जलवायु परिवर्तन की मार: गर्मी से किसान परेशान, फल-सब्जियों की कीमतों में उबाल; उत्पादन में गिरावट – climate change causes farmers to fall in the prices of troubled fruit vegetables due to heat – बिज़नेस स्टैंडर्ड

जलवायु परिवर्तन की मार: गर्मी से किसान परेशान, फल-सब्जियों की कीमतों में उबाल; उत्पादन में गिरावट – climate change causes farmers to fall in the prices of troubled fruit vegetables due to heat – बिज़नेस स्टैंडर्ड


प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो क्रेडिट: Pexels

बीते कुछ वर्षों से पारा तेजी से चढ रहा है। इस गर्म मौसम का न केवल मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि फल-सब्जी खासकर पेरिशेबल( जल्द खराब होने वाली) पर भी जलवायु परिवर्तन की मार पड़ रही है। मौसम में आ रहे इस भारी उतार-चढ़ाव से इन फल सब्जियों की फसल को नुकसान हो रहा है। इससे न केवल उत्पादकता में कमी देखने को मिल मिल रही है, बल्कि इनकी गुणवत्ता पर भी असर देखने को मिल रहा है। असमय अधिक गर्मी या बारिश से फसल चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

प्रतिकूल मौसम से उत्पादन घटने पर उपभोक्ताओं को तो महंगे दाम पर ये फल सब्जियां खरीदनी पड़ती हैं। लेकिन किसानों की जेब फिर भी खाली रह जाती है क्योंकि कुल उपज कम होने से उनकी कुल आमदनी घटती है। साथ ही साथ उन्हें उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत के अनुरूप उनकी उपज का काफी कम दाम मिलता है। इसकी वजह बिचौलियों द्वारा कमाई करना है। जानकारों का कहना है कि इस जलवायु परिवर्तन के कारण फल-सब्जियों की खेती पर पड़ रही मार से बचाने के लिए गर्म मौसम को सहन करने वाली किस्में विकसित करने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान व विकास प्रतिष्ठान (एनएचआरडीएफ) के पूर्व निदेशक आर पी गुप्ता ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि 5-7 साल पहले तापमान 30 से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता था। अब अप्रैल में ही यह 40 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाता है। मई-जून के दौरान तो यह 40 से 48 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने लगा है। इस बढ़ते पारे से लोगों को गर्मी से तो परेशान होना ही पड़ता है, साथ ही इसकी खासकर जल्द खराब होने वाली फल सब्जियों पर भी मार पड़ रही है। अधिक तापमान से इनका बाहरी हिस्सा खराब होने लगता है। जिससे इनका विकास ढंग से नहीं हो पाता है। इसका सीधा असर इन फल सब्जी के उत्पादन पर दिखता है।

भारतीय सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के किसान श्रीराम गाढवे कहते हैं कि फूल आने के दौरान अधिक तापमान सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है क्योंकि अधिक गर्मी से फूल मुरझाने लगते हैं। अधिक तापमान से फल-सब्जियों पर वायरस भी हमला करते हैं। जिससे कई बार जल्द खराब होने वाली फल सब्जियों का उत्पादन 30 से 40 फीसदी घट जाता है।

महाराष्ट्र के पुणे जिले में टमाटर, मिर्च,प्याज व अन्य सब्जियों की खेती करने वाले सचिन गाटे कहते हैं कि ज्यादा गर्मी के कारण फल-सब्जियों का विकास रुक जाता है। टमाटर में पल्प कम हो जाता है और इसका आकार भी टेढ़ा मेढ़ा होने की शिकायत आती है। साथ ही इसका उत्पादन पर असर पड़ता है। गर्मी से बचाने के लिए किसानों का खर्चा भी करना पडता है। ताकि फसल खराब न हो और बीमारी भी न लगे। गाटे ने कहा कि टमाटर में तुड़ाई तक एक एकड़ की लागत इस समय डेढ़ लाख रुपये के करीब है। पांच साल पहले यह एक लाख रुपये से काफी कम थी। इस साल तो टमाटर की खेती में काफी घाटा हो रहा है। इस समय किसानों को दो-तीन रुपये किलो टमाटर के दाम मिल रहे हैं।

अखिल भारतीय सेब उत्पादन संघ के अध्यक्ष और हिमाचल के सेब किसान रविंद्र चौहान ने बताया कि जलवायु परिवर्तन की मार सेब पर भी पड़ रही है। सेब के लिए ठंडा मौसम बहुत जरूरी है। गर्मी अधिक पड़ने से सेब के मौसम का चक्र बदल गया है। समय पर बर्फ न पड़ने और बारिश न होने के कारण सेब की फसल प्रभावित हो रही है। बीते कुछ वर्षों के दौरान तापमान में तेजी से हो रही बढ़ोतरी के कारण सेब के पौधे भी सूख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण सेब का उत्पादन गिर  रहा है।  बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने कहा कि ज्यादा गर्मी से लीची की फसल भी प्रभावित हो रही है। अब नवंबर-दिसंबर में भी मौसम गर्म ही रहता है। इस दौरान पहले जितना ठंडा मौसम नहीं रहता है।

