महिलाओं की तरह क्या मर्दों को भी होता है पीरियड पेन, जानें इस दौरान क्या-क्या होता है?

महिलाओं की तरह क्या मर्दों को भी होता है पीरियड पेन, जानें इस दौरान क्या-क्या होता है?



Testosterone fluctuation in Men: क्या पुरुषों को महिलाओं की तरह पीरियड पेन होता है? यह सवाल सोशल मीडिया से लेकर हेल्थ फोरम तक बार-बार सामने आता है. ताजा रिसर्च और मेडिकल एक्सपर्ट के अनुसार इसका सीधा जवाब है नहीं, पुरुषों को महिलाओं जैसा पीरियड्स नहीं होता, लेकिन कुछ ऐसी शारीरिक और मानसिक स्थितियां जरूर होती हैं जिनके कारण पुरुष पीरियड जैसे लक्षण महसूस कर सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि कब पुरुषों में पीरियड्स जैसी स्थिति दिखने लगती है.

पुरुषों में क्या होता है?

Healthline की रिपोर्ट Do Men Have Periods? के अनुसार पुरुषों में यूट्रस, ओवुलेशन और पीरियड साइकिल नहीं होता. इसलिए पुरुषों को महिलाओं पीरियड दर्द नहीं हो सकता. अगर पुरुषों को दर्द, चिड़चिड़ापन या मूड महसूस होता है, तो उसका कारण कुछ और होता है. WebMD बताता है कि पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर रोज बदलता है. जब यह स्तर घटता है, तो पुरुषों को चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है. इसे Irritable Male Syndrome (IMS) कहा जाता है, जो PMS जैसे लक्षण देता है.

Mayo Clinic की रिसर्च बताती है कि स्ट्रेस बढ़ने पर कोर्टिसोल हार्मोन शरीर में बहुत बढ़ जाता है. इस कोर्टिसोल की वजह से पुरुषों में पेट में ऐंठन, सिरदर्द, नींद में कमी, थकान और मूड खराब होना जैसे लक्षण आ सकते हैं. हालांकि ये सब लक्षण महिलाओं के PMS जैसे लगते हैं, लेकिन यह असली पीरियड नहीं होता.

इससे कैसे बचा जा सकता है?

अगर बात करें कि इससे बचने के उपाय क्या हैं, तो पुरुषों में पीरियड जैसे दिखने वाले लक्षण खास तौर पर तनाव, नींद की कमी, पाचन की गड़बड़ी और काम के दबाव के कारण पैदा होते हैं, और इन्हें ठीक करने के लिए सबसे पहले स्ट्रेस कम करना जरूरी है. जब दिमाग और शरीर ज्यादा दबाव में रहते हैं तो चिड़चिड़ापन, थकान, पेट में ऐंठन और मूड में उतार-चढ़ाव जैसे लक्षण बढ़ जाते हैं. ऐसे में नींद पूरी लेना, समय पर खाना खाना, हल्का-फुल्का व्यायाम करना और दिन भर पर्याप्त पानी पीना शरीर को काफी राहत देता है. गैस, कब्ज या पेट की सूजन भी अक्सर पीरियड जैसा दर्द पैदा करती है, इसलिए पाचन को ठीक रखना बेहद जरूरी है.

शराब, सिगरेट, जंक फूड और देर रात तक जागना शरीर को और कमजोर बनाता है, इसलिए इन्हें कम करना या छोड़ देना फायदेमंद है. अगर यह लक्षण कई दिनों तक बने रहें, रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करें या बहुत ज्यादा दर्द हो, तो यह किसी अंदरूनी समस्या या हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है, ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना सबसे बेहतर होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मोटापा कम करने के लिए भारत की पहली दवा ट्रायल में सफल, जानें मार्केट में कब आएगी?

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Weight loss medicine: सन फार्मा की नई दवा यूट्रिग्लूटाइड, जिसे मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित किया जा रहा है, उसने शुरुआती क्लिनिकल स्टडी में मेनोपॉज के बाद वाली महिलाओं में महत्वपूर्ण वजन घटाने और मेटाबॉलिक सुधार दिखाए हैं. इस दवा के फेज 1a/2b ट्रायल के नतीजे इस हफ्ते अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स में हुए अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) के साइंटिफिक सेशन में पेश किए गए. यूट्रिग्लूटाइड उसी दवा समूह से है, जिसमें दुनिया भर में चर्चित मोनजारो और विगोवी आती हैं. इन दवाओं की खासियत यह रही कि ये भारत में भी तेजी से लोकप्रिय हुई हैं. ये दवाएं GLP-1 रेसेप्टर एगोनिस्ट हैं, जो लिवर के हार्मोन की तरह काम करके भूख कम करती हैं.

