पेट के कैंसर से बचना है तो बदलें ये डेली हैबिट्स, डॉक्टरों ने दी सलाह

पेट के कैंसर से बचना है तो बदलें ये डेली हैबिट्स, डॉक्टरों ने दी सलाह



Stomach Cancer Symptoms: पेट का कैंसर आज पूरी दुनिया में एक गंभीर हेल्थ समस्या बन चुका है. हर साल लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित होते हैं. हालांकि जेनेटिक कारण और आसपास का माहौल फैक्टर भी इसमें भूमिका निभाते हैं, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक खानपान और लाइफस्टाइल पेट की सेहत और कैंसर के खतरे पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं. अगर हम अपने खाने-पीने और आदतों में कुछ छोटे-छोटे बदलाव करें, तो डाइजेशन को मजबूत किया जा सकता है, इम्युनिटी बढ़ाई जा सकती है और लंबे समय में कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है.

AIIMS, Harvard और Stanford से ट्रेंड गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में स्टमक कैंसर का खतरा कम करने के लिए 4 आसान और कारगर तरीके बताए हैं. उनकी सलाह में शामिल हैं, सही डाइट, गट-फ्रेंडली आदतें, प्रोसेस्ड मीट से दूरी और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जैसी बैक्टीरियल इंफेक्शन की जांच. ये उपाय न सिर्फ पेट की सेहत को बेहतर बनाते हैं, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत और कैंसर से लड़ने में सक्षम भी बनाते हैं.

डाइट में शामिल करें क्रूसीफेरस सब्जियां

ब्रोकली, पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रसेल्स स्प्राउट्स और केल जैसी क्रूसीफेरस सब्जियां कैंसर से बचाव में बेहद फायदेमंद मानी जाती हैं. इनमें पाया जाने वाला सल्फोराफेन नामक प्राकृतिक तत्व शरीर को डिटॉक्स करता है, लीवर की कार्यक्षमता बढ़ाता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है, जो कैंसर का कारण बन सकता है. डॉ. सेठी के मुताबिक, अगर आप इन सब्जियों को अपने भोजन में नियमित रूप से शामिल करते हैं. चाहे वो उबली हों, भुनी हों या हल्की सॉते की गई हों, तो इससे पाचन, इम्युनिटी और पेट की सेहत तीनों बेहतर होती हैं. इनमें मौजूद विटामिन C, विटामिन K और फोलेट शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं.

खाने में लहसुन को बनाएं जरूरी हिस्सा

लहसुन को हमेशा से सुपरफूड माना गया है. इसमें पाया जाने वाला एलिसिन तत्व एंटी-कैंसर और एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है. डॉ. सेठी के अनुसार, लहसुन पेट की अंदरूनी परत को बचाता है, हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है और H. pylori जैसे इंफेक्शन से बचाव में मदद करता है. इसे रोजमर्रा के खाने में आसानी से जोड़ा जा सकता है, जैसे सूप, सब्जियों, स्टर-फ्राई या सलाद में. कच्चे लहसुन में एलिसिन की मात्रा सबसे ज्यादा होती है, लेकिन हल्का पकाकर खाने से भी इसका फायदा बना रहता है. नियमित सेवन से न केवल खाना स्वादिष्ट बनता है, बल्कि पेट को प्राकृतिक सुरक्षा भी मिलती है.

प्रोसेस्ड मीट से दूरी बनाएं

बेकन, सॉसेज, हॉट डॉग और डेली मीट्स जैसी प्रोसेस्ड मीट में नाइट्रेट्स और नाइट्राइट्स नामक केमिकल्स पाए जाते हैं, जो पेट के कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं. इनका ज्यादा सेवन पाचन तंत्र में सूजन बढ़ाता है और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है. डॉ. सेठी के अनुसार, इनकी जगह चिकन, मछली, दालें या प्लांट-बेस्ड प्रोटीन शामिल करें. ताजा मांस घर पर पकाएं और ओवरकुक्ड या जली हुई मीट से बचें, क्योंकि ये कैंसर पैदा करने वाले यौगिक छोड़ती हैं.

