सर्दियों में सुबह-सुबह आ रही है खांसी, हो सकती है इस बीमारी का संकेत

सर्दियों में सुबह-सुबह आ रही है खांसी, हो सकती है इस बीमारी का संकेत



Why You Cough More in Winter: सर्दी का मौसम शुरू होते ही कई लोगों को सर्दी-खांसी की समस्या शुरू हो जाती है. कई मामलों में यह मौसम का असर होता है, लेकिन कई मामलों में यह किसी बीमारी का संकेत हो सकता है. ऐसा तब होता है, जब आपको खांसी के साथ-साथ अन्य समस्या हो, जैसे सीने में दर्द या बलगम की समस्या भी देखन को मिले तब. हालांकि, अगर सर्दी वाला नॉर्मल खांसी है आपको, तो घबराने की जरूरत नहीं. थोड़ी सी देखभाल और सही उपाय अपनाकर आप अपनी सर्दियों वाली खांसी को जल्दी कंट्रोल कर सकते हैं.

सर्दियों में खांसी क्यों बढ़ती है?

ठंड के मौसम में हमारा ज्यादातर वक्त घर के अंदर ही गुजरता है, हीटर के पास बैठकर. हीटर और सूखी हवा गले और नाक के रास्तों को सुखा देती है. ऐसे में हल्की सी खुजली भी खांसी में बदल जाती है. इसके अलावा सर्दियों की हवा भी काफी ड्राई होती है, जिससे श्वसन तंत्र आसानी से इरिटेट हो जाता है.

सर्दियों में खांसी की आम वजह

अस्थमा– ठंडी हवा और धूल से आसानी से बढ़ जाता है, जिससे सीजन भर सूखी खांसी रह सकती है.

ब्रोंकाइटिस-  एयरवेज में सूजन पैदा करता है. क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस वाले लोगों को पूरे मौसम तक खांसी रह सकती है.

इन्फेक्शन- फ्लू या फिर निमोनिया, ये गंभीर इंफेक्शन खांसी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं.

एलर्जन्स-  धूल, फफूंद, पराग आदि ठंडी और सूखी हवा के साथ आसानी से उड़ते हैं और खांसी ट्रिगर कर सकते हैं.

पोस्टनेजल ड्रिप– नाक का म्यूकस रातभर गले में आकर जमा हो जाता है और सुबह खांसी बढ़ा देता है.

सर्दियों की खांसी के आसान घरेलू उपाय

पानी ज्यादा पिएं– हाइड्रेशन म्यूकस को पतला करता है और गले की जलन कम करता है.

नमक वाले पानी से गरारे- गले को आराम मिलता है और खांसी में राहत मिलती है.

हर्बल टी- अदरक, थाइम, या मार्शमैलो रूट वाली चाय सूजन और खांसी दोनों को शांत करती है.

ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल- कमरे में नमी बढ़ाकर सांस लेने में राहत देता है. चाहें तो यूकेलिप्टस या पुदीने के इसेंसियल ऑयल भी डाल सकते हैं.

स्टीम लें– गर्म भाप म्यूकस को ढीला करती है और खांसी कम करती है.

कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

Indigohealth के अनुसार, अगर आपकी खांसी कई हफ्तों तक बनी रहे या इन लक्षणों के साथ दिखाई दे, तो जल्द जांच करवानी चाहिए. लक्षणों में-

  • हरा या पीला बलगम
  • घरघराहट
  • बुखार
  • सांस लेने में दिक्कत
  • अत्यधिक थकान
  • बिना वजह वजन कम होना

इसे भी पढ़ें- Red Chilli Cancer Link: जरूरत से ज्यादा तीखा तो नहीं खा रहे हैं आप, बन सकता है कैंसर का कारण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कार्बोहाइड्रेट्स खाना छोड़ देंगे तो शरीर पर कितना पड़ेगा असर? दिक्कत होने से पहले दुरुस्त कर लें यह गलती

कार्बोहाइड्रेट्स खाना छोड़ देंगे तो शरीर पर कितना पड़ेगा असर? दिक्कत होने से पहले दुरुस्त कर लें यह गलती


कार्बोहाइड्रेट शरीर का सबसे आसान और पसंदीदा ऊर्जा सोर्स हैं. यह सिर्फ चावल, रोटी और आलू में ही नहीं, बल्कि फलों, सब्जियों, दालों, दूध और अनाज में भी पाए जाते हैं. ग्लूकोज, जो कार्ब्स से बनता है वह लगभग हर सेल की प्राथमिक जरूरत है, खासकर दिमाग और रेल ब्लड सेल्स की.

