डाइट और आदतों में कर लेंगे ये बदलाव तो बेहतर रहेगी Gut Health, एक्सपर्ट ने बताए असरदार नियम

डाइट और आदतों में कर लेंगे ये बदलाव तो बेहतर रहेगी Gut Health, एक्सपर्ट ने बताए असरदार नियम



आज की तेज रफ्तार वाली जिंदगी में सबसे ज्यादा अनदेखा किया जाने वाला हिस्सा हमारी आंत यानी Gut है. अक्सर लोग पेट की तकलीफों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि हमारी गट हेल्थ ही शरीर की लगभग हर प्रक्रिया को प्रभावित करती है. पाचन से लेकर नींद, स्किन, मूड, इम्यूनिटी और एनर्जी तक.

हम सुबह कैसे उठते हैं, क्या खाते-पीते हैं, कब सोते हैं और दिनभर कौन-सी छोटी आदतें अपनाते हैं. ये सब मिलकर हमारी गट को हेल्दी और अनहेल्दी बनाते हैं. यही वजह है कि दुनिया भर के डॉक्टर और शोधकर्ता Gut Health को दूसरा दिमाग कहकर इस पर जोर देते हैं. इसी बीच एम्स, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित, 25 साल के अनुभव वाले मशहूर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में बेहद सरल लेकिन असरदार आदतें शेयर की हैं. उनका कहना है कि आने वाले सालों में हमारा पेट कितना हेल्दी रहेगा, यह आज बनाई गई आदतों पर ही निर्भर करता है. तो आइए जानते हैं बेहतर Gut Health के लिए G एम्स-ट्रेंड डॉक्टर ने क्या असरदार नियम बताए हैं. 

1. सुबह की शुरुआत मोबाइल से नहीं – डॉ. सेठी का कहना है कि उठते ही फोन देखने से तनाव बढ़ता है, क्योंकि सुबह हमारे शरीर में कॉर्टिसोल पहले ही ज्यादा होता है. इस समय स्क्रीन स्क्रॉल करना दिमाग को और बेचैन करता है. इसके बजाय 1–2 मिनट अपने दिन के लिए आभार व्यक्त करें. यह वेगस नर्व को एक्टिव करता है, जिससे पाचन और मूड दोनों बेहतर होते हैं. 

2. सुबह 10 मिनट धूप जरूर लें – सुबह की हल्की धूप शरीर की सर्कैडियन रिदम को रीसेट करती है. इससे विटामिन D बेहतर बनता है,  मूड अच्छा रहता है और गट की आंत की घड़ी संतुलित होती है यानी आपके पाचन प्रणाली को दिनभर सही ढंग से काम करने में मदद मिलती है. 

3. खाने के बाद 10 मिनट पैदल चलें – डॉक्टर मानते हैं कि खाने के बाद हल्की वॉक पाचन के लिए सबसे आसान उपाय है. इससे खाना जल्दी और अच्छे से पचता है, ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता, खाने के बाद आने वाली भारीपन वाली नींद नहीं आती है. खाने के बाद सिर्फ 10 मिनट की वॉक काफी हैं. 

4. हफ्ते में तीन बार फर्मेंटेड चीजें खाएं – फर्मेंटेड चीजें आंत में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाती हैं. इनमें दही, केफिर, किम्ची और कांजी शामिल हैं. डॉ. सेठी कहते हैं इसके लिए किसी कैप्सूल की जरूरत नहीं, नेचुरल खाना ही काफी है. 

5. खाने-पीने में जड़ी-बूटियां और मसाले बढ़ाएं – भारत के पारंपरिक मसाले सिर्फ टेस्ट ही नहीं बढ़ाते, बल्कि आंत के लिए वरदान हैं जैसे हल्दी, अदरक, जीरा, सौंफ और काली मिर्च. ये पाचन में मदद करते हैं, आंत में सूजन घटाते हैं और माइक्रोबायोम को मजबूत करते हैं. 