हेलिकोबैक्टर पाइलोरी की जांच करवाएं

H. pylori एक ऐसा बैक्टीरिया है जो पेट की अंदरूनी परत में इंफेक्शन पैदा करता है और गैस्ट्राइटिस, अल्सर और पेट के कैंसर का बड़ा कारण बन सकता है. अगर आपको बार-बार पेट में दर्द, गैस, बदहजमी, मितली या जलन की शिकायत रहती है, तो यह संकेत हो सकता है कि पेट में H. pylori इंफेक्शन है. डॉ. सेठी सलाह देते हैं कि समय रहते इसका टेस्ट करवाएं और जरूरत हो तो डॉक्टर की सलाह से इलाज लें. एंटीबायोटिक्स और एसिड-सप्रेसिंग मेडिकेशन से इस इंफेक्शन का इलाज संभव है. साफ-सफाई रखना, गंदा पानी और बाहर का अधपका खाना न खाना भी जरूरी है.

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लंबे समय तक दवा खाने से घट सकते हैं जरूरी विटामिन, डॉक्टर ने किया खुलासा

लंबे समय तक दवा खाने से घट सकते हैं जरूरी विटामिन, डॉक्टर ने किया खुलासा



Side Effects of Daily Medicines: दवाइयां इलाज के लिए होती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल धीरे-धीरे शरीर के ज़रूरी न्यूट्रिशन को कम कर देता है? यह कमी अंदर ही अंदर बढ़ती रहती है और बाद में थकान, इम्युनिटी की कमजोरी, हड्डियों का कमजोर होना और कई ऐसी दिक्कतें पैदा कर सकती है, जिन्हें लोग अक्सर किसी और वजह से जोड़ लेते हैं. डॉ. गरिमा गोयल ने इसको लेकर इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट किया था, जिसमें वे बताती हैं कि डायटीशियन और न्यूट्रिशनिस्ट एस्पिरिन, बर्थ कंट्रोल पिल्स, एंटासिड, मेटफॉर्मिन और कुछ एंटीबायोटिक्स जैसी दवाएं शरीर में विटामिन और मिनरल्स के एब्जॉर्प्शन में रुकावट डालती हैं. चलिए आपको इनके बारे में विस्तार से बताते हैं कि कैसे ये आपके शरीर पर असर करती हैं.

एस्पिरिन

एस्पिरिन शरीर में विटामिन C के एब्जॉर्प्शन को घटा देती है, जिससे इसकी मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है. लंबे समय तक एस्पिरिन लेने से शरीर में आयरन स्टोर भी घट सकता है. एक बड़ी स्टडी ASPREE ट्रायल के मुताबिक, रोज़ 100mg लो-डोज एस्पिरिन लेने वाले 65 साल से ऊपर के लोगों में एनीमिया का खतरा करीब 20 प्रतिशत बढ़ जाता है.

टायलनॉल, एसिटामिनोफेन

ग्लूटाथियोन शरीर का मेन एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो सेल्स को डैमेज से बचाता है. टायलनॉल जैसी दवाएं इसका स्तर घटा देती हैं, जिससे लिवर को नुकसान का खतरा बढ़ जाता है. कम ग्लूटाथियोन लेवल उम्र बढ़ने, डायबिटीज, इंफेक्शन और इम्यून सिस्टम पर असर डालता है.

बर्थ कंट्रोल पिल्स

बर्थ कंट्रोल पिल्स का लगातार सेवन शरीर में कई विटामिन्स और मिनरल्स को घटा देता है, जैसे फॉलिक एसिड, B2, B6, B12, विटामिन C, विटामिन E, मैग्नीशियम, सेलेनियम और जिंक. WHO की रिपोर्ट के अनुसार, यह कमी इतनी गंभीर हो सकती है कि कई महिलाओं को सप्लीमेंट्स लेने पड़ते हैं. इसका कारण पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इन पिल्स में मौजूद एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन शरीर में न्यूट्रिशन के प्रोसेस को प्रभावित करते हैं.

