भारत में कब तक रहेगा इथियोपिया के ज्वालामुखी की राख का असर, किन मरीजों के लिए यह खतरनाक?

भारत में कब तक रहेगा इथियोपिया के ज्वालामुखी की राख का असर, किन मरीजों के लिए यह खतरनाक?



Ethiopia Volcanic Ash: इथियोपिया में ज्वालामुखी फटने के बाद उठी राख की परत मंगलवार शाम तक भारत से पूरी तरह निकल जाएगी. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, यह राख सोमवार से उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में फैली हुई थी और कुछ समय के लिए फ्लाइट संचालन को भी प्रभावित किया. IMD के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्र ने बताया कि राख के बादल अब चीन की ओर बढ़ रहे हैं और मंगलवार शाम 7.30 बजे तक भारत से हट जाएंगे. यह सोमवार को पहले गुजरात में दाखिल हुआ, फिर रातभर में राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पंजाब तक फैल गया.

राख का बादल भारत तक कैसे पहुंचा?

इथियोपिया के अफार क्षेत्र में स्थित हैली गुब्बी नामक शील्ड ज्वालामुखी में रविवार को करीब 10,000 साल बाद विस्फोट हुआ. राख 14 किमी (लगभग 45,000 फीट) ऊंचाई तक उठी. Toulouse VAAC के मुताबिक, रविवार सुबह 8:30 बजे GMT पर विस्फोट के दौरान बनी भारी मात्रा में राख का गुबार विस्फोट रुकने के बाद भी उत्तरी भारत की ओर बढ़ता रहा. अफार क्षेत्र से उठी राख तेज ऊपरी हवाओं के साथ लाल सागर पार करते हुए यमन और ओमान तक पहुंची और फिर अरब सागर के ऊपर से होते हुए पश्चिमी और उत्तरी भारत में दाखिल हुई. IMD ने बताया कि इस plume को सैटेलाइट इमेजरी, VAAC की एडवाइजरी और मॉडल्स के जरिए ट्रैक किया गया.

सेहत के लिए कितना खतरनाक 

दिल्ली में तो आसमान में एक हल्की-सी राख की परत जैसी धुंध छाई रही और हवा का स्तर ‘बहुत खराब’ कैटेगरी में बना रहा. रिपोर्ट्स के अनुसार,  ज्वालामुखी फटने के दौरान बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड भी बाहर निकली. गैस की इतनी ज्यादा मौजूदगी ने पर्यावरण और लोगों की सेहत पर संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ज्वालामुखी की राख आम आग में बची मुलायम राख जैसी नहीं होती. इसमें चट्टानों, खनिजों और कांच के बेहद बारीक, खुरदुरे और तेज कण होते हैं. इनका आकार इतना छोटा हो सकता है कि नंगी आंख से दिखे भी नहीं, और इतना बड़ा भी कि आंखों या संवेदनशील त्वचा पर खरोंच छोड़ देंय कई बार इस राख में क्रिस्टलाइन सिलिका भी होती है जिसे लंबे समय तक सांस में लेने पर सिलिकोसिस जैसी गंभीर फेफड़े की बीमारी हो सकती है.

स्वास्थ्य पर इसका क्या असर पड़ता है?

CDC के अनुसार, थोड़े समय के संपर्क में आने पर भी ये समस्याएं हो सकती हैं. इसमें

  • लगातार खांसी या सांस लेने में तकलीफ
  • गले में खराश
  • आंखों में लालिमा या जलन
  • सिरदर्द या थकान
  • ज्यादा राख सांस में चले जाए तो हल्की-सी मतली

अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या किसी भी तरह की सांस संबंधी बीमारी वाले लोगों में ये लक्षण और तेज. महसूस हो सकते हैं. लंबे समय और भारी मात्रा में राख के संपर्क में रहना जैसे ज्वालामुखी के आसपास उन लोगों को आगे चलकर गंभीर फेफड़े की परेशानी पैदा कर सकता है. हालांकि, भारत में ऐसी स्थिति नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.

बचाव कैसे करें?

  • जितना हो सके घर के अंदर रहें और दरवाजे-खिड़कियां बंद रखें.
  • बाहर निकलना जरूरी हो तो N95 मास्क पहनें.
  • ऐसी एयर-कंडीशनिंग सेटिंग न चलाएं जो बाहर की हवा अंदर खींचती हो.
  • घर के बाहर जमा राख को दरवाजों और वेंटिलेशन सिस्टम से हटाते रहें.

