सुबह के नाश्ते में भूलकर भी नहीं खानी चाहिए ये चीजें, पूरा दिन हो जाता है खराब

सुबह के नाश्ते में भूलकर भी नहीं खानी चाहिए ये चीजें, पूरा दिन हो जाता है खराब



सुबह का नाश्ता दिन का सबसे जरूरी खाना माना जाता है. क्योंकि यही आपके पूरे दिन की ऊर्जा, पाचन और मूड को प्रभावित करता है. वहीं डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि सुबह हल्का पौष्टिक और बैलेंस नाश्ता करना चाहिए ताकि शरीर पूरे दिन एक्टिव रहे. लेकिन कई लोग जल्दी के चक्कर में या सिर्फ स्वाद के लिए ऐसी चीज खा लेते हैं जो न सिर्फ पाचन को खराब करती है बल्कि गैस, एसिडिटी और थकान भी बढ़ा देती है. ऐसे में सवाल उठता है कि सुबह के नाश्ते में आखिर क्या नहीं खाना चाहिए. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि सुबह के नाश्ते में भूलकर भी आपको कौन सी चीज नहीं खानी चाहिए, नहीं तो आपका पूरा दिन खराब हो जाएगा.

सुबह के नाश्ते में भूलकर भी न खाएं ये चीजें

खाली पेट न खाएं तला-भुना खाना  

सुबह समोसा, कचोरी, पराठे, पकोड़े या पनीर की तली-भुनी चीजें खाने से पाचन गड़बड़ा सकता है. ज्यादा तेल और मसालों के कारण गैस, भारीपन और एसिडिटी की समस्या बढ़ जाती है. इसलिए बेहतर है कि सुबह हल्का नाश्ता जैसे दलिया और पोहा या इडली सांभर लें.

खाली पेट न पिएं चाय या कॉफी

बहुत से लोग सुबह उठते ही चाय या कॉफी पी लेते हैं. लेकिन खाली पेट कैफीन पेट में एसिडिटी बढ़ता है, जिससे जलन, गैस और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है. वहीं दूध, चीनी वाली चाय और कॉफी खाली पेट लेना सेहत के लिए नुकसानदायक माना जाता है. ऐसे में कोशिश करें कि आप सुबह खाली पेट चाय या  कॉफी न पिएं.

जंक फूड से बनाएं दूरी

सुबह बर्गर, पिज्जा, नूडल्स या प्रोसेस्ड फूड खाने से दिन की शुरुआत खराब हो सकती है. इनमें फाइबर कम और नमक, तेल ज्यादा होता है जो पाचन को बिगाड़ते हैं और मोटापा बढ़ाते हैं. इसके बजाय ब्राउन ब्रेड, सैंडविच या बेसन चीला आप खा सकते हैं.

खट्टे फल खाली पेट न खाएं

कई लोग अपनी सुबह को हेल्दी बनाने के लिए नाश्ते में संतरा, नींबू, अनानास और टमाटर जैसे फल खा लेते हैं. लेकिन संतरा, नींबू, अनानास और टमाटर जैसे साइट्रस फल खाली पेट एसिडिटी बढ़ाते हैं. वहीं सुबह पाचन तंत्र नाजुक होता है और ऐसे फल सीने में जलन पैदा कर सकते हैं. ऐसे में कोशिश करें कि आप सुबह इस तरह के खट्टे फल का सेवन न करें.

मीठा नाश्ता अवॉइड करें

सुबह आपको मीठा नाश्ता भी नहीं करना चाहिए. पेस्ट्री, केक या मीठे सीरियल खाली पेट खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है और अचानक गिरता है. इससे थकान, कमजोरी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है. वहीं मीठा पाचन को भी बिगाड़ सकता है.

ठंडा दही न खाएं

सुबह-सुबह ठंडा दही खाने से पाचन धीमा होता है और गैस या एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है. जिन लोगों का पाचन कमजोर है, उन्हें सुबह दही से बचाना चाहिए.