इस साल अप्रैल में भी अच्छी खासी गर्मी पड़ रही है। इसका लीची की फसल पर बुरा असर पड़ा है। बीते वर्षों में मौसम ज्यादा गर्म रहने के कारण लीची का उत्पादन साल दर साल कम ही हो रहा है। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 5 साल पहले देश में 7 लाख टन से अधिक लीची का उत्पादन होता था, जो अब घटकर 6 लाख टन से भी कम रह गया है। खास बात यह है कि लीची के रकबा में कमी नहीं आई है। इसका रकबा 97 से 99 हजार हेक्टेयर के बीच बना हुआ है।

गर्मी सहन करने वाली किस्में विकसित करने पर दिया जाए बल

ग्वालियर और जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति रह चुके विजय सिंह तोमर कहते हैं कि बीते वर्षों में गर्मी तेजी से बढ़ने के कारण सभी कृषि फसलें प्रभावित हो रही हैं। लेकिन जल्द खराब होने वाली फल सब्जियों को अधिक नुकसान हो रहा है। इसलिए इस नुकसान से बचने के लिए गर्मी को सहन करने वाली किस्में विकसित करने की जरूरत है। जैसा गेहूं के मामले में किया जा चुका है। साथ ही फसलों का पैटर्न भी बदलने की आवश्यकता है। 

गुप्ता ने कहा कि बागवानी फसलों में गर्मी सहन करने वाली कुछ किस्में विकसित हुई हैं। लेकिन उनका परिणाम बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसलिए इन किस्मों पर और काम करने की जरूरत है। गाढवे ने कहा फल-सब्जियों में बदलते मौसम के अनुरूप नई किस्में नहीं आ रही है। सरकार को इन पर ध्यान देने की जरूरत है।

उपभोक्ता व किसान दोनों पर गर्मी का सितम

जलवायु परिवर्तन की किसान और उपभोक्ता दोनों पर मार पड़ रही है। गाटे ने कहा कि दो साल पहले उपभोक्ताओं को टमाटर के लिए 300 रुपये तक दाम चुकाने पड़े थे। इतने महंगे टमाटर के बावजूद किसानों की झोली उतनी नहीं भर पाई, जितनी उपभोक्ताओं की जेब ढीली हुई। क्योंकि किसानों के पास उपज कम थी और उपभोक्ताओं को जिस भाव पर टमाटर बेचा गया, उसका तीसरा हिस्सा भी किसानों को नहीं दिया गया। इस समय भी उपभोक्ताओं को खुदरा बाजार में टमाटर 20 रुपये किलो मिल रहा है, जबकि किसानों को इसकी कीमत 5 रुपये भी नहीं मिल पा रही है। 

चौहान ने कहा कि उत्पादन घटने से सेब के दाम तो बढ जाते हैं। लेकिन मौसम की मार से सेब की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। जिससे किसानों को सभी सेब की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती है। दिल्ली के टमाटर कारोबारी सुभाष चुघ कहते हैं कि न केवल किसानों को नुकसान होता है, बल्कि कारोबारियों को भी नुकसान सहन करना पड़ता है। अधिक गर्मी से ढुलाई और मंडी में रखने पर टमाटर व वन्य फल-सब्जियां खराब भी होती हैं। 


First Published – April 18, 2025 | 10:43 PM IST



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कीड़ों और बीमारियों से जूझते किसान: जलवायु परिवर्तन से बढ़े कीटों और रोगों के हमले, किसानों के लिए नई चुनौती – farmers struggling with pests and diseases new challenge for farmers increased pests and diseases due to climate change – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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जाने-माने वैज्ञानिक एवं अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र (सीआईएमएमवाईटी) केंद्र में क्षेत्रीय निदेशक (एशिया) डॉ. बी एम प्रसन्ना

जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों की सबसे अधिक मार कृ​षि पर पड़ रही है। जाने-माने वैज्ञानिक एवं अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र (सीआईएमएमवाईटी) केंद्र में क्षेत्रीय निदेशक (एशिया) डॉ. बी एम प्रसन्ना ने संजीव मुखर्जी से बातचीत में इस संबंध में चुनौतियों और उनके समाधानों की जानकारी दी। बातचीत के प्रमुख अंशः

कृषि क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन कितना गंभीर खतरा है?

जलवायु परिवर्तन का संकट कई रूपों में कृषि-खाद्यान्न प्रणाली को प्रभावित कर रहा है जिनमें कीटों एवं फसलों को लगने वाली बीमारियां भी शामिल हैं। अधिक तापमान एवं अनियमित बारिश जैसी मौसमी परिस्थितियों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कुछ कीटों के हमले बढ़ जाते हैं और कई तरह की बीमारियां भी लगने लगती हैं। अब यह साबित हो चुका है कि सूखा, अत्यधिक तापमान, जल जमाव से न केवल फसलों की पैदावार कम हो रही है बल्कि ये जैविक वर्णक्रम (बायोटिक स्पेक्ट्रम) पर भी असर डाल रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल दो- तीन तरीके मौजूद हैं और उनमें एक हैं आनुवांशिक नवाचार। यानी हमें फसलों की ऐसी किस्में तैयार करनी होंगी जो जैविक और अजैविक खतरों का सामना करने में सक्षम हों। दूसरा तरीका सस्य विज्ञान (एग्रोनॉमी) या पर्यावरण के अनुकूल कृषि कार्यों को बढ़ावा देना है जिससे हम जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभाव कम कर सकते हैं। तीसरा तरीका उपयुक्त नीतियां तैयार करना है। ये नीतियां विशेषकर जल, पोषक तत्त्व एवं उपयोग में दक्षता और श्रम बचत को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। ये तीनों उपाय एक साथ आजमाने होंगे। 

दुनिया में कीटों के हमले एवं बीमारियां कितना गंभीर रूप ले चुके हैं?  

