सुबह-सुबह क्यों हाई हो जाता है ब्लड शुगर, यह कितना खतरनाक और क्या है इसे मैनेज करने का तरीका?

सुबह-सुबह क्यों हाई हो जाता है ब्लड शुगर, यह कितना खतरनाक और क्या है इसे मैनेज करने का तरीका?



High Blood Sugar: सुबह उठते ही अगर आपका ब्लड शुगर हाई मिलता है, तो यह परेशान करने वाली बात लगती है. खासकर तब, जब रातभर कुछ खाया भी नहीं होता. टाइप-2 डायबिटीज या प्रीडायबिटीज वाले लोगों में यह स्थिति और भी उलझन पैदा करती है. लेकिन एक्सपर्ट बताते हैं कि खाली पेट ब्लड शुगर बढ़ना एक आम बात है और इसके पीछे शरीर की कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाएं और कुछ लाइफस्टाइल कारण काम करते हैं. इसमें सबसे सामान्य वजह है डॉन फिनॉमेनन। यह वह समय है जब सुबह 2 बजे से 8 बजे के बीच शरीर कुछ खास हार्मोन रिलीज करता है. जैसे कॉर्टिसोल, ग्रोथ हार्मोन, ग्लूकागॉन और एड्रेनालिन. ये हार्मोन शरीर को दिन की एक्टिविटी के लिए तैयार करते हैं और इसी दौरान लीवर खून में ग्लूकोज़ छोड़ता है ताकि सुबह ऊर्जा बनी रहे.

जिन लोगों में इंसुलिन अच्छी तरह काम करता है, शरीर तुरंत अतिरिक्त ग्लूकोज को संभाल लेता है. लेकिन टाइप-2 डायबिटीज या इंसुलिन रेसिस्टेंस वाले लोगों में यह ग्लूकोज संतुलित नहीं हो पाता, और सुबह ब्लड शुगर अपेक्षा से ज्यादा दिखाई देता है. गुरुग्राम स्थित फिजियोलॉजिस्ट डॉ. नलिन विकास कहते हैं कि यह प्रक्रिया शरीर के लिए सामान्य है, लेकिन इंसुलिन रेसिस्टेंस की स्थिति में ब्लड शुगर को बढ़ा सकती है.

इन वजहों से भी बढ़ता है शुगर

कुछ मामलों में सुबह का बढ़ा हुआ शुगर सोमोजी इफेक्ट की वजह से भी हो सकता है. यह तब होता है जब रात में ब्लड शुगर बहुत नीचे चला जाता है और शरीर उसे बचाने के लिए स्ट्रेस हार्मोन रिलीज करता है. ये हार्मोन ब्लड शुगर को जरूरत से ज्यादा बढ़ा देते हैं, और सुबह का रीडिंग हाई आता है. कई बार लोग इसे डॉन फिनॉमेनन समझ लेते हैं, लेकिन असल में यह रात के हाइपोग्लाइसीमिया का रिबाउंड होता है. हार्मोनल कारणों के अलावा, कई लाइफस्टाइल फैक्टर्स भी सुबह शुगर बढ़ाते हैं. तनाव और खराब नींद कॉर्टिसोल बढ़ाते हैं, जिससे इंसुलिन रेसिस्टेंस और अधिक हो जाता है. देर रात खाना, खासकर कार्ब्स या मीठा, रातभर ग्लूकोज को ऊंचा रखता है. दवाइयां गलत समय पर लेना भी फास्टिंग शुगर को बिगाड़ सकता है. इसके अलावा कम एक्टिविटी शरीर को ग्लूकोज उपयोग करने में कमजोर बना देती है.

कैसे कंट्रोल कर सकते हैं इसे?