इसे भी पढ़ें- Winter Health Tips: ठंडे पानी से या गर्म पानी से… ठंड में कैसे नहाना होता है ठीक? एक्सपर्ट से जानें

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ठंडे पानी से या गर्म पानी से… ठंड में कैसे नहाना होता है ठीक? एक्सपर्ट से जानें

ठंडे पानी से या गर्म पानी से… ठंड में कैसे नहाना होता है ठीक? एक्सपर्ट से जानें



Winter Health Tips: पूरे देश पर में फिलहाल कड़ाके की ठंड शुरू हो गई है. वहीं सर्दियां शुरू होते ही सुबह नहाने को लेकर सबसे बड़ा कंफ्यूजन यही रहता है कि ठंडा पानी से नहाया जाए या गर्म पानी से. एक तरफ ठंड में गर्म पानी शरीर को तुरंत राहत देता है तो दूसरी तरफ कहीं लोग कहते हैं कि इससे स्किन खराब होती है. वहीं ठंडे पानी से नहाने के भी अपने फायदे होते हैं लेकिन उसे लेकर भी डर रहता है कि ठंड में ठंडे पानी से नहाने पर जल्दी बीमार पड़ सकते हैं. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि सर्दियों में नहाने का सही तरीका क्या है. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि ठंड में ठंडे पानी से या गर्म पानी से किससे नहान ठीक रहता है .

ठंड में गर्म पानी से नहाने के फायदे और नुकसान

गर्म पानी ठंड के मौसम में शरीर को तुरंत राहत देता है. इसकी गर्माहट मांसपेशियों को आराम पहुंचाती है, जकड़न कम करती है और ब्लड फ्लो को बेहतर बनाती है. गर्म पानी की भाप नाक को खोलने में मदद करती है, इसलिए सर्दी जुकाम में इससे काफी राहत मिलती है. यही वजह होती है कि सर्दियों में लोग गर्म पानी से नहाना पसंद करते हैं. वही इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च एंड इंजीनियरिंग डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार बहुत गर्म पानी स्किन की बाहरी लेयर को नुकसान पहुंचा सकता है. एक्सपर्ट्स भी बताते हैं कि ज्यादा गर्म पानी से नहाने पर स्क्रीन का नेचुरल ऑयल खत्म हो जाते हैं, जिससे ड्राइनेस, खुजली, रेडनेस और एक्जिमा जैसी समस्याएं बढ़ जाती है. वहीं लंबे समय तक गर्म पानी से नहाने पर स्किन की नमी भी तेजी से घटने लगती है.

ठंडे पानी से नहाने के फायदे और नुकसान

ठंडा पानी शरीर को तुरंत एक्टिव करता है और ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है. माना जाता है कि ठंडे पानी से नहाने से इम्यूनिटी भी बेहतर होती है क्योंकि यह व्हाइट ब्लड सेल्स की प्रक्रिया को तेज कर देता है. वहीं दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स बताते हैं की बहुत ज्यादा ठंड में अचानक ठंडे पानी से नहाना शरीर को शॉक दे सकता है. ठंडा पानी ब्लड वेसल्स को सिकोड़ देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल की धड़कन तेज हो सकती है. खासतौर पर दिल के मरीज, हाई बीपी वाले लोगों और रेस्पिरेटरी समस्या वालों के लिए यह खतरनाक हो सकता है.

क्या सलाह देते हैं डॉक्टर?

सर्दियों में ठंडे पानी से नहाना चाहिए या गर्म पानी से इस कंफ्यूजन को दूर करने के लिए डॉक्टर बताते हैं कि सर्दियों में सबसे अच्छा ऑप्शन होता है कि हल्के गुनगुने पानी से नहाया जाए. हल्का गुनगुना पानी शरीर को आराम भी देता है और स्किन की नमी भी खत्म नहीं करता है. वहीं नहाने के बाद मॉइश्चराइजर लगाना भी डॉक्टर जरूरी बताते हैं जिससे स्किन की नमी बनी रहे. वहीं एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि गांव में हैंडपंप या बोरवेल का पानी कई बार हार्ड वाटर होता है जिससे स्किन की ऑयली लेयर और बालों की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है. ऐसे में एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सर्दी हो या गर्मी नहाने के लिए हमेशा गुनगुना पानी इस्तेमाल करना चाहिए.

