8 घंटे से ज्यादा सोते हैं फिर भी सुबह उठते ही सिर दर्द होता है, जानें क्या है समस्या?

8 घंटे से ज्यादा सोते हैं फिर भी सुबह उठते ही सिर दर्द होता है, जानें क्या है समस्या?


सुबह का समय दिन की सबसे अच्छी शुरुआत माना जाता है. अच्छी नींद के बाद ताजगी महसूस होनी चाहिए, लेकिन कई लोगों की सुबह सिर दर्द के साथ शुरू होती है. हैरानी की बात यह है कि कुछ लोग पूरी 8–9 घंटे की नींद लेने के बावजूद जैसे ही बिस्तर से उठते हैं, सिर भारी लगने लगता है या तेज दर्द शुरू हो जाता है.

अक्सर लोग इसे थकान, मौसम या आज कुछ ठीक नहीं है, कहकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, तो यह आपके शरीर की तरफ से एक संकेत हो सकता है. सुबह होने वाला सिर दर्द कोई छोटी बात नहीं है, इसके पीछे नींद से जुड़ी आदतें, पानी की कमी, तनाव, या कभी-कभी गंभीर स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में कारण पहचाने जा सकते हैं और सही कदम उठाकर इस समस्या से राहत पाई जा सकती है. 

8 घंटे से ज्यादा सोते हैं फिर भी सुबह उठते ही सिर दर्द क्यों होता है?

1. जरूरत से ज्यादा सोना – बहुत से लोगों को लगता है कि जितना ज्यादा सोएंगे, उतना बेहतर होगा. लेकिन सच्चाई यह है कि जरूरत से ज्यादा नींद भी सिर दर्द का कारण बन सकती है. ज्यादा देर तक सोने से दिमाग के केमिकल (न्यूरोट्रांसमीटर) असंतुलित हो जाते हैं. खासतौर पर वीकेंड पर देर तक सोने से वीकेंड हेडेक हो सकता है. इसके कारण उठते ही सिर भारी लगना, सुस्ती और चिड़चिड़ापन जैसे समस्या हो सकती है. 

2. शरीर में पानी की कमी – रात भर सोते समय हम पानी नहीं पीते, अगर दिन में भी पर्याप्त पानी न पिया जाए, तो सुबह शरीर और दिमाग़ दोनों में पानी की कमी हो जाती है. जब शरीर डिहाइड्रेट होता है, तो दिमाग हल्का-सा सिकुड़ता है, जिससे नसों पर दबाव पड़ता है और सिर दर्द होता है.  ज्यादा खतरा तब होता है जब रात में शराब पी हो, कमरा बहुत गर्म हो, दिन भर पानी कम पिया गया हो. 

3. स्लीप एपनिया (Sleep Apnea) – स्लीप एपनिया एक ऐसी समस्या है जिसमें नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती है. इससे दिमाग को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है. ऐसे लोगों को अक्सर तेज खर्राटे आते हैं, सुबह उठते ही सिर दर्द होता है, दिन में बहुत नींद आती है. यह एक गंभीर स्थिति हो सकती है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 

4. रात में दांत पीसना (Bruxism) – कई लोग सोते समय अनजाने में दांत पीसते या जबड़ा कस लेते हैं. इससे जबड़े और कनपटी की मांसपेशियों में तनाव आ जाता है, जो सुबह सिर दर्द का कारण बनता है. इसके लक्षण सुबह जबड़े में दर्द, कनपटियों में हल्का या मध्यम दर्द और दांतों का घिस जाना है. 

5.गलत तकिया या सोने की गलत पोजिशन – अगर आपका तकिया बहुत ऊंचा, बहुत सख्त या बहुत नरम है, तो गर्दन गलत स्थिति में चली जाती है. इससे गर्दन और सिर की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है. गलत पोजिशन में सोना भी सुबह सिर दर्द और गर्दन अकड़ने का कारण बन सकता है. 

6. तनाव, चिंता और अवसाद – मानसिक स्वास्थ्य का सीधा असर नींद और सिर दर्द पर पड़ता है. जिन लोगों को चिंता या अवसाद की समस्या होती है, उनमें सुबह सिर दर्द की शिकायत ज्यादा पाई जाती है. तनाव के कारण नींद गहरी नहीं होती, जिससे शरीर पूरी तरह आराम नहीं कर पाता है. 