डॉ. विकास सलाह देते हैं कि इन सभी कारणों को समझकर ही सुबह का शुगर कंट्रोल किया जा सकता है. उनका जोरर है कि डायबिटीज मैनेजमेंट सिर्फ दवाइयों पर नहीं टिका होता, बल्कि खानपान, नींद, तनाव और गतिविधि का संतुलन बेहद जरूरी है. शाम के समय हल्का और लो-कार्ब डिनर लेना रात में ग्लूकोज स्पाइक को रोकता है. डिनर के बाद थोड़ी वॉक करने से इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है. नींद और तनाव का ध्यान रखना हार्मोनल बैलेंस बनाए रखता है. कभी-कभार रात में ब्लड शुगर चेक करना मदद करता है यह पहचानने में कि समस्या डॉन फिनॉमेनन है या सोमोजी इफेक्ट और सबसे जरूरी दवाइयों का समय डॉक्टर की सलाह के अनुसार सेट करना.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप भी हर समय थका हुआ महसूस करते हैं? बॉडी टायर्डनेस के पीछे हो सकते हैं ये कारण

क्या आप भी हर समय थका हुआ महसूस करते हैं? बॉडी टायर्डनेस के पीछे हो सकते हैं ये कारण



आजकल की लाइफ में स्ट्रेस और मेंटल एग्जॉस्शन काफी ज्यादा हो गया है. इसके चलते लोग अक्सर फ्रस्ट्रेटिड और मेंटली ड्रेन्ड महसूस करते हैं. साथ ही, वह हर समय थके हुए रहते हैं. इसका कारण उनका अनहेल्दी लाइफस्टाइल भी है. ऐसे में इस थकान को दूर करने के लिए डॉक्टर्स पूरी नींद लेने की सलाह देते हैं.

लेकिन अपने देखा होगा कि कई लोग पूरी नींद लेने के बावजूद भी हर टाइम टायर्ड फील करते हैं. ऐसे में ये समस्या कई और वजहों से भी हो सकती है. आइए जानते हैं इसके पीछे के बड़े कारण.

आयरन डेफिशिएंसी से होती है थकान

हम सभी जानते हैं कि बैलेंस डाइट हेल्दी बॉडी के लिए काफी जरूरी होती है. इसलिए हमें सही समय पर खाना खाना चाहिए और सही मात्रा में सभी न्यूट्रियंट्स लेने चाहिए. इससे हमारा इम्यून सिस्टम अच्छा रहता है और बॉडी में  एनर्जी लेवल्स भी मेंटेन रहते हैं. ऐसे में जब भी हमारे शरीर में आयरन की कमी हो जाती है तो हीमोग्लोबिन भी कम बनने लगता है. इससे बॉडी में सभी सेल्स तक ऑक्सीजन की सप्लाई ठीक तरह से नहीं होती और हम थका हुआ महसूस करते हैं.

डिहाइड्रेशन से हो सकती है परेशानी

जब शरीर की एनर्जी खत्म हो जाती है तो हमें थकान होने लगती है. ऐसे में इसका एक बड़ा कारण डिहाइड्रेशन भी होता है. दरअसल, पानी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की मूवमेंट समेत ब्लड सर्कुलेशन के लिए भी जरूरी होता है. इसकी कमी से थकान और सिर दर्द जैसी परेशानियां हो जाती है. इसलिए हमें सही मात्रा में पानी पीना चाहिए.

स्ट्रेस करता है बॉडी को टायर्ड 

थकान और चिड़चिड़ेपन का सबसे बड़ा कारण स्ट्रेस है. स्ट्रेस इनडायरेक्टली आपके पूरे बॉडी फंक्शन को डिस्ट्रप्ट करता है. इससे न सिर्फ बॉडी बल्कि आपका माइंड भी एंग्जाइटी और डिप्रेशन को एक्सपीरियंस करता है और बॉडी हाई अलर्ट पर चली जाती है. इससे नींद में कमी आ जाती है और इंसान रिफ्रेश महसूस नहीं करता.

ब्ल्यू लाइट रे का पड़ता है बुरा असर

आजकल हर कोई अपने ऑफिस लैपटॉप या कंप्यूटर पर काम करता है. इसके अलावा मोबाइल फोन का इस्तेमाल तो बहुत कॉमन है. ऐसे में इन डिवाइसेज से निकलने वाली ब्ल्यू लाइट रेस भी आपके दिमाग को रेस्टलैस बनाती है. दरअसल, इनसे निकलने वाली लाइट ब्रेन को इंडीकेशन देती है कि अब भी दिन हो रहा है. इसके चलते ब्रेन मेलाटॉनिन प्रोडक्शन को कम देता है, जिससे हमें सही समय से नींद नहीं आती है और दिमाग एक्टिव मोड में ही रहता है.