ये भी पढ़ें-Watery Eyes: सुबह उठते ही आंखों से आता है पानी, हो सकती है इस चीज की कमी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल को चुपके-चुपके नुकसान पहुंचाती हैं ये 6 चीजें, हेल्दी समझकर खाते तो नहीं हैं आप?

दिल को चुपके-चुपके नुकसान पहुंचाती हैं ये 6 चीजें, हेल्दी समझकर खाते तो नहीं हैं आप?


केले को रोजाना ज्यादातर लोग अपनी डाइट में शामिल करते हैं. वहीं केला पोषण से भी भरपूर माना जाता है, लेकिन इसमें पोटेशियम की मात्रा काफी ज्यादा होती है. ऐसे में किसी व्यक्ति की किडनी ठीक से काम नहीं कर रही हो या वह ऐसी दवाइयां ले रहा हो जिससे पोटेशियम बढ़ता है तो इसका असर शरीर में खतरनाक रूप से बढ़ सकता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अचानक बढ़ा हुआ पोटेशियम दिल की धड़कन पर असर डाल सकता है. इसलिए ऐसे लोगों को केले का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए.

वहीं ग्रेपफ्रूट सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन यह लीवर में होने वाली दवाओं की प्रक्रिया को धीमा कर देता है. इससे दवाइयों का असर शरीर में जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है. वहीं कुछ मरीजों में यह कंडीशन और खतरनाक हो सकती है. खासकर उन लोगों में जिन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद दवाइयां दी जाती है.

वहीं ग्रेपफ्रूट सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन यह लीवर में होने वाली दवाओं की प्रक्रिया को धीमा कर देता है. इससे दवाइयों का असर शरीर में जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है. वहीं कुछ मरीजों में यह कंडीशन और खतरनाक हो सकती है. खासकर उन लोगों में जिन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद दवाइयां दी जाती है.

पालक में पोटेशियम के साथ-साथ ऐसे तत्व भी होते हैं जो खून को पतला करने वाली दवा वॉरफरिन के असर को प्रभावित कर सकते हैं. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पालक हेल्दी है लेकिन इससे समस्या तब होती है जब लोग इसे अचानक बहुत ज्यादा या बहुत कम मात्रा में खाने लगते हैं. ऐसे में पालक का संतुलित मात्रा में सेवन जरूरी होता है, ताकि दवाइयों का असर गड़बड़ न हो.

पालक में पोटेशियम के साथ-साथ ऐसे तत्व भी होते हैं जो खून को पतला करने वाली दवा वॉरफरिन के असर को प्रभावित कर सकते हैं. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पालक हेल्दी है लेकिन इससे समस्या तब होती है जब लोग इसे अचानक बहुत ज्यादा या बहुत कम मात्रा में खाने लगते हैं. ऐसे में पालक का संतुलित मात्रा में सेवन जरूरी होता है, ताकि दवाइयों का असर गड़बड़ न हो.

सोया सॉस को भी हम अक्सर अपने खाने में उपयोग में लेते हैं. वहीं सोया सॉस में नमक इतनी ज्यादा मात्रा में होता है कि यह शरीर में पानी रुकने की समस्या बढ़ा देता है. इससे वजन बढ़ाना, सूजन और सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. वहीं डॉक्टर बताते हैं कि एक बार ज्यादा सोया सॉस खाने से भी शरीर में पानी रुक सकता है. ऐसे में जिन लोगों को दिल से जुड़ी बीमारियां है उन्हें सोया सॉस खाते समय सावधानी रखनी चाहिए.

सोया सॉस को भी हम अक्सर अपने खाने में उपयोग में लेते हैं. वहीं सोया सॉस में नमक इतनी ज्यादा मात्रा में होता है कि यह शरीर में पानी रुकने की समस्या बढ़ा देता है. इससे वजन बढ़ाना, सूजन और सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. वहीं डॉक्टर बताते हैं कि एक बार ज्यादा सोया सॉस खाने से भी शरीर में पानी रुक सकता है. ऐसे में जिन लोगों को दिल से जुड़ी बीमारियां है उन्हें सोया सॉस खाते समय सावधानी रखनी चाहिए.