मेटफॉर्मिन

मेटफॉर्मिन, जो शुगर के मरीजों को दी जाती है, इंटेस्टाइन में विटामिन B12 के एब्जॉर्प्शन को कम कर देती है. लंबे समय तक इसके इस्तेमाल से शरीर में B12 की कमी हो सकती है, जिससे नर्व डैमेज का खतरा बढ़ जाता है.

एंटासिड

एंटासिड पेट में बनने वाले एसिड को कम करते हैं, लेकिन यही एसिड खाने से विटामिन B12 रिलीज करने में मदद करता है. लंबे समय तक एंटासिड लेने से शरीर में कैल्शियम, पोटैशियम और जिंक की भी कमी हो सकती है, जिससे हड्डियां कमजोर और मसल्स ढीली पड़ सकती हैं.

स्टैटिन

स्टैटिन दवाएं कोलेस्ट्रॉल को कम करती हैं और दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होती हैं, लेकिन ये शरीर में Coenzyme Q10 को घटा देती हैं, जो मसल्स की एनर्जी प्रोडक्शन के लिए जरूरी है. इसकी कमी से मांसपेशियों में दर्द, कमजोरी और सूजन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.

एंटीबायोटिक्स

एंटीबायोटिक्स हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करते हैं, लेकिन इसके साथ ही अच्छे गट बैक्टीरिया को भी नुकसान पहुंचाते हैं. इससे गट बैलेंस बिगड़ जाता है, जो मोटापा, एलर्जी, पाचन की दिक्कत और इम्युनिटी पर असर डालता है.

स्टेरॉयड

स्टेरॉयड शरीर के मिनरल बैलेंस को कई तरीकों से गड़बड़ करते हैं. ये कैल्शियम एब्जॉर्प्शन को घटाते हैं, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और विटामिन D एक्टिविटी भी कम हो जाती है. इससे मैग्नीशियम और पोटैशियम लेवल घट जाता है, जिससे शरीर में कमजोरी, थकान और ऐंठन जैसी दिक्कतें आती हैं. लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने से B Vitamins का असर भी घट जाता है, जिससे एनर्जी और नर्व फंक्शन पर असर पड़ता है.

अगर आप कोई दवा लंबे समय से ले रहे हैं, तो अपने डॉक्टर या डायटीशियन से पूछें कि कौन-से विटामिन या मिनरल सप्लीमेंट्स साथ में लेने चाहिए. छोटी-छोटी सावधानियां आपको थकान, एनीमिया, बोन लॉस और हॉर्मोनल इंबैलेंस जैसी कई दिक्कतों से बचा सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बार-बार नींद टूटने की समस्या से हैं परेशान, दोबारा सोने के लिए अपनाएं ये 8 आसान उपाय

बार-बार नींद टूटने की समस्या से हैं परेशान, दोबारा सोने के लिए अपनाएं ये 8 आसान उपाय


एक्सपर्ट्स बताते हैं की फोन, टीवी या बल्ब की नीली रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन को कम करती है. इसलिए सोने से पहले कमरे की सभी तेज लाइट बंद कर दें और मोबाइल की स्क्रीन से दूर रहे. इससे आपकी नींद बार-बार नहीं टूटेगी.

इसके अलावा एक्सपर्ट बताते हैं कि नींद की अच्छी आदत के लिए कंसिस्टेंसी जरूरी होती है. ऐसे में हर दिन अगर आप एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें चाहे वीकेंड ही क्यों न हो तो आपकी बार-बार नींद टूटने की समस्याएं खत्म हो सकती है.

इसके अलावा एक्सपर्ट बताते हैं कि नींद की अच्छी आदत के लिए कंसिस्टेंसी जरूरी होती है. ऐसे में हर दिन अगर आप एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें चाहे वीकेंड ही क्यों न हो तो आपकी बार-बार नींद टूटने की समस्याएं खत्म हो सकती है.

इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं की रात के समय चेरी खाने या चेरी जूस पीने से नींद बेहतर होती है. क्योंकि इनमें मेलाटोनिन होता है. वहीं बादाम और केले भी नींद सुधारने में मदद करते हैं. इसके साथ ही एक्सपर्ट्स बताते हैं कि शाम के समय भारी या मसालेदार खाना खाने से बचें. जिससे आपको नींद टूटने की समस्या नहीं होगी.

इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं की रात के समय चेरी खाने या चेरी जूस पीने से नींद बेहतर होती है. क्योंकि इनमें मेलाटोनिन होता है. वहीं बादाम और केले भी नींद सुधारने में मदद करते हैं. इसके साथ ही एक्सपर्ट्स बताते हैं कि शाम के समय भारी या मसालेदार खाना खाने से बचें. जिससे आपको नींद टूटने की समस्या नहीं होगी.

इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि वाईफाई राउटर से भी दूरी बना कर रखें. दरअसल वाईफाई राउटर या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे नींद के सर्केडियन रिदम को प्रभावित कर सकती है.

इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि वाईफाई राउटर से भी दूरी बना कर रखें. दरअसल वाईफाई राउटर या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे नींद के सर्केडियन रिदम को प्रभावित कर सकती है.

एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर आपकी नींद बार-बार टूटती है तो आप मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें. मेडिटेशन से दिमाग शांत होता है और स्ट्रेस कम होता है, जिससे शरीर रिलैक्स होकर नींद में चला जाता है.

एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर आपकी नींद बार-बार टूटती है तो आप मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें. मेडिटेशन से दिमाग शांत होता है और स्ट्रेस कम होता है, जिससे शरीर रिलैक्स होकर नींद में चला जाता है.

वहीं नींद की कमी से कॉर्टिसोल और ग्रोथ हार्मोन जैसे हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं जो ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं. इसलिए एक्सपर्ट्स संतुलित डाइट अपने की सलाह देते हैं.

वहीं नींद की कमी से कॉर्टिसोल और ग्रोथ हार्मोन जैसे हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं जो ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं. इसलिए एक्सपर्ट्स संतुलित डाइट अपने की सलाह देते हैं.

सोने के लिए सही तापमान करीब 18 डिग्री सेल्सियस होता है. इसके अलावा एक्सपर्ट्स के अनुसार पैरों में मोजे पहनने से शरीर का तापमान कंट्रोल में रहता है और मेलाटोनिन रिलीज होकर नींद लाने में मदद करता है.

सोने के लिए सही तापमान करीब 18 डिग्री सेल्सियस होता है. इसके अलावा एक्सपर्ट्स के अनुसार पैरों में मोजे पहनने से शरीर का तापमान कंट्रोल में रहता है और मेलाटोनिन रिलीज होकर नींद लाने में मदद करता है.

इसके अलावा अगर तनाव ज्यादा है तो इसका भी असर नींद पर पड़ सकता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स बताते हैं कि रोजाना डिस्ट्रेसिंग एक्टिविटी करें जैसे ब्रीदिंग, हल्की एक्सरसाइज या जर्नलिंग करें.

इसके अलावा अगर तनाव ज्यादा है तो इसका भी असर नींद पर पड़ सकता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स बताते हैं कि रोजाना डिस्ट्रेसिंग एक्टिविटी करें जैसे ब्रीदिंग, हल्की एक्सरसाइज या जर्नलिंग करें.

Published at : 08 Nov 2025 07:58 PM (IST)

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किन-किन बीमारियों का पता बताता है CRP Test, किस उम्र में इसे कराना जरूरी?

किन-किन बीमारियों का पता बताता है CRP Test, किस उम्र में इसे कराना जरूरी?



When to get CRP blood test: जब शरीर में कोई इंफेक्शन या सूजन होती है, तो शरीर खुद उसे पहचानने और लड़ने की कोशिश करता है. इसी प्रक्रिया में लीवर एक स्पेशल प्रोटीन बनाता है जिसे सी-रिएक्टिव प्रोटीन या सीआरपी कहा जाता है. इस प्रोटीन का स्तर जब बढ़ता है, तो यह संकेत देता है कि शरीर में कहीं न कहीं सूजन या इंफेक्शन मौजूद है. यही कारण है कि डॉक्टर अक्सर मरीजों को सीआरपी टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. यह एक सामान्य ब्लड टेस्ट है, लेकिन इसके नतीजे कई गंभीर बीमारियों की ओर इशारा कर सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह टेस्ट कब करवाया जाता है और किस उम्र में इसको करवाना सही है.