6. दिन के खाने के लिए 12 घंटे की एक तय सीमा रखें – खाना सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक सीमित कर दें. इससे आंत को रात में पर्याप्त आराम मिलता है, और डिटॉक्स प्रक्रिया बेहतर होती है. खाने का समय सीमित रहने से पाचन सुधरता है, वजन कंट्रोल में रहता है और नींद की क्वालिटी बढ़ती है. 

7. नियमित रूप से बेरीज खाएं – बेरीज आंत के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाती हैं और शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव कम करती हैं. उन्हें खाने से पहले इन्हें बेकिंग सोडा और पानी से अच्छी तरह धोने की सलाह दी जाती है ताकि किसी भी प्रकार के केमिकल  हट जाएं. 

8. 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लें – नींद आंत के लिए उतनी ही जरूरी है जितना खाना, डॉ. सेठी कहते हैं माइक्रोबायोम रात में ही खुद को रिपेयर करता है,. देर रात तक जागने से न सिर्फ पाचन गड़बड़ होता है, बल्कि अगले दिन मीठा खाने की इच्छा भी बढ़ जाती है. इसलिए रोज कम से 7–8 घंटे की शांत, गहरी नींद जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डायबिटीज के कारण आपकी हड्डियां तो कमजोर नहीं हो रहीं? दिखते हैं ऐसे लक्षण

डायबिटीज के कारण आपकी हड्डियां तो कमजोर नहीं हो रहीं? दिखते हैं ऐसे लक्षण



आजकल खराब खानपान, स्ट्रेस और खराब लाइफस्टाइल के कारण डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. डायबिटीज का असर सिर्फ ब्लड शुगर लेवल, किडनी, आंखों और दिल पर ही नहीं पड़ता बल्कि यह धीरे-धीरे हड्डियों और जोड़ों को भी कमजोर कर देती है. कई रिसर्च बताती है कि हाई ब्लड शुगर हड्डियों की मजबूती को सीधे प्रभावित करता है और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ा देता है.

वहीं डॉक्टर्स के अनुसार भी डायबिटीज रोगियों में सामान्य लोगों की तुलना में दो गुना ज्यादा हड्डियां टूटने की संभावना रहती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि डायबिटीज के कारण आपकी हड्डियां भी तो कमजोर नहीं हो रही है.

डायबिटीज हड्डियों को कैसे करती है कमजोर?

लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर हड्डियों के बनने और टूटने की प्रक्रिया के बीच संतुलन बिगाड़ देता है. इससे हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है और वह ज्यादा नाजुक हो जाती है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि शुगर के कारण घुटने के ओस्टियोआर्थराइटिस लिगामेंट मोच और जोड़ों की सूजन की समस्या बढ़ जाती है. ऐसे में हड्डियां कमजोर होने लगती है. इसके अलावा हाइपरग्लाइसेमिया यानी लगातार बढ़ता हुआ शुगर लेवल शरीर में सूजन पैदा करता है. इसका असर भी सीधा जोड़ों पर पड़ता है, जिससे उनमें दर्द, अकड़न और चलने फिरने में दिक्कत होती है. वहीं समय पर इलाज नहीं कराने पर यह कंडीशन आर्थराइटिस तक पहुंच सकती है.

इन लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज

डायबिटीज में हड्डियों के कमजोर होने के लक्षण आपको पहले से ही दिखाई देने लगते हैं. इन लक्षणों में लगातार जोड़ों में दर्द, जोड़ों में सूजन, मामूली चोट से हड्डी का टूट जाना, हड्डियों में बार-बार दर्द और बोन डेंसिटी में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

  • हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए डायबिटीज के मरीजों को अपने खान-पान और लाइफस्टाइल दोनों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है.
  • ऐसे में हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए डायबिटीज के मरीजों को कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर खाना खाना चाहिए. इसमें दूध, दही, पनीर, हरी सब्जियां और दालें शामिल कर सकते हैं.
  • वहीं डायबिटीज के मरीजों को रोजाना सुबह की हल्की धूप में कुछ देर टहलना चाहिए.
  • रोजाना हल्की फिजिकल एक्टिविटी या योग भी करना चाहिए.
  • इसके अलावा डायबिटीज के मरीजों को मीठा और हाई कार्बोहाइड्रेट फूड कम खाना चाहिए.
  • साथ ही डायबिटीज के मरीजों को वजन भी कंट्रोल में रखना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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85 साल के बाद घट सकता है कैंसर का खतरा, स्टैनफोर्ड स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा

85 साल के बाद घट सकता है कैंसर का खतरा, स्टैनफोर्ड स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा



बढ़ती उम्र के साथ कई बीमारियां भी बढ़ने लगती हैं. माना जाता है की उम्र बढ़ने पर कैंसर का खतरा भी बढ़ता है, लेकिन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. रिसर्च के अनुसार, 85 साल की उम्र के बाद कैंसर होने की संभावना काफी कम हो जाती है. हालांकि यह दवा नया नहीं है. इससे पहले भी देखा गया है कि मीडियम एज वालों और बुजुर्गों में कैंसर का खतरा बढ़ता है, लेकिन बहुत ज्यादा उम्र यानी एडवांस्ड ओल्ड एज में कैंसर का खतरा स्थिर हो जाता है या फिर घटने लगता है. इस पैटर्न को समझने के लिए स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने नई स्टडी की.

क्या सच में उम्र बढ़ने पर घट जाता है कैंसर का खतरा?

स्टैनफोर्ड की स्टडी जेनेटिकली इंजीनियर चूहों पर की गई है. इस रिसर्च में चूहों में KRAS जीन म्यूटेशन जो कैंसर पैदा करने वाले सबसे आम म्यूटेशन में से एक है इन्हें डालकर चूहों में फेफड़े का कैंसर विकसित किया था. स्टडी में दो उम्र के चूहे शामिल किए थे, जिनमें 4 से 6 महीने और 21 से 22 महीने वाले चूहे शामिल थे. इस स्टडी के रिजल्ट में साफ देखा गया कि बुजुर्ग चूहों में ट्यूमर का विकास युवा चूहों की तुलना में दो से तीन गुना तक कम था.

क्यों घट जाता है कैंसर का खतरा?

स्टडी के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में ऐसी नेचुरल जैविक प्रक्रियाएं विकसित हो जाती है जो म्यूटेशन से होने वाले ट्यूमर बनने को रोकती हैं, जिसका मतलब है कि भले ही उम्र के साथ शरीर में कैंसर पैदा करने वाले म्यूटेशन बढ़ते हैं लेकिन एजिंग टिश्यू इन म्यूटेशन को कैंसर में बदलने से रोक लेते हैं. रिसर्चर्स ने यह भी पाया है कि ट्यूमर सप्रेसर जीन जो शरीर को कैंसर से बचाते हैं यह युवा चूहाें में आसानी से इनएक्टिव हो जाते हैं. वहीं बुजुर्ग चूहों में यह जीन ज्यादा सक्रिय रहते हैं, जिससे कैंसर बनने की संभावना कम हो जाती है. वहीं रिसर्चर्स का यह भी मानना है कि यह रिसर्च फ्यूचर में कैंसर के इलाज और रोकथाम के नए रास्ते भी खोल सकती है.