मुझे लगता है कि कई फसलों को कीटों के हमलों एवं बीमारियों ने शिकार बना लिया है। उदाहरण के लिए फॉल आर्मी वर्म (फसलों को नुकसान पहुंचाने वाला घातक कीड़ा) से मक्के में होने वाली बीमारी अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र में 2017 से और भारत में 2018 से लगातार बड़ा खतरा बन कर उभरी है। यह बीमारी एशिया-प्रशांत क्षेत्र के गई देशों में भी तेजी से फैल गई और दूसरे देशों में भी फैल रही है।

यानी फॉल आर्मी वर्म जलवायु परिवर्तन के बड़े प्रभावों का एक उदाहरण है?

बिल्कुल। यह कीड़ा दुनिया के कई देशों में मक्के की फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। मगर यही एक मात्र खतरा नहीं है। उदाहरण के लिए बांग्लादेश में गेहूं में व्हीट ब्लास्ट (कवक संक्रमण) बीमारी लग गई है। यह बीमारी ब्राजील से वहां तक पहुंची है। इसी तरह, दक्षिण एशिया, खासकर भारत में फूल आने के बाद मक्के में डंठल सूखने की बीमारी भी बढ़ रही है।

ये बीमारियां तो 30-40 वर्ष पहले भी फसलों को लग रही थीं। तो जलवायु परिवर्तन इसके लिए क्यों जिम्मेदार माना जा रहा है?

हां, इनमें कुछ बीमारियां फसलों को पहले भी लगती रही हैं मगर ऐसे मामले कम होते थे। उदाहरण के लिए फॉल आर्मी वर्म अफ्रीका या एशिया में पहले कभी नहीं देखा गया था। यह केवल अमेरिका में मक्का उत्पादक क्षेत्रों तक ही सीमित था। यह कीड़ा शरद ऋतु में दिखता था इसलिए इसका नाम भी फॉल आर्मी वर्म रखा गया है। गर्मी के दिनों में ये अमेरिका और लैटिन अमेरिका के गर्म हिस्सों में पहुंच जाते थे। मगर 2016 में अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र में फॉल आर्मी वर्म का बड़ा हमला देखा गया। 2018 में एशिया में भी मक्के की फसल में फॉल आर्मीवर्म की बीमारी लग गई। उनमें कई बीमारियां कई दशकों से एशिया या अफ्रीका में नहीं थी। कुछ रोगाणु छोटी-मोटी बीमारियां फैलाते थे मगर जलवायु परिवर्तन के बाद वे फसलों को अधिक नुकसान पहुंचाने लगे हैं। कुल मिलाकर दोनों बातें हो रही हैं। जो बीमारियां पहले किसी महाद्वीप में नहीं हुआ करती थीं वे अब दिखने लगी हैं और इनके लिए जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार सहित कई कारक जिम्मेदार हैं। ये सभी बातें कीटों एवं बीमारियों के एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार रहे हैं। 

इससे लड़ने का सबसे कारगर तरीका क्या है?

बीमारियों से निपटने के लिए बहु-आयामी एवं टिकाऊ उपाय करने होंगे। पौधों के स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए सबसे पहले तो हमें राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य एजेंसियों की कार्य क्षमता मजबूत करनी होगी ताकि वे देश में लगातार हानिकारक कीटों के मामलों पर नजर रख कर उनके रोकथाम के उपाय कर सकें। इससे देश में बाहर से आने वाले रोगाणुओं का तुरंत पता लगाकर उन्हें नियंत्रित करने एवं खत्म करने में मदद मिलेगी। पौधों को बीमार करने वाले कीड़ों को आने से रोकना मुश्किल है इसलिए पादप स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखना अगला श्रेष्ठ विकल्प हो सकता है। इसके लिए हमें ऐसे समाधान खोजने होंगे जो पर्यावरण के अनुकूल हों। जब किसी देश में कीटों या बीमारियों के हमले होते हैं तो पहले उपाय के रूप में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। ये कीटनाशक अस्थायी तौर पर राहत जरूर देते हैं लेकिन कई किसान यह नहीं समझ पाते हैं कि इनका सही इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। किसानों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि कितनी मात्रा में, कैसे और कब रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए और कब नहीं।  

आनुवांशिकी की कितनी भूमिका है?