सुबह के सिर दर्द से बचने के आसान उपाय

1. नियमित नींद का समय रखें –  वीकेंड पर भी रोज एक ही समय पर सोएं और उठें. 

2. पर्याप्त पानी पिएं – दिन भर पानी पीते रहें, सोने से पहले एक गिलास पानी, सुबह उठते ही पानी पिएं . 

3. सही तकिया चुनें – ऐसा तकिया लें जो आपकी गर्दन को सीधी स्थिति में रखे, न ज्यादा सख्त, न ज्यादा नरम. 

4. शराब और देर रात स्क्रीन से बचें – मोबाइल, लैपटॉप और टीवी सोने से पहले दिमाग को एक्टिव कर देते हैं. 

5. हल्का व्यायाम करें – नियमित व्यायाम माइग्रेन और तनाव दोनों को कम करता है. 

यह भी पढ़ें Vitamin B12: क्या खाली पेट विटामिन B12 लेना सही है? एक्सपर्ट से जानें सप्लीमेंट लेने का सबसे सही समय

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या डीजे वाली लेजर लाइट छीन सकती है आपकी आंखों की रोशनी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

क्या डीजे वाली लेजर लाइट छीन सकती है आपकी आंखों की रोशनी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


Can DJ Laser Lights Cause Permanent Vision Loss: डीजे पार्टी, क्लब या किसी इवेंट में चलने वाली लेजर लाइट देखने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन यह आंखों के लिए खतरनाक भी हो सकती है. हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस खतरे को गंभीरता से समझने की जरूरत दिखा दी है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना खतरनाक है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

आंखों के डॉक्टर डॉ. आशीष मारकन ने एक किशोर लड़के का मामला साझा किया, जिसकी दाहिनी आंख की रोशनी अचानक कम हो गई थी. जांच में पता चला कि उसकी नजर 6/18 तक गिर चुकी थी. जब आंखों की अंदरूनी जांच की गई, तो आंख के बीच वाले हिस्से (मैक्युला) में चोट के निशान मिले. बातचीत के दौरान लड़के ने बताया कि वह कई बार डीजे द्वारा इस्तेमाल की जा रही लेजर लाइट को सीधे देख चुका था. पार्टी के दौरान लेजर बीम उसकी आंखों में बार-बार पड़ी थी.

 

लेजर का आंखों पर नुकसान

डॉक्टरों के अनुसार, इस स्थिति को लेजर से होने वाला आंखों का नुकसान कहा जाता है. लेजर की तेज रोशनी आंख के उस हिस्से को नुकसान पहुंचाती है, जो साफ और सीधी नजर के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है. अगर लेजर की रोशनी कुछ सेकंड के लिए भी सीधे आंखों पर पड़ जाए, या बार-बार ऐसा हो, तो नजर धुंधली हो सकती है, चीजें टेढ़ी दिख सकती हैं और पढ़ने में परेशानी हो सकती है. कुछ मामलों में यह नुकसान हमेशा के लिए भी रह सकता है.

कब बढ़ता है खतरा?

डॉ. बताते हैं कि क्लब या पार्टी में लेजर से आंखों को नुकसान होना आम बात नहीं है, लेकिन अगर लेजर बहुत तेज हो या सही तरीके से इस्तेमाल न की जा रही हो, तो खतरा बढ़ जाता है. खासतौर पर तेज हरी लेजर अगर कुछ सेकंड तक सीधे आंखों पर पड़े, तो वह रेटिना को नुकसान पहुंचा सकती है. डॉक्टर कहते हैं कि बार-बार लेजर की रोशनी आंखों में पड़ना ज्यादा खतरनाक होता है. आंख लेजर की रोशनी को एक छोटे बिंदु पर केंद्रित कर लेती है, जिससे उसका असर और तेज हो जाता है. अंधेरे माहौल जैसे क्लब में यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि वहां आंखों की पुतलियां ज्यादा खुली रहती हैं.

कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

अगर लेजर देखने के बाद आंखों में जलन हो, नजर धुंधली लगे, काले धब्बे दिखें, रोशनी चुभे या सिरदर्द हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे लक्षण तुरंत या कुछ घंटों बाद भी आ सकते हैं. डॉक्टरों की सलाह है कि ऐसी स्थिति में उसी दिन आंखों के डॉक्टर को दिखाना चाहिए. इलाज समय पर हो जाए, तो नजर को बचाया जा सकता है, लेकिन हर बार पूरी तरह ठीक होना संभव नहीं होता. इसलिए सबसे जरूरी है सावधानी कि लेजर लाइट को सीधे न देखें, बीम आंखों की ओर आए तो नजर हटा लें और सुरक्षित दूरी बनाए रखें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर और सेहत को लेकर भ्रम में तो नहीं रहते आप, जानें किन गलत बातों को इंसान मान बैठा है सही?

