इंसानों के खून में कब बढ़ जाता है क्रोमियम, इससे किस बीमारी का खतरा?

इंसानों के खून में कब बढ़ जाता है क्रोमियम, इससे किस बीमारी का खतरा?



Chromium Exposure Health Risks: क्रोमियम एक नेचुरल तत्व है, जो धरती की सतह, पानी, भोजन और हमारे आस-पास के एटमॉस्फियर में थोड़ी मात्रा में मौजूद रहता है. इसकी दो प्रमुख स्थिति होती है. जिसमें, जो हमारे हेल्थ के लिए सही है वह है ट्राइवैलेंट क्रोमियम, जो बहुत कम मात्रा में शरीर के लिए जरूरी माना जाता है,और हेक्सावैलेंट क्रोमियम, जो बेहद जहरीला होता है और एक साबित मानव कार्सिनोजन माना जाता है।

जब शरीर में खासकर हेक्सावैलेंट क्रोमियम का लेवल बढ़ जाता है, तो यह कई तरह के गंभीर स्वास्थ्य असर पैदा कर सकता है. हेक्सावैलेंट क्रोमियम सेल्स के भीतर आसानी से प्रवेश कर लेता है और अंदर पहुंचकर रिएक्टिव ऑक्सीजन बनने लगता है, जिससे डीएनए को नुकसान होता है. खून में पहुंचने के बाद यह लिवर, किडनी, लंग्स और हड्डियों तक जाकर सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है और कई बीमारियों की शुरुआत कर सकता है.

खून में क्रोमियम बढ़ने से क्या बीमारियां हो सकती हैं?

कैंसर

National library of medical science के अनुसार, इससे सबसे बड़ा खतरा कैंसर का है. IARC (International Agency for Research on Cancer) ने Cr(VI) यानी हेक्सावैलेंट क्रोमियम को ग्रुप-1 कार्सिनोजन माना है. इसका मतलब इसमें इंसानों में कैंसर पैदा करने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं. क्रोमियम-VI को सांस के साथ लेना फेफड़ों, नाक और साइनस के कैंसर से जुड़ा हुआ पाया गया है. क्रोमियम से दूषित पानी पीने पर डाइजेशन सिस्टम से जुड़े कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है.

 खून से संबंधित बीमारियां

तमाम मेडिकल रिपोर्ट्स बताते हैं कि खून में क्रोमियम की मात्रा बढ़ने से ब्लड सेल्स  की सामान्य काम करने की क्षमता प्रभावित होती है. कई स्टडीज में माइटोकॉन्ड्रिया को नुकसान, डीएनए डैमेज और रेड ब्लड सेल्स के टूटने  जैसे प्रभाव देखे गए हैं. इससे एनीमिया, थकान और शरीर की ऑक्सीजन वहन क्षमता कम हो सकती है.

किडनी और लिवर डैमेज

किडनी और लिवर शरीर के मुख्य डिटॉक्सीफिकेशन ऑर्गन हैं. क्रोमियम की हाई मात्रा, खासकर Cr(VI), इन अंगों में जमा होकर किडनी की ट्यूब्यूल्स को नुकसान पहुंचा सकती है और लिवर की काम करने की क्षमता को कम कर सकती है. 

लंग्स पर असर

क्रोमियम के जर्रे या धुएं को सांस के साथ लेने पर वायुमार्गों में जलन, सांस फूलना, अस्थमा का बढ़ना और क्रॉनिक लंग्स की बीमारियां हो सकती हैं. खून में इसका स्तर बढ़ा मिले तो यह शरीर में भारी एक्सपोजर का संकेत है.

क्रोमियम कैसे बढ़ता है?

  • क्रोमियम शरीर में अलग-अलग माध्यमों से अधिक पहुंच सकता है:
  • उद्योगों में क्रोमियम की धूल या धुआं सांस के साथ अंदर जाने से
  • दूषित पानी या भोजन के सेवन से
  • मिट्टी या धातु के संपर्क से
  • कुछ मामलों में त्वचा के जरिए

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल्ली-मुंबई में ओजोन प्रदूषण बढ़ा, जानें यह आपके फेफड़ों के लिए कितना खतरनाक?

दिल्ली-मुंबई में ओजोन प्रदूषण बढ़ा, जानें यह आपके फेफड़ों के लिए कितना खतरनाक?