इसे भी पढ़ें : अमरूद करेगा शुगर लेवल को कंट्रोल, पिंक या वाइट जानें कौन सा है बेहतर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिस्तर पर जाने से पहले कभी नहीं खानी-पीनी चाहिए ये चीजें, नाम जानकर उड़ जाएंगे होश

बिस्तर पर जाने से पहले कभी नहीं खानी-पीनी चाहिए ये चीजें, नाम जानकर उड़ जाएंगे होश


एक्सपर्ट के अनुसार, डिनर के बाद मिठाई खाना आपकी नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन सकता है. आइसक्रीम या चॉकलेट उस वक्त भले अच्छा महसूस कराएं, लेकिन सुबह थकान, डार्क सर्कल और सुस्ती देकर जाती हैं. ज्यादा शुगर ब्लड शुगर को बढ़ाती है और फैट पाचन को धीमा कर देता है, जिससे नींद खराब हो जाती है.

शाम की चाय या कॉफी भले ही आपको रिलैक्स महसूस कराए, लेकिन कैफीन दिमाग को शांत होने नहीं देता. इससे ब्रेन एक्टिव बना रहता है और नींद आने में दिक्कत होती है. कुछ स्टडीज के अनुसार, रात में कैफीन लेने से impulsive behaviour बढ़ सकता है, जिससे देर रात बेवजह ऑनलाइन शॉपिंग जैसी हरकतें भी होती हैं.

शाम की चाय या कॉफी भले ही आपको रिलैक्स महसूस कराए, लेकिन कैफीन दिमाग को शांत होने नहीं देता. इससे ब्रेन एक्टिव बना रहता है और नींद आने में दिक्कत होती है. कुछ स्टडीज के अनुसार, रात में कैफीन लेने से impulsive behaviour बढ़ सकता है, जिससे देर रात बेवजह ऑनलाइन शॉपिंग जैसी हरकतें भी होती हैं.

सोने से पहले तला-भुना खाना भी परेशानी बढ़ा देता है. इन चीजों में फैट ज्यादा होता है, जो पचने में समय लेता है. इससे रात में भारीपन, गैस और हार्टबर्न जैसी दिक्कतें बढ़ जाती हैं, और नींद बार-बार टूटती है.

सोने से पहले तला-भुना खाना भी परेशानी बढ़ा देता है. इन चीजों में फैट ज्यादा होता है, जो पचने में समय लेता है. इससे रात में भारीपन, गैस और हार्टबर्न जैसी दिक्कतें बढ़ जाती हैं, और नींद बार-बार टूटती है.

एक हैरान करने वाली बात यह है कि कभी-कभी पानी भी नींद खराब कर सकता है. रात में बहुत ज्यादा पानी पीने से बार-बार टॉयलेट जाना पड़ता है, जिसे nocturia कहा जाता है. इससे नींद पूरी नहीं हो पाती और शरीर लगातार थका हुआ महसूस करता है.

एक हैरान करने वाली बात यह है कि कभी-कभी पानी भी नींद खराब कर सकता है. रात में बहुत ज्यादा पानी पीने से बार-बार टॉयलेट जाना पड़ता है, जिसे nocturia कहा जाता है. इससे नींद पूरी नहीं हो पाती और शरीर लगातार थका हुआ महसूस करता है.

कई लोग सोचते हैं कि शराब नींद लाती है, लेकिन यह एक मिथ है. अल्कोहल शरीर को डिहाइड्रेट करता है और रातभर बार-बार बाथरूम जाने की समस्या पैदा करता है. इससे नींद टूटती है और सुबह उठकर सुस्ती महसूस होती है.

कई लोग सोचते हैं कि शराब नींद लाती है, लेकिन यह एक मिथ है. अल्कोहल शरीर को डिहाइड्रेट करता है और रातभर बार-बार बाथरूम जाने की समस्या पैदा करता है. इससे नींद टूटती है और सुबह उठकर सुस्ती महसूस होती है.

डॉक्टर सलाह देते हैं कि सोने से दो से तीन घंटे पहले ऐसे किसी भी पेय या खाने से दूरी रखें जो दिमाग या पाचन को एक्टिव कर दे. इससे आपकी नींद गहरी होगी और सुबह ज्यादा एनर्जेटिक महसूस करेंगे.