कीटों के संक्रमण से बेअसर रहने वाली किस्में काफी महत्त्वपूर्ण हैं। अफ्रीका इसका उदाहरण है। सीआईएमएमवाईटी ने फॉल आर्मी वर्म से बेअसर रहने वाली मूल आनुवांशिक प्रतिरोध किस्म का विकास एवं इसका इस्तेमाल किया है। यह बिल्कुल ट्रांसजेनिक (दूसरे पौधों का जीन शामिल नहीं है) नहीं है। हमने मेक्सिको में टक्सपेनो और कैरेबियाई मक्के से तैयार जर्मप्लाज्म (आनुवांशिक पदार्थ) का इस्तेमाल किया। कैरेबियाई द्वीप मक्के की खास किस्म के लिए भी जाने जाते हैं जो कुछ खास कीटों से बेअसर रहते हैं। हमने उस जर्मप्लाज्म को उगाया और अफ्रीका ले आए और हाल में ही यह एशिया आया है। अफ्रीका में फॉल आर्मी वर्म रोधी संकर नस्लों का उपयोग हो रहा है, जो पूरी तरह नॉन- ट्रांसजेनिक हैं। एशिया में हमारे हैदराबाद के शोध केंद्र पर मक्के की पीली नस्ल तैयार हो रही हैं जो फॉल आर्मी वर्म से लड़ने के साथ ही जलवायु परिवर्तन से बेअसर रह सकती हैं।


First Published – April 18, 2025 | 10:39 PM IST



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भारत में जलवायु परिवर्तन का असर फसलों की पैदावार और किसानों की आर्थिक स्थिति पर बड़ा संकट

भारत में जलवायु परिवर्तन का असर फसलों की पैदावार और किसानों की आर्थिक स्थिति पर बड़ा संकट


कुछ दिन पहले ही भारत मौसम विभाग ने इस वर्ष देश में मॉनसून के दौरान ‘सामान्य से अधिक वर्षा’ होने का अनुमान व्यक्त किया है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि अच्छी वर्षा और मुद्रास्फीति में कमी में सीधा संबंध नहीं है। यानी यह जरूरी नहीं  कि मॉनसून के दौरान पर्याप्त वर्षा होने से मुद्रास्फीति कम हो जाएगी।  वर्ष 2023 में तो पूरे देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 6 प्रतिशत कम रहा था।

वर्ष 2023-24 में औसत खाद्य मुद्रास्फीति 7.49 प्रतिशत रही थी जबकि अगले साल यानी 2024 में पूरे देश में 8 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई थी मगर पूरे देश में औसत मुद्रास्फीति (7.29 प्रतिशत) पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था।

संचयी वर्षा से अधिक वर्षा का स्थानिक वितरण, सही समय पर वृष्टि एवं इसका फैलाव या विस्तार जैसे महत्त्वपूर्ण कारक यह तय करते हैं किसी साल कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन कैसा रहने वाला है। मगर प्रत्येक वर्ष वर्षा का स्थानिक वितरण, इसकी समयबद्धता और विस्तार को लेकर अनिश्चितता बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी चरम मौसमी घटनाओं जैसे बाढ़ आने, बादल फटने और लंबे समय तक सूखे की स्थिति रहने के बावजूद पूरे देश में मॉनसून अनुमान के इर्द-गिर्द ही रहता हैं।  

वर्षा के क्षेत्रीय वितरण में एकरूपता नहीं होने के कारण भारत जैसे विशाल देश में कृषि क्षेत्र के ऊपर अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकती रहती है। अनिश्चितता के ये बादल तब तक छंटने वाले नहीं हैं जब तक व्यापक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। इन उपायों में जलवायु परिवर्तन रोधी बीज, लगभग 100 प्रतिशत सिंचाई सुविधा और मौसम के मिजाज में अचानक बदलाव से जुड़े जोखिमों से निपटने के अन्य तरीके शामिल हैं।

संसद में पेश वित्त वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए मध्यम से दीर्घ अवधि के जोखिमों का जिक्र किया गया था। आर्थिक समीक्षा में अनुमान व्यक्त किया गया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण असिंचित इलाकों में फसल उत्पादन 20-25 प्रतिशत तक घट सकता है। समीक्षा के अनुसार वर्तमान कृषि आय के हिसाब से जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मध्य कृषक परिवार की आय में सालाना 3,600 रुपये से अधिक कमी आई। समीक्षा में एक विस्तृत विश्लेषण में कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान शुष्क दिनों (प्रति दिन 0.1 मिलीमीटर से कम वर्षा) और गीले दिनों (प्रतिदिन 80 मिलीमीटर से अधिक वर्षा) की संख्या बढ़ गई है। समीक्षा में कहा गया, ‘असिंचित क्षेत्रों में तापमान अत्यधिक होने से खरीफ और रबी फसलों का उत्पादन क्रमशः 7.0 प्रतिशत और 7.60 प्रतिशत कम हो जाता है।’समीक्षा में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन का असर कम करने के लिए सरकार को ड्रिप ऐंड स्प्रिंकलर इरीगेशन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना चाहिए। समीक्षा में यह भी कहा गया कि सरकार को बिजली और उर्वरक क्षेत्र में सीधी सब्सिडी देने के बजाय प्रत्यक्ष आय का प्रावधान करना चाहिए और अनाज-केंद्रित नीति की भी समीक्षा करनी चाहिए।