Ozone Pollution Health Effect: कुछ महीने महीने पहले सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को बताया था कि ग्राउंड-लेवल ओज़ोन (O₃) प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका नेशनल कैपिटल रीजनहै, जबकि इसके बाद नंबर आता है मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन  का. ट्रिब्यूनल में दाखिल हलफनामे में CPCB ने देश के 10 बड़े क्षेत्रों में ओजोन लेवल का एनालिसिस किया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में NCR के 57 में से 25 एयर मॉनिटरिंग स्टेशन राष्ट्रीय आठ घंटे वाले ओजोन मानक से 2 प्रतिशत से अधिक ऊपर थे. मुंबई में भी स्थिति अलग नहीं थी, यहां 45 में से 22 स्टेशन सुरक्षित सीमा को पार कर चुके थे. NGT ने इस मामले पर पिछले अगस्त एक न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें भारत में बढ़ते ओजोन प्रदूषण को लेकर चिंता जताई गई थी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे ये आपके लंग्स को नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

इससे कौन सी दिक्कत होती है?

पीआईबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण उन प्रमुख कारणों में से एक है जो सांस संबंधी बीमारियों और उनसे जुड़ी दिक्कतों को बढ़ाता है. CPCB ने ग्राउंड-लेवल ओजोन के संपर्क से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर कोई स्पेशल सर्वे नहीं किया है, लेकिन ओजोन (O₃) के प्रभाव को लेकर यह तथ्य सामने आते हैं:

  • ओजोन को सांस के साथ अंदर लेने पर सीने में दर्द, खांसी, जी मिचलाना, गले में जलन और कंजेशन जैसी समस्याएं दिख सकती हैं.
  • O₃ का प्रभाव ब्रोंकाइटिस, हार्ट रोग, एम्फीसिमा और अस्थमा जैसी बीमारियों को और गंभीर बना देता है और लंग्स की क्षमता घटा सकता है.
  • लंबे समय तक ओजोन के संपर्क में रहने से लंग्स को स्थायी नुकसान भी हो सकता है.
  • यह शरीर को एलर्जेन यानी एलर्जी पैदा करने वाले कारकों के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देता है.

लंग्स को कितना नुकसान पहुंचाता है?

अमेरिकी पर्यावरण एजेंसी (EPA) के अनुसार, ग्राउंड-लेवल ओजोन लंग्स की कार्यक्षमता को सीधे कम कर देता है. ओजोन सांस लेते ही वायुमार्गों  की अंदरूनी परत पर असर डालता है, जिससे सूजन और जलन हो सकती है. EPA बताता है कि ओजोन के संपर्क में आने से गहरी सांस लेना मुश्किल हो सकता है और FEV₁ जैसी लंग्स की क्षमता मापने वाली रीडिंग भी तुरंत कम पाई गई है. यह असर उन लोगों में और ज्यादा दिखता है जिन्हें पहले से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या अन्य सांस संबंधी समस्याएं होती हैं.

EPA यह भी बताता है कि बार-बार या लंबे समय तक ओजोन प्रदूषण में रहने से लंग्स के टिश्यू को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है. लगातार सूजन और ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस की वजह से एयरवेज मोटे होने लगते हैं और समय के साथ लंग्स में स्कारिंग तक बन सकती है, जो रिवर्स नहीं होती. यही कारण है कि ओजोन को एक साइलेंट लंग डैमेजर माना जाता है, जो धीरे-धीरे लंग्स की क्षमता घटाता रहता है और सांस की बीमारियों को और गंभीर कर देता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सुबह उठते ही आंखों से आता है पानी, हो सकती है इस चीज की कमी

सुबह उठते ही आंखों से आता है पानी, हो सकती है इस चीज की कमी



Watery Eyes In The Morning: हमारी आंखों से पानी आना कई वजहों से हो सकता है. अगर सुबह उठते ही आपकी आंखें ज्यादा नम या पानी से भरी लगती हैं, तो यह एपिफोरा नाम की स्थिति भी हो सकती है. एपिफोरा का मतलब है आंखों का अत्यधिक पानी बहाना या तो आंखें जरूरत से ज्यादा आंसू बना रही होती हैं या फिर आंसू निकालने वाला सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा होता. चलिए, आपको बताते हैं कि सुबह आंखों में पानी क्यों आता है 