डॉक्टर सलाह देते हैं कि सोने से दो से तीन घंटे पहले ऐसे किसी भी पेय या खाने से दूरी रखें जो दिमाग या पाचन को एक्टिव कर दे. इससे आपकी नींद गहरी होगी और सुबह ज्यादा एनर्जेटिक महसूस करेंगे.

इसलिए रात के खाने की प्लानिंग करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है. कई बार वे चीजें भी आपकी नींद खराब कर देती हैं जिन्हें आप बिल्कुल हार्मलैस  समझते हैं. इस मामले में पानी तक अगर ज्यादा ले लिया जाए तो पूरी रात नींद खुलती रह सकती है.

इसलिए रात के खाने की प्लानिंग करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है. कई बार वे चीजें भी आपकी नींद खराब कर देती हैं जिन्हें आप बिल्कुल हार्मलैस समझते हैं. इस मामले में पानी तक अगर ज्यादा ले लिया जाए तो पूरी रात नींद खुलती रह सकती है.

Published at : 17 Nov 2025 05:42 PM (IST)

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विटामिन B12 की रिपोर्ट एकदम सही, फिर भी महसूस हो रही थकान और पैरों में झुनझुनी तो तुरंत हो जाएं

विटामिन B12 की रिपोर्ट एकदम सही, फिर भी महसूस हो रही थकान और पैरों में झुनझुनी तो तुरंत हो जाएं



Hidden Vitamin B12 Deficiency: कई लोग मान लेते हैं कि अगर उनकी Vitamin B12 की रिपोर्ट नॉर्मल है, तो सेहत भी ठीक ही होगी. लेकिन अपोलो दिल्ली के सर्जन डॉ. अंशुमान कौशल, जो सोशल मीडिया पर The Angry Doc के नाम से जाने जाते हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि नॉर्मल रिपोर्ट हमेशा सच नहीं बताती. बहुत से लोग थकान, पैरों में झनझनाहट, भूलने की आदत और चिड़चिड़ापन जैसी दिक्कतों से जूझते रहते हैं, जबकि उनकी रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य लगती है.

फंक्शनल B12 डेफिशिएंसी: जब रिपोर्ट ठीक, पर शरीर में रहती है कमी

डॉ. कौशल ने एक वीडियो में कहा कि “क्या आपने ऐसे लोगों को देखा है जो हमेशा थके रहते हैं, भूलते हैं, डिप्रेस रहते हैं, लेकिन उनकी रिपोर्ट में B12 नॉर्मल आता है? यह फंक्शनल B12 डेफिशियेंसी है.” उन्होंने समझाया कि इसमें खून में B12 मौजूद होता है, लेकिन शरीर की सेल्स उसे इस्तेमाल नहीं कर पातीं. उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि “कागज पर B12 लेवल परफेक्ट दिखता है, लेकिन असल में सेल्स के पास कुछ नहीं होता. जैसे बैंक अकाउंट में पैसे हों, पर ATM कार्ड न हो, दिखने में अमीर, महसूस में कंगाल.”


क्यों भरोसेमंद नहीं होते नॉर्मल टेस्ट?

डॉ. कौशल के मुताबिक, ज्यादातर लैब केवल serum B12 मापकर रिपोर्ट दे देती हैं, जबकि असली कमी सेल्स के स्तर पर होती है. उन्होंने कहा, “B12 और फोलेट बैटमैन-रॉबिन की तरह काम करते हैं. DNA रीपेयर से लेकर RBC बनाने और न्यूरॉन बचाने तक दोनों साथ चलते हैं. इनमें से एक भी कमी हो जाए तो दिमाग ‘गॉथम मोड’ में चला जाता है. तनाव, सुन्न हाथ-पैर, झनझनाहट सब मुफ्त में मिलते हैं.”

किन लोगों में ज्यादा खतरा?