क्या निकला ट्रायल में?

सन फार्मा के मुताबिक, वजन घटाने के अलावा इस दवा ने सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर, लिवर फैट, और इंसुलिन सेंसिटिविटी से जुड़े कई बायोमार्कर में सुधार दिखाया. इसके साथ ही सीरम यूरिक एसिड भी कम हुआ, जिससे यह पता चलता है कि दवा मेटाबॉलिक समस्याओं के कई पहलुओं पर असर डाल सकती है. सन फार्मा के चेयरमैन दिलीप सांघवी ने कहा कि “मोटापा और मेटाबॉलिक लिवर डिजीज तेजी से बढ़ रही हैं, खासकर मेनोपॉज़ के बाद की महिलाओं में. इस शुरुआती स्टडी के नतीजे उत्साहजनक हैं और हमें इन बीमारियों से निपटने के लिए बेहतर इलाज विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाते हैं.”

बढ़ रही दिक्कत

भारत का एंटी-ओबेसिटी दवा का बाजार फिलहाल 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये का है, जो 2030 तक बढ़कर 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. इसके पीछे मोटापा और लाइफस्टाइल डिजीज के बढ़ते दिक्कत को देखकर यह अनुमान लगाया गया.

स्टडी के नतीजे उम्मीद जगाने वाले

इस ट्रायल में 52 से 69 साल की मेनोपॉज के बाद वाली महिलाएं शामिल थीं, जिन्हें मोटापे की समस्या थी. 14 हफ्ते तक दवा लेने के बाद यूट्रिग्लूटाइड लेने वालों का औसतन 8 प्रतिशत वजन घटा और यह 17वें हफ्ते तक बना रहा. प्लेसबो लेने वालों का वजन सिर्फ 2.1 प्रतिशत और 1.2 प्रतिशत घटा.

14वें हफ्ते तक क्या देखने को मिला?

  • 76 प्रतिशत महिलाओं का वजन 5 प्रतिशत से ज्यादा घटा.
  • 25 प्रतिशत महिलाओं का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हुआ.
  • शुरुआत में औसत BMI 43 था, जो 14 और 17 हफ्ते तक घटकर 39.7 से 39.8 हो गया.

इस दौरान सबसे खास बात यह रही कि लिवर फैट में 28.6 प्रतिशत की कमी, जबकि प्लेसबो समूह में सिर्फ 2.7 प्रतिशत गिरावट देखी गई. ये नतीजे बताते हैं कि यह दवा मोटापे के साथ-साथ MASLD मेटाबॉलिक लिवर डिजीज जैसी समस्याओं में भी मददगार हो सकती है.

साइड इफेक्ट

अगर इसके साइड इफेक्ट की बात करें, तो भूख कम लगना, जल्दी पेट भर जाना, मतली, अपच और उलटी शामिल था. जो GLP-1 दवाओं में सामान्य माने जाते हैं. ट्रायल से जुड़े डॉ. रोहित लूंबा (यूसी सैन डिएगो) ने कहा कि “यूट्रिग्लूटाइड ने मोटापे और MASLD वाली महिलाओं में लिवर फैट और कई मेटाबॉलिक पैरामीटर में बेहतरीन सुधार दिखाया है, जो बेहद उत्साहजनक है.” ट्रायल के बाद अगर सब कुछ मंजूरी मिल जाती है, तो यह दवा बाजार में जल्द इंट्र कर सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल्ली के प्रदूषण में आंखें हो रही खराब? बार-बार हो रही चुभन और आ रहा पानी तो अपनाएं ये नुस्खे

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अब कॉफी में हल्दी का तड़का, जानें टर्मरिक कॉफी को लेकर एक्सपर्ट्स के बताए 7 जबरदस्त फायदे

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हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन शरीर में सूजन को कम करने में मदद करता है. जबकि कॉफी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर को डिटॉक्स करने का काम करते हैं. दोनों के मिक्सर से बनने वाली टर्मरिक कॉफी शरीर में सूजन और थकान को घटाती है. वहीं इसके नियमित सेवन से मांसपेशियों के दर्द और जोड़ों की जकड़न से भी राहत मिलती है.