सुबह आंखों से पानी आने की वजह

rauteyecare के अनुसार, कई बार सुबह-सुबह आंखों से पानी आने के पीछे ये सामान्य कारण होते हैं. अचानक रोशनी बदलने से आंखें आंसू बनाने लगती हैं. ठंडी हवा, तेज रोशनी, धुआं, धूल, केमिकल्स या मच्छर भगाने वाली स्प्रे जैसी चीजें भी आंखों को चुभन देकर पानी ला सकती हैं. कई लोगों को एलर्जिक राइनाइटिस होता है, जिसमें छींक आना, नाक बहना और आंखों से पानी आना, ये सब बेडरूम में मौजूद धूल, मिट्टी, पालतू जानवरों की डैंडर या ठंडी हवा से ट्रिगर हो सकता है.

कभी-कभी यह किसी आंख की बीमारी का संकेत भी होता है

1. सूखी आंखें 

अजीब लगता है, लेकिन हां, सूखी आंखें भी पानी ला सकती हैं. आंखों के ऊपर एक टीयर फिल्म होती है जिसमें तीन लेयर होती हैं म्यूकस, पानी और तेल की परत. ड्राई आई में पानी वाली परत कम बनती है या तेल वाली परत कमजोर होने से आंसू जल्दी सूख जाते हैं. जब आंख सूखती है, तो शरीर तुरंत ज्यादा पानी वाली परत बनाने लगता है. पर अगर तेल की परत कमजोर है, तो ये नए आँसू आँख पर टिक नहीं पाते और बाहर बह जाते हैं. इसलिए आँख अंदर से सूखी रहती है, लेकिन बाहर पानी आता है.

2. नींद में पलकें पूरी तरह बंद न होना

कुछ लोगों की पलकें सोते समय पूरी तरह बंद नहीं होतीं, जिससे आंख का एक हिस्सा रातभर सूख जाता है. सुबह उठते ही शरीर सूखी आँख को बचाने के लिए अचानक आंसू बना देता है, जिससे आंख पानी-पानी लगती है.

3. कॉर्नियल इरोजन

कभी हल्की चोट, जैसे नाखून या कागज के किनारे से कॉर्निया पर लग जाती है. शुरू में ठीक लगती है, लेकिन ऊपर की परत ठीक से चिपकती नहीं. सुबह आंख खोलते ही यह परत फिर छिल सकती है, जिससे, तेज पानी, चुभन रोशनी से परेशानी (फोटोफोबिया जैसे लक्षण आते हैं.

सुबह आंखों में पानी आने पर क्या करें?

  • सुबह कमरे में रोशनी धीरे-धीरे आने दें सीधे तेज लाइट न पड़े.
  • पंखे या AC की सीधी हवा में न सोएं.
  • कमरे में नमी बनाए रखने के लिए ह्यूमिडिफायर या पानी से भरा कटोरा रखें.
  • एलर्जी हो तो साफ और धुले हुए बेडशीट-पिलो कवर का इस्तेमाल करें; एयर प्यूरीफायर फायदेमंद है.
  • रात में कमरे में मच्छर-रोधी स्प्रे या तेज केमिकल वाली चीजें न प्रयोग करें.

सुबह वॉक के समय ठंडी हवा से बचने के लिए चश्मा पहनें; बाहर निकलने से पहले आर्टिफिशियल टीयर या सलाइन ड्रॉप डालना मददगार हो सकता है. अगर पलक की किनारों पर इंफेक्शन, ऑयल लेयर की समस्या, कॉर्नियल इरोजन या एक्सपोजर केराटोपैथी हो, तो डॉक्टर का इलाज जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- Dharmendra Death: किन बीमारियों से जूझ रहे थे बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र, इनसे जान बचाना कितना मुश्किल?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ कार्डियो और नो कार्ब्स? तमन्ना भाटिया के फिटनेस ट्रेनर बताया खास रुटीन, तेजी से घटाता है

सिर्फ कार्डियो और नो कार्ब्स? तमन्ना भाटिया के फिटनेस ट्रेनर बताया खास रुटीन, तेजी से घटाता है