शरीर और सेहत को लेकर भ्रम में तो नहीं रहते आप, जानें किन गलत बातों को इंसान मान बैठा है सही?


Do You Really Need To Detox Your Body: आज हर कोई सेहत को लेकर जागरूक है, लेकिन परेशानी यह है कि जानकारी जितनी ज्यादा मिल रही है, भ्रम भी उतना ही बढ़ता जा रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल सलाह, पुराने घरेलू नुस्खे और “एक उपाय, हर बीमारी का इलाज” जैसे दावे लोगों को आसानी से प्रभावित कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि कई बार बिना जांचे-परखे लोग ऐसी बातों पर भरोसा कर लेते हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता.

मेडिसिन एक्सपर डॉ. अनन्या मेहता बताती हैं कि ज्यादातर हेल्थ मिथ्स इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि उनमें सच्चाई का थोड़ा-सा अंश होता है, जिसे समय के साथ बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर दिया जाता है.

गलतफहमी 1: शरीर को बाहर से डिटॉक्स करना जरूरी

डिटॉक्स टी, जूस और पाउडर यह भरोसा दिलाते हैं कि वे शरीर को अंदर से साफ कर देंगे. लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक शरीर को अलग से डिटॉक्स की जरूरत ही नहीं होती. डॉ. मेहता कहती हैं कि लिवर और किडनी दिन-रात शरीर से गंदगी बाहर निकालने का काम करते हैं. डिटॉक्स के नाम पर लंबे समय तक सिर्फ लिक्विड लेने से शरीर कमजोर हो सकता है और जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है.

गलतफहमी 2: ज्यादा विटामिन लेने से सेहत और बेहतर हो जाती है

विटामिन जरूरी हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा लेना फायदे की बजाय नुकसान कर सकता है. डॉक्टरों के अनुसार कुछ विटामिन शरीर में जमा हो जाते हैं और अधिक मात्रा में लेने पर टॉक्सिक असर डाल सकते हैं. आम लोगों के लिए संतुलित भोजन ही काफी होता है, जब तक किसी खास कमी की पुष्टि न हो.

गलतफहमी 3: जो नेचुरल है, वह नुकसान नहीं करता

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि हर्बल या देसी चीजें पूरी तरह सुरक्षित होती हैं. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है. डॉ. मेहता बताती हैं कि कई प्राकृतिक तत्व दवाओं की तरह ही शरीर पर असर डालते हैं और दूसरी दवाओं के साथ रिएक्शन भी कर सकते हैं. इसलिए बिना सलाह के सप्लीमेंट या काढ़े लेना सही नहीं है.

गलतफहमी 4: डॉक्टर के पास तभी जाएं, जब बीमारी हो

कई लोग तब तक डॉक्टर से दूरी बनाए रखते हैं, जब तक परेशानी बढ़ न जाए. एक्सपर्ट का कहना है कि रेगुलर हेल्थ चेकअप से बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है. देर करने पर इलाज मुश्किल और महंगा दोनों हो सकता है.

गलतफहमी 5: उम्र बढ़ने पर दर्द होना तय

उम्र के साथ शरीर में बदलाव आते हैं, लेकिन लगातार दर्द को “नॉर्मल” मान लेना सही नहीं है. डॉ. मेहता के मुताबिक लंबे समय तक रहने वाला दर्द किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है.

सेहत से जुड़े भ्रम क्यों बनते हैं खतरा?

गलत धारणाएं सिर्फ जानकारी को नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि सही इलाज में देरी, गलत फैसलों और बेवजह की चिंता का कारण भी बनती हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि अधूरी या गलत जानकारी कई बार बीमारी से भी ज्यादा नुकसानदेह हो सकती है.

सही और गलत में फर्क कैसे करें?

