यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर दिखता है असर, जानें क्या है डायबिटिक रेटिनोपैथी?

यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर दिखता है असर, जानें क्या है डायबिटिक रेटिनोपैथी?



भारत में डायबिटीज की समस्या तेजी से बढ़ रही है और अब इसका असर युवाओं में भी दिखने लगा है. ICMR–India Diabetes 2024 की स्टडी के अनुसार देश में हर छठा डायबिटीज पेशेंट 40 साल से कम उम्र का है. इतनी कम उम्र में डायबिटीज होना आगे चलकर कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है. वहीं इन्हीं में से एक डायबिटिक रेटिनोपैथी है जो आंखों के रेटिना को नुकसान पहुंचती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि यंग डायबिटीज पेशेंट्स में सबसे पहले आंखों पर कैसे असर दिखाता है और डायबिटिक रेटिनोपैथी क्या है.

क्या है डायबिटीज रेटिनोपैथी?

डायबिटिक रेटिनोपैथी ऐसी कंडीशन है, जिसमें लगातार बदलते ब्लड शुगर लेवल के कारण रेटिना की छोटी ब्लड सेल्स कमजोर हो जाती है. वहीं रेटिना आंख का वह हिस्सा है जो रोशनी को पहचानता है और देखने में मदद करता है. ब्लड शुगर बढ़ने पर इन सेल्स में सूजन या ब्लीडिंग होने लगती है और धीरे-धीरे नई असामान्य सेल्स बनने लगती है जो आंखों की रोशनी पर असर डालती है. अगर समय पर इसका पता न लगे तो यह पूरी तरह अंधेपन का खतरा पैदा कर सकती हैं.

यंग पेशेंट में बढ़ रहा सबसे ज्यादा खतरा

कम उम्र में डायबिटीज होने वाले मरीजों में यह खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि बीमारी की अवधि लंबी होती है. ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी 2025 के आंकड़ों के अनुसार 40 साल से कम उम्र के लगभग 12 से 15 प्रतिशत भारतीय डायबिटीज मरीजों में रेटिनोपैथी के शुरुआती लक्षण दिखने लगते हैं. इसे लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं की रेटिना आंख का सबसे संवेदनशील हिस्सा है और डायबिटीज का सबसे पहला असर यहीं पर दिखाई देता है. शुरुआती स्टेज में इसका कोई लक्षण नहीं होता है, लेकिन अंदर ही अंदर नुकसान शुरू हो जाता है. इसलिए ब्लड शुगर कंट्रोल में रखना और साल में कम से कम एक बार आंख की जांच करना बहुत जरूरी होता है.

आधुनिक लाइफस्टाइल से बढ़ रहा खतरा

लगातार हाई ब्लड शुगर लेवल रेटिना तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई को प्रभावित करता है. इससे आंखों की कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ती है. वहीं आजकल की लाइफ स्टाइल जैसे प्रोसेस्ड फूड खाना, स्क्रीन टाइम बढ़ना, तनाव और नींद की कमी भी इस समस्या को और बढ़ा देती है.  इसके अलावा ब्लड प्रेशर हाई कोलेस्ट्रॉल और स्मोकिंग की आदत रेटिना की सेल्स को और कमजोर कर देती है.

कैसे करें आंखों की सुरक्षा?

  • आंखों को सुरक्षित रखने के लिए सबसे पहले ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखें.
  • वहीं अपनी डाइट में फाइबर, हरी सब्जियां, खट्टे फल, मछली, अलसी और अखरोट जैसे फूड शामिल करें.
  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह साबुत अनाज और मिलेट्स का सेवन करें.
  • रोजाना 30 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी करें.
  • पर्याप्त पानी पिएं और 7 से 8 घंटे की नींद लें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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स्मोकिंग की आदत या प्रदूषण से खराब हुए फेफड़े दोबारा हो सकते हैं ठीक, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

स्मोकिंग की आदत या प्रदूषण से खराब हुए फेफड़े दोबारा हो सकते हैं ठीक, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?



दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार जहरीली हो रही है. ऐसे में हवा में लगातार बढ़ते प्रदूषण से लोगों के फेफड़ों की हालत खराब हाे रही है. वहीं डॉक्टर का कहना है कि वायु प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कण जैसे पीएम 2.5, पीएम 10 नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन फेफड़ों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं. स्मोकिंग की आदत रखने वाले लोगों के लिए तो खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर फेफड़े प्रदूषण या धूम्रपान से खराब हो जाए तो क्या ये दोबारा ठीक हो सकते हैं. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि स्मोकिंग की आदत या प्रदूषण से अगर फेफड़े खराब हो जाए तो क्या वह दोबारा ठीक हो सकते हैं या नहीं और इसे लेकर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं. 