सुबह कोल्ड ड्रिंक और सोडा से भी बचें

ज्यादातर गर्मियों में कई लोग सुबह के समय कोल्ड ड्रिंक और सोडा पी लेते हैं. लेकिन कोल्ड ड्रिंक में मौजूद कार्बोनेटेड गैस और एसिडिटी पेट में जलन पैदा करते हैं. ऐसे में खाली पेट कोल्ड ड्रिंक पीना आंतों के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है.

 

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ये लोग डोनेट नहीं कर सकते किडनी, रोहिणी आचार्य ‘किडनी विवाद’ के बीच जान लीजिए नियम

ये लोग डोनेट नहीं कर सकते किडनी, रोहिणी आचार्य ‘किडनी विवाद’ के बीच जान लीजिए नियम



Who Cannot Donate Kidney: बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद लालू यादव के परिवार में बिखराव नजर आने लगा है. साल 2022 में जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की तबीयत खराब थी और उन्हें किडनी की जरूरत थी, तो रोहिणी आगे आई थीं. उन्होंने अपने पिता को किडनी डोनेट की थी. उस दौरान उनके इस कदम की पूरे देश में सराहना हुई थी. हालांकि अब जब वे अपने भाई तेजस्वी से नाराज हैं, तो इसे लेकर कई बयान दे चुकी हैं. चलिए आपको बताते हैं कि वे लोग कौन होते हैं, जो किडनी डोनेट नहीं कर सकते.

कौन से लोग डोनेट नहीं कर सकते किडनी?

किडनी डोनेट करना किसी भी इंसान द्वारा दिया गया सबसे बड़ा तोहफ़ा माना जाता है. जिन लोगों की किडनी काम करना बंद कर देती है, उनके लिए किसी जीवित व्यक्ति से मिली किडनी उन्हें बेहतर रिजल्ट और डायलिसिस की तुलना में लंबी, हेल्दी ज़िंदगी दे सकती है. National Kidney Foundation के अनुसार, हर इच्छुक व्यक्ति किडनी डोनेट नहीं कर सकता. कुछ ऐसे कारण होते हैं, जिनकी वजह से किसी व्यक्ति को डोनेशन की अनुमति नहीं मिलती. इनमें-

गंभीर मेडिकल समस्याएं

किडनी डोनेट करने में सबसे पहले आपकी सेहत को देखा जाता है. अगर कोई ऐसी बीमारी है जो ऑपरेशन के दौरान या बाद में आपको नुकसान पहुंचा सकती है, तो डोनेशन की अनुमति नहीं दी जाती. इसमें कुछ दिक्कतों को शामिल किया जाता है, जैसे-

  • अनकंट्रोल हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज
  • एक्टिव कैंसर या हाल में कैंसर का इतिहास
  • हार्ट या लंग्स की कोई गंभीर बीमारी, जिससे सर्जरी जोखिम भरी हो जाए

वजन और BMI से जुड़ी शर्तें

ट्रांसप्लांट सेंटर्स BMI यानी बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर भी तय करते हैं कि कोई व्यक्ति डोनेट कर सकता है या नहीं. कुछ सेंटर्स के नियम सख्त होते हैं, जबकि कुछ आपकी लाइफस्टाइल और फैट कहां जमा है जैसी बातों को भी देखते हैं.

BMI कैटेगरी
18.5 से कम- अंडरवेट
18.5–24.9- नार्मल
25–29.9- ओवरवेट
30 से ऊपर- मोटापा

बहुत कम या बहुत ज्यादा BMI सर्जरी के दौरान या बाद में ब्लीडिंग, इंफेक्शन या घाव की दिक्कतों का खतरा बढ़ा सकता है. ज्यादा वजन लंबे समय में डायबिटीज और हाई बीपी जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है.