मुलेठी को लोग अक्सर चाय, काढ़ या स्वाद बढ़ाने के लिए उपयोग करते हैं. लेकिन असली मुलेठी ब्लड प्रेशर बढ़ा सकती है और शरीर में पोटेशियम का लेवल कम कर सकती है. कई लोग बिना जाने मुलेठी वाली ड्रिंक या सप्लीमेंट्स ले लेते हैं जो दिल की के लिए खतरनाक हो सकता है.

मुलेठी को लोग अक्सर चाय, काढ़ या स्वाद बढ़ाने के लिए उपयोग करते हैं. लेकिन असली मुलेठी ब्लड प्रेशर बढ़ा सकती है और शरीर में पोटेशियम का लेवल कम कर सकती है. कई लोग बिना जाने मुलेठी वाली ड्रिंक या सप्लीमेंट्स ले लेते हैं जो दिल की के लिए खतरनाक हो सकता है.

वहीं शराब भी दिल पर सीधा असर डालती है. लंबे समय तक शराब पीने से दिल की मांसपेशियां कमजोर होने लगती है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कई मरीजों में दिल की कार्यशमता कम होने की वजह शराब ही निकलती है. ऐसे में शराब से दूरी रखना दिल की सुरक्षा के लिए जरूरी होता है.

वहीं शराब भी दिल पर सीधा असर डालती है. लंबे समय तक शराब पीने से दिल की मांसपेशियां कमजोर होने लगती है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कई मरीजों में दिल की कार्यशमता कम होने की वजह शराब ही निकलती है. ऐसे में शराब से दूरी रखना दिल की सुरक्षा के लिए जरूरी होता है.

Published at : 25 Nov 2025 08:43 AM (IST)

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मां के दूध में कैसे बनने लगता है यूरेनियम, जान लें किस वजह से होता है ऐसा?

मां के दूध में कैसे बनने लगता है यूरेनियम, जान लें किस वजह से होता है ऐसा?



Toxic Metals Breast Milk: बिहार में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के खून में लेड की बढ़ी हुई मात्रा को लेकर सामने आई हालिया रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है. लेड एक ऐसा न्यूरोटॉक्सिन है जिसके लिए कोई भी स्तर सुरक्षित नहीं माना जाता. बच्चों में इसकी थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी ब्रेन को स्थायी नुकसान हो सकता है. इससे IQ कम होना, सीखने में दिक्कत, ध्यान की कमी और लगातार व्यवहार संबंधी समस्याएं होने का खतरा रहता है. 

Scientific Reports में पब्लिश यह स्टडी गंगा के मैदानी इलाकों खासकर बिहार में मां के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी का पहला बड़ा आकलन है. यह वही क्षेत्र है जहां पहले भी आर्सेनिक, लेड और पारा जैसे भारी धातुओं के खतरनाक स्तर पाए जा चुके हैं. 10 µg/dL से ऊपर लेड का स्तर बच्चों में लंबे समय तक चलने वाले मानसिक और कांगोनेटिव नुकसान के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है. गर्भवती महिलाओं में यह जहर आसानी से प्लेसेंटा पार कर लेता है, जिससे गर्भपात, समय से पहले डिलीवरी, कम वजन के बच्चे और भ्रूण के दिमाग के विकास में गंभीर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं. चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि जिन रास्तों से ये टॉक्सिन शरीर में जाते हैं, वही रास्ते आगे चलकर मां के दूध तक पहुंचते हैं.

यह कितना नुकसानदेह है?

केडी अस्पताल (अहमदाबाद) के कंसल्टेंट फिजिशियन और नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जय पटेल बताते हैं कि बच्चों के शरीर में लेड का बढ़ना बेहद खतरनाक है. यह दिमाग के विकास को रोक देता है, जिससे IQ गिरता है, ध्यान और सीखने की क्षमता कमजोर होती है, और व्यवहार पर भी असर पड़ता है. इसके अलावा यह इम्यूनिटी और ग्रोथ को भी प्रभावित करता है. गर्भावस्था में यह जहर आसानी से प्लेसेंटा पार कर लेता है, जिससे गर्भपात, प्रीमेच्योर डिलीवरी, कम वजन के बच्चे और जीवनभर चलने वाली विकास संबंधी समस्याओं का जोखिम तेजी से बढ़ जाता है. कम स्तर पर भी लेड का असर स्थायी और बदले न जाने वाली होता है. 

मां के दूध में जहर कैसे पहुंचता है? 