जैसे ही कार्ब्स कम होते हैं, शरीर अपने स्टोर किए हुए ग्लाइकोजन को इस्तेमाल करने लगता है. ग्लाइकोजन पानी के साथ बंधा होता है, इसलिए इसके खत्म होते ही वजन तेजी से गिरता दिखाई देता है. हालांकि लंबे समय में यह अंतर कम हो जाता है, क्योंकि वॉटर लॉस रुक जाते हैं.

जैसे ही कार्ब्स कम होते हैं, शरीर अपने स्टोर किए हुए ग्लाइकोजन को इस्तेमाल करने लगता है. ग्लाइकोजन पानी के साथ बंधा होता है, इसलिए इसके खत्म होते ही वजन तेजी से गिरता दिखाई देता है. हालांकि लंबे समय में यह अंतर कम हो जाता है, क्योंकि वॉटर लॉस रुक जाते हैं.

कार्ब कम होते ही शरीर ऊर्जा के लिए फैट पर निर्भर होने लगता है और कीटोन बनने शुरू हो जाते हैं. यह प्रक्रिया तेजी से फैट जलाने में मदद करती है और भूख भी कुछ कम कर सकती है. लेकिन लंबे समय तक सख्त लो-कार्ब डाइट पर रहने से पोषक तत्वों की कमी की संभावना भी बढ़ जाती है.

कार्ब कम होते ही शरीर ऊर्जा के लिए फैट पर निर्भर होने लगता है और कीटोन बनने शुरू हो जाते हैं. यह प्रक्रिया तेजी से फैट जलाने में मदद करती है और भूख भी कुछ कम कर सकती है. लेकिन लंबे समय तक सख्त लो-कार्ब डाइट पर रहने से पोषक तत्वों की कमी की संभावना भी बढ़ जाती है.

कार्ब्स हटाने का सबसे बड़ा असर पाचन पर पड़ता है, क्योंकि फाइबर भी कम हो जाता है. फाइबर की कमी से कब्ज, पेट फूलना और आंतों के माइक्रोबायोम में गड़बड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लंबे समय तक कार्ब कम रखने से अच्छी बैक्टीरिया की विविधता भी घटती है.

कार्ब्स हटाने का सबसे बड़ा असर पाचन पर पड़ता है, क्योंकि फाइबर भी कम हो जाता है. फाइबर की कमी से कब्ज, पेट फूलना और आंतों के माइक्रोबायोम में गड़बड़ी हो सकती है. कुछ स्टडीज बताती हैं कि लंबे समय तक कार्ब कम रखने से अच्छी बैक्टीरिया की विविधता भी घटती है.

कार्ब कम होने पर कई लोगों में एनर्जी लेवल गिर जाता है. शुरुआत के दिनों में थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान भटकना या ब्रेन फॉग की शिकायत आम होती है. दिमाग को ग्लूकोज चाहिए और इसकी कमी से कुछ लोगों में हल्का हाइपोग्लाइसीमिया तक हो सकता है.

कार्ब कम होने पर कई लोगों में एनर्जी लेवल गिर जाता है. शुरुआत के दिनों में थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान भटकना या ब्रेन फॉग की शिकायत आम होती है. दिमाग को ग्लूकोज चाहिए और इसकी कमी से कुछ लोगों में हल्का हाइपोग्लाइसीमिया तक हो सकता है.

हर किसी के लिए लो-कार्ब डाइट सही नहीं होती. किडनी की दिक्कत वाले लोगों में ज्यादा प्रोटीन का लोड बढ़ सकता है. वहीं, लिवर संबंधी समस्याओं या हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग करने वाले एथलीटों के लिए कार्ब कम करना परफॉर्मेंस को सीधे प्रभावित कर सकता है.

हर किसी के लिए लो-कार्ब डाइट सही नहीं होती. किडनी की दिक्कत वाले लोगों में ज्यादा प्रोटीन का लोड बढ़ सकता है. वहीं, लिवर संबंधी समस्याओं या हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग करने वाले एथलीटों के लिए कार्ब कम करना परफॉर्मेंस को सीधे प्रभावित कर सकता है.