डॉक्टरों की सलाह है कि भरोसा केवल प्रमाणित और वैज्ञानिक स्रोतों पर करें. चमत्कारी इलाज या तुरंत असर के दावों से बचें. किसी भी बड़े फैसले से पहले डॉक्टर से सलाह लें. इसके अलावा ऐसी जानकारी पर सवाल उठाएं जो इलाज से दूर रहने को कहे. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बच्चों को गाय का दूध पिलाने की सही उम्र क्या, कब छुड़वाना चाहिए मां का दूध?

बच्चों को गाय का दूध पिलाने की सही उम्र क्या, कब छुड़वाना चाहिए मां का दूध?


What Is The Right Age To Start Cow’s Milk For Babies: नवजात शिशु के लिए मां का दूध सबसे पूर्ण और प्राकृतिक आहार माना जाता है, खासकर जीवन के पहले छह महीनों में. मां के दूध में वे सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिनकी बच्चे को सही शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरत होती है. इसमें एंटीबॉडी और एंजाइम भी होते हैं, जो बच्चे की रोग इम्यून सिस्टम  को मजबूत बनाते हैं. यही वजह है कि वर्ल्ड हेल्थ  ऑर्गेनाइजेशन  और यूनिसेफ दोनों ही जन्म से लेकर छह महीने तक केवल मां का दूध देने की सलाह देते हैं.

पूरी तरह संतुलित आहार

मां के दूध में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट, विटामिन और मिनरल्स की मात्रा बिल्कुल संतुलित होती है. यह दूध बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुसार खुद को ढाल लेता है, जो न तो फॉर्मूला मिल्क में संभव है और न ही गाय के दूध में. शुरुआती महीनों में बच्चे का डाइजेशन कमजोर होता है, ऐसे में मां का दूध आसानी से पच जाता है और अतिरिक्त कैलोरी का बोझ भी नहीं डालता.

रोगों से सुरक्षा देता है मां का दूध

डिलीवरी के बाद निकलने वाला पहला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे के लिए किसी पहले टीके से कम नहीं होता. यह दूध डायरिया, निमोनिया और कान के इंफेक्शन जैसी बीमारियों से बच्चे की रक्षा करता है. रिसर्च बताते हैं कि जो बच्चे पूरी तरह ब्रेस्टफीड होते हैं, उनमें एलर्जी, अस्थमा और भविष्य की कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है स्टडी से यह भी सामने आया है कि मां का दूध पीने वाले बच्चों का ब्रेन डेवलपमेंट बेहतर होता है और उनका आईक्यू लेवल थोड़ा अधिक पाया गया है. यानी ब्रेस्टफीडिंग सिर्फ शरीर ही नहीं, दिमाग के विकास के लिए भी अहम है.

 इसके साथ ही मां का दूध हमेशा साफ, सुरक्षित और सही तापमान पर उपलब्ध रहता है. इसे न तो उबालने की जरूरत होती है और न ही बोतल या उपकरणों को स्टरलाइज करने की. इससे परिवार पर आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता, क्योंकि फॉर्मूला दूध और अन्य सामान खरीदने की जरूरत नहीं होती. ब्रेस्टफीड किए गए बच्चों में मोटापा और कुपोषण का खतरा कम देखा गया है. मां का दूध बच्चे की मेटाबॉलिज्म और खाने की आदतों को संतुलित करता है, जिससे आगे चलकर मोटापे की समस्या से बचाव होता है.

तो गाय का दूध कब देना चाहिए?

डॉक्टर पवन मंडाविया बाल रोग एक्सपर्ट ने इसको सोशल मीडिया पर इसको लेकर वीडियो शेयर किया था. उनके मुताबिक “एक साल से पहले बच्चे को गाय का दूध नहीं देना चाहिए.” वे बताते हैं कि गाय के दूध में प्रोटीन और मिनरल्स की मात्रा काफी अधिक होती है, जो नवजात शिशु की पूरी तरह विकसित न हुई किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है. गर्मी, बुखार या दस्त जैसी स्थिति में यह दबाव गंभीर बीमारी का कारण भी बन सकता है.

 

इसके अलावा, गाय के दूध में आयरन, विटामिन C और कई अन्य जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं होते, जिनकी शिशु को शुरुआती महीनों में बेहद जरूरत होती है. कुछ बच्चों में गाय का दूध आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का कारण भी बन सकता है. दरअसल, गाय के दूध में मौजूद प्रोटीन पेट और आंतों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे मल के साथ खून निकलने की समस्या हो सकती है.