कैंसर की रोकथाम को लेकर डब्ल्यूएचओ ने बताया मुख्य कारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 30 से 35 प्रतिशत कैंसर के मामले पूरी तरह से रोके जा सकते हैं. ऐसे कैंसर के मुख्य कारण तंबाकू, शराब, हेपेटाइटिस और एचपीवी जैसे इन्फेक्शन होते हैं. इसके अलावा इनमें खराब डाइट, मोटापा जैसी समस्याएं, नेचुरल कारण जैसे वायु प्रदूषण, रेडिएशन और कार्सिनोजेन्स शामिल है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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घर पर यूरिक एसिड का इलाज, दवा से पहले आजमाएं ये उपाय

घर पर यूरिक एसिड का इलाज, दवा से पहले आजमाएं ये उपाय



सर्दियों के मौसम में हमारे शरीर में यूरिक एसिड का स्तर अक्सर तेजी से बढ़ने लगता है. यूरिक एसिड शरीर का एक नेचुरल पदार्थ है, लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो कई परेशानियां पैदा करता है. इसमें सबसे आम समस्याएं जोड़ों में दर्द, सूजन, चलने-फिरने में कठिनाई और कभी-कभी अंगुलियों या घुटनों में तेज दर्द शामिल हैं. अगर समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या बढ़कर गंभीर स्थिति में बदल सकती है.

इसलिए जरूरी है कि हम अपने यूरिक एसिड के लेवल को कंट्रोल रखने के लिए कुछ आसान और नेचुरल उपाय अपनाएं. दवा लेने से पहले आप इन घरेलू उपायों को आजमा सकते हैं, जो न सिर्फ सुरक्षित हैं बल्कि शरीर को अंदर से स्वस्थ रखने में भी मदद करते हैं. तो चलिए जानते हैं कि घर पर यूरिक एसिड का इलाज करने के लिए दवा से पहले कौन से उपाय आजमाएं. 

1. सर्दियों में खट्टे फल खाएं – यूरिक एसिड को कंट्रोल करने के लिए सबसे आसान तरीका अपनी डाइट में खट्टे फलों को शामिल करना है. संतरा, नींबू, अमरूद, कीवी जैसे फल विटामिन-सी से भरपूर होते हैं. विटामिन-सी शरीर में सूजन को कम करने में मदद करता है और यूरिक एसिड को कंट्रोल रखने में सहायक होता है. आप रोजाना इन फलों का सेवन नाश्ते या खाने के बाद कर सकते हैं. इसके अलावा, नींबू का पानी खाली पेट पीना भी यूरिक एसिड को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है. 

2. रोजाना योगा और एक्सरसाइज करें – सर्दियों में अक्सर हम घर पर आराम करने लगते हैं और फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है. इससे न सिर्फ वजन बढ़ता है बल्कि यूरिक एसिड का लेवल भी बढ़ने लगता है. इसे रोकने के लिए रोजाना कम से कम 30 से 40 मिनट किसी भी तरह की हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करना जरूरी है. यह वॉकिंग, साइकलिंग, स्ट्रेचिंग या योगा हो सकती है. नियमित एक्सरसाइज शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है और यूरिक एसिड के लेवल को कंट्रोल रखने में मदद करता है. 

3. पानी पीने पर ध्यान दें –  सर्दियों में लोग अक्सर कम पानी पीते हैं क्योंकि ठंड में प्यास कम लगती है. लेकिन यह एक बड़ी गलती है. पानी की कमी से यूरिक एसिड शरीर में जमा होने लगता है, जिससे जोड़ों में दर्द और सूजन बढ़ सकती है. इसलिए रोजाना कम से कम 3 लीटर पानी पीना चाहिए. इसके अलावा, हर सुबह नींबू पानी पीने से भी यूरिक एसिड शरीर से बाहर निकलता है और मेटाबोलिज्म तेज होता है. 

4. जिंजर टी का सेवन करें – सर्दियों में चाय पीना हम सबको पसंद होता है. अगर आप यूरिक एसिड को कंट्रोल करना चाहते हैं तो अदरक वाली चाय को अपनी डेली रूटीन में शामिल करें. अदरक में नेचुरल एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में मदद करते हैं. दिन में दो बार अदरक वाली चाय पीने से शरीर अंदर से गर्म रहता है और यूरिक एसिड कंट्रोल रहता है. 

5. लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव करें – सिर्फ डाइट और पानी पर ध्यान देना ही काफी नहीं है. पर्याप्त नींद लेना, तनाव को कम करना और फिजिकल एक्टिविटी को नियमित रखना भी यूरिक एसिड कंट्रोल रखने में मदद करता है.कोशिश करें कि ज्यादा ऑयली और मीठे खाने से बचें, क्योंकि ये भी यूरिक एसिड बढ़ता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इन 5 सब्जियों से रिवर्स हो जाता है फैटी लिवर, जानें इन्हें खाने का सही वक्त

इन 5 सब्जियों से रिवर्स हो जाता है फैटी लिवर, जानें इन्हें खाने का सही वक्त


डायट की बात आती है, तो कुछ ऐसी सब्जियां हैं जो फैटी लिवर को सुधारने में खास भूमिका निभाती हैं. इन्हें रोजाना या नियमित डाइट में शामिल करने से लिवर के ऊपर पड़ने वाला बोझ कम होता है और सूजन भी घटती है. बस ध्यान रहे, इन सब्जियों के साथ संतुलित खान-पान, वर्कआउट और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं भी जरूरी हैं.

चुकंदर लिवर के लिए किसी सुपरफूड से कम नहीं है. इसमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और नाइट्रेट्स भरपूर मात्रा में होते हैं, जो लिवर में खून का प्रवाह बढ़ाते हैं और उसकी डिटॉक्स क्षमता को मजबूत करते हैं. यह पित्त बनाने में भी मदद करता है, जो शरीर में जमा वसा को तोड़ने और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में जरूरी है. रिसर्च बताती है कि चुकंदर लिवर कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करता है और एंजाइम एक्टिविटी को बेहतर बनाता है.

चुकंदर लिवर के लिए किसी सुपरफूड से कम नहीं है. इसमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और नाइट्रेट्स भरपूर मात्रा में होते हैं, जो लिवर में खून का प्रवाह बढ़ाते हैं और उसकी डिटॉक्स क्षमता को मजबूत करते हैं. यह पित्त बनाने में भी मदद करता है, जो शरीर में जमा वसा को तोड़ने और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में जरूरी है. रिसर्च बताती है कि चुकंदर लिवर कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करता है और एंजाइम एक्टिविटी को बेहतर बनाता है.

राजमा, चना, मसूर और छोले जैसे लेग्यूम्स पौधे आधारित प्रोटीन के साथ-साथ भरपूर फाइबर देते हैं. इनमें फैट बहुत कम होता है, इसलिए ये फैटी लिवर वाले लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प हैं. कई स्टडीज में पाया गया है कि मांस की जगह दालें लेने से लिवर में फैट कम होता है. साथ ही ये पाचन बेहतर करते हैं और ब्लड शुगर को स्थिर रखते हैं, जो फैटी लिवर के लिए बेहद ज़रूरी है.

राजमा, चना, मसूर और छोले जैसे लेग्यूम्स पौधे आधारित प्रोटीन के साथ-साथ भरपूर फाइबर देते हैं. इनमें फैट बहुत कम होता है, इसलिए ये फैटी लिवर वाले लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प हैं. कई स्टडीज में पाया गया है कि मांस की जगह दालें लेने से लिवर में फैट कम होता है. साथ ही ये पाचन बेहतर करते हैं और ब्लड शुगर को स्थिर रखते हैं, जो फैटी लिवर के लिए बेहद ज़रूरी है.

लहसुन सिर्फ खाने का स्वाद नहीं बढ़ाता, लिवर का दोस्त भी है. इसमें मौजूद सल्फर कंपाउंड लिवर में जमा होने वाली चर्बी को कम करने में मदद करते हैं और कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित रखते हैं. रिसर्च बताती है कि लहसुन लिवर में फैट जमा होने से रोकता है और उसकी प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया को तेज करता है. इसकी एंटी-इंफ्लेमेटरी खूबियां सूजन कम कर लिवर की कार्यक्षमता बढ़ाती हैं.

