यह एक ऐसा कदम था जो आंध्र प्रदेश के किसानों के लिए एक जबरदस्त बदलाव साबित हुआ। एक अन्य किसान वेणुगोपाल राजू करीब 30 एकड़ में झींगा पालन करते हैं। उन्होंने कहा, ‘अब हम केवल वन्नामेई का ही पालन करते हैं।’ भारत के कुल झींगा निर्यात में वन्नामेई की हिस्सेदारी 87 फीसदी है और उसका मूल्य करीब 4.25 अरब डॉलर है। केवल अमेरिका को ही 54 फीसदी निर्यात किया जाता है। उसके बाद चीन को 16 फीसदी और यूरोपीय संघ को 9 फीसदी निर्यात किया जाता है।

सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय समिति सदस्य जगदीश थोटा ने कहा, ‘कुछ तिमाहियों से कीमतों में गिरावट के बारे में जारी चिंताएं सही नहीं हैं। घबराहट के कारण कीमतों में सभी किस्मों के लिए करीब 40 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट आई थी। मगर अब उसमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। साथ ही अमेरिकी खरीदार अतिरिक्त शुल्क के प्रभाव को झेलने के लिए तैयार हैं। उसका बोझ किसानों पर नहीं डाला जा सकता है।’ उन्होंने कहा कि अभी भी इक्वाडोर जैसे प्रतिस्पर्धियों पर भारत की बढ़त बरकरार है।

बहरहाल तमाम तर्क-वितर्क के बीच भारत के झींगा किसान ट्रंप की नीतियों और अनिश्चितताओं के बीच फंसे हुए हैं।


First Published – April 18, 2025 | 11:00 PM IST



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