Sustainable Weight Loss: वजन घटाने की शुरुआत करते ही हम सब की एक ही सोच रहती है जिम में पसीने की बरसात और खाने में कार्ब्स का सफाया. जैसे आलू, रोटी और चावल दुश्मन बन जाते हैं और ट्रेडमिल, चिकन ग्रिल हमारे नए बेस्ट फ्रेंड. लेकिन जिस चीज को हम सच मानकर जी रहे होते हैं, वह मिथक भी हो सकती है. इससो लेकर तमन्ना भाटिया के फिटनेस कोच  सिद्धार्थ सिंह ने यह खुलासा किया है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने साफ कहा कि रोज 40 से 50 मिनट की कार्डियो और कार्ब्स को पूरी तरह हटाना फैट लॉस का शॉर्टकट तो है, लेकिन टिकाऊ रास्ता नहीं. अगर ये फॉर्मूला सचमुच काम करता, तो लोग ट्रेनर तक आते ही क्यों? सीधे शब्दों में ये तरीका ज्यादातर लोगों को नतीजे नहीं देता. चलिए, आपको बताते हैं कि आखिर उन्होंने क्या कहा है.

 


क्यों नहीं टिकता यह क्विक फिक्स फॉर्मूला?

फिटनेस कोच सिद्धार्थ सिंह बताते हैं कि लंबी कार्डियो और जीरो-कार्ब डाइट से जो वजन गिरता है, उसमें असली फैट कम नहीं, ज्यादातर पानी और ग्लाइकोजन निकलता है. इसका नतीजा हमारे ऊपर उल्टा होता है जैसे-

  • थकान
  • चिड़चिड़ापन
  • कार्ब्स की तीखी क्रेविंग
  • फिर से पहले जैसा वजन

इसलिए बहुत लोग नो-कार्ब डाइट शुरू तो कर देते हैं, पर कुछ हफ्तों में वहीं लौट आते हैं जहां से शुरू किया था.

तो फिर काम क्या आता है?

अब हमारे मन में सवाल यह आता है कि आखिर फिर काम क्या आता है. यहां सिद्धार्थ बताते हैं कि लंबा चलने वाला बदलाव ही असली फैट लॉस देता है.
उन्होंने इसको लेकर कुछ सलाह दी है, जैसे कि:

  • ऐसी गतिविधियां चुनें जिन्हें आप सच में पसंद करते हों
  • रोजमर्रा के खाने में प्रोटीन और असली भोजन बढ़ाएं
  • परफेक्ट होने की कोशिश न करें, बस नियमित रहें

स्ट्रेंथ ट्रेनिंग क्यों जरूरी है?

सिद्धार्थ बताते हैं कि सिर्फ चलने से काम नहीं चलेगा. कार्डियो आपको कैलरी जलाने में मदद करता है, लेकिन यह मांसपेशियां नहीं बनाता और बिना मांसपेशियों के मेटाबॉलिज़्म तेज नहीं होता. यही वजह है कि हमें संतुलित प्लान बनाकर काम करने की जरूरत होती है. जिसमें:

स्ट्रेंथ ट्रेनिंग

  • हल्का–फुल्का कार्डियो
  • रोज की एक्टिविटी (जैसे वॉक)

यह कॉम्बिनेशन फैट घटाता भी है और शरीर को शेप भी देता है.

स्टार्टर प्लान शुरुआत ऐसे करें

अब चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर आप सिंपल प्लान कैसे बना सकते हैं, जिसको फॉलो करने में आसानी होती है और आप इसको लंबे समय तक फॉलो कर सकते हैं. इसमें-

  • हफ्ते में 3 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग
  • 2 से 3 छोटे कार्डियो या कंडीशनिंग सेशन
  • रोजाना हल्की–फुल्की वॉक
  • दिन की शुरुआत प्रोटीन-रिच ब्रेकफास्ट से
  • वर्कआउट के आसपास कार्ब्स की नियंत्रित मात्रा
  • नींद, पानी और स्ट्रेस पर ध्यान

एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि आप जो भी रूटीन बना रहे हैं, ऐसी दिनचर्या बनाना जो महीनों तक चली जा सके, हफ्तों तक नहीं.

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किन बीमारियों से जूझ रहे थे बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र, इनसे जान बचाना कितना मुश्किल?

किन बीमारियों से जूझ रहे थे बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र, इनसे जान बचाना कितना मुश्किल?