अगर बात करें कि यह कहां से पहुंचता है, तो लेड और बाकी न्यूरोटॉक्सिन शरीर में कई रास्तों से आते हैं, जिसमें  पानी, मिट्टी, खाना, बर्तन मसाले या हवा शामिल होते हैं. जो भी चीजें मां को रोजमर्रा में प्रभावित करती हैं, वही धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर खून में आती हैं और गर्भावस्था व ब्रेस्टफीडिग के दौरान दूध तक पहुंच जाती हैं. टॉक्सिन ज्यादातर हड्डियों में जमा रहते हैं और गर्भावस्था के दौरान खून में रिलीज होते हैं, इसलिए नवजात को इनसे सबसे ज्यादा खतरा रहता है, क्योंकि यह समय दिमाग और शरीर के विकास का सबसे संवेदनशील दौर होता है. 

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इंसानों के खून में कब बढ़ जाता है क्रोमियम, इससे किस बीमारी का खतरा?

इंसानों के खून में कब बढ़ जाता है क्रोमियम, इससे किस बीमारी का खतरा?



Chromium Exposure Health Risks: क्रोमियम एक नेचुरल तत्व है, जो धरती की सतह, पानी, भोजन और हमारे आस-पास के एटमॉस्फियर में थोड़ी मात्रा में मौजूद रहता है. इसकी दो प्रमुख स्थिति होती है. जिसमें, जो हमारे हेल्थ के लिए सही है वह है ट्राइवैलेंट क्रोमियम, जो बहुत कम मात्रा में शरीर के लिए जरूरी माना जाता है,और हेक्सावैलेंट क्रोमियम, जो बेहद जहरीला होता है और एक साबित मानव कार्सिनोजन माना जाता है।

जब शरीर में खासकर हेक्सावैलेंट क्रोमियम का लेवल बढ़ जाता है, तो यह कई तरह के गंभीर स्वास्थ्य असर पैदा कर सकता है. हेक्सावैलेंट क्रोमियम सेल्स के भीतर आसानी से प्रवेश कर लेता है और अंदर पहुंचकर रिएक्टिव ऑक्सीजन बनने लगता है, जिससे डीएनए को नुकसान होता है. खून में पहुंचने के बाद यह लिवर, किडनी, लंग्स और हड्डियों तक जाकर सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है और कई बीमारियों की शुरुआत कर सकता है.

खून में क्रोमियम बढ़ने से क्या बीमारियां हो सकती हैं?

कैंसर

National library of medical science के अनुसार, इससे सबसे बड़ा खतरा कैंसर का है. IARC (International Agency for Research on Cancer) ने Cr(VI) यानी हेक्सावैलेंट क्रोमियम को ग्रुप-1 कार्सिनोजन माना है. इसका मतलब इसमें इंसानों में कैंसर पैदा करने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं. क्रोमियम-VI को सांस के साथ लेना फेफड़ों, नाक और साइनस के कैंसर से जुड़ा हुआ पाया गया है. क्रोमियम से दूषित पानी पीने पर डाइजेशन सिस्टम से जुड़े कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है.

 खून से संबंधित बीमारियां

तमाम मेडिकल रिपोर्ट्स बताते हैं कि खून में क्रोमियम की मात्रा बढ़ने से ब्लड सेल्स  की सामान्य काम करने की क्षमता प्रभावित होती है. कई स्टडीज में माइटोकॉन्ड्रिया को नुकसान, डीएनए डैमेज और रेड ब्लड सेल्स के टूटने  जैसे प्रभाव देखे गए हैं. इससे एनीमिया, थकान और शरीर की ऑक्सीजन वहन क्षमता कम हो सकती है.

किडनी और लिवर डैमेज

किडनी और लिवर शरीर के मुख्य डिटॉक्सीफिकेशन ऑर्गन हैं. क्रोमियम की हाई मात्रा, खासकर Cr(VI), इन अंगों में जमा होकर किडनी की ट्यूब्यूल्स को नुकसान पहुंचा सकती है और लिवर की काम करने की क्षमता को कम कर सकती है. 

लंग्स पर असर

क्रोमियम के जर्रे या धुएं को सांस के साथ लेने पर वायुमार्गों में जलन, सांस फूलना, अस्थमा का बढ़ना और क्रॉनिक लंग्स की बीमारियां हो सकती हैं. खून में इसका स्तर बढ़ा मिले तो यह शरीर में भारी एक्सपोजर का संकेत है.