प्रदूषण से फेफड़ों को कैसे पहुंचता है नुकसान?

डॉक्टरों के अनुसार हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व सांस के जरिए फेफड़ों के गहरे हिस्से तक पहुंच जाते हैं. इससे जलन, सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस होता है जो फेफड़ों की संरचना और क्षमता को कमजोर कर देता है. बच्चों, बुजुर्गों और दिल या अस्थमा जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह खतरा सबसे ज्यादा होता है. वहीं फेफड़ों के खराब होने की शुरुआती संकेत में बार-बार सूखी खांसी या गले में जलन होना शामिल होता है. इसके अलावा हल्का सा काम करने पर भी सांस फूल जाती है. वहीं सीने में भारीपन या घरघराहट की आवाज भी खराब फेफड़े का शुरुआती संकेत होता है. बलगम बढ़ाना और थकान महसूस होना भी खराब फेफड़े के संकेत में आता है.

क्या खराब होने के बाद फेफड़ों दोबारा ठीक हो सकते हैं?

एक्सपर्ट बताते हैं कि फेफड़ों में खुद को रिपेयर करने की क्षमता होती है. जब व्यक्ति साफ हवा में रहता है, प्रदूषण या स्मोकिंग से दूरी बनाता है तो धीरे-धीरे फेफड़ों की कार्य क्षमता बेहतर हो सकती है. वहीं फेफड़ों में कुछ महीनों से लेकर कुछ सालों में सुधार देखा जा सकता है. हालांकि अगर नुकसान बहुत गहरा या पुराना है जैसे कि COPD तो फेफड़ों का पूरी तरह ठीक होना मुश्किल होता है. लेकिन सही इलाज और सावधानी बरतने से इसका खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर कोई व्यक्ति स्मोकिंग छोड़ देता है या प्रदूषण से बचने की कोशिश करता है तो दो हफ्तों से 3 महीने के भीतर फेफड़ों की क्षमता में सुधार दिखने लगता है. 

लंग हेल्थ के लिए क्या करें?

  • स्मोकिंग और सेकंड हैंड स्मोक से दूरी बनाएं. 
  • एन95 या केएन95 मास्क लगाकर बाहर निकलें.
  • घर में HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल करें. 
  • डीप ब्रीदिंग या डायाफ्रामेटिक ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें.
  • दिनभर पर्याप्त पानी पिएं, ताकि फेफड़ों में जमा गंदगी साफ हो सके. 
  • प्रदूषण वाले दिनों में बाहर की एक्टिविटी कम करें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सुबह की चाय और टोस्ट बन सकते हैं सेहत के दुश्मन, एक्सपर्ट्स ने बताए इसके नुकसान

सुबह की चाय और टोस्ट बन सकते हैं सेहत के दुश्मन, एक्सपर्ट्स ने बताए इसके नुकसान



सुबह का समय हो और एक कप गर्म चाय के साथ कुरकुरा टोस्ट न मिले, ऐसा बहुत कम लोगों के साथ होता है. ज्यादातर भारतीयों के लिए चाय और टोस्ट दिन की शुरुआत का एक अहम हिस्सा हैं. यह जल्दी बन जाते हैं, टेस्टी लगते हैं और दिन की भागदौड़ से पहले कुछ पल सुकून भी देते हैं. हालांकि, हाल के शोध बता रहे हैं कि यह आदत जितनी मासूम लगती है, उतनी सेहतमंद नहीं है.

चाय और सफेद ब्रेड टोस्ट का यह रोजाना का कॉम्बिनेशन धीरे-धीरे आपके शरीर पर बुरा असर डाल सकता है. तो चलिए जानते हैं कि सुबह की चाय और टोस्ट कैसे सेहत के दुश्मन बन सकते हैं और इसके नुकसान क्या हैं. 

सुबह की चाय और टोस्ट कैसे सेहत के दुश्मन बन सकते हैं 

रिसर्च के अनुसार, जो लोग ज्यादातर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और मीठे ड्रिंक्स का सेवन करते हैं. जैसे दूध और चीनी से भरपूर चाय और सफेद ब्रेड टोस्ट उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है. इसका मतलब यह है कि शरीर के सेल्स धीरे-धीरे इंसुलिन पर सही प्रतिक्रिया देना बंद कर देती हैं, जिससे शुगर का स्तर बढ़ जाता है और मोटापा, डायबिटीज और हार्ट डिजीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. 

बार-बार ऐसे नