सुबह उठकर सूखा-सूखा लगता है गला, शरीर में हो सकती है ये दिक्कत

सुबह उठकर सूखा-सूखा लगता है गला, शरीर में हो सकती है ये दिक्कत



Dry Throat In Morning: सुबह उठते ही गले में सूखापन या खराश महसूस होना सिर्फ एक असहज शुरुआत नहीं है. यह शरीर का संकेत भी हो सकता है कि अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा. इसकी वजह हमारा सोने का तरीका हो सकता है, कमरे की हवा या फिर शरीर का अंदरूनी बैलेंस. अगर असली कारण समझ आ जाए, तो लंबे समय तक चलने वाले गले के दर्द या नींद से जुड़ी दिक्कतों से बचा जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन-किन कारणों के चलते होता है. 

नींद में मुंह से सांस लेना

सुबह गला सूखा होने की सबसे आम, लेकिन अनदेखी वजह है मुंह से सांस लेना. जब हम नाक की बजाय मुंह से सांस लेते हैं, तो हवा सीधे गले की नाजुक परतों पर गुजरती है और उन्हें सुखा देती है. ‘Annals’ में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि कई बार नाक बंद होना, टेढ़ी नाक की हड्डी या स्लीप एप्निया जैसी समस्याएं मुंह से सांस लेने की वजह बनती हैं. लंबे समय में इससे गले में जलन और बदबूदार सांस की परेशानी भी बढ़ सकती है.

रात में एसिड रिफ्लक्स का ऊपर आना

कई बार गला सूखने की वजह सांस नहीं, बल्कि पेट का एसिड होता है. नींद के दौरान एसिड ईसोफेगस से ऊपर उठकर गले तक पहुंच जाए, तो सुबह जलन और सूखापन महसूस होता है. NIH की 2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 20 प्रतिशत रिफ्लक्स रोगियों में लेरिंगोफैरिंजियल रिफ्लक्स होता है, जिसमें हार्टबर्न नहीं होता बल्कि गला प्रभावित होता है.

कम पानी पीना या सूखी हवा

दिनभर कम पानी पीना और रात में AC या हीटर में सोना, दोनों ही गले को सूखा बना सकते हैं. नींद में शरीर सांस के साथ नमी खोता है और अगर हवा पहले से ही सूखी हो, तो यह असर और बढ़ जाता है. ResearchGate की एक स्टडी कहती है कि हल्की-सी डिहाइड्रेशन भी लार का उत्पादन कम कर देती है, जिससे गला और ज्यादा सूखने लगता है.

नींद में खर्राटे, घुटन या दिनभर थकान

अगर सूखे गले के साथ खर्राटे, सांस रुकने जैसे झटके या 8 घंटे सोने के बाद भी थकान महसूस हो, तो यह स्लीप एप्निया का संकेत हो सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार स्लीप एप्निया में एयरवे आंशिक रूप से बंद होते हैं, जिससे व्यक्ति मुंह से सांस लेने लगता है और गला लगातार सूखता है.

एलर्जी और पोस्ट-नेजल ड्रिप

मौसमी एलर्जी, धूल या पालतू जानवरों से एलर्जी की वजह से रात में गले में म्यूकस जमा होकर सूखापन और जलन पैदा कर सकता है.

कुछ दवाइयों का असर

एंटीहिस्टामिन, एंटीडिप्रेसेंट या ब्लड प्रेशर की कई दवाइयां लार बनना कम कर देती हैं. लार कम होगी तो रात में गला ज्यादा सूखेगा. NIH के मुताबिक, सैकड़ों दवाइयां ड्राई माउथ और ड्राई थ्रोट का कारण बन सकती हैं.

क्या करें?

  • नई दवा शुरू होने के बाद गला सूख रहा है तो डॉक्टर से बात करें.
  • पानी ज्यादा पिएं और सोने से पहले शुगर-फ्री लॉजेंज इस्तेमाल करें.

सुबह का गला आरामदायक कैसे रखें?

छोटी-छोटी आदतें बहुत फर्क डालती हैं, जैसे नमी वाली हवा, सही मात्रा में पानी, नाक से सांस लेने की कोशिश और सोने से पहले हल्का खाना. लेकिन अगर यह दिक्कत हफ्तों तक बनी रहे या बढ़ती जाए, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें. कई बार लगातार सूखापन थायरॉइड या नींद से जुड़ी गंभीर समस्याओं का संकेत भी हो सकता है.

इसे भी पढ़ें- Health Risks Volcanic Ash: भारत में कब तक रहेगा इथियोपिया के ज्वालामुखी की राख का असर, किन मरीजों के लिए यह खतरनाक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये 4 नौकरियां सड़ा देती हैं आपकी किडनी, तुरंत ढूंढना शुरू कर दें नई जॉब

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High-Risk Occupations Kidney: हम रोज काम पर जाते हैं, कई घंटे मेहनत करते हैं, पसीना बहाते हैं और घर पर भी काम खत्म नहीं होता. थकान हो जाना या जॉइंट में दर्द होना तो समझ में आता है, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि यही रोज का काम धीरे-धीरे किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि किडनी अंदर ही अंदर खराब होती रहती है, बिना किसी बड़े लक्षण के.

किन लोगों की होती है किडनी खराब?

ज्यादातर लोगों का मानना है कि किडनी की बीमारी सिर्फ उन लोगों को होती है जिनकी डाइट खराब है, जो ज्यादा मीठा-नमक खाते हैं या जिन्हें शुगर और ब्लड प्रेशर की समस्या है. लेकिन सच्चाई यह है कि कई ऐसे कारण हैं जो चुपचाप रोज आपकी किडनी पर बोझ डालते रहते हैं और आपको पता भी नहीं चलता कि अंदर क्या नुकसान हो रहा है. किडनी खून को साफ रखती है. लेकिन जब उन पर लगातार दबाव बढ़ता है, तो शरीर में गंदगी जमा होने लगती है, जिसे क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD कहा जाता है. कई रिसर्च बताते हैं कि अलग-अलग तरह के काम करने वाले मजदूरों में किडनी फेल होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनकी काम करने की परिस्थितियां ही किडनी के लिए खतरा बन जाती हैं.

किन कामों में हो रही किडनी खराब?

सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जो बहुत ज्यादा गर्म माहौल में काम करते हैं. जैसे कंस्ट्रक्शन साइट, सड़क बनाने का काम, फैक्ट्रियों में भट्ठी के पास, खेतों में धूप में जहां लगातार पसीना निकलता है. ज्यादा पसीना मतलब ज्यादा डिहाइड्रेशन, जिससे किडनी पर सीधा दबाव पड़ता है. समय के साथ यही स्थिति किडनी को नुकसान पहुंचाती है.

इसके अलावा ऐसे काम जहां लोग केमिकल्स या जहरीली गैसों के संपर्क में रहते हैं जैसे पेंट, बैटरी, गोंद, टेनरी और कई फैक्ट्री यूनिट्स वहां मौजूद रसायन धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर किडनी की सेल्स को नष्ट करते हैं. लेड, कैडमियम और मर्करी जैसे भारी धातुएं तो किडनी के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती हैं. बैटरी प्लांट, माइनिंग, वेल्डिंग, पेंट और केमिकल उद्योग में काम करने वालों में किडनी को नुकसान का खतरा कई गुना ज्यादा होता है.

कुछ फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स, जैसे ट्राइक्लोरोएथिलीन या टोलुईन भी किडनी में धीरे-धीरे ज़हर की तरह असर करते हैं. इनका नुकसान तुरंत नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ किडनी की फिल्टरिंग क्षमता कम होने लगती है. रोजाना इन धुएं और रसायनों का संपर्क आपकी किडनी को चुपचाप खोखला करता रहता है.

गर्मी और भारी मेहनत के अलावा, लगातार तनाव वाली नौकरियां भी किडनी को प्रभावित करती हैं. लंबे घंटे काम करना, शिफ्ट बदलते रहना, कम सोना और खाना अनियमित होना, ये सब चीजें ब्लड प्रेशर बढ़ाकर और मेटाबॉलिज्म बिगाड़कर किडनी पर दबाव बढ़ाती हैं. ऑफिस में लगातार तनाव झेलने वाले लोगों में किडनी फंक्शन कम होने के मामले तेजी से देखे जा रहे हैं.

रिसर्च में क्या निकला?

कई रिसर्च तो यह भी बताते हैं कि तेज गर्मी में काम करने वाले मजदूरों में किडनी के Acute Injury के मामले सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं. अमेरिका के खेतों में काम करने वाले मजदूरों में एक ही दिन की मेहनत के बाद किडनी पर असर देखा गया है. वहीं थाईलैंड के एक अध्ययन में पाया गया कि जो लोग गर्म वातावरण में काम करते हैं, उनकी किडनी बीमारी का खतरा 5 गुना बढ़ जाता है.

क्या किया जा सकता है?

 सबसे जरूरी है पानी की कमी ना होने देना. जो लोग धूप या गर्म जगहों पर काम करते हैं, उन्हें हर 20-30 मिनट में पानी या इलेक्ट्रोलाइट लेना चाहिए और बीच-बीच में आराम करना चाहिए. जो लोग रसायनों के बीच काम करते हैं, उन्हें मास्क, ग्लव्स और प्रोटेक्टिव कपड़ों का सही इस्तेमाल करना चाहिए, वेंटिलेशन अच्छा रखना चाहिए और समय-समय पर किडनी का टेस्ट कराना चाहिए. वहीं तनाव में काम करने वाले लोगों को नींद पूरी करना, छोटे-छोटे ब्रेक लेना और जीवनशैली को संतुलित रखना बेहद जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- White Coat Hypertension: डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर में किस विटामिन की है कमी? इन संकेतों से पहचानें

शरीर में किस विटामिन की है कमी? इन संकेतों से पहचानें


कभी-कभी होंठ फटना या मुंह के कोनों में दरारें सिर्फ मौसम या बुखार की वजह से होती हैं, लेकिन कई बार यह विटामिन B की कमी का सीधा संकेत भी हो सकती हैं. ऐसे में कुछ दिनों तक B-कॉम्प्लेक्स लेने से फर्क दिखने लगता है और होंठ फिर से ठीक होने लगते हैं.

हाथों और पैरों में झनझनाहट आना भी एक आम संकेत है जो अक्सर विटामिन B12 की कमी से जुड़ा होता है. इसके साथ जीभ में सूजन, थकान, हल्का पीलापन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है. कुछ लोगों को डाइट में B12 वाले खाद्य पदार्थ शामिल करने से आराम मिलता है, जबकि कुछ को इंजेक्शन की जरूरत पड़ जाती है. एक साधारण ब्लड टेस्ट से इसकी पुष्टि की जा सकती है.

हाथों और पैरों में झनझनाहट आना भी एक आम संकेत है जो अक्सर विटामिन B12 की कमी से जुड़ा होता है. इसके साथ जीभ में सूजन, थकान, हल्का पीलापन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है. कुछ लोगों को डाइट में B12 वाले खाद्य पदार्थ शामिल करने से आराम मिलता है, जबकि कुछ को इंजेक्शन की जरूरत पड़ जाती है. एक साधारण ब्लड टेस्ट से इसकी पुष्टि की जा सकती है.

कभी-कभी किसी एक पैर में लगातार दर्द बना रहता है. आमतौर पर यह दर्द चोट या मांसपेशी की वजह से माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह विटामिन B6 की कमी के कारण भी हो सकता है. जब आहार में मछली, चिकन और होल-ग्रेन जैसे B6 वाले खाद्य पदार्थ जोड़े गए, तो दर्द पूरी तरह ठीक हो गया.

कभी-कभी किसी एक पैर में लगातार दर्द बना रहता है. आमतौर पर यह दर्द चोट या मांसपेशी की वजह से माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह विटामिन B6 की कमी के कारण भी हो सकता है. जब आहार में मछली, चिकन और होल-ग्रेन जैसे B6 वाले खाद्य पदार्थ जोड़े गए, तो दर्द पूरी तरह ठीक हो गया.

