पेट में गैस से रहते हैं परेशान तो आज ही आजमा लें ये 3 हर्बल चाय, अमेरिका के डॉक्टर भी देते हैं सलाह

पेट में गैस से रहते हैं परेशान तो आज ही आजमा लें ये 3 हर्बल चाय, अमेरिका के डॉक्टर भी देते हैं सलाह


एक्सपर्ट्स के अनुसार तुलसी की चाय ब्लोटिंग पर जादू की तरह काम करती है. तुलसी में ऐसे नेचुरल कंपाउंड्स होते हैं जो पाचन तंत्र की मांसपेशियों को रिलैक्स करते हैं और फंसी हुई गैस बाहर निकालने में मदद करते हैं.

घर में तुलसी की चाय बनाने के लिए उबलते पानी में कुछ ताजी तुलसी के पत्तियां डालकर 5 से 10 मिनट कर तक ढककर रख दें. फिर इसे छान कर गरमा-गरम पी लें. इससे आपको ब्लोटिंग जैसी समस्याओं से जल्दी राहत मिल जाएगी.

घर में तुलसी की चाय बनाने के लिए उबलते पानी में कुछ ताजी तुलसी के पत्तियां डालकर 5 से 10 मिनट कर तक ढककर रख दें. फिर इसे छान कर गरमा-गरम पी लें. इससे आपको ब्लोटिंग जैसी समस्याओं से जल्दी राहत मिल जाएगी.

इसके अलावा आप पेट में गैस से परेशान रहते हैं तो किचन में आसानी से मिलने वाली सौंफ भी इस समस्या के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. 2017 की एक स्टडी के अनुसार सौंफ में मौजूद कंपाउंड anethole पाचन तंत्र की मांसपेशियों को ढीला करता है जिससे गैस जल्दी निकल जाती है.

इसके अलावा आप पेट में गैस से परेशान रहते हैं तो किचन में आसानी से मिलने वाली सौंफ भी इस समस्या के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. 2017 की एक स्टडी के अनुसार सौंफ में मौजूद कंपाउंड anethole पाचन तंत्र की मांसपेशियों को ढीला करता है जिससे गैस जल्दी निकल जाती है.

सौंफ की चाय पीने के लिए आप सौंफ के दानों को हल्का क्रश करके पानी में 10 से 15 मिनट तक उबाल लें और फिर छान कर इसे चाय की तरह पी लें.

सौंफ की चाय पीने के लिए आप सौंफ के दानों को हल्का क्रश करके पानी में 10 से 15 मिनट तक उबाल लें और फिर छान कर इसे चाय की तरह पी लें.

वहीं अदरक में मौजूद गुण ब्लोटिंग गैस और पेट दर्द को तेजी से कम करते हैं. 2018 की एक रिसर्च में पाया गया है कि अदरक आंतों में दबाव कम करता है, क्रैम्पिंग से राहत देता है और पेट फूलने जैसी समस्याओं को घटाता है.

वहीं अदरक में मौजूद गुण ब्लोटिंग गैस और पेट दर्द को तेजी से कम करते हैं. 2018 की एक रिसर्च में पाया गया है कि अदरक आंतों में दबाव कम करता है, क्रैम्पिंग से राहत देता है और पेट फूलने जैसी समस्याओं को घटाता है.

अदरक वाली चाय बनाने के लिए आप 1 से 2 इंच अदरक के स्लाइस काटकर पानी में 10 से 15 मिनट तक उबाल लें और फिर इसे भी चाय की तरह पी लें.

अदरक वाली चाय बनाने के लिए आप 1 से 2 इंच अदरक के स्लाइस काटकर पानी में 10 से 15 मिनट तक उबाल लें और फिर इसे भी चाय की तरह पी लें.

यह तीनों ही चाय पाचन तंत्र को शांत करती है और गैस को नेचुरली बाहर निकालने में मदद करती है. इन्हें आप एक बार में बड़ी मात्रा में बनाकर शाम के दौरान धीरे-धीरे पी सकते हैं. हालांकि गैस की समस्या खत्म करने का यह इकलौता इलाज नहीं है. गैस की समस्या खत्म करने के लिए खाने में सावधानी, पोषण कंट्रोल और माइंडफुल ईटिंग भी जरूरी है ताकि पेट हेल्दी रहे.

यह तीनों ही चाय पाचन तंत्र को शांत करती है और गैस को नेचुरली बाहर निकालने में मदद करती है. इन्हें आप एक बार में बड़ी मात्रा में बनाकर शाम के दौरान धीरे-धीरे पी सकते हैं. हालांकि गैस की समस्या खत्म करने का यह इकलौता इलाज नहीं है. गैस की समस्या खत्म करने के लिए खाने में सावधानी, पोषण कंट्रोल और माइंडफुल ईटिंग भी जरूरी है ताकि पेट हेल्दी रहे.

Published at : 27 Nov 2025 07:04 AM (IST)

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सफदरजंग अस्पताल ने रचा इतिहास, पहली बार 11 साल के बच्चे का सफल किडनी ट्रांसप्लांट

सफदरजंग अस्पताल ने रचा इतिहास, पहली बार 11 साल के बच्चे का सफल किडनी ट्रांसप्लांट



दिल्ली के वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल ने 19 नवंबर 2025 को किडनी प्रत्यारोपण सेवाओं में नया अध्याय जोड़ते हुए पहली बार किसी बच्चे का सफल किडनी ट्रांसप्लांट कर दिखाया. यह उपलब्धि न सिर्फ अस्पताल के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि देश के किसी भी केंद्रीय सरकारी अस्पताल में किया गया पहला पेडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट भी है.

11 साल के बच्चे को मिला नया जीवन

यूपी के सुल्तानपुर का 11 वर्षीय बच्चा करीब डेढ़ साल से ‘बाइलेटरल हाइपोडिसप्लास्टिक किडनी’ जैसी दुर्लभ स्थिति से जूझ रहा था. गंभीर हालात में सफदरजंग अस्पताल लाए गए बच्चे को इलाज के दौरान कार्डियक अरेस्ट तक हुआ और जांच में पता चला कि उसकी दोनों किडनियां पूरी तरह फेल हो चुकी हैं. तब से वह नियमित डायलिसिस पर निर्भर था.

मां बनीं जीवनदायिनी, जटिल सर्जरी रही सफल

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में किडनी ट्रांसप्लांट हमेशा मुश्किल माना जाता है. छोटे शरीर में वयस्क किडनी फिट करना और नाजुक रक्तवाहिनियों से जोड़ना बेहद जटिल प्रक्रिया होती है. बच्चे की मां ने किडनी दान की और सर्जरी के बाद किडनी ने तुरंत काम करना शुरू कर दिया. डॉक्टरों का कहना है कि बच्चा अब डायलिसिस की जरूरत से पूरी तरह मुक्त हो चुका है और तेजी से स्वस्थ हो रहा है.

आर्थिक संकट के बीच अस्पताल बना सहारा

बच्चे के पिता मजदूरी से परिवार चलाते हैं और निजी अस्पताल में होने वाला लाखों रुपये का खर्च उनके लिए नामुमकिन था. अस्पताल प्रशासन ने न केवल प्रत्यारोपण की प्रक्रिया संभाली, बल्कि उसके बाद लगने वाली महंगी दवाओं का खर्च भी खुद वहन करने की घोषणा की. 

विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने मिलकर रचा इतिहास

अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. संदीप बंसल ने कहा कि यह उपलब्धि मेडिकल टीम की वर्षों की मेहनत और समर्पण का नतीजा है. उन्होंने इसे देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता और भरोसे को मजबूत करने वाला कदम बताया. इस सर्जरी का नेतृत्व यूरोलॉजी और रीनल ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख डायरेक्टर प्रो. डॉ. पवन वासुदेवा ने किया. उनके साथ प्रो. डॉ. नीरज कुमार भी सर्जिकल टीम में शामिल थे. पेडियाट्रिक टीम का नेतृत्व डॉ. शोभा शर्मा ने किया, जिनके साथ डॉ. श्रीनिवासवरदन और विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप के. देबता जुड़े रहे. एनेस्थीसिया टीम का संचालन डॉ. सुशील ने किया, जिनकी टीम में डॉ. ममता और डॉ. सोनाली शामिल थीं.

ये भी पढ़ें: कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कौन-सी दवाएं ज्यादा बनाती है देश की फार्मा इंडस्ट्री, आपकी सेहत के लिए क्या है फ्यूचर प्लानिंग?

कौन-सी दवाएं ज्यादा बनाती है देश की फार्मा इंडस्ट्री, आपकी सेहत के लिए क्या है फ्यूचर प्लानिंग?



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ बम के बाद अगर देश की किसी इंडस्ट्री पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा था तो वह फार्मा सेक्टर है. कभी सोचा है कि अमेरिका में दवाओं की खपत को करीब 80 पर्सेंट पूरा करने वाली भारत की फार्मा इंडस्ट्री कौन-सी दवाएं सबसे ज्यादा बनाती है? इसके अलावा आपकी सेहत के लिए इस सेक्टर में क्या प्लानिंग चल रही है? आइए जानते हैं.

सरकार की यह है प्लानिंग

सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन के जॉइन मेडिसिन कंट्रोलर डॉ. आर चंद्रशेखर के मुताबिक, भारतीय फार्मा इंडस्ट्री में इस वक्त रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) पर खास जोर दिया जा रहा है. इसका मकसद जेनेरिक दवाओं को बनाने के साथ-साथ नई दवाओं और तकनीक को डिवेलप करना है. इसके तहत भारत सरकार ने प्रमोशन ऑफ रिसर्च एंड इनोवेशन इन फार्मा-मेडटेक सेक्टर (पीआरआईपी) नामक बड़ी योजना शुरू की है, जिस पर करीब 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इस स्कीम के तहत प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों, स्टार्टअप्स और एमएसएमई को रिसर्च के लिए फाइनेंशियल हेल्प दी जा रही है. 

उन्होंने ग्रेटर नोएडा के एक्सपो सेंटर में आयोजित 18वें सीपीएचआई और पिमेक इंडिया एक्सपो में बताया कि एक लाख करोड़ रुपये की नई हॉस्पिटल फाइनेंस योजना से देश के फार्मा सेक्टर में रिसर्च एंड डिवेलपमेंट को मजबूत करेगी. उन्होंने कहा कि इस वक्त भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है, लेकिन हॉस्पिटल फाइनेंस योजना से देश अगले पांच साल में दुनिया की फार्मेसी से एक इनोवेशन-नेतृत्व वाले फार्मा राष्ट्र के रूप में डिवेलप होने की तरफ कदम बढ़ा देगा. 

कौन-सी दवाएं बनाती है फार्मा इंडस्ट्री?

फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष नामित जोशी ने बताया कि भारत का फार्मा उद्योग इस वक्त पूरी दुनिया में ‘जेनेरिक्स हब’ के नाम से जाना जाता है. अब ग्लोबल फार्मास्युटिकल  की फील्ड में तेजी से बदलाव हो रहा है. ऐसे में दुनिया की फार्मेसी बने रहने के लिए भारत को अपनी पारंपरिक जेनेरिक्स मानसिकता से आगे बढ़ना होगा और वैल्यू बेस्ड इनोवेशन पर फोकस करना होगा. साथ ही, पेप्टाइड्स, जटिल जेनेरिक्स, बायोसिमिलर्स, बायोलॉजिक्स और सेल व जीन थैरेपी में अपनी क्षमताएं बढ़ानी होंगी. 

फार्मा सेक्टर में भी आत्मनिर्भर हो रहा भारत

इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुद्रास के मुताबिक, भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर ने काफी तेजी दिखाई है. इसकी वजह से निर्यात दोगुना होकर 30 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है. इसमें काफी तेजी से बदलाव हो रहा है, क्योंकि भारत पारंपरिक जेनेरिक्स, जटिल फॉर्मूलेशन, बायोलॉजिक्स और एडवांस्ड ट्रीटमेंट में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है.

ये भी पढ़ें: कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल

कैंसर के इलाज में बड़ी छलांग, भारत में बना AI अब बताएगा ट्यूमर का असली खेल



कैंसर के इलाज को ज्यादा पर्सनलाइज्ड बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है. भारत में एक नई रिसर्च में ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फ्रेमवर्क डिवेलप किया गया है, जो कैंसर की कोशिकाओं के भीतर होने वाली जटिल गतिविधियों को पढ़कर बता सकता है कि ट्यूमर किस वजह से बढ़ रहा है और मरीज के शरीर में कौन-सी खतरनाक प्रक्रियाएं एक्टिव हैं?

कैंसर को समझने का पुराना तरीका अब काफी नहीं!

अब तक डॉक्टर कैंसर का मूल्यांकन उसके आकार, फैलाव और स्टेज के आधार पर करते रहे हैं, लेकिन एक ही स्टेज वाले दो मरीजों का रिजल्ट कई बार अलग निकलता है, क्योंकि ट्यूमर के भीतर चलने वाली मॉलिक्यूलर प्रक्रियाओं को ये स्टेजिंग सिस्टम पहचान नहीं पाते. नई AI तकनीक इसी कमी को पूरा करती है. यह कैंसर को उसकी ‘मॉलिक्यूलर पर्सनैलिटी’ के आधार पर समझती है, न कि सिर्फ उसके आकार या फैलाव से.

कैंसर के सिग्नल्स को पढ़ने वाला पहला AI फ्रेमवर्क

SN Bose National Centre for Basic Sciences और Ashoka University की टीम ने मिलकर OncoMark नाम का AI फ्रेमवर्क बनाया है. यह पहली ऐसी तकनीक है, जो कैंसर के हॉलमार्क्स जैसे मेटास्टेसिस, इम्यून सिस्टम से बच निकलना, जीन अस्थिरता और थैरेपी रेसिस्टेंस को सटीक रूप से पहचान सकती है. इस रिसर्च टीम का नेतृत्व डॉ. शुभाशिस हलदार और डॉ. देबयान गुप्ता ने किया.

14 तरह के कैंसर पर की गई रिसर्च

शोधकर्ताओं ने 14 प्रकार के कैंसर से ली गई 31 लाख कोशिकाओं का डेटा AI में डाला. AI ने इन पर काम करके ‘प्सूडो-बायोप्सी’ तैयार कीं, जिनसे यह समझ आया कि कौन-सा ट्यूमर किन बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं से संचालित हो रहा है. यह पहली बार है, जब वैज्ञानिक मॉलिक्यूलर लेवल पर देख पाए हैं कि कैंसर स्टेज बढ़ने के साथ हॉलमार्क एक्टिविटीज कैसे बढ़ती जाती हैं.

कैसा रहा रिजल्ट?

OncoMark ने इंटरनल टेस्टिंग में 99% से ज्यादा सटीकता हासिल की. 5 स्वतंत्र समूहों में भी इसकी सटीकता 96% से ऊपर रही. 20,000 असली मरीजों के नमूनों पर वैलिडेशन के बाद शोधकर्ताओं ने इसे व्यापक रूप से उपयोग योग्य बताया है.

नई तकनीक से होंगे ये फायदे

  • पता चलेगा कि मरीज में कौन-सा हॉलमार्क सक्रिय है. इससे कैंसर की असली वजह पर सीधे निशाना साधने वाली दवा या थैरेपी चुनी जा सकेगी.
  • ऐसे ट्यूमर की पहचान होगी, जो दिखने में कम खतरनाक लेकिन अंदर से तेजी से बढ़ रहे हों. ऐसे मामलों में पहले से इंटरवेशन करके मरीज की जान बचाई जा सकती है.

क्या होगा फायदा?

विशेषज्ञों की मानें तो यह सिस्टम उन मरीजों की भी मदद करेगा, जिनका कैंसर पारंपरिक स्टेजिंग सिस्टम में हल्का दिखता है, लेकिन असल में कहीं ज्यादा आक्रामक होता है. यह रिसर्च Communications Biology (Nature Publishing Group) में प्रकाशित हुई है. भारत की इस उपलब्धि को कैंसर रिसर्च में बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में टार्गेटेड थैरेपी और पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन को नई दिशा दे सकता है.

इसे भी पढ़ें: डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये चीजें तुरंत खाना छोड़ दें महिलाएं, वरना कभी नहीं बन पाएंगी मां!

ये चीजें तुरंत खाना छोड़ दें महिलाएं, वरना कभी नहीं बन पाएंगी मां!



Impact Of Junk Food On Fertility: फर्टिलिटी का मतलब है कि शरीर की नेचुरल क्षमता गर्भधारण करने और संतान पैदा करने की. उम्र, जेनेटिक्स और कई मेडिकल समस्याएं इसका असर तय करती हैं. कई कारण हमारे हाथ में नहीं होते, लेकिन कुछ आदतें और लाइफस्टाइल चॉइस ऐसी होती हैं, जिन्हें बदलकर इनफर्टिलिटी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यह वह स्थिति है जब कोई महिला एक साल तक नियमित और बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाती. अधिकतर मामलों में कोई अलग लक्षण दिखाई नहीं देते. आज कई तरह के इलाज जैसे हार्मोन थेरेपी, IVF आदि उपलब्ध हैं, लेकिन सबसे अच्छा तरीका है कि उन कारणों को कंट्रोल किया जाए जो इनफर्टिलिटी का जोखिम बढ़ाते हैं.

महिलाओं में इनफर्टिलिटी बढ़ाने वाले जोखिम कारक

कुछ महत्वपूर्ण कारण जो गर्भधारण की क्षमता को कमजोर करते हैं, जिसमें-

उम्र- 35 वर्ष के बाद प्रजनन क्षमता तेजी से गिरने लगती है.

स्मोकिंग– धूम्रपान न सिर्फ इनफर्टिलिटी बढ़ाता है, बल्कि गर्भपात का खतरा भी दोगुना करता है.

मोटापा- अधिक वजन हार्मोन बैलेंस बिगाड़ देता है और गर्भधारण मुश्किल बना देता है.

अल्कोहल– नियमित शराब सेवन भी फर्टिलिटी को प्रभावित करता है.

डाइट– पोषक तत्वों की कमी या ईटिंग डिसऑर्डर गर्भधारण में रुकावट बनते हैं.

तनाव– बहुत अधिक मानसिक और शारीरिक तनाव से प्रजनन क्षमता कमजोर पड़ती है.

फास्ट फूड और फर्टिलिटी

इन सभी कारणों को देखकर साफ है कि फास्ट फूड महिलाओं की फर्टिलिटी पर बुरा असर डालता है. लगातार फास्ट फूड खाने से वजन बढ़ता है और शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते, जिससे गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है. अडिलेड यूनिवर्सिटी की 5600 महिलाओं पर हुई स्टडी में पाया गया कि जो महिलाएं नियमित फास्ट फूड खाती थीं, उनमें इनफर्टिलिटी का जोखिम 8 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत हो गया. यानी गर्भधारण में समय भी ज्यादा लगता है और शरीर की सेहत भी लगातार कमजोर होती जाती है.

गर्भावस्था में फास्ट फूड खाने के खतरे

गर्भधारण के बाद भी फास्ट फूड कई तरह के जोखिम पैदा करता है:

  • बच्चे में जेनेटिक का खतरा बढ़ता है.
  • असमय प्रसव का जोखिम.
  • जन्म दोष की संभावना बढ़ जाती है.
  • मां का वजन बढ़ने से मिसकैरेज और स्टिलबर्थ का खतरा.
  • बच्चे में एलर्जी और अस्थमा का खतरा.
  • गेस्टेशनल डायबिटीज का बढ़ा हुआ जोखिम.

प्रोसेस्ड मीट

सॉसेज, बेकन, हॉट डॉग जैसे प्रोसेस्ड मांस पुरुषों और महिलाओं, दोनों की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं. गर्भधारण की कोशिश कर रही महिलाओं के लिए ये चीजें पूरी तरह से छोड़ देना ही बेहतर है. इन मांस उत्पादों में हानिकारक फैट के साथ-साथ नाइट्रेट और नाइट्राइट जैसे प्रिजर्वेटिव होते हैं, जो शरीर के हार्मोनल संतुलन और प्रजनन क्षमता को कमजोर करते हैं.