लहसुन सिर्फ खाने का स्वाद नहीं बढ़ाता, लिवर का दोस्त भी है. इसमें मौजूद सल्फर कंपाउंड लिवर में जमा होने वाली चर्बी को कम करने में मदद करते हैं और कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित रखते हैं. रिसर्च बताती है कि लहसुन लिवर में फैट जमा होने से रोकता है और उसकी प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया को तेज करता है. इसकी एंटी-इंफ्लेमेटरी खूबियां सूजन कम कर लिवर की कार्यक्षमता बढ़ाती हैं.

पालक, मेथी और केल जैसी हरी सब्जियां लिवर को साफ रखने में बेहद प्रभावी हैं. इनमें मौजूद क्लोरोफिल शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करता है और एंटीऑक्सीडेंट लिवर पर पड़ने वाले oxidative stress को कम करते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि नियमित रूप से पालक खाने वाले लोगों में फैटी लिवर का खतरा कम देखा गया है. ये सब्ज़ियां पित्त बनने में भी मदद करती हैं, जिससे वसा का breakdown आसान हो जाता है.

पालक, मेथी और केल जैसी हरी सब्जियां लिवर को साफ रखने में बेहद प्रभावी हैं. इनमें मौजूद क्लोरोफिल शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करता है और एंटीऑक्सीडेंट लिवर पर पड़ने वाले oxidative stress को कम करते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि नियमित रूप से पालक खाने वाले लोगों में फैटी लिवर का खतरा कम देखा गया है. ये सब्ज़ियां पित्त बनने में भी मदद करती हैं, जिससे वसा का breakdown आसान हो जाता है.

ब्रोकली, फूलगोभी, पत्तागोभी और ब्रसेल्स स्प्राउट्स जैसी सब्ज़ियां फाइबर और फाइटोकेमिकल्स से भरपूर होती हैं. ये लिवर की सफाई में मदद करती हैं और सूजन को कम करती हैं. कई रिसर्च में देखा गया है कि इन सब्ज़ियों का अधिक सेवन करने वाले लोगों में लिवर-फैट स्कोर कम पाया गया. इन सब्जियों में मौजूद इंडोल नामक कंपाउंड लिवर पर जमा होने वाली चर्बी और सूजन दोनों को कम करने में मदद करता है.

ब्रोकली, फूलगोभी, पत्तागोभी और ब्रसेल्स स्प्राउट्स जैसी सब्ज़ियां फाइबर और फाइटोकेमिकल्स से भरपूर होती हैं. ये लिवर की सफाई में मदद करती हैं और सूजन को कम करती हैं. कई रिसर्च में देखा गया है कि इन सब्ज़ियों का अधिक सेवन करने वाले लोगों में लिवर-फैट स्कोर कम पाया गया. इन सब्जियों में मौजूद इंडोल नामक कंपाउंड लिवर पर जमा होने वाली चर्बी और सूजन दोनों को कम करने में मदद करता है.

ब्रोकली या फूलगोभी को हफ्ते में कुछ बार खाने से असर दिखने लगता है. चुकंदर को सलाद, जूस या रोस्टेड रूप में ले सकते हैं. दालें, राजमा, चना और सूप में लेग्यूम्स मिलाना आसान है. लहसुन को रोज़ाना सब्जी या दाल में जोड़ें. पालक और मेथी को रोटेशन में शामिल करें, कभी सब्ज़ी, कभी सलाद और कभी स्मूदी के रूप में.

ब्रोकली या फूलगोभी को हफ्ते में कुछ बार खाने से असर दिखने लगता है. चुकंदर को सलाद, जूस या रोस्टेड रूप में ले सकते हैं. दालें, राजमा, चना और सूप में लेग्यूम्स मिलाना आसान है. लहसुन को रोज़ाना सब्जी या दाल में जोड़ें. पालक और मेथी को रोटेशन में शामिल करें, कभी सब्ज़ी, कभी सलाद और कभी स्मूदी के रूप में.

Published at : 15 Nov 2025 08:09 AM (IST)

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