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क्रेविंग कम करने से लेकर प्रोटीन नाश्ते तक, वजन घटाने का वह तरीका, जो आपकी आदतों को बदल देगा

क्रेविंग कम करने से लेकर प्रोटीन नाश्ते तक, वजन घटाने का वह तरीका, जो आपकी आदतों को बदल देगा


सस्टेनेबल फैट लॉस आमतौर पर दबाव बढ़ाने से नहीं, बल्कि आदतों को आसान बनाने से आता है. इसी सोच के साथ डॉ. मल्हार गनला ने एक वीडियो में ढाई महीने में 10 किलो वजन घटाने के तीन सरल स्टेप्स बताए.



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क्या खाली पेट विटामिन B12 लेना सही है? एक्सपर्ट से जानें सप्लीमेंट लेने का सबसे सही समय

क्या खाली पेट विटामिन B12 लेना सही है? एक्सपर्ट से जानें सप्लीमेंट लेने का सबसे सही समय


Is It Safe To Take Vitamin B12 On An Empty Stomach: थकान, नसों की सेहत और विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए विटामिन B12 सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल आजकल काफी आम हो गया है. भागदौड़ भरी जिंदगी और नाश्ता छोड़ने की आदत के चलते कई लोग इन्हें खाली पेट ही ले लेते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या खाली पेट विटामिन B12 लेना सुरक्षित है?. चलिए आपको इस सवाल का जबाव बताते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस बारे में डॉक्टर प्रियंका शेखावत(न्यूरोलॉजिस्ट) के अनुसार, विटामिन B12 उन सप्लीमेंट्स में से एक है जिसे लेने का समय ज्यादा सख्त नहीं होता. उनके अनुसार, यह एक वॉटर-सॉल्युबल विटामिन विटामिन है,जिसको आप ब्रेकफास्ट से एक घंटे पहले या एक घंटे बाद में ले सकते हैं. यानी अगर इसको अगर सरल शब्दों में समझें, तो इसको खाली पेट या खाने के साथ दोनों तरह से लिया जा सकता है, क्योंकि भोजन इसकी अब्जॉर्ब प्रक्रिया को खास तौर पर प्रभावित नहीं करता.

 

खाली पेट लेने से क्या फायदा हो सकता है?

एक्सपर्ट बताते हैं कि विटामिन B12 एक वॉटर-सॉल्युबल विटामिन है, यानी इसे शरीर में अवशोषित होने के लिए फैट या अन्य पोषक तत्वों पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना पड़ता. कुछ मामलों में, खासकर च्यूएबल या सबलिंगुअल गोलियों में, खाली पेट लेने से इसका असर थोड़ा जल्दी दिख सकता है. इसकी वजह यह है कि पाचन के दौरान दूसरे न्यूट्रिएंट्स से कोई रेस नहीं होती.

किन लोगों को खाली पेट नहीं लेना चाहिए?

हालांकि, यह तरीका हर किसी के लिए आरामदायक नहीं होता. डॉ के मुताबिक, कुछ लोगों को खाली पेट B12 लेने से हल्की मतली, पेट में जलन या असहजता महसूस हो सकती है. खासतौर पर जिन लोगों को एसिड रिफ्लक्स, गैस्ट्राइटिस या संवेदनशील पाचन तंत्र की समस्या रहती है, उन्हें इसे भोजन के बाद लेना ज्यादा सुरक्षित और आरामदायक लग सकता है.

क्या इसके साइड इफेक्ट्स होते हैं?

आमतौर पर विटामिन B12 सुरक्षित माना जाता है. खाली पेट लेने पर कुछ लोगों को पेट खराब होना, सूजन या मुंह में हल्का मेटैलिक स्वाद महसूस हो सकता है, लेकिन ये लक्षण ज्यादातर हल्के होते हैं और जल्दी ठीक हो जाते हैं. क्योंकि यह वॉटर-सॉल्युबल विटामिन विटामिन है, इसलिए शरीर अतिरिक्त मात्रा को यूरिन के जरिए बाहर निकाल देता है, जिससे ओवरडोज का खतरा कम रहता है.

किसे ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए?

एक्सपर्ट के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान मॉर्निंग सिकनेस, पेट के अल्सर या एक साथ कई सप्लीमेंट लेने वाले लोगों को B12 भोजन के बाद लेना ज्यादा बेहतर लग सकता है.
अगर B12 लेने के बाद लगातार कोई परेशानी महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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