कार्ब्स पूरी तरह छोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर की एनर्जी, डाइजेशन और दिमाग तीनों ही इससे जुड़े हुए हैं. किसी भी बड़े बदलाव से पहले अपने स्वास्थ्य, जरूरतों और मेडिकल कंडीशन को ध्यान में रखना सबसे सही तरीका है. यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, किसी भी डाइट को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

कार्ब्स पूरी तरह छोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर की एनर्जी, डाइजेशन और दिमाग तीनों ही इससे जुड़े हुए हैं. किसी भी बड़े बदलाव से पहले अपने स्वास्थ्य, जरूरतों और मेडिकल कंडीशन को ध्यान में रखना सबसे सही तरीका है. यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, किसी भी डाइट को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

Published at : 28 Nov 2025 07:02 AM (IST)

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अंडे से लेकर केले तक… फ्रिज में कभी नहीं रखनी चाहिए ये चीजें, बन जाती हैं जहर

अंडे से लेकर केले तक… फ्रिज में कभी नहीं रखनी चाहिए ये चीजें, बन जाती हैं जहर


दूध बहुत जल्दी खराब होने वाली चीज है और इसे लगातार ठंडा तापमान चाहिए. दरवाजे में रखने पर यह बार-बार गर्म हवा के संपर्क में आता है, जिससे यह जल्दी खराब हो सकता है और उसकी शेल्फ लाइफ कम हो जाती है.

अंडों को अक्सर लोग दरवाजे में बनी ट्रे में रख देते हैं, लेकिन यह जगह उनके लिए सुरक्षित नहीं है. यहां तापमान लगातार बदलता है, जिससे अंडों में बैक्टीरिया बढ़ सकता है और फूडबॉर्न बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अंडों को अक्सर लोग दरवाजे में बनी ट्रे में रख देते हैं, लेकिन यह जगह उनके लिए सुरक्षित नहीं है. यहां तापमान लगातार बदलता है, जिससे अंडों में बैक्टीरिया बढ़ सकता है और फूडबॉर्न बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

बटर देखने में दरवाजे के लिए सही लगता है, लेकिन तापमान में उतार-चढ़ाव इसे जल्दी नरम कर देता है. इससे इसकी फ्रेशनैस और टेक्सचर दोनों खराब हो सकते हैं, इसलिए इसे फ्रिज के अंदर ही रखना बेहतर है.

बटर देखने में दरवाजे के लिए सही लगता है, लेकिन तापमान में उतार-चढ़ाव इसे जल्दी नरम कर देता है. इससे इसकी फ्रेशनैस और टेक्सचर दोनों खराब हो सकते हैं, इसलिए इसे फ्रिज के अंदर ही रखना बेहतर है.

सॉफ्ट चीज जैसे मोजरेला या क्रीम चीज को स्थिर ठंडक चाहिए, जो दरवाज़े में बिल्कुल नहीं मिलती. यहां रखी चीजें जल्दी खराब हो सकती हैं या उनमें फंगस बन सकती है, इसलिए इन्हें अंदर वाली शेल्फ पर रखना चाहिए.

सॉफ्ट चीज जैसे मोजरेला या क्रीम चीज को स्थिर ठंडक चाहिए, जो दरवाज़े में बिल्कुल नहीं मिलती. यहां रखी चीजें जल्दी खराब हो सकती हैं या उनमें फंगस बन सकती है, इसलिए इन्हें अंदर वाली शेल्फ पर रखना चाहिए.

फ्रेश जूस तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होता है और थोड़ा सा उतार-चढ़ाव भी इसे खट्टा या फर्मेंटेड बना सकता है. दरवाजे की गर्म हवा इसे जल्दी खराब कर देती है, इसलिए इसे हमेशा अंदर ही स्टोर करें.

फ्रेश जूस तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होता है और थोड़ा सा उतार-चढ़ाव भी इसे खट्टा या फर्मेंटेड बना सकता है. दरवाजे की गर्म हवा इसे जल्दी खराब कर देती है, इसलिए इसे हमेशा अंदर ही स्टोर करें.

कच्चा मीट बैक्टीरिया के लिए सबसे संवेदनशील होता है और इसे फ्रिज का सबसे ठंडा हिस्सा चाहिए. दरवाजे में रखने से मीट जल्दी गर्म होता है, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

कच्चा मीट बैक्टीरिया के लिए सबसे संवेदनशील होता है और इसे फ्रिज का सबसे ठंडा हिस्सा चाहिए. दरवाजे में रखने से मीट जल्दी गर्म होता है, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

दही भी ठंडी और स्थिर जगह पर ही ज्यादा समय तक टिकता है. दरवाज़े में तापमान बदलने से इसका टेक्सचर बिगड़ जाता है और यह जल्दी खट्टा हो सकता है, इसलिए इसे अंदर की शेल्फ में ही रखना सही है.