वर्ष 2022 में जारी आखिरी जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) रिपोर्ट में खतरे के संकेतों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कृषि एवं संबंधित कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का जोखिम बढ़ गया है। जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल असर के कारण भारत में फसलों की पैदावार कम होगी, व्यावसायिक मछलियों की प्रजातियों जैसे ‘हिलसा’  और ‘बॉम्बे डक’  का उत्पादन भी कम हो जाएगा और कृषि क्षेत्र में श्रम से जुड़ी क्षमता भी कम हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि चावल, गेहूं, दलहन, मोटे अनाज का उत्पादन 2050 तक 9 प्रतिशत कम हो सकता है। अगर कार्बन उत्सर्जन अधिक रहा तो देश के दक्षिणी हिस्से में मक्का उत्पादन में लगभग 17 प्रतिशत कमी आ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन से जलीय पौधे एवं शैवाल द्वारा तैयार ऊर्जा में भी कमी आएगी। यह ऊर्जा मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए काफी आवश्यक मानी जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से विशेषकर भारत में श्रम क्षमता में कमी आती जाएगी। उत्सर्जन निरंतर अधिक रहने से औसत वैश्विक आय 23 प्रतिशत कम हो सकती है और 2100 में भारत की औसत आय 92 प्रतिशत कम रह सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था, बाजार, वित्त और व्यापार पर भी होगा जिससे भारत में वस्तुओं की उपलब्धता कम हो जाएगी एवं उनकी कीमतें बढ़ जाएंगी। इससे उन बाजारों को भी नुकसान पहुंचेगा जो भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तापमान की अधिकता और जल की कम उपलब्धता के अलावा जलवायु परिवर्तन से जुड़े घटनाक्रम स्वच्छ जल की उपलब्धता पर भी असर डालेंगे और पानी में घुले जैविक कार्बन और जहरीले तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाएगी। इससे भारत में स्वच्छ जल की उपलब्धता एवं आंतरिक मत्स्य व्यवसाय प्रभावित होंगे। हाल में ही आए एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया कि चरम मौसमी घटनाओं के कारण 50 प्रतिशत से अधिक सीमांत एवं पिछड़े किसानों की खेतों में खड़ी फसलों में कम से कम आधी से अधिक बरबाद हो गईं। अत्यधिक या बेमौसम बारिश, अधिक दिनों तक कड़ाके की सर्दी, सूखा और बाढ़ आदि चरम मौसमी घटनाएं कहलाती हैं। 

यह विश्लेषण डेवलपमेंट इंटेलिजेंस यूनिट (डीआईयू) द्वारा ‘भारत के सीमांत किसानों की स्थिति, 2024’ पर दूसरे सालाना सर्वेक्षण का हिस्सा था। इस सर्वेक्षण की शुरुआत फोरम ऑफ एंटरप्राइजेज फॉर इक्विटेबल डेवलपमेंट (फीड) ने थी। ‘फीड’ सीमांत एवं पिछड़े किसानों के हितों के लिए आवाज उठाता है। इस अध्ययन में कुल 6,615 सीमांत किसानों ने हिस्सा लिया था जिनका चयन एक बड़ी कृषक समिति से किया गया था। पहले चरण का सर्वेक्षण 2023 में हुआ था और इसमें किसानों का चयन उनकी जमीन की जोत के अनुसार किया गया था। 21 राज्यों से ऐसे किसानों का चयन टेली-कॉलिंग के माध्यम से किया गया था। 

अध्ययन में दर्शाया गया है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान 50 प्रतिशत से अधिक धान​ और 40 प्रतिशत से अधिक गेहूं किसानों की आधी फसलें बरबाद हो गई हैं। बाकी दूसरी सभी फसलों के मामले में 45-65 प्रतिशत किसानों को आधी से अधिक फसलों का नुकसान सहना पड़ा।

सर्वेक्षण के अनुसार जहां तक वास्तविक नुकसान की बात है तो यह मानते हुए कि भारत में सीमांत किसानों का औसत भूमि जोत का आकार 0.38 हेक्टेयर है, खरीफ सत्र में केवल धान उगाने वाले 50 प्रतिशत सीमांत किसानों की आय 72 प्रतिशत कम हो गई। इसी तरह, अगर भूमि जोत का आकार 0.40-1.0 हेक्टेयर के बीच मानते हुए धान की फसल में 26 प्रतिशत नुकसान हुआ। रबी सत्र में गेहूं की फसलों में भी यही बात देखी गई।

कुछ अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में चावल एवं गेहूं उत्पादन 6-10 प्रतिशत कम हो सकता है जिससे करोड़ों लोगों के लिए सस्ता अनाज उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाएगा।

केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से जलवायु परिवर्तन के खतरों एवं गर्म मौसम से फसलों को होने वाले नुकसान से निपटने के लिए उपाय किए जा रहे हैं। पिछले खरीफ सत्र में कुल धान के रकबे में लगभग 25 प्रतिशत हिस्से में जलवायु परिवर्तन रोधी किस्में लगाई गई थीं जबकि गेहूं के मामले में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 75 प्रतिशत हो गया। गेहूं की ज्यादातर जलवायु परिवर्तन रोधी किस्में चरम तापमान झेलने में सक्षम हैं जबकि धान की ये किस्में अत्यधिक वर्षा के प्रतिकूल असर झेलने में सक्षम हैं। पिछले वित्त वर्ष सरकार ने विभिन्न फसलें उगाने वाले किसानों को 119 से अधिक जलवायु रोधी बीज दिए थे।

इसके अलावा विभिन्न सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जलवायु परिवर्तन रोधी कृषि कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इन उपायों के जरिये बीज और नई किस्मों के शोध एवं विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीस) के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन में संसाधनों के संरक्षण, मृदा में उर्वरा शक्ति सुनिश्चित करने और उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एकीकृत कृषि, जल इस्तेमाल में दक्षता और वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यह मिशन जलवायु परिवर्तन के जोखिम कम करने में भी सहयोग कर रहा है और भारतीय कृषि को लाभ पहुंचा रहा है।   

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अन्य कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं जिनमें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमएसकेवाई), मृदा स्वास्थ्य कार्ड, परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), कृषि आपात योजना और जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (निक्रा) और कृषि वानिकी पर उप-अभियान शामिल हैं। केंद्र सरकार ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, कृषि शोध एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्यम से भारत के 151 जिलों में जलवायु परिवर्तन रोधी गांवों की स्थापना की है। ये सभी आदर्श गांव के रूप में विकसित किए गए हैं जिनका मकसद भारतीय कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कार्यों को बढ़ावा देना है। जलवायु के अनुकूल और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए भारत के दूसरे कई राज्यों में भी ये आदर्श गांव स्थापित किए जा रहे हैं।


First Published – April 18, 2025 | 10:36 PM IST



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सोने का भाव 4 महीने में 25% उछलकर ऑलटाइम हाई पर, Motilal Oswal ने क्यों दी BUY on Dips की सलाह – gold price surge 25 pc in 4 months to an all time high why did motilal oswal advise buy on dip – बिज़नेस स्टैंडर्ड

सोने का भाव 4 महीने में 25% उछलकर ऑलटाइम हाई पर, Motilal Oswal ने क्यों दी BUY on Dips की सलाह – gold price surge 25 pc in 4 months to an all time high why did motilal oswal advise buy on dip – बिज़नेस स्टैंडर्ड


साल 2025 के पहले चार महीनों में सोने की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिली है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान सोना 25% की शानदार बढ़त के साथ MCX और COMEX दोनों एक्सचेंजों पर नए ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गया। वहीं, चांदी ने भी अब तक सालाना आधार पर 15% का रिटर्न दिया है। हालांकि प्रदर्शन और उतार-चढ़ाव के लिहाज से सोना काफी आगे रहा। सोने की कीमतों में यह तेजी अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते ट्रेड वॉर, कमजोर डॉलर और आर्थिक सुस्ती की आशंकाओं से मजबूती मिल रही है।”

ट्रेड वॉर ने बढ़ाई सोने की चमक

ट्रंप प्रशासन की आक्रामक रेसिप्रोकल टैरिफ पॉलिसी—जिसमें चीन सहित 50 से ज्यादा वैश्विक व्यापारिक साझेदारों को निशाना बनाया गया—ने निवेशकों के आत्मविश्वास को बुरी तरह झकझोर दिया है। चीनी आयात पर 145% तक का टैरिफ और उसके जवाब में चीन द्वारा 125% की जवाबी ड्यूटी ने न सिर्फ ग्लोबल ट्रेड को बाधित किया, बल्कि बाजार में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (risk aversion) को और बढ़ा दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, “टैरिफ वॉर (खासतौर पर अमेरिका और चीन के बीच) ने ग्लोबल मंदी या आर्थिक सुस्ती की आशंकाओं को फिर से जगा दिया है, जिससे सोना एक आकर्षक हेजिंग विकल्प बन गया है।”

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कमजोर डॉलर और सेंट्रल बैंकों की खरीद से मिला सोने को सहारा

अमेरिकी डॉलर की कमजोरी और सेंट्रल बैंकों की खरीद से सोने की तेजी को और बल मिला है। अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले 7% से ज्यादा गिर चुका है। इसी दौरान, खासकर चीन जैसे उभरते बाजारों के सेंट्रल बैंक तेजी से गोल्ड रिजर्व जमा कर रहे हैं, जिससे कीमतों को और मजबूती मिली है। महंगाई की आशंका के बावजूद, अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड्स में भी बढ़ोतरी हुई है। इसका कारण यह है कि स्टैगफ्लेशन (जहां विकास ठहर जाता है और महंगाई बढ़ती है) के डर से हेज फंड्स बॉन्ड बाजार से बाहर निकलने लगे हैं।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सीनियर एनालिस्ट (कमोडिटी रिसर्च) मानव मोदी ने कहा, “सोने की कीमतों ने अपनी रिकॉर्ड तेजी को जारी रखते हुए $3,300 का स्तर पार कर लिया है। कमजोर डॉलर और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते व्यापार तनाव ने निवेशकों को एक बार फिर सुरक्षित विकल्प यानी गोल्ड की ओर मोड़ दिया है। बुलियन को कमजोर डॉलर, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और आर्थिक सुस्ती की आशंकाओं से मजबूती मिल रही है।”