सीआरपी टेस्ट क्या है?

अब आते हैं कि इसका टेस्ट क्यों करवाया जाता है. सीआरपी टेस्ट खून में मौजूद इस प्रोटीन की मात्रा मापता है. मेयो क्लिनिक के अनुसार, जब शरीर में इंफेक्शन या चोट होती है, तो लीवर तुरंत सीआरपी का स्तर बढ़ा देता है. सामान्य रूप से खून में इसकी मात्रा बहुत कम होती है, लेकिन अगर यह स्तर बढ़ा हुआ मिले, तो यह किसी प्रकार की इंफ्लेमेशन या इंफेक्शन का संकेत हो सकता है.

किन-किन बीमारियों का पता बताता है सीआरपी टेस्ट?

जब शरीर में कोई गंभीर इंफेक्शन होता है, जैसे सेप्सिस, तो सीआरपी स्तर तेजी से बढ़ता है. क्लीवलैंड क्लिनिक की रिपोर्ट बताती है कि यह टेस्ट ऐसे मामलों में सूजन की तीव्रता का पता लगाने में मदद करता है. इसके अलावा ऑटोइम्यून बीमारियां जैसे कि रूमेटॉइड आर्थराइटिस और ल्यूपस में शरीर अपनी ही सेल्स पर हमला करता है. इन स्थितियों में भी सीआरपी का स्तर बढ़ा हुआ मिलता है, जिससे बीमारी की सक्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है. आंतों की सूजन संबंधी बीमारियों में भी सीआरपी बढ़ सकता है. कुछ ऐसे टेस्ट होते हैं, जिसे एचएस-सीआरपी कहते हैं, वह हार्ट की सेहत का आकलन करने में काम आता है. अगर इसका स्तर लगातार बढ़ा हुआ हो, तो यह हार्ट की ब्लड वेसेल्स में सूजन और भविष्य में हार्ट अटैक के जोखिम का संकेत हो सकता है.

किस उम्र में कराना चाहिए सीआरपी टेस्ट?

सामान्य रूप से हर व्यक्ति को यह टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर बार-बार इंफेक्शन, लगातार बुखार, जोड़ों में दर्द, थकान या किसी गंभीर बीमारी के लक्षण दिख रहे हों, तो डॉक्टर इसे सुझा सकते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, हृदय रोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए 30 से 40 साल की उम्र के बाद एचएस-सीआरपी टेस्ट समय-समय पर कराना फायदेमंद हो सकता है, खासकर यदि परिवार में हार्ट रोग की कोई हिस्ट्री हो.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चॉकलेट ज्यादा नुकसान करती है या बिस्कुट, जान लें सेहत के लिए कौन ज्यादा खतरनाक?

चॉकलेट ज्यादा नुकसान करती है या बिस्कुट, जान लें सेहत के लिए कौन ज्यादा खतरनाक?



इंसान के लिए आजकल लाइफस्टाइल पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है. लोग पहले घर के खानों पर ज्यादा फोकस करते थे और बाहर की चीजों पर कम खाते-पीते थे. लेकिन आजकल ऐसा दौर आ चुका है कि लोग घर पर बनी चीजों को कम पसंद कर रहे हैं, बाहर के चॉकलेट, बिस्कुट को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. हालांकि ये हमारी सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित होते हैं. कई लोग मानते हैं कि चॉकलेट से मोटापा और शुगर बढ़ती है, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि बिस्कुट में छिपे फैट और रिफाइन्ड आटे से ज्यादा खतरा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि बच्चों से लेक बड़ों तक जिस चॉकलेट और बिस्कुट को बड़ी चाव से खाते हैं, दरअसल वह हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है और इनमें से कौन सा हमारी सेहत के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है. 

चॉकलेट कितनी खतरनाक?