दही भी ठंडी और स्थिर जगह पर ही ज्यादा समय तक टिकता है. दरवाज़े में तापमान बदलने से इसका टेक्सचर बिगड़ जाता है और यह जल्दी खट्टा हो सकता है, इसलिए इसे अंदर की शेल्फ में ही रखना सही है.

केले कभी भी फ्रिज के दरवाज़े में नहीं रखने चाहिए, क्योंकि यहां का तापमान बदलने से केले की स्किन काली पड़ जाती है. अंदर का फल भी जल्दी नरम होकर खराब हो सकता है और उसका स्वाद बिगड़ जाता है.

केले कभी भी फ्रिज के दरवाज़े में नहीं रखने चाहिए, क्योंकि यहां का तापमान बदलने से केले की स्किन काली पड़ जाती है. अंदर का फल भी जल्दी नरम होकर खराब हो सकता है और उसका स्वाद बिगड़ जाता है.

Published at : 27 Nov 2025 05:35 PM (IST)

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किडनी खराब होने से पहले आंखों में ही दिख जाते हैं बीमारी के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान

किडनी खराब होने से पहले आंखों में ही दिख जाते हैं बीमारी के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान



Kidney Disease Warning Signs: अक्सर लोग किडनी बीमारी को थकान, पैरों में सूजन या यूरिन में बदलाव से जोड़ते हैं, लेकिन कई बार शुरुआत आंखों से होती है. वजह यह है कि किडनी और आंखें दोनों ही शरीर की छोटी-छोटी नसों और फ्लूइड बैलेंस पर निर्भर होते हैं. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो इसका असर आंखों पर भी दिखने लगता है. आंखों में लगातार सूजन, धुंधलापन, लालपन, जलन या रंग पहचानने में बदलाव. ये सभी संकेत किसी गहरी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं. शुरू में ये बदलाव बहुत हल्के होते हैं, लेकिन समय के साथ बढ़ सकते हैं. अगर ये लक्षण थकान या सूजन के साथ दिखें, तो किडनी और आंखों दोनों की जांच कराना जरूरी है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

किडनी की बीमारी सबसे पहले आंखों में दिखाती है असर

ज्यादातर लोग मानते हैं कि किडनी बीमारी सिर्फ थकान, सूजन या यूरिन चेंज से पता चलती है, लेकिन हकीकत यह है कि इसके शुरुआती संकेत आंखों में भी दिखाई दे सकते हैं. National Kidney Foundation के अनुसार,  किडनी शरीर का फिल्टर सिस्टम है और आंखें बेहद नाजुक ब्लड वेसल्स पर टिकी होती हैं. जैसे ही किडनी फ्लूइड बैलेंस या ब्लड वेसल्स को प्रभावित करती है, आंखों में तुरंत बदलाव नजर आने लगते हैं. किडनी की समस्या बढ़ने पर विजन, आंखों की नमी, आंखों की नसों और यहां तक कि रंग पहचानने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है. कई बार ये लक्षण किसी आम आंख की बीमारी जैसे लगते हैं, जिससे असली समस्या पहचानने में देर हो जाती है. नजरअंदाज करने पर ये लक्षण बढ़ते जाते हैं. यहां जानिए वे पांच आंख-संबंधी लक्षण, जिन्हें हल्का लेने पर मामला गंभीर हो सकता है:

आंखों में लगातार सूजन 

कभी-कभी देर रात जागने या नमक ज्यादा खाने से आंखें सूज जाती हैं, लेकिन अगर सूजन दिनभर बनी रहे तो यह किडनी में प्रोटीन लीक होने का संकेत हो सकता है. जब किडनी प्रोटीन को फिल्टर नहीं कर पाती, तो वही प्रोटीन शरीर से यूरिन में निकलने लगता है और इसका असर आंखों के आसपास सूजन के रूप में दिखता है. अगर सूजन के साथ यूरिन झागदार या ज्यादा फोमी दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएं.

धुंधली या दोहरी दिखाई देना 

अचानक विजन का धुंधला होना या दो-दो दिखाई देना रेटिना की छोटी नसों के खराब होने की निशानी हो सकती है. हाई BP और डायबिटीज, किडनी खराब होने के दो सबसे बड़े कारण रेटिना की नसों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. फ्लूइड जमा होना, रेटिना की सूजन या गंभीर मामलों में विजन लॉस भी हो सकता है. अगर आप डायबिटिक या BP मरीज हैं और विज़न बदला हुआ महसूस करें, तो किडनी फंक्शन की जांच भी जरूरी है.