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‘BUY on Dips’ की स्ट्रैटेजी अपनाएं

मोतीलाल ओसवाल के तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, सोना अभी भी तेजी के रुझान में बना हुआ है। MCX पर सोने के लिए प्रमुख सपोर्ट ₹91,000 प्रति 10 ग्राम पर देखा जा रहा है, जबकि रेजिस्टेंस ₹99,000 के आसपास है। वहीं, COMEX पर सोना $3,100 से $3,400 प्रति औंस के दायरे में ट्रेड कर सकता है।

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि जब तक टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता बनी रहेगी और महंगाई की चिंता ज्यादा बनी रहेगी, तब तक सोना निवेशकों के लिए एक पसंदीदा सुरक्षित विकल्प बना रहेगा। विश्लेषकों ने लिखा, “हम मीडियम टू लॉन्ग टर्म के नजरिए से गोल्ड में ‘बाय ऑन डिप्स’ की स्ट्रैटेजी बनाए हुए हैं।” यानी शॉर्ट टर्म की गिरावटों को बुलियन निवेशकों के लिए खरीद का अवसर माना जा सकता है।


First Published – April 18, 2025 | 11:10 AM IST



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Gold at new record high: सोने ने बनाया नया रिकॉर्ड, MCX पर 96 हजार के करीब, ग्लोबल मार्केट में 3,350 डॉलर के पार – gold at new record high set new record mcx gold close to 96 thousand above 3350 dollar in global market – बिज़नेस स्टैंडर्ड

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Gold prices on 17th April 2025: घरेलू और ग्लोबल मार्केट में गुरुवार (17 अप्रैल) को सोना एक बार फिर नए ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया। घरेलू फ्यचर्स मार्केट यानी  (MCX) पर आज सोना सुबह के सत्र में 95,935 रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया। पिछले शुक्रवार को इसने 93,940 रुपये का रिकॉर्ड हाई बनाया था। सोना इस हफ्ते 4 फीसदी से ज्यादा जबकि इस साल अब तक 25 फीसदी मजबूत हुआ है। घरेलू स्पॉट मार्केट में भी आज सोना शुरुआती कारोबार में 95,207 रुपये के रिकॉर्ड हाई पर दर्ज किया गया।

ग्लोबल मार्केट में भी सोना फिलहाल नए शिखर पर है। बेंचमार्क स्पॉट गोल्ड गुरुवार को कारोबार के दौरान 3,557.40 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड हाई तक ऊपर गया, वहीं यूएस गोल्ड फ्यूचर्स 3,371.90 डॉलर प्रति औंस की नई ऊंचाई पर पहुंच गया। मौजूदा कैलेंडर ईयर के दौरान इसने 26वें दिन और इस महीने सातवें दिन रिकॉर्ड हाई बनाया है। पिछले कारोबारी दिन सोने की कीमतों में 3.5 फीसदी का उछाल आया। मार्च 2023 के बाद एक दिन के दौरान यह सबसे बडी तेजी थी। ग्लोबल मार्केट में सोना इस साल अब तक 28 फीसदी चढ़ चुका है जबकि पिछले साल इसमें 27 फीसदी की बढ़ोतरी आई थी।

सोने की कीमतों में यह तेजी अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते ट्रेड वॉर के मद्देनजर बतौर सुरक्षित विकल्प (safe-haven) इस बेशकीमती धातु की मांग में आई मजबूती की वजह से आई है। चीन पर अमेरिकी टैरिफ के 245 फीसदी किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर ट्रेड वॉर छिड़ने की आशंका तेज हो गई है। चीन ने पिछले हफ्ते ही अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ को बढ़ाकर 125 फीसदी कर दिया था।

साथ ही अमेरिकी डॉलर में लगातार कमजोरी ने भी इस बेशकीमती धातु की कीमतों को परवान चढ़ाने में मदद की है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) फिलहाल 3 साल के अपने लो पर है। इस साल अब तक यह 8 फीसदी से ज्यादा कमजोर हुआ है। जब अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है तो सोना उन खरीदारों के लिए सस्ता हो जाता है जो इसे किसी अन्य करेंसी में खरीदना चाहते हैं। इससे सोने की मांग बढ़ सकती है और कीमतों में इजाफा हो सकता है।

ब्याज दरों में कटौती की संभावना, अमेरिका सहित दुनिया की अर्थव्यवस्था में स्लोडाउन और महंगाई के बढ़ने की आशंका के मद्देनजर ज्यादातर जानकार सोने को लेकर फिलहाल बेहद बुलिश हैं। उनका मानना है कि ग्लोबल लेवल पर खासकर अमेरिका और चीन के बीच छिड़े ट्रेड वॉर के मद्देनजर जो अनिश्चितता की स्थिति बनी है उसमें बतौर सुरक्षित विकल्प (safe-haven) सोने की मांग बरकरार रह सकती है। साथ ही बढ़ते जियो-पॉलिटिकल टेंशन की वजह से भी बतौर सुरक्षित विकल्प सोने की मांग में और तेजी आने की उम्मीद है। इतना ही नहीं महंगाई के खिलाफ ‘हेज’ के तौर पर सोने की पूछ परख बढ़ सकती है।