मेंटल हेल्थ संबंधित दिक्कत

किडनी डोनेट करना सिर्फ मेडिकल फैसला नहीं, एक इमोशनल निर्णय भी है. इसलिए इसमें सोशल वर्कर या साइकोलॉजिस्ट से भी मुलाकात कराई जाती है. वे यह सुनिश्चित करते हैं कि आप भावनात्मक रूप से भी तैयार हैं.

वे खासतौर पर इन बातों का ध्यान रखते हैं-

  • आप डोनेशन के फायदे और जोखिम समझते हों
  • आप पर किसी तरह का दबाव न हो
  • अगर आप मेंटल हेल्थ की दवा लेते हैं, तो आप लंबे समय से स्थिर हों

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि मेंटल हेल्थ से जुड़ी बीमारी होना डोनेशन रोक नहीं देता. मुद्दा यह है कि आप सुरक्षित और समझदारी से फैसला ले पा रहे हैं या नहीं.

सपोर्ट सिस्टम और रिकवरी की जरूरत

किडनी डोनेट करने के बाद पूरी तरह ठीक होने में लगभग 4 से 6 हफ्ते लगते हैं. इस दौरान आपको घर में सहयोग और आरामदायक माहौल चाहिए होता है.

सपोर्ट सिस्टम में शामिल हो सकता है-

  • मदद करने वाला कोई व्यक्ति- खाना, सफाई, गाड़ी चलाना या शुरुआती कुछ दिनों की जरूरतें
  • इमोशनल सपोर्ट- ताकि आप चिंताओं से न घबराएं
  • साफ-सुथरा और सुरक्षित माहौल- जिससे इंफेक्शन का खतरा कम हो

ये भी पढ़ें: 9 में से 1 भारतीय है इन्फेक्शियस डिजीज से पीड़ित, ICMR की रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन

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बार-बार आ रही है हिचकी तो हो जाएं सीरियस, शरीर में फैल सकती है ये गंभीर बीमारी

बार-बार आ रही है हिचकी तो हो जाएं सीरियस, शरीर में फैल सकती है ये गंभीर बीमारी



Long-Lasting Hiccups Complications: हिचकी आना एक बेहद आम अनुभव है, जिससे लगभग हर कोई गुजरता है. ये डायफ्राम नाम की मांसपेशी के अचानक और अनकंट्रोल सिकुड़ने से होती है, जिससे हिक जैसी आवाज निकलती है. आमतौर पर हिचकी कुछ ही मिनटों में खुद रुक जाती है. बहुत कम मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकती है. हिचकी तब लगती है जब हवा अंदर लेने की प्रक्रिया थोड़ी देर के लिए रुक जाती है. इसके पीछे वजहें हो सकती हैं, पेट में गैस भर जाना, मसालेदार खाना, या फिर पाचन और सांस से जुड़ी कुछ छिपी समस्याएं. ज्यादातर समय हिचकी नुकसानदायक नहीं होती है. लोग इसे सामान्य मानते हैं और हर किसी के पास इसे शांत करने का अपना एक तरीका होता है.

हिचकी क्यों आती है?

हिचकी तब आती है जब डायफ्राम अचानक सिकुड़ता है और इसी दौरान वोकल कॉर्ड बंद हो जाते हैं, जिससे वह खास हिक आवाज पैदा होती है. आमतौर पर इसको ट्रिगर करने के लिए ये हैं-

  • बहुत जल्दी-जल्दी खाना या पीना
  • सोडा, बहुत गर्म चीजें या शराब पीना
  • पेट में गैस भर जाना
  • तनाव, घबराहट या ज्यादा उत्साह
  • ज्यादा खाना
  • कुछ दवाओं का असर, जैसे एनेस्थीसिया या स्टेरॉइड

बार-बार हिचकी आए तो क्या दिक्कतें हो सकती हैं?