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सुबह उठकर सूखा-सूखा लगता है गला, शरीर में हो सकती है ये दिक्कत

सुबह उठकर सूखा-सूखा लगता है गला, शरीर में हो सकती है ये दिक्कत



Dry Throat In Morning: सुबह उठते ही गले में सूखापन या खराश महसूस होना सिर्फ एक असहज शुरुआत नहीं है. यह शरीर का संकेत भी हो सकता है कि अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा. इसकी वजह हमारा सोने का तरीका हो सकता है, कमरे की हवा या फिर शरीर का अंदरूनी बैलेंस. अगर असली कारण समझ आ जाए, तो लंबे समय तक चलने वाले गले के दर्द या नींद से जुड़ी दिक्कतों से बचा जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन-किन कारणों के चलते होता है. 

नींद में मुंह से सांस लेना

सुबह गला सूखा होने की सबसे आम, लेकिन अनदेखी वजह है मुंह से सांस लेना. जब हम नाक की बजाय मुंह से सांस लेते हैं, तो हवा सीधे गले की नाजुक परतों पर गुजरती है और उन्हें सुखा देती है. ‘Annals’ में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि कई बार नाक बंद होना, टेढ़ी नाक की हड्डी या स्लीप एप्निया जैसी समस्याएं मुंह से सांस लेने की वजह बनती हैं. लंबे समय में इससे गले में जलन और बदबूदार सांस की परेशानी भी बढ़ सकती है.

रात में एसिड रिफ्लक्स का ऊपर आना

कई बार गला सूखने की वजह सांस नहीं, बल्कि पेट का एसिड होता है. नींद के दौरान एसिड ईसोफेगस से ऊपर उठकर गले तक पहुंच जाए, तो सुबह जलन और सूखापन महसूस होता है. NIH की 2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 20 प्रतिशत रिफ्लक्स रोगियों में लेरिंगोफैरिंजियल रिफ्लक्स होता है, जिसमें हार्टबर्न नहीं होता बल्कि गला प्रभावित होता है.

कम पानी पीना या सूखी हवा

दिनभर कम पानी पीना और रात में AC या हीटर में सोना, दोनों ही गले को सूखा बना सकते हैं. नींद में शरीर सांस के साथ नमी खोता है और अगर हवा पहले से ही सूखी हो, तो यह असर और बढ़ जाता है. ResearchGate की एक स्टडी कहती है कि हल्की-सी डिहाइड्रेशन भी लार का उत्पादन कम कर देती है, जिससे गला और ज्यादा सूखने लगता है.

नींद में खर्राटे, घुटन या दिनभर थकान

अगर सूखे गले के साथ खर्राटे, सांस रुकने जैसे झटके या 8 घंटे सोने के बाद भी थकान महसूस हो, तो यह स्लीप एप्निया का संकेत हो सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार स्लीप एप्निया में एयरवे आंशिक रूप से बंद होते हैं, जिससे व्यक्ति मुंह से सांस लेने लगता है और गला लगातार सूखता है.

एलर्जी और पोस्ट-नेजल ड्रिप

मौसमी एलर्जी, धूल या पालतू जानवरों से एलर्जी की वजह से रात में गले में म्यूकस जमा होकर सूखापन और जलन पैदा कर सकता है.

कुछ दवाइयों का असर

एंटीहिस्टामिन, एंटीडिप्रेसेंट या ब्लड प्रेशर की कई दवाइयां लार बनना कम कर देती हैं. लार कम होगी तो रात में गला ज्यादा सूखेगा. NIH के मुताबिक, सैकड़ों दवाइयां ड्राई माउथ और ड्राई थ्रोट का कारण बन सकती हैं.

क्या करें?

  • नई दवा शुरू होने के बाद गला सूख रहा है तो डॉक्टर से बात करें.
  • पानी ज्यादा पिएं और सोने से पहले शुगर-फ्री लॉजेंज इस्तेमाल करें.

सुबह का गला आरामदायक कैसे रखें?

छोटी-छोटी आदतें बहुत फर्क डालती हैं, जैसे नमी वाली हवा, सही मात्रा में पानी, नाक से सांस लेने की कोशिश और सोने से पहले हल्का खाना. लेकिन अगर यह दिक्कत हफ्तों तक बनी रहे या बढ़ती जाए, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें. कई बार लगातार सूखापन थायरॉइड या नींद से जुड़ी गंभीर समस्याओं का संकेत भी हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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