घरेलू फ्यूचर्स मार्केट

घरेलू फ्यूचर्स मार्केट एमसीएक्स (MCX) पर सोने का बेंचमार्क जून कॉन्ट्रैक्ट बुधवार को दोपहर के कारोबार (12:21 PM IST) में 74 रुपये यानी 0.08 फीसदी की  नरमी के साथ 95,587 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पर है। इससे पहले यह आज 95,661 रुपये पर खुला और कारोबार के दौरान 95,935 रुपये के रिकॉर्ड हाई और 95,431 रुपये के लो के बीच कारोबार किया ।

घरेलू स्पॉट मार्केट

Indian Bullion and Jewellers Association (IBJA) के मुताबिक स्पॉट (हाजिर) मार्केट में सोना 24 कैरेट (999) गुरुवार को शुरुआती कारोबार में पिछले कारोबारी दिन (बुधवार) की क्लोजिंग के मुकाबले 628 रुपये उछलकर 95,207 रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड भाव पर दर्ज किया गया। बुधवार को कारोबार की समाप्ति पर यह 94,579 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पर देखा गया था।

स्पॉट गोल्ड (Rupees/10 gm)

गोल्ड 16 अप्रैल 2025  (क्लोजिंग प्राइस/ 10 ग्राम) 17 अप्रैल 2025 (ओपनिंग प्राइस/10 ग्राम) बदलाव
गोल्ड 24 कैरेट (999 ) 94,579 95,207 +628
गोल्ड 24 कैरेट (995) 94,200 94,826 +626
गोल्ड 22  कैरेट (916) 86,634 87,210 +576
सिल्वर/kg 96,575 95,639     -936

Source: IBJA

ग्लोबल मार्केट

ग्लोबल मार्केट में बेंचमार्क स्पॉट गोल्ड (spot gold) कारोबार के दौरान आज रिकॉर्ड 3,357.81 डॉलर प्रति औंस तक ऊपर और 3,314.98  डॉलर प्रति औंस तक नीचे गया। फिलहाल यह 0.75 फीसदी की गिरावट के साथ 3,317.97 डॉलर प्रति औंस पर है। इसी तरह बेंचमार्क यूएस जून गोल्ड फ्यूचर्स (Gold COMEX JUN′25) भी आज कारोबार के दौरान रिकॉर्ड 3,371.90 डॉलर और 3,333.10 डॉलर प्रति औंस के रेंज में रहा। फिलहाल यह 0.27 फीसदी की नरमी  के साथ 3,337.30 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा है।

 


First Published – April 17, 2025 | 12:36 PM IST



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सामान्य से अधिक बारिश का मतलब कम महंगाई नहीं – excess rainfall does not mean less inflation – बिज़नेस स्टैंडर्ड

सामान्य से अधिक बारिश का मतलब कम महंगाई नहीं – excess rainfall does not mean less inflation – बिज़नेस स्टैंडर्ड


मौसम विभाग ने अनुमान लगाया है कि 2025 में कुल मिलाकर देश में औसत बारिश ‘सामान्य से अधिक’ रहेगी। अगर यह अनुमान सही रहता है तो 1953 के बाद चौथी बार ऐसा होगा, जब लगातार 2 वर्ष ‘सामान्य’ या ‘सामान्य से अधिक’ बारिश होगी।

इसके पहले 2010 में ऐसा हुआ था, जब 2010 और 2013 के बीच भारत में दो बार लगातार दो साल तक सामान्य से अधिक और सामान्य बारिश हुई थी।

मौसम विभाग तब सामान्य बारिश मानता है, जब दीर्घावधि औसत (एलपीए) के 96 से 104 प्रतिशत के बीच बारिश होती है। जब एलपीए के 106 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है तो उसे ‘सामान्य से अधिक’ के रूप मे वर्गीकृत किया जाता है। 2017 से 2020 के बीच जून से सितंबर के दौरान एलपीए 870 मिलीमीटर था।

2025 के लिए बारिश के मौसम विभाग के अनुमान से यह उम्मीद बढ़ी है कि खाद्य उत्पादन पर्याप्त रहने पर महंगाई नियंत्रण में रहेगी। हालांकि 10 साल से ज्यादा समय के आंकड़ों से पता चलता है कि कोई जरूरी नहीं है कि सामान्य मॉनसून के वर्षों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर कम रहे।

महंगाई दर कई वजहों से प्रभावित होती है, जिसमें स्थानीय मांग और आपूर्ति आदि शामिल है। इसके अलावा अगर देश में औसत बारिश किसी खास साल में सामान्य से ऊपर रहती है तो क्षेत्रवार इसमें बहुत अंतर होता है, जिसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है। इस साल मौसम ने बिहार और तमिलनाडु में ‘सामान्य से कम’ बारिश का अनुमान
लगाया है।


First Published – April 16, 2025 | 10:40 PM IST



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