Cleveland Clinic के अनुसार, अगर हिचकी लंबे समय तक बनी रहे, तो यह रोजमर्रा की जिंदगी और सेहत दोनों को प्रभावित कर सकती है. लगातार चलने वाली हिचकी से ये परेशानियां हो सकती हैं-

  • खाने-पीने में दिक्कत से वजन कम होना या डिहाइड्रेशन
  • बात करने में दिक्कत
  • नींद खराब होना, थकान और ध्यान की क्षमता घट जाना
  • खाने-पीने में परेशानी से कमजोरी
  • मानसिक तनाव, बेचैनी या डिप्रेशन

बार-बार आने वाली हिचकी कैसे रोकी जाए?

  • छोटे घूंट लेकर ठंडा पानी पीएं या गरारा करें
  • सांस रोककर धीरे से छोड़ें
  • हल्का दबाव दें- निगलते समय नाक पकड़कर, डायफ्राम पर या जीभ पर
  • थोड़ा मीठा या खट्टा- चुटकीभर चीनी, नींबू, थोड़ा सिरका

कब चिंता करनी चाहिए?

अधिकतर हिचकियां खुद बंद हो जाती हैं, लेकिन 48 घंटे से ज्यादा चलने वाली हिचकी को क्रॉनिक हिचकी कहा जाता है. ऐसी स्थिति में यह किसी छिपी हुई बीमारी का संकेत हो सकती है. कुछ गंभीर स्थितियां जहां हिचकी एक लक्षण बनकर सामने आ सकती है-

  • दिमाग और नसों की समस्याएं: स्ट्रोक, नर्व डैमेज
  • दिल या फेफड़ों की बीमारी: हार्ट अटैक, निमोनिया
  • कैंसर: ट्यूमर या कैंसर के इलाज के साइड इफेक्ट
  • पाचन संबंधी परेशानियां: पैंक्रियास में सूजन, इसोफेगस में जलन या इंफेक्शन

डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?

अगर हिचकी 48 घंटे से ज्यादा रहे, नींद बिगाड़ दे, खाना-पीना मुश्किल कर दे, सांस लेने में दिक्कत हो, या इसके साथ छाती में दर्द, तेज बुखार, उल्टी, कमजोरी या सुन्नपन भी हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है. हिचकी छुड़ाने के लिए किसी को अचानक डराने की कोशिश न करें. इससे कभी-कभी हिचकी रुक सकती है, लेकिन गिरने, चोट लगने या दिल की समस्याएं बढ़ने का खतरा भी होता है.

इसे भी पढ़ें: Ginger Tea: क्या अदरक वाली चाय सच में घटाती है वजन, जानें इस दावे को लेकर क्या कहती है रिसर्च?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेशाब बैठकर करना सही या खड़े होकर, पुरुषों के लिए क्या है सही तरीका?

पेशाब बैठकर करना सही या खड़े होकर, पुरुषों के लिए क्या है सही तरीका?



Men Sit Or Stand To Pee: अगर आप साफ-सफाई को लेकर थोड़े चुस्त रहते हैं, तो आपने कभी न कभी अपने पार्टनर से ये जरूर कहा होगा कि सीट गंदी न हो इसलिए बैठकर ही पेशाब करें. लेकिन कुछ ऐसे कारण भी सामने आए हैं, जो सच में पुरुषों की ये आदत बदल सकते हैं. आमतौर पर खड़े होकर पेशाब करना पुरुषों के लिए बिल्कुल सामान्य बात है. उनका शरीर भी इसी हिसाब से बना है. लेकिन हाल के कुछ रिसर्च ये बताते हैं कि कई पुरुषों के लिए बैठकर पेशाब करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.

पेशाब खड़े होकर या बैठकर करना, कौन सा सही?