Dharmendra Death News: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने आज अंतिम सांस ली. वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. कुछ दिन पहले उनको सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 89 साल के धर्मेंद्र पिछले कुछ दिनों से डॉक्टरों की सख्त निगरानी में थे और फिलहाल आईसीयू में भर्ती थे. हालांकि, कुछ दिन पहले ही उनको अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी. चलिए आपको बताते हैं कि दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र किस बीमारी से पीड़ित थे.

किस बीमारी से पीड़ित थे धर्मेंद्र?

रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मेंद्र शुरुआत में सिर्फ एक सामान्य चेकअप के लिए अस्पताल गए थे, लेकिन डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें भर्ती करना बेहतर समझा. ब्रीच कैंडी अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि धर्मेंद्र सांस लेने में दिक्कत महसूस कर रहे थे, इसलिए उन्हें आईसीयू में रखा गया था. जब उनकी हालत के बारे में पूछा गया तो अस्पताल की ओर से बताया गया था कि किसी तरह की गंभीर चिंता की बात नहीं है. उनका हार्ट रेट करीब 70 है, ब्लड प्रेशर 140/80 के आसपास है और यूरिन आउटपुट भी बिल्कुल सामान्य है. डॉक्टरों ने एहतियात के तौर पर उन्हें कुछ दिनों तक निगरानी में रखने की सलाह दी थी. बीच में उनकी मौत की खबर आई थी, हालांकि, उनकी बेटी ने उसका खंडन किया था और बाद में उनको डिस्चार्ज कर दिया गया था. 

सांस फूलने की समस्या कितनी गंभीर थी?

89 साल की उम्र में उनके लंग्स और हार्ट पहले जैसे मजबूत नहीं रह गए थे. इसी वजह से जरा सी थकान या ऑक्सीजन की कमी पर भी उन्हें सांस फूलने की दिक्कत हो जाती थी. कई बार ऐसा तब भी होता था जब शरीर में पानी रुक जाता था, फेफड़ों में हल्का संक्रमण हो जाता था या दिल की धड़कनें सामान्य तरह से काम नहीं करती थीं. सामान्य तौर पर, किसी बुज़ुर्ग को थकान या मौसम बदलने पर थोड़ी देर के लिए सांस फूलना बहुत गंभीर नहीं माना जाता. लेकिन धर्मेंद्र के मामले में यह समस्या अचानक और बार-बार होने लगी थी, जो दिल, फेफड़ों या ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकती थी.

इस फिल्म में नजर आने वाले थे धर्मेंद्र

इस साल अप्रैल में धर्मेंद्र की मोतियाबिंद की सर्जरी हुई थी. ऑपरेशन के बाद उन्होंने बहुत जल्दी रिकवरी कर ली थी और उम्र के इस पड़ाव पर भी वे निजी जिंदगी और काम दोनों में सक्रिय बने रहने की कोशिश करते थे. वर्क फ्रंट की बात करें तो धर्मेंद्र हाल ही में तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया (2024) में नजर आए थे, जिसमें शाहिद कपूर और कृति सेनन लीड रोल में थे. इसके अलावा वे श्रीराम राघवन की फिल्म इक्कीस में भी दिखाई देने वाले थे.

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कौन सी अंडरवियर पहनते हैं आप, कहीं आपके अंडर गारमेंट आपको तो नहीं बना रहे नामर्द?

कौन सी अंडरवियर पहनते हैं आप, कहीं आपके अंडर गारमेंट आपको तो नहीं बना रहे नामर्द?



Tight Underwear Effects On Male Fertility: पुरुषों की फर्टिलिटी को लेकर अक्सर एक सवाल उठता है कि क्या टाइट अंडरवियर पहनने से प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है?  कई टेस्ट और स्टडीज की मदद से यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि आखिर टाइट अंडरवियर टेस्टिकल्स को किस तरह प्रभावित करता है. कुछ समय पहले ह्यूमन रिप्रोडक्शन जर्नल में छपी एक स्टडी में पाया गया कि जो पुरुष टाइट अंडरवियर पहनते हैं, उनमें स्पर्म काउंट कम देखा गया. हालांकि एक्सपर्ट अभी भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इसका कारण सिर्फ टाइट अंडरवियर है या फिर टेस्टिकल्स के आसपास बढ़ने वाला तापमान. हीट एक बड़ा फैक्टर है, और टाइट कपड़े उसे और बढ़ा देते हैं. चलिए आपको बताते हैं इसके बारे में.