डॉ. कौशल बताते हैं कि कुछ ग्रुप्स पहले से ही रिस्क जोन में आते हैं. इनमें metformin या acidity की दवाएं लेने वाले, दूसरे नम्बर पर वीगेन डाइट पर रहने वाले तीसरे नम्बर पर bariatric surgery करा चुके लोग होते हैं.  उनका कहना है कि अगर लक्षण बने हुए हैं लेकिन रिपोर्ट नॉर्मल है, तो MMA, homocysteine या active B12 की जांच जरूरी है. उन्होंने कहा कि “कई बार टैबलेट असर नहीं करतीं और इंजेक्शन की जरूरत पड़ती है. समस्या विटामिन की नहीं, ऑब्जर्बेशन की होती है.” फंक्शनल डेफिशियेंसी का मतलब है कि आपकी कोशिकाएं B12 को सही से इस्तेमाल नहीं कर रहीं. नंबरों पर मत जाएं, फंक्शन मायने रखता है. अपने न्यूरॉन्स बचाइए और ऊर्जा के लिए B12 gummies पर भरोसा मत कीजिए. यह बायोकेमिस्ट्री है, बॉलीवुड नहीं.

दूसरे डॉक्टर भी दे चुके हैं चेतावनी

अपोलो के ही न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार ने भी X पर बताया कि B12 की कमी होने पर थकान, भूलेपन और सुस्ती की शिकायतें आम हैं, और नॉर्मल रिपोर्ट हमेशा पूरी कहानी नहीं बताती. उन्होंने कहा कि खून में मौजूद B12 का बड़ा हिस्सा एक ऐसे प्रोटीन से जुड़ा रहता है, जो विटामिन को सेल तक पहुंचाता ही नहीं. इससे रिपोर्ट में B12 सामान्य दिखता है, लेकिन शरीर को उसका फायदा नहीं मिलता. यही वजह है कि टेस्ट सही आने के बावजूद थकान और ब्रेन फंक्शन से जुड़ी समस्याएं बनी रह सकती हैं.

विटामिन B12 क्या है?

क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, B12 एक जरूरी पोषक तत्व है जो नर्व और रेड ब्लड सेल्स को स्वस्थ रखता है और DNA बनाने में मदद करता है. शरीर इसे खुद नहीं बनाता, इसलिए इसे भोजन से लेना पड़ता है जैसे मांस, मछली, अंडे, डेयरी और फोर्टिफाइड फूड. आम तौर पर वयस्कों को रोज लगभग 2.4 माइक्रोग्राम B12 चाहिए होता है, जबकि गर्भवती और ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाओं की जरूरत इससे अधिक होती है.

इसे भी पढ़ें-Poop Timing Health Risks: सुबह और शाम… कितने बजे पॉटी जाते हैं आप? आपकी सेहत के बारे में बहुत कुछ बताती है टाइमिंग

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सुबह और शाम… कितने बजे पॉटी जाते हैं आप? आपकी सेहत के बारे में बहुत कुछ बताती है टाइमिंग

सुबह और शाम… कितने बजे पॉटी जाते हैं आप? आपकी सेहत के बारे में बहुत कुछ बताती है टाइमिंग



Health Effects of Poop Timing: अक्सर लोग इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि वे सुबह जाते हैं या शाम को, लेकिन पॉटी की टाइमिंग आपके पेट, इंटेस्टाइन और मेटाबॉलिज्म की हालत के बारे में बहुत कुछ बताती है. हमारा पाचन तंत्र भी 24 घंटे की एक सर्कैडियन रिद्म पर चलता है, ठीक उसी तरह जैसे नींद, भूख, हार्मोन और बॉडी क्लॉक काम करते हैं. यही वजह है कि ज्यादातर लोग सुबह उठने के कुछ समय बाद ही फ्रेश होने जाते हैं, क्योंकि उस समय कोलन सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है.

लेकिन अगर कोई व्यक्ति रोज शाम को या कभी भी अनियमित समय पर पॉटी जाता है, तो ये अक्सर इस बात का संकेत होता है कि उसकी बॉडी क्लॉक, तनाव का स्तर या खाने-पीने की आदतें बदल गई हैं. टाइमिंग पर ध्यान देने से आप बिना किसी झिझक के अपने मेटाबॉलिक हेल्थ की कई छोटी लेकिन अहम बातें समझ सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इससे कौन-कौन सी चीजें पता चलती हैं.

सुबह पॉटी क्यों पसंद करती है बॉडी?