 आंखों में सूखापन, जलन या खुरदुरापन 

बार-बार आंखें सूखना या चुभन महसूस होना सिर्फ मौसम या स्क्रीन टाइम का असर नहीं होता. किडनी बीमारी के बढ़ने या डायलिसिस लेने वाले मरीजों में ड्राई आई कॉमन शिकायत है. कैल्शियम-फॉस्फोरस असंतुलन, या शरीर में टॉक्सिन जमा होने से आंसू कम बनते हैं. अगर आंखें बिना वजह लाल, सूखी या चुभती रहें, तो किडनी जांच करवाना जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- ABHA Card: आभा कार्ड में किन-किन बीमारियों की रखी जाती है डिटेल, डॉक्टरों को किन बातों की तुरंत मिल जाती है जानकारी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जरूरत से ज्यादा तीखा तो नहीं खा रहे हैं आप, बन सकता है कैंसर का कारण

जरूरत से ज्यादा तीखा तो नहीं खा रहे हैं आप, बन सकता है कैंसर का कारण



Cancer Risk From Spicy Food: दुनिया भर में लोग तीखा खाने के शौकीन हैं, चाहे बात हो भारतीय करी की या मैक्सिकन साल्सा की. लाल मिर्च न सिर्फ खाने का स्वाद और गर्माहट बढ़ाती है, बल्कि मेटाबॉलिज्म को भी थोड़ा तेज करती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में साइंटिस्ट यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लगातार बहुत ज्यादा मिर्च खाने से डाइजेशन से जुड़े कुछ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. Frontiers in Nutrition जर्नल में पब्लिश एक स्टडी में इस विषय को विस्तार से परखा गया है. रिसर्च के अनुसार, मिर्च में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट गुण थोड़ी मात्रा में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन बहुत अधिक सेवन से अन्ननली, पेट और कोलन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. भारत में कोलोरेक्टल कैंसर तीसरा सबसे आम कैंसर है और समय रहते इलाज शुरू हो जाए तो इसका उपचार पूरी तरह संभव है.

कैसे ज्यादा मिर्च खाना कितना खतरनाक?

मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन वह तत्व है जो इसे तीखापन देता है. इसे दर्द कम करने, सूजन घटाने और फैट बर्निंग जैसी खूबियों के लिए जाना जाता है. लेकिन कैंसर को इसके प्रभावों को लेकर मिक्स परिणाम सामने आए हैं. ज्यादा मात्रा में लाल मिर्च खासतौर पर कच्ची या बहुत तीखी लंबे समय तक खाने से डाइजेशन सिस्टम में जलन और सूजन बढ़ सकती है. धीरे-धीरे यही सूजन सेल्स को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है.

वहीं कम मात्रा में मिर्च, खासकर यदि आहार में पर्याप्त सब्जियां, फल और फाइबर हों, तो नुकसान नहीं पहुंचाती. दही जैसे कूलिंग खाने के पदार्थों के साथ मिर्च खाना या पकाकर खाना पेट की जलन कम करता है.

बहुत ज्यादा मिर्च खाने से पेट के कैंसर का खतरा

Frontiers in Nutrition में पब्लिश स्टडी ने दुनिया भर के हजारों लोगों पर हुई रिसर्च को शामिल किया. निष्कर्ष ये बताते हैं कि बहुत तीखा खाना रोजाना या बड़ी मात्रा में खाने वाले लोगों में डाइजेशन सिस्टम के कैंसर का जोखिम बढ़ा पाया गया. हल्के से मध्यम स्तर पर मिर्च का सेवन नुकसान नहीं करता, और कैप्सेसिन के कारण कुछ फायदे भी दे सकता है. बहुत ज्यादा मिर्च खाने और धूम्रपान या शराब सेवन करने पर खतरा और बढ़ जाता है. किस प्रकार की मिर्च खाई जा रही है और आपकी बाकी डाइट कैसी है, यह सब जोखिम को प्रभावित करता है.

मिर्च खाने के फायदे

लाल मिर्च नुकसानदायक नहीं है, बल्कि सही मात्रा में कई फायदे देती है. इससे मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है, कैप्सेसिन कैलोरी बर्न करने में मदद करती है. यह दिल के लिए भी अच्छा है, सीमित मात्रा में खाने से ब्लड फ्लो और कोलेस्ट्रॉल पर अच्छा असर हो सकता है. इसे एंटीऑक्सिडेंट्स का सोर्स भी माना जाता है, जिससे विटामिन C, बीटा-कैरोटीन और अन्य घटक शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं.