क्या निकला रिसर्च में?

साल 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार,अमेरिका के हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के रिसर्चर 656 पुरुषों पर की गई एक स्टडी में पाया गया कि बॉक्सर पहनने वाले पुरुषों में टाइट अंडरवियर पहनने वालों की तुलना में 25 प्रतिशत ज्यादा स्पर्म कंसंट्रेशन देखा गया. माना जा रहा है कि टेस्टिकल्स के आसपास का ठंडा तापमान इसका मुख्य कारण हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ अंडरवियर की स्टाइल बदलने जैसा एक साधारण लाइफस्टाइल चेंज भी पुरुषों की फर्टिलिटी को सुधार सकता है. स्पर्म प्रोडक्शन 34°C (92°F) से ऊपर तापमान के प्रति संवेदनशील होता है, यही वजह है कि टेस्टिकल्स शरीर से थोड़ा दूर लटके होते हैं.

कुछ अंडरवियर या ब्रीफ्स स्क्रोटम को शरीर के पास खींच लेते हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है. वहीं बॉक्सर शॉर्ट्स जैसे ढीले अंडरवियर स्क्रोटम को ठंडा रखते हैं. अब तक की सबसे बड़ी स्टडी में रिसर्चर ने पाया कि फर्टिलिटी क्लिनिक आने वाले पुरुषों में, जो ढीले बॉक्सर पहनते थे, उनमें टाइट अंडरवियर पहनने वालों की तुलना में ज्यादा स्पर्म कंसंट्रेशन, 17 प्रतिशत अधिक कुल स्पर्म काउंट और 33 प्रतिशत मोटाइल स्पर्म पाए गए.

टाइट अंडरवियर पुरुषों पर कैसे असर डालता है?

टाइट अंडरवियर पहनना कुछ लोगों को सुरक्षित और फिट महसूस करा सकता है, लेकिन जब यह बहुत ज्यादा टाइट हो जाए, तो कई समस्याएं शुरू हो सकती हैं. पुरुषों में टाइट अंडरवियर के ये असर देखे जा सकते हैं-

 ब्लड सर्कुलेशन में कमी

बहुत टाइट अंडरवियर ग्रोइन में रक्त प्रवाह को सीमित कर देता है, जिससे सुन्नपन, असहजता या लंबे समय में सर्कुलेशन से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं.

 स्किन इरिटेशन का खतरा

कपड़े का घर्षण बढ़ जाता है, जिससे रैशेज, लालपन, जलन और कभी-कभी दर्दनाक कट तक हो सकते हैं.

 स्पर्म प्रोडक्शन पर असर

टाइट अंडरवियर स्क्रोटम का तापमान बढ़ा देता है, जिससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और समय के साथ फर्टिलिटी कम हो सकती है.

 मूवमेंट में रुकावट और असहजता

बहुत टाइट अंडरवियर पिन्चिंग, दर्द और मूवमेंट में खिंचाव पैदा करता है, जिससे रोजमर्रा के काम या एक्सरसाइज में दिक्कत आती है.

 इंफेक्शन का खतरा बढ़ना

टाइट अंडरवियर गर्मी और नमी को फंसा लेता है, जिससे बैक्टीरिया और फंगल इंफेक्शन का जोखिम बढ़ जाता है.

 टेस्टिकल्स पर दबाव

टाइट फिटिंग टेस्टिकल्स को दबा सकती है, जिससे दर्द, खिंचाव या लंबे समय में नुकसान तक हो सकता है.

पॉश्चर पर असर

जब अंडरवियर बहुत टाइट हो, तो बॉडी का नैचुरल अलाइनमेंट बिगड़ सकता है, जिससे लोअर बैक में दर्द और पॉश्चर खराब हो सकता है.

पसीना और बदबू बढ़ना

एयरफ्लो कम होने से ज्यादा पसीना आता है और गर्मी फंसने से बदबू भी बढ़ जाती है.

फिजिकल एक्टिविटी में दिक्कत

खेलते या जिम करते समय टाइट अंडरवियर चफिंग और असहजता पैदा करता है, जिससे परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है.

वैरिकोज वेन्स का खतरा

लंबे समय तक टाइट अंडरवियर पहनने से ग्रोइन में नसों पर दबाव बढ़ता है, जिससे वैरिकोज वेन्स बनने का जोखिम हो सकता है.

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