आपको बता दें कि पेट और कोलन का मूवमेंट पूरे दिन एक जैसा नहीं रहता. सुबह उठने के बाद इसकी एक्टिविटी सबसे ज्यादा होती है. रिसर्च बताते हैं कि कोलन की मोटिलिटी का खुद का सर्कैडियन रिद्म होता है, जो दिन में तेज और रात में धीमा पड़ जाता है. चूहों पर किए गए कई स्टडीज में पाया गया कि अगर खास क्लॉक जीन जैसे Per1 और Per2 हटा दिए जाएं, तो पॉटी का रिद्म पूरी तरह बिगड़ जाता है. इसके अलावा, सुबह उठकर खाना खाने से गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स एक्टिव होता है, जो कोलन को सिग्नल देता है कि वह कंटेंट को आगे बढ़ाए. इन्हीं कारणों से सुबह पॉटी आना इस बात का संकेत है कि आपकी बॉडी और गट क्लॉक एक-दूसरे के साथ तालमेल में काम कर रही हैं.

शाम को पॉटी आने का क्या मतलब?

अगर किसी व्यक्ति की पॉटी रोज शाम को ही आती है, तो इसका मतलब हो सकता है कि उसकी बॉडी क्लॉक शिफ्ट हो गई है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रात के समय कोलन का मूवमेंट काफी धीमा हो जाता है. अगर पाचन गतिविधि शाम को तेज होने लगती है, तो इसके पीछे लेट-नाइट खाना, शिफ्ट वर्क, या अनियमित नींद जैसी चीजें हो सकती हैं. खाना भी शरीर की इंटरनल क्लॉक को सेट करने वाला बड़ा संकेत होता है, इसलिए देर से खाने की आदत गट की रिद्म को बिगाड़ देती है. इसका मतलब है, शाम को पॉटी आना सिर्फ लेट डाइजेशन नहीं, बल्कि मेटाबॉलिक रिद्म के गड़बड़ होने का संकेत भी हो सकता है.

पॉटी टाइमिंग और मेटाबॉलिज्म का कनेक्शन

इंटेस्टाइन और मेटाबॉलिज्म दोनों ही बॉडी क्लॉक से जुड़े हैं. अगर नींद, खाना या रूटीन गड़बड़ हो जाए, तो इससे न सिर्फ कोलन की गति बदलती है, बल्कि शरीर में शुगर कंट्रोल, फैट मेटाबॉलिज्म जैसे काम भी प्रभावित होते हैं. इसी वजह से नियमित सुबह की पॉटी अक्सर एक सिंक्रोनाइज्ड मेटाबॉलिस्म का संकेत होती है, जबकि शाम या अनियमित टाइमिंग किसी रिद्म शिफ्ट की ओर इशारा कर सकती है.

कब यह टाइमिंग चिंता का कारण?

अगर अचानक पॉटी का समय बदल जाए, और इसके साथ दर्द, खून, वजन घटना या लगातार पेट फूलना जैसी दिक्कतें शुरू हो जाएं, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. सर्कैडियन रिद्म में गड़बड़ी IBS या फंक्शनल कॉन्स्टिपेशन जैसी समस्याओं से भी जुड़ी मानी जाती है. कुछ दिनों तक टाइमिंग नोट करने से समस्या समझने में मदद मिलती है और सही समय पर डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है.

इसे भी पढ़ें: Vitamin D: ठंड में कमरे में बैठे-बैठे हो सकती है विटामिन डी की कमी, डाइट में इन चीजों को करें शामिल

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बदलते मौसम में जरा-सी लापरवाही पड़ रही भारी, डॉक्टर से जानें अपना ख्याल रखने का तरीका

बदलते मौसम में जरा-सी लापरवाही पड़ रही भारी, डॉक्टर से जानें अपना ख्याल रखने का तरीका



सर्दी का मौसम जैसे-जैसे दस्तक दे रहा है, वैसे-वैसे लोगों की सेहत पर इसका असर साफ दिखने लगा है. सुबह-शाम की ठंड और दिन में कभी-कभी निकलने वाली हल्की धूप का खेल शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर बना रहा है. इसकी वजह से वायरल बुखार, जुकाम, खांसी, गले में खराश और पूरे बदन में दर्द के मरीजों की तादाद अस्पतालों में तेजी से बढ़ रही है. खासकर बच्चे और बुजुर्ग इस मौसम में सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं, क्योंकि उनकी इम्यूनिटी पहले से ही कमजोर होती है.