करक्यूमिन के एंटीऑक्सीडेंट गुण हार्ट को कई बीमारियों से बचाते हैं. यह शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल रखता है. रिसर्च में सामने आया है कि हल्दी का नियमित सेवन धमनियों में प्लाक जमने से रोकता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा भी घटता है.

करक्यूमिन के एंटीऑक्सीडेंट गुण हार्ट को कई बीमारियों से बचाते हैं. यह शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल रखता है. रिसर्च में सामने आया है कि हल्दी का नियमित सेवन धमनियों में प्लाक जमने से रोकता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा भी घटता है.

अगर आप फैट कम करने की कोशिश में है तो टर्मरिक कॉफी आपकी हेल्दी डाइट में शामिल की जा सकती है. हल्दी शरीर के मेटाबॉलिज्म को एक्टिव करती है और फैट ब्रेकडाउन को तेज करती है. वहीं कॉफी की कैफीन एनर्जी लेवल बढ़ाकर कैलोरी बर्निंग को आसान बनाती है. ऐसे में सुबह की शुरुआत इस गोल्डन कॉफी से करने पर धीरे-धीरे वजन कम होने में मदद मिलती है.

अगर आप फैट कम करने की कोशिश में है तो टर्मरिक कॉफी आपकी हेल्दी डाइट में शामिल की जा सकती है. हल्दी शरीर के मेटाबॉलिज्म को एक्टिव करती है और फैट ब्रेकडाउन को तेज करती है. वहीं कॉफी की कैफीन एनर्जी लेवल बढ़ाकर कैलोरी बर्निंग को आसान बनाती है. ऐसे में सुबह की शुरुआत इस गोल्डन कॉफी से करने पर धीरे-धीरे वजन कम होने में मदद मिलती है.

कॉफी में मौजूद कैफीन मानसिक सतर्कता और एकाग्रता को बढ़ाती है. जबकि हल्दी का करक्यूमिन दिमाग की कोशिकाओं को डैमेज होने से बचाता है. इन दोनों का मेल ब्रेन फंक्शन को बेहतर करता है और अल्जाइमर या पार्किंसन जैसी बीमारियों से बचाव में मददगार हो सकता है.

कॉफी में मौजूद कैफीन मानसिक सतर्कता और एकाग्रता को बढ़ाती है. जबकि हल्दी का करक्यूमिन दिमाग की कोशिकाओं को डैमेज होने से बचाता है. इन दोनों का मेल ब्रेन फंक्शन को बेहतर करता है और अल्जाइमर या पार्किंसन जैसी बीमारियों से बचाव में मददगार हो सकता है.

हल्दी का सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जबकि कॉफी में मौजूद क्लोरोजेनिक एसिड और कैफेस्टोल जैसे तत्व इम्यूनिटी को सपोर्ट करते हैं. टर्मरिक कॉफी में दोनों के गुण मिलकर शरीर को इंफेक्शन से लड़ने की क्षमता देते हैं.

हल्दी का सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जबकि कॉफी में मौजूद क्लोरोजेनिक एसिड और कैफेस्टोल जैसे तत्व इम्यूनिटी को सपोर्ट करते हैं. टर्मरिक कॉफी में दोनों के गुण मिलकर शरीर को इंफेक्शन से लड़ने की क्षमता देते हैं.

हल्दी और कॉफी दोनों में एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है जो फ्री रेडिकल से लड़ते हैं. यही फ्री रेडिकल स्किन, एजिंग का मुख्य कारण माने जाते हैं. टर्मरिक कॉफी का नियमित सेवन स्किन की नेचुरल चमक को भी बढ़ाता है और झुर्रियों को कम करता है.

हल्दी और कॉफी दोनों में एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है जो फ्री रेडिकल से लड़ते हैं. यही फ्री रेडिकल स्किन, एजिंग का मुख्य कारण माने जाते हैं. टर्मरिक कॉफी का नियमित सेवन स्किन की नेचुरल चमक को भी बढ़ाता है और झुर्रियों को कम करता है.