 बिस्कुट या फिर चॉकलेट. चॉकलेट पूरी तरह खराब नहीं है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की चॉकलेट खाते हैं. Medical News Today की रिपोर्ट के अनुसार, डार्क चॉकलेट में पाए जाने वाले फ्लैवोनॉल्स जैसे एंटीऑक्सिडेंट हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं. कुछ स्टडीज में यह भी पाया गया है कि सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से ब्लड प्रेशर और हार्ट के रोगों का खतरा कम हो सकते हैं. हालांकि, यह फायदा सिर्फ हाई कोको वाली डार्क चॉकलेट में पाए जाते हैं. बाजार में मिलने वाली मिल्क चॉकलेट या व्हाइट चॉकलेट में कोको की मात्रा बहुत कम और चीनी व फैट्स की मात्रा अधिक होती है.  मेडिकल रिपोर्ट्स में बताया जाता है कि ज्यादा शुगर और फैट वाली चॉकलेट के अधिक सेवन से मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और दांतों की समस्याएं हो सकती हैं.

बिस्कुट सेहत के लिए कितना खतरनाक?

अब आते हैं कि बिस्कुट सेहत के लिए कितना खतरनाक होता है. बिस्कुट एक आसान स्नैक है, जो लगभग हर घर में खाया जाता है. लेकिन इसकी वास्तविकता थोड़ी अलग है। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में बिकने वाले ज्यादातर बिस्कुट रिफाइन्ड आटे , हाइड्रोजेनेटेड ऑयल और अधिक चीनी से बने होते हैं.  ये खाली कैलोरी  प्रदान करते हैं, यानी ऊर्जा तो देते हैं लेकिन विटामिन, फाइबर और मिनरल्स जैसे पोषक तत्वों की कमी रहती है. Ultrahuman Blog की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिस्कुट का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी अधिक होता है, जिससे खून में शुगर की मात्रा तेजी से बढ़ जाती है और जल्द भूख लगने लगती है. बार-बार ऐसे स्नैक्स लेने से न केवल वजन बढ़ता है बल्कि इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल असंतुलन जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं. 

कौन सबसे ज्यादा खतरनाक?

अब हम इस बात पर आते हैं कि इनमें से कौन कितना ज्यादा खतरनाक है. अगर तुलना की जाए तो सामान्य परिस्थितियों में बिस्कुट चॉकलेट से ज्यादा नुकसानदायक माने जा सकते हैं. इसके पीछे कारण भी हैं, जैसे कि इनमें ट्रांस फैट, रिफाइन्ड आटा और प्रिजर्वेटिव्स की मात्रा अधिक होती है. वहीं डार्क चॉकलेट, अगर सीमित मात्रा में और बिना अतिरिक्त शुगर के खाई जाए, तो उसमें मौजूद कोको आपके हार्ट और ब्रेन दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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महिलाओं में बढ़ रहा पीसीओएस का खतरा, जानें इसके शुरुआती और गंभीर लक्षण

महिलाओं में बढ़ रहा पीसीओएस का खतरा, जानें इसके शुरुआती और गंभीर लक्षण



Common Symptoms of PCOS: पीसीओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में ज्यादातर महिलाएं सुनती तो हैं, लेकिन अक्सर इसे अपने साथ पहचान नहीं पातीं. इसकी सबसे मुश्किल बात यह है कि यह बीमारी एकदम से नहीं आती, बल्कि धीरे-धीरे छोटे-छोटे संकेतों के रूप में शुरू होती है. कभी पीरियड्स मिस होना, कभी बार-बार मुंहासे निकलना, या शरीर में अजीब बदलाव दिखना. हममें से कई लोग इन बातों को तनाव, खान-पान या हॉर्मोनल दिक्कत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस कारण से होता है.

कैसे पहचान सकते हैं?

अगर पीसीओएस को समय रहते पहचान लिया जाए, तो इसके असर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. इससे न सिर्फ आगे चलकर फर्टिलिटी सुरक्षित रहती है, बल्कि डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है. तो चलिए आपको बताते हैं, वो शुरुआती संकेत जो आपका शरीर देकर चेतावनी दे रहा हो सकता है.