अस्पतालों में तेजी से बढ़े मरीज

हालिया रिपोर्ट्स पर गौर करें तो नवंबर 2025 के पहले पखवाड़े में ही नॉर्थ इंडिया के बड़े अस्पतालों में वायरल इंफेक्शन के केस 30-40 फीसदी तक बढ़ गए हैं. दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में ओपीडी में रोजाना सैकड़ों मरीज बुखार और खांसी की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, इस बार वायरल का रूप थोड़ा अलग है. पहले बुखार 2-3 दिन में उतर जाता था, अब वह ठीक होने के बाद भी सूखी खांसी, गले में जलन, कमजोरी और थकान जैसी दिक्कतें काफी वक्त तक परेशान कर रही हैं. कई मरीज तो हल्का बुखार ठीक होने के एक हफ्ते बाद अचानक खांसी के तेज दौरे पड़ने पर दोबारा अस्पताल आ रहे हैं.

क्यों बढ़ रही है दिक्कत?

डॉक्टरों की मानें तो इस बार इंफ्लुएंजा ए और बी वायरस के साथ-साथ रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस (आरएसवी) भी एक्टिव है. बच्चों में आरएसवी की वजह से ब्रॉन्कियोलाइटिस के केस बढ़े हैं, जबकि बुजुर्गों में निमोनिया का खतरा ज्यादा है. इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) की लेटेस्ट एडवायजरी में कहा गया है कि मौसम के बदलाव के साथ प्रदूषण का लेवल भी बढ़ रहा है, जो वायरल को ज्यादा खतरनाक बना रहा है. दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 300 के पार पहुंच चुका है, जिससे सांस की तकलीफें दोगुनी हो रही हैं.

डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके

मेदांता हॉस्पिटल नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अर्पिता कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, लोगों को लगता है कि हल्का-सा बुखार है, खुद ही ठीक हो जाएगा. यही छोटी-सी लापरवाही बड़ी मुसीबत बन जाती है. वायरल में शरीर को पूरा आराम चाहिए. दवाइयां बीच में छोड़ना, रात भर जागना, बाहर का तला-भुना खाना और ठंड से बचाव न करना, ये सब दोबारा बीमार करने का न्योता देते हैं. इस बार कई मरीजों को कोविड जैसी पोस्ट-वायरल थकान हो रही है, जो हफ्तों तक चलती है. ऐसे में शुरू से ही सतर्क रहे.

इन बातों का रखें ध्यान

डॉ. कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, अगर बुखार 101 डिग्री से ऊपर हो और खांसी के साथ बलगम में खून आए या सांस लेने में तकलीफ हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें. बच्चों में अगर तेज सांस चल रही हो या खाना-पीना छोड़ दिया हो तो इंतजार बिल्कुल न करें. इस मौसम में एंटीबायोटिक्स की जरूरत बहुत कम पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर केस वायरल के होते हैं. गलत दवा लेने से बैक्टीरियल रेसिस्टेंस बढ़ता है, जो बाद में बड़ी बीमारी का कारण बन सकता है. बच्चों को स्कूल भेजने से पहले मास्क जरूर लगवाएं. घर में हैंड सैनिटाइजर रखें और बार-बार हाथ धुलवाएं. ठंडी हवा से बचाने के लिए गर्म कपड़े पहनाएं, लेकिन ज्यादा गर्मी भी न दें वरना पसीना आने पर फिर जुकाम हो जाएगा. 

इन नुस्खों को आजमाने से मिलेगा फायदा

गर्म पानी में हल्दी-नमक डालकर गरारा करें. अदरक वाली चाय पिएं. शहद के साथ तुलसी का काढ़ा लें, लेकिन ये सब दवाइयों की जगह नहीं ले सकते. अगर लक्षण 3-4 दिन से ज्यादा रहें तो सेल्फ मेडिकेशन बंद कर दें. विटामिन सी और डी की कमी भी इम्यूनिटी कम करती है, इसलिए संतरा, आंवला, दही और धूप जरूर लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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