दुनिया के करीब 7,000 पुरुषों से एक साधारण सवाल पूछा गया, आप खड़े होकर पेशाब करते हैं या बैठकर? इस सर्वे के बाद सोशल मीडिया पर इतनी चर्चा हुई कि एक यूरोलॉजिस्ट ने तक सलाह दे दी कि उम्र बढ़ने पर पुरुषों को बैठकर पेशाब करने पर विचार करना चाहिए. जर्मनी में 40 प्रतिशत पुरुष हर बार बैठकर पेशाब करते हैं. ऑस्ट्रेलिया में चौथाई पुरुष ऐसा कहते हैं, जबकि अमेरिका में सिर्फ 10 प्रतिश पुरुष इस आदत को अपनाए हुए हैं. कुछ देशों में खड़े होकर पेशाब करना सही और बैठकर करना कमजोरों वाली आदत समझा जाता है. जर्मन में Sitzpinkler शब्द उन्हीं लोगों के लिए इस्तेमाल होता है और कई बार ताना मारने के लिए भी बोला जाता है.

हालांकि, अब आदतें बदल रही हैं. ऑस्ट्रेलिया में युवा पुरुषों में बैठकर पेशाब करने की आदत तेजी से बढ़ रही है. वहां 36 प्रतिशत युवा ये तरीका अपनाते हैं, जबकि उम्रदराज पुरुषों में ये आंकड़ा सिर्फ 20 प्रतिशत है.

सही तरीका क्या है?

अगर पुरुष स्वस्थ हैं, तो दोनों तरीकों में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. रिसर्च में पाया गया है कि बैठकर या खड़े होकर पेशाब करने से पेशाब का वक्त, फ्लो या ब्लैडर खाली होने की क्षमता तीनों में कोई खास अंतर नहीं होता. यानि, चाहे बैठकर करें या खड़े होकर ये आपकी पसंद है. बस खड़े होकर करते हैं तो सीट साफ रहे, इसका ध्यान रखें.

कब फर्क पड़ता है?

जिन पुरुषों को पेशाब से जुड़ी दिक्कतें होती हैं, जैसे बहुत हल्की धार, रुक-रुककर पेशाब आना या ये महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ. उनके लिए पोस्टर यानी बैठना या खड़ा होना मायने रख सकता है. कुछ पुरुषों को बैठने से फ्लो बेहतर होता है, तो कुछ को खड़े होने में ज्यादा आराम मिलता है. जिन लोगों को बढ़ी हुई प्रोस्टेट की समस्या होती है, उनमें कई बार खड़े होकर पेशाब करने से ब्लैडर बेहतर तरीके से खाली होता है. लेकिन ये हर किसी पर लागू नहीं होता, इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है.

इसे भी पढ़ें: Ginger Tea: क्या अदरक वाली चाय सच में घटाती है वजन, जानें इस दावे को लेकर क्या कहती है रिसर्च?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल क्यों बढ़ता है? जानें इसे प्राकृतिक रूप से कम करने के तरीके

स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल क्यों बढ़ता है? जानें इसे प्राकृतिक रूप से कम करने के तरीके


कॉर्टिसोल डिटॉक्स का मतलब किसी खास डाइट या दवा से नहीं है, बल्कि ऐसे डेली लाइफस्टाइल के बदलावों से है जो धीरे-धीरे तनाव को कम करके शरीर को संतुलन में लाते हैं. यह तरीका तेज़ नतीजों का वादा नहीं करता, लेकिन लंबे समय में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है.

NIH के स्टडी में पाया गया है कि हमारा लाइफस्टाइल, जैसे नींद, कैफीन, मूड, एक्सरसाइज और इमोशनल स्थिति कॉर्टिसोल पर सीधा असर डालता है. इसलिए छोटी आदतों में सुधार करना ही कॉर्टिसोल को स्वाभाविक रूप से कम करने का सबसे सरल रास्ता है.

NIH के स्टडी में पाया गया है कि हमारा लाइफस्टाइल, जैसे नींद, कैफीन, मूड, एक्सरसाइज और इमोशनल स्थिति कॉर्टिसोल पर सीधा असर डालता है. इसलिए छोटी आदतों में सुधार करना ही कॉर्टिसोल को स्वाभाविक रूप से कम करने का सबसे सरल रास्ता है.