पीरियड्स का अनियमित होना

हर महिला का पीरियड 28 दिनों का नहीं होता, कभी-कभी तनाव, यात्रा या नींद की गड़बड़ी से इसमें फर्क पड़ता है. लेकिन पीसीओएस में ये फर्क बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. पीरियड्स 35 दिन से भी ज्यादा देर से आते हैं या कई बार महीनों तक गायब रहते हैं. कई महिलाओं को इसका उल्टा अनुभव होता है. जब पीरियड आता है तो बहुत भारी ब्लीडिंग और थकावट होती है. ये सब इसलिए होता है क्योंकि पीसीओएस में ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, जिससे हॉर्मोन असंतुलन हो जाता है और शरीर की लय बिगड़ जाती है. अगर आप बार-बार सोचती हैं कि इस बार पीरियड आएगा भी या नहीं, तो यह संकेत ध्यान देने लायक है.

वजन कम न होना या तेजी से बढ़ना

क्या आपने महसूस किया है कि चाहे जितनी मेहनत कर लें, वजन नीचे आने का नाम नहीं लेता? पीसीओएस वाली महिलाओं के साथ ऐसा अक्सर होता है, क्योंकि उनका शरीर इंसुलिन रेसिस्टेंट बन जाता है. यानी शुगर को ठीक से प्रोसेस नहीं कर पाता. इससे वजन बढ़ना आसान हो जाता है, खासकर पेट के आसपास, और घटाना मुश्किल. यह आलस या इच्छाशक्ति की बात नहीं है. यह शरीर के अंदर चल रहे हॉर्मोनल बदलाव का नतीजा है.

अनचाही जगहों पर बाल उगना

ठुड्डी पर बाल, ऊपरी होंठों पर झाईं जैसी रेखाएं, पेट या छाती पर बाल उग आना, ये सब पीसीओएस के आम संकेत हैं. डॉक्टर इसे हिर्सुटिज्म कहते हैं, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इसे अनफेयर कहती हैं. दरअसल, पीसीओएस में शरीर में एंड्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे बाल उन जगहों पर उगने लगते हैं जहां आमतौर पर नहीं होते. बार-बार वैक्सिंग या थ्रेडिंग करने से थोड़ी राहत तो मिलती है, लेकिन अगर बाल बार-बार, मोटे और कड़े होकर लौटते हैं, तो यह हॉर्मोनल बदलाव का साफ संकेत है.

सिर के बाल पतले होना

यह पीसीओएस की सबसे उलझी हुई बातों में से एक है, जहां एक तरफ शरीर पर अनचाहे बाल उग आते हैं, वहीं सिर के बाल झड़ने लगते हैं. कई महिलाएं नोटिस करती हैं कि उनकी पोनीटेल पतली हो रही है, या बालों का घनापन कम होता जा रहा है. ये बदलाव धीरे-धीरे आते हैं, अचानक नहीं. अगर बाल ज्यादा झड़ने लगे हों या पार्टिंग लाइन चौड़ी लगने लगी हो, तो इसे हल्के में न लें.

त्वचा पर काले पैच या निशान

पीसीओएस का हर संकेत पीरियड या वजन से जुड़ा नहीं होता. कई बार यह त्वचा पर भी दिखाई देता है. गर्दन के पीछे, बगल या जांघों के पास काले, मुलायम या गाढ़े पैच बन जाते हैं. इसे Acanthosis Nigricans कहा जाता है और यह इंसुलिन रेसिस्टेंस का संकेत होता है. ये पैच खुद नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन ये बताते हैं कि शरीर को ब्लड शुगर संभालने में दिक्कत हो रही है और यह पीसीओएस का अहम हिस्सा है.

गर्भधारण में कठिनाई

कई बार महिलाओं को पीसीओएस का पता तब चलता है जब वे गर्भधारण की कोशिश करती हैं. क्योंकि ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, इसलिए गर्भ ठहरने में दिक्कत आती है. इसका मतलब यह नहीं कि प्रेग्नेंसी असंभव है. बस थोड़ा समय और डॉक्टर की मदद की जरूरत होती है. अक्सर जब जांच कराई जाती है, तो महिलाओं को एहसास होता है कि छोटे-छोटे संकेत तो पहले से थे, बस उन्होंने ध्यान नहीं दिया.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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