रात में साफ दिखाई न देना या रंगों में अंतर महसूस होना कई कारणों से हो सकता है, लेकिन यह विटामिन A की कमी का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में गाजर, शकरकंद और पत्तेदार सब्जियां खाने से आंखों की रोशनी को नेचुरल रूप से सपोर्ट मिलता है.

रात में साफ दिखाई न देना या रंगों में अंतर महसूस होना कई कारणों से हो सकता है, लेकिन यह विटामिन A की कमी का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में गाजर, शकरकंद और पत्तेदार सब्जियां खाने से आंखों की रोशनी को नेचुरल रूप से सपोर्ट मिलता है.

मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन होना अक्सर डिहाइड्रेशन या पोटैशियम की कमी से जुड़ा होता है. तुरंत राहत के लिए इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक काम आती है, लेकिन इसे दोबारा होने से रोकने के लिए रोजाना केला या कोई साइट्रस फल खाना मददगार होता है.

मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन होना अक्सर डिहाइड्रेशन या पोटैशियम की कमी से जुड़ा होता है. तुरंत राहत के लिए इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक काम आती है, लेकिन इसे दोबारा होने से रोकने के लिए रोजाना केला या कोई साइट्रस फल खाना मददगार होता है.

नाखूनों का पतला, कमजोर या चम्मच जैसा दिखना यानी ऊपर की ओर मुड़ना आयरन की कमी, यानी एनीमिया का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में डॉक्टर अक्सर आयरन सप्लीमेंट और आयरन युक्त भोजन जैसे सीफूड, लीवर और हरी सब्जियां की सलाह देते हैं.

नाखूनों का पतला, कमजोर या चम्मच जैसा दिखना यानी ऊपर की ओर मुड़ना आयरन की कमी, यानी एनीमिया का शुरुआती संकेत हो सकता है. ऐसे में डॉक्टर अक्सर आयरन सप्लीमेंट और आयरन युक्त भोजन जैसे सीफूड, लीवर और हरी सब्जियां की सलाह देते हैं.

मसूड़ों से खून आना, स्किन का बार-बार सूखना या एक्जिमा जैसे लक्षण कई बार विटामिन C और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी से जुड़े होते हैं. इन्हें ठीक करने के लिए आहार में मछली, अंडे की जर्दी, अखरोट, चिया सीड्स और अधिक फल-सब्जियां जोड़ना बहुत फायदेमंद है.

मसूड़ों से खून आना, स्किन का बार-बार सूखना या एक्जिमा जैसे लक्षण कई बार विटामिन C और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी से जुड़े होते हैं. इन्हें ठीक करने के लिए आहार में मछली, अंडे की जर्दी, अखरोट, चिया सीड्स और अधिक फल-सब्जियां जोड़ना बहुत फायदेमंद है.

आखिर में सबसे जरूरी बात यह है कि मल्टीविटामिन से ज्यादा असर असली, प्राकृतिक भोजन करता है. संतुलित और ताजा आहार अपनाने से शरीर को अपनी जरूरत के पोषक तत्व खुद ही मिलने लगते हैं, और इस तरह की कमियां लंबे समय तक टिक नहीं पातीं.

आखिर में सबसे जरूरी बात यह है कि मल्टीविटामिन से ज्यादा असर असली, प्राकृतिक भोजन करता है. संतुलित और ताजा आहार अपनाने से शरीर को अपनी जरूरत के पोषक तत्व खुद ही मिलने लगते हैं, और इस तरह की कमियां लंबे समय तक टिक नहीं पातीं.

Published at : 26 Nov 2025 09:58 AM (IST)

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डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह

डॉक्टर के सामने अचानक क्यों बढ़ जाता है मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर? जान लें वजह



कल्पना कीजिए आप डॉक्टर के क्लिनिक में बैठे हैं. नर्स आपका ब्लड प्रेशर चेक करती है और अचानक मशीन पर 150/95 नंबर आ जाता है. वहीं, घर जाने पर ब्लड प्रेशर 120/80 मिलता है. यानी एकदम नॉर्मल. क्या आपने कभी सोचा है कि डॉक्टर के सामने मरीज या सही सलामत इंसान का ब्लड प्रेशर क्यों बढ़ जाता है? इसकी असली वजह क्या है? 

असलियत में क्या है यह दिक्कत?

बता दें कि डॉक्टर के सामने अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ जाना कोई जादू नहीं, बल्कि व्हाइट कोट हाइपरटेंशन है. इसका मतलब है कि डॉक्टर का सफेद कोट देखते ही ब्लड प्रेशर चढ़ जाता है. यह समस्या आजकल इतनी कॉमन हो गई है कि हर 5 में से 1-2 लोग इससे जूझ रहे हैं. नई रिसर्च बताती है कि ये सिर्फ घबराहट की बात नहीं, बल्कि दिल की बीमारी का खतरा भी दोगुना कर सकती है.

यह प्रॉब्लम कितनी खतरनाक?

अमेरिकन हार्ट असोसिएशन की 2024 की एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों का बीपी डॉक्टर के सामने बढ़ता है, उनमें हार्ट अटैक का रिस्क नॉर्मल लोगों से दोगुना होता है. पेन मेडिसिन के रिसर्चर्स ने 60 हजार से ज्यादा मरीजों पर स्टडी की और बताया कि अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह साइलेंट किलर बन सकता है. ICMR की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, 21 करोड़ से ज्यादा लोग हाई बीपी से परेशान हैं और इनमें 20-30 पर्सेंट को व्हाइट कोट हाइपरटेंशन की वजह से गलत दवा दी जा रही है. 

क्यों होती है यह दिक्कत?

व्हाइट कोट हाइपरटेंशन बीमारी के नाम से साफ है कि डॉक्टर के सफेद कोट, इंजेक्शन, सुई और बीमारी का डर. जब हम क्लिनिक या अस्पताल पहुंचते हैं तो डॉक्टर का कोट देखते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है. इसकी वजह से ब्लड प्रेशर अचानक ऊपर चढ़ जाता है. यह कोई नई बीमारी नहीं है. इसे 1980 के दशक में पहचान लिया गया था, लेकिन 2025 तक कई रिसर्च ने इसके पीछे के राज खोल दिए हैं.

जापान में हुई स्टडी में सामने आई यह बात

जापान के ओहासामा में 2023 के दौरान 153 लोगों पर एक स्टडी पूरी की गई थी. करीब चार साल तक चली इस स्टडी में देखा गया कि इस बीमारी का असर काफी समय तक रहता है और यह दिक्कत बार-बार होती है. अगर आपका बीपी ऑफिस में 140/90 से ज्यादा रहता है, लेकिन 24 घंटे की मॉनिटरिंग में 130/80 से कम मिलता है तो यह व्हाइट कोट ही है. यह दिक्कत महिलाओं, बुजुर्गों और तनावग्रस्त लोगों में ज्यादा होती है.

ये टिप्स आएंगे काम

अब सवाल उठता है कि व्हाइट कोट हाइपरटेंशन से कैसे बचा जा सकता है. आइए आपको इसके तरीके भी बताते हैं.

  • सुबह-शाम 2-2 बार घर पर बीपी चेक करें. अगर बीपी 3 दिन तक लगातार ऑफिस में हाई आता है तो ABPM करवाएं.
  • डॉक्टर के पास जाते वक्त गहरी सांस लें. 5 मिनट शांत बैठें. म्यूजिक सुनें या प्राणायाम करें.
  • खाने में नमक कम करें. फल-सब्जी ज्यादा खाएं. रोजाना 30 मिनट वॉक करें. धूम्रपान-शराब छोड़ें.

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सिगरेट और शराब नहीं, इन वजहों से भी नामर्द हो रहे पुरुष, आप भी इसके शिकार तो नहीं?

सिगरेट और शराब नहीं, इन वजहों से भी नामर्द हो रहे पुरुष, आप भी इसके शिकार तो नहीं?



Causes Of Male Infertility: आज की बदलती लाइफस्टाइल में फर्टिलिटी रेट्स भी तेजी से बदल रहे हैं. कई स्टडी में पाया गया है कि बढ़ती बांझपन की कुल मामलों में 40 से 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पुरुषों से जुड़े कारणों की होती है. पुरुषों की फर्टिलिटी कई वजहों से प्रभावित होती है, जिनमें धूम्रपान, ज्यादा शराब पीना और बैठे-बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल प्रमुख कारण माने जाते हैं. दुनियाभर में फर्टिलिटी घट रही है, ऐसे में पुरुषों के लिए इन लाइफस्टाइल फैक्टर्स को समझना और समय रहते सुधार करना बेहद जरूरी हो जाता है.

सिगरेट का धुआं स्पर्म की क्वालिटी को बुरी तरह प्रभावित करता है. इसमें मौजूद हानिकारक केमिकल्स और भारी धातुएं जैसे कैडमियम और लेड स्पर्म के DNA को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे स्पर्म की मोलालिटी कम हो जाती है, यानी स्पर्म का आगे बढ़कर एग्स तक पहुंचने की क्षमता घट जाती है, इसका सीधा असर फर्टिलाइजेशन पर पड़ता है और गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है. कई वैश्विक अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि स्मोकर्स की स्पर्म कंसन्ट्रेशन नॉन-स्मोकर्स की तुलना में 12 से 20 प्रतिशत तक कम होती है. चलिए, आपको बताते हैं कि सिगरेट और शराब के अलावा किन वजहों से इनफर्टिलिटी बढ़ रही है. 

किन वजहों से बढ़ रही है इनफर्टिलिटी?

स्मोकिंग और शराब के अलावा इसके तमाम कारण होते हैं, जिसकी वजह से इनफर्टिलिटी तेजी से बढ़ रही है. Palanibalajifertilitycenter में के अनुसार,

ड्रग्स का असर

दुनिया भर में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला अवैध नशा कैनबिस (मारिजुआना) है, और इसके उपभोक्ताओं में पुरुषों की संख्या सबसे अधिक पाई जाती है. अगर कोई पुरुष हफ्ते में एक से ज्यादा बार, लगातार तीन महीने तक कैनबिस का सेवन करता है, तो उसकी स्पर्म काउंट और स्पर्म कंसन्ट्रेशन कम हो सकती है. अगर इसके साथ अन्य ड्रग्स या शराब भी ली जाए तो नुकसान और बढ़ जाता है.

मोटापा

जैसे-जैसे पुरुषों का BMI बढ़ता है, वैसे-वैसे शरीर की फैट स्क्रोटम के आसपास बढ़ने लगती है. इससे वहां का तापमान बढ़ जाता है, जो स्पर्म बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है. बढ़ी हुई चर्बी से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस भी बढ़ता है, जिससे स्पर्म की गतिशीलता, DNA क्वालिटी और एग के साथ इंटरैक्शन, तीनों प्रभावित होते हैं.

मेंटल हेल्थ

चाहे तनाव काम का हो, परिवार का या किसी भी अन्य कारण से हो, पुरुषों में लगातार साइकोलॉजिकल स्ट्रेस से स्पर्म क्वालिटी बिगड़ सकती है. कई बार तनाव के कारण सीमन पैरामीटर्स असामान्य हो जाते हैं, जिससे पिता बनने की संभावना कम हो जाती है.

डाइट

स्पर्म की गुणवत्ता काफी हद तक खाने पर निर्भर करती है. जो लोग ओमेगा-3 फैटी एसिड, एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन से भरपूर डाइट लेते हैं, जैसे मेडिटेरेनियन डाइट उनमें स्पर्म पैरामीटर्स बेहतर देखे जाते हैं.  इस तरह की डाइट में सैचुरेटेड और ट्रांस फैट बहुत कम होते हैं, जो खराब सीमन क्वालिटी से जुड़े माने जाते हैं.

उम्र का प्रभाव

हालांकि इसकी कोई सख्त सीमा तय नहीं है, लेकिन 40 साल से ऊपर की उम्र को आमतौर पर एडवांस्ड पिता बनाने का उम्र माना जाता है. उम्र बढ़ने के साथ स्पर्म में जेनेटिक बदलाव भी आते हैं, जिससे होने वाले बच्चे में कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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