Published at : 14 Nov 2025 01:01 PM (IST)

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मीठा नहीं खाते फिर भी बढ़ रहा शुगर लेवल, जानें किन आदतों से बढ़ता है डायबिटीज का खतरा?

मीठा नहीं खाते फिर भी बढ़ रहा शुगर लेवल, जानें किन आदतों से बढ़ता है डायबिटीज का खतरा?



Diabetes Treatment: हर साल 14 नवंबर को वर्ल्ड डायबिजीट डे मनाया जाता है, जिसको उद्देश्य लोगों को इसके बारे में जागरूक करना होता है. शुगर यानी ब्लड शुगर बढ़ना सिर्फ मिठाई खाने से नहीं होता. कई ऐसे कारण हैं जिनका मिठाई या मीठे से कोई लेना-देना नहीं होता. लोग सवाल पूछते रहते हैं कि “मैं मिठाई नहीं खाता फिर भी मेरी शुगर क्यों बढ़ जाती है?” Centers for Disease Control and Prevention के अनुसार, इसके बढ़ने के अलग-अलग कारण होते हैं, जिसमें हमारी लाइफस्टाइल सबसे ज्यादा जिम्मेदार होती है. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप मीठा नहीं खाते हैं, तो उसके बाद भी आखिर क्यों ब्लड शुगर बढ़ जाता है.

signos के अनुसार, ब्लड शुगर बढ़ने के 8 बड़े कारण होते हैं, जिनमें शुगर बिना मिठाई खाने के भी बढ़ता रहता है. इनमें-

सुबह की शुगर बढ़ना

सुबह 4 से 8 बजे के बीच शरीर कुछ हार्मोन बनाता है, जैसे कॉर्टिसोल और ग्रोथ हार्मोन. ये आपके लीवर को ज्यादा ग्लूकोज बनाने को कहते हैं, जिससे आप उठ सकें. अगर आपको डायबिटीज है, तो आपका शरीर उतनी इंसुलिन नहीं बना पाता, इसलिए सुबह शुगर बढ़ जाती है.

रात की कमी हुई शुगर का असर

अगर रात में शुगर बहुत कम हो जाए, तो शरीर इसकी भरपाई के लिए सुबह ज्यादा ग्लूकोज बना देता है. इस वजह से सुबह उठते ही शुगर बढ़ी मिलती है. ये ज्यादातर इंसुलिन लेने वालों में होता है.

सर्दी, जुकाम या फ्लू

जब आपको वायरल या सर्दी-जुकाम होता है, तो शरीर स्ट्रेस हार्मोन छोड़ता है, जो ब्लड शुगर बढ़ा देते हैं.

तनाव

ज्यादा टेंशन, चिंता, कम नींद, ज्यादा गर्मी, ठंड या सनबर्न ये सब शरीर को तनाव में डालते हैं. तनाव के कारण कॉर्टिसोल बढ़ता है और इससे ब्लड शुगर भी बढ़ जाता है.

शरीर में पानी की कमी

पानी कम होने पर खून गाढ़ा हो जाता है. ग्लूकोज ज्यादा नहीं होता, लेकिन पानी कम होने से ब्लड शुगर का लेवल बढ़ा हुआ दिखता है. ऊपर से ज्यादा शुगर पेशाब बढ़ाती है, जिससे और डिहाइड्रेशन होता है.

पीरियड्स और मेनोपॉज

इन दिनों में एस्ट्रोजन कम होता है, जिससे शरीर इंसुलिन पर सही प्रतिक्रिया नहीं देता. इससे ब्लड शुगर बढ़ सकती है.

स्टेरॉयड वाली दवाएं

सूजन या किसी बीमारी में दी जाने वाली स्टेरॉयड दवाएं जैसे प्रेडनिसोन लीवर में ग्लूकोज बढ़ा देती हैं और इंसुलिन की क्षमता कम कर देती हैं—इससे शुगर बढ़ती है.