क्रोमियम कैसे बढ़ता है?

  • क्रोमियम शरीर में अलग-अलग माध्यमों से अधिक पहुंच सकता है:
  • उद्योगों में क्रोमियम की धूल या धुआं सांस के साथ अंदर जाने से
  • दूषित पानी या भोजन के सेवन से
  • मिट्टी या धातु के संपर्क से
  • कुछ मामलों में त्वचा के जरिए

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दिल्ली-मुंबई में ओजोन प्रदूषण बढ़ा, जानें यह आपके फेफड़ों के लिए कितना खतरनाक?

दिल्ली-मुंबई में ओजोन प्रदूषण बढ़ा, जानें यह आपके फेफड़ों के लिए कितना खतरनाक?



Ozone Pollution Health Effect: कुछ महीने महीने पहले सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को बताया था कि ग्राउंड-लेवल ओज़ोन (O₃) प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका नेशनल कैपिटल रीजनहै, जबकि इसके बाद नंबर आता है मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन  का. ट्रिब्यूनल में दाखिल हलफनामे में CPCB ने देश के 10 बड़े क्षेत्रों में ओजोन लेवल का एनालिसिस किया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में NCR के 57 में से 25 एयर मॉनिटरिंग स्टेशन राष्ट्रीय आठ घंटे वाले ओजोन मानक से 2 प्रतिशत से अधिक ऊपर थे. मुंबई में भी स्थिति अलग नहीं थी, यहां 45 में से 22 स्टेशन सुरक्षित सीमा को पार कर चुके थे. NGT ने इस मामले पर पिछले अगस्त एक न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें भारत में बढ़ते ओजोन प्रदूषण को लेकर चिंता जताई गई थी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे ये आपके लंग्स को नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

इससे कौन सी दिक्कत होती है?

पीआईबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण उन प्रमुख कारणों में से एक है जो सांस संबंधी बीमारियों और उनसे जुड़ी दिक्कतों को बढ़ाता है. CPCB ने ग्राउंड-लेवल ओजोन के संपर्क से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर कोई स्पेशल सर्वे नहीं किया है, लेकिन ओजोन (O₃) के प्रभाव को लेकर यह तथ्य सामने आते हैं:

  • ओजोन को सांस के साथ अंदर लेने पर सीने में दर्द, खांसी, जी मिचलाना, गले में जलन और कंजेशन जैसी समस्याएं दिख सकती हैं.
  • O₃ का प्रभाव ब्रोंकाइटिस, हार्ट रोग, एम्फीसिमा और अस्थमा जैसी बीमारियों को और गंभीर बना देता है और लंग्स की क्षमता घटा सकता है.
  • लंबे समय तक ओजोन के संपर्क में रहने से लंग्स को स्थायी नुकसान भी हो सकता है.
  • यह शरीर को एलर्जेन यानी एलर्जी पैदा करने वाले कारकों के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देता है.

लंग्स को कितना नुकसान पहुंचाता है?

अमेरिकी पर्यावरण एजेंसी (EPA) के अनुसार, ग्राउंड-लेवल ओजोन लंग्स की कार्यक्षमता को सीधे कम कर देता है. ओजोन सांस लेते ही वायुमार्गों  की अंदरूनी परत पर असर डालता है, जिससे सूजन और जलन हो सकती है. EPA बताता है कि ओजोन के संपर्क में आने से गहरी सांस लेना मुश्किल हो सकता है और FEV₁ जैसी लंग्स की क्षमता मापने वाली रीडिंग भी तुरंत कम पाई गई है. यह असर उन लोगों में और ज्यादा दिखता है जिन्हें पहले से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या अन्य सांस संबंधी समस्याएं होती हैं.

EPA यह भी बताता है कि बार-बार या लंबे समय तक ओजोन प्रदूषण में रहने से लंग्स के टिश्यू को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है. लगातार सूजन और ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस की वजह से एयरवेज मोटे होने लगते हैं और समय के साथ लंग्स में स्कारिंग तक बन सकती है, जो रिवर्स नहीं होती. यही कारण है कि ओजोन को एक साइलेंट लंग डैमेजर माना जाता है, जो धीरे-धीरे लंग्स की क्षमता घटाता रहता है और सांस की बीमारियों को और गंभीर कर देता है.

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