इसे भी पढ़ें: कौन-सी दवाएं ज्यादा बनाती है देश की फार्मा इंडस्ट्री, आपकी सेहत के लिए क्या है फ्यूचर प्लानिंग?

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अचानक मुंह में बनने लगा जरूरत से ज्यादा बलगम, हो सकती है ये दिक्कत

अचानक मुंह में बनने लगा जरूरत से ज्यादा बलगम, हो सकती है ये दिक्कत



Morning Phlegm Causes: बहुत से लोग सुबह उठते ही गले में कफ या बलगम महसूस करते हैं और सोचते हैं कि “आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?” रात की नींद के बाद ऐसा होना आम बात है, लेकिन कई बार ये किसी अंदरूनी दिक्कत का संकेत भी हो सकता है. कफ ज्यादा बनने पर खांसी भी शुरू हो जाती है, क्योंकि शरीर उसी म्यूकस को बाहर निकालने की कोशिश करता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस वजह से होता है और इसको रोकने के लिए क्या करना चाहिए.

किस कारण से मुंह में बनने लगते हैं बलगम?

पोस्टनेजल ड्रिप

यह सबसे कॉमन कारण है. रात में नाक के अंदर बनने वाला म्यूकस धीरे-धीरे गले में जमा होने लगता है. एलर्जी, सर्दी-जुकाम या धूल-मिट्टी से यह और बढ़ जाता है. सुबह उठते ही गला भारी-भारी और कफ ज्यादा महसूस होता है.

एसिडिटी

अगर रात में पेट का एसिड ऊपर आ जाता है तो वह गले को इरिटेट करता है. इससे शरीर ज्यादा म्यूकस बनाने लगता है. लेटने पर यह समस्या और बढ़ जाती है, इसलिए सुबह उठकर गले में चिपचिपा कफ महसूस हो सकता है.

अस्थमा

अस्थमा वाले लोगों में रात के समय सूजन और कफ बनना बढ़ जाता है. सुबह उठते ही खांसी और कफ का बोलबाला इसी वजह से होता है, क्योंकि नींद के दौरान हवा के रास्ते ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं.

धूम्रपान और प्रदूषण

सिगरेट का धुआं म्यूकस को गाढ़ा बना देता है और उसकी मात्रा भी बढ़ जाती है. बाहर का प्रदूषित और सूखा हवा भी कफ को बढ़ाती है. स्मोकर्स में सुबह कफ सबसे ज्यादा देखा जाता है.

सुबह गले में बनने वाले कफ को कैसे रोकें?

अगर आपको भी सुबह बलगम बनता है, तो इसके लिए आप अलग-अलग तरह के उपाय अपना सकते हैं. mucinex के अनुसार, अगर आपको सुबह कफ बनता है, तो उसके लिए आप

पानी ज्यादा पिएं

शरीर हाइड्रेट रहेगा तो कफ पतला रहेगा और गले में जमा नहीं होगा. रात को हल्का गर्म पानी या हर्बल टी फायदेमंद होती है.

सिर ऊंचा करके सोएं

ताकि नाक का म्यूकस गले में इकट्ठा न हो और एसिडिटी भी कंट्रोल में रहे. एक अतिरिक्त तकिया भी काफी काम करता है.

अपनी एलर्जी या एसिडिटी का इलाज कराएं

अगर यह दिक्कतें बार-बार होती दिखाई दें तो डॉक्टर की मदद लें. कारण को ठीक करना सबसे जरूरी है.

कमरे में धूल, पालतू जानवरों के बाल और एलर्जन्स नियंत्रित रखें

साफ-सफाई का खास ध्यान रखने से सुबह वाला कफ काफी हद तक कम हो जाता है.

नींद का रूटीन सही रखें

अच्छी नींद शरीर की इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है, जिससे कफ बनने की दिक्कत भी कम होती है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है?

अगर आपको यह समझ नहीं आ रहा कि आपका कफ आखिर किस वजह से बढ़ रहा है, या लक्षण लंबे समय तक बने हुए हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. वे आपकी असली समस्या पहचानकर आपकी स्थिति के हिसाब से सही इलाज बता पाएंगे.

इसे भी पढ़ें- Intermittent Fasting: क्या इंटरमिटेंट फास्टिंग से ठीक हो जाता है लिवर? जानें इसके पीछे का पूरा सच

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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