दवा सही समय पर न लेना

अगर डायबिटीज की दवा या इंसुलिन समय पर न ली जाए, या कम मात्रा में ली जाए, तो शुगर अपने-आप बढ़ जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिहार चुनाव के नतीजों से लगा सदमा तो न हो परेशान, ये 8 टिप्स ठीक करेंगे दिमागी सेहत

बिहार चुनाव के नतीजों से लगा सदमा तो न हो परेशान, ये 8 टिप्स ठीक करेंगे दिमागी सेहत



Bihar election Results: आज यानी 14 नवंबर को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की जयंती भी है और इसी दिन यह भी तय होने वाला है कि देश में सबसे बड़ी आबादी के मामले में आने वाले राज्य बिहार को अगले पांच साल तक कौन संभालेगा. एनडीए और महागठबंधन इस समय मैदान में हैं, एक तरह जहां एग्जिट पोल से लेकर बाकी सट्टा बाजार तक नीतीश के फिर से सीएम बनने का दावा कर रहे हैं, तो विपक्ष को भी उम्मीद है कि शायद इस बार तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन कुछ कमाल कर जाए. फिलहाल कौन बनेगा बिहार का अगला सीएम, किसके सर पर सजेगा सेहरा और किसका लटके चेहरा ये शाम तक पता चल जाएगा. लेकिन चलिए आपको हम बताते हैं कि अगर आपको चुनाव के नतीजों से लगा सदमा तो न हों परेशान, वो कौन से 8 टिप्स हैं, जो आपको मेंटली फिट रखने में मदद करेंगे.

सोशल मीडिया से दूरी

चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद न्यूज चैनल और सोशल मीडिया लगातार सूचनाएं, बहसें और राय दिखाते रहते हैं. इससे दिमाग पर और बोझ पड़ता है. अगर मन भारी लग रहा है, तो कुछ घंटों के लिए टीवी, ट्विटर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप से दूरी बना लें. यह दिमाग को ब्रेक देने का सबसे आसान तरीका है.

अपनी भावनाओं को स्वीकार करें

अगर नतीजों से निराशा हुई है, तो यह मानना जरूरी है कि ऐसा महसूस करना बिल्कुल सामान्य है. खुद को दोष देने की जरूरत नहीं है. अपनी भावना को पहचानें और समझें कि यह अस्थायी है. साइकोलॉजिस्ट भी कहते हैं कि भावनाओं को दबाने से तनाव बढ़ता है, जबकि उन्हें स्वीकार करने से राहत मिलती है.

किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें

अगर सिर भारी लग रहा है या दिमाग बेचैन है, तो अपनी बात किसी ऐसे दोस्त, परिवार के सदस्य या सहकर्मी से शेयर करें, जो आपको समझता हो. बात करने से दिमाग हल्का होता है और आप स्थिति को नए नजरिये से देख पाते हैं.

आराम और नींद को प्राथमिकता दें

चुनाव के दिनों में देर रात तक टीवी देखना, सोशल मीडिया चेक करना और लगातार चर्चा करना नींद को प्रभावित कर देता है. अच्छी नींद दिमाग के लिए दवा की तरह काम करती है. कोशिश करें कि 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें. इससे मानसिक थकान में काफी कमी आती है.

हल्की फुल्की एक्सरसाइज करें

थोड़ी देर टहलना, स्ट्रेचिंग या योग करने से दिमाग में खुश करने वाले हार्मोन रिलीज होते हैं. इससे तनाव कम होता है और मूड बेहतर होता है. यह उन लोगों के लिए भी बेहद फायदेमंद है जो राजनीतिक माहौल से मानसिक रूप से परेशान महसूस कर रहे हैं.

अपनी शेड्यूल सामान्य रखें

नतीजों के बाद कई लोग अपना पूरा दिन मोबाइल या टीवी पर लगाए रहते हैं. इससे दिमाग पर दबाव बढ़ता है. बेहतर होगा कि आप अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में वापस लौटें. चाहे वह ऑफिस हो, पढ़ाई हो या घरेलू काम. नियमित रूटीन मानसिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है.

असहमतियों में संयम रखें

चुनाव के बाद अक्सर लोगों के बीच बहस बढ़ जाती है. बार-बार विवाद में पड़ने से तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ता है. कोशिश करें कि राजनैतिक मतभेदों को निजी रिश्तों पर असर न डालें. शांत रहें और जहां जरूरत हो, चर्चा को सीमित करें.

खुद को सकारात्मक गतिविधियों में लगाएं

म्यूजिक सुनना, फिल्म देखना, किताब पढ़ना या कोई कला सीखना, ये सब दिमाग को तुरंत हल्का कर देते हैं. ऐसी गतिविधियां तनाव कम करती हैं और मूड बेहतर बनाती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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