सबसे पहले बात कैफीन की. ज्यादा कॉफी या एनर्जी ड्रिंक शरीर को तनाव की स्थिति में धकेलते हैं और कॉर्टिसोल बढ़ाते हैं. इसलिए इसे सीमित करना, खासकर सुबह के बाद, शरीर के हार्मोनल संतुलन को बेहतर बनाए रखता है.

सबसे पहले बात कैफीन की. ज्यादा कॉफी या एनर्जी ड्रिंक शरीर को तनाव की स्थिति में धकेलते हैं और कॉर्टिसोल बढ़ाते हैं. इसलिए इसे सीमित करना, खासकर सुबह के बाद, शरीर के हार्मोनल संतुलन को बेहतर बनाए रखता है.

हंसी कॉर्टिसोल कम करने का सबसे आसान तरीका है. दोस्तों के साथ समय बिताना, हल्की-फुल्की बातचीत या कुछ मजेदार देखना दिमाग में ऐसे केमिकल्स पैदा करता है जो तनाव को काफी घटा देते हैं और मूड को तुरंत हल्का कर देते हैं.

हंसी कॉर्टिसोल कम करने का सबसे आसान तरीका है. दोस्तों के साथ समय बिताना, हल्की-फुल्की बातचीत या कुछ मजेदार देखना दिमाग में ऐसे केमिकल्स पैदा करता है जो तनाव को काफी घटा देते हैं और मूड को तुरंत हल्का कर देते हैं.

माइंडफुलनेस जैसे ध्यान, गहरी सांसें या कुछ मिनट योग नर्वस सिस्टम को शांत करते हैं. साइंटफिक रिसर्च बताते हैं कि रोजाना सिर्फ 10 से 15 मिनट का माइंडफुलनेस अभ्यास कॉर्टिसोल कम कर सकता है और भावनात्मक स्थिरता बढ़ा सकता है.

माइंडफुलनेस जैसे ध्यान, गहरी सांसें या कुछ मिनट योग नर्वस सिस्टम को शांत करते हैं. साइंटफिक रिसर्च बताते हैं कि रोजाना सिर्फ 10 से 15 मिनट का माइंडफुलनेस अभ्यास कॉर्टिसोल कम कर सकता है और भावनात्मक स्थिरता बढ़ा सकता है.

नियमित व्यायाम भी कॉर्टिसोल नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभाता है. हल्की वॉक, साइक्लिंग, तैराकी या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शरीर में जमी टेंशन को कम कर देती है. इसके साथ 7से 8 घंटे की अच्छी और लगातार नींद जरूरी है, क्योंकि खराब नींद कॉर्टिसोल को रातभर बढ़ाए रखती है.

नियमित व्यायाम भी कॉर्टिसोल नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभाता है. हल्की वॉक, साइक्लिंग, तैराकी या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शरीर में जमी टेंशन को कम कर देती है. इसके साथ 7से 8 घंटे की अच्छी और लगातार नींद जरूरी है, क्योंकि खराब नींद कॉर्टिसोल को रातभर बढ़ाए रखती है.

Psychoneuroendocrinology जैसी जर्नल्स में छपे स्टडी के मुताबिक, लगातार तनाव कम करने वाली आदतें कॉर्टिसोल को 30 प्रतिशत तक घटा सकती हैं. इससे दिल की बीमारी, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और डिप्रेशन बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है. यानी ये साधारण बदलाव ही लंबे समय में मानसिक और शारीरिक सेहत को मजबूत बनाते हैं.

Psychoneuroendocrinology जैसी जर्नल्स में छपे स्टडी के मुताबिक, लगातार तनाव कम करने वाली आदतें कॉर्टिसोल को 30 प्रतिशत तक घटा सकती हैं. इससे दिल की बीमारी, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और डिप्रेशन बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है. यानी ये साधारण बदलाव ही लंबे समय में मानसिक और शारीरिक सेहत को मजबूत बनाते हैं.

Published at : 21 Nov 2025 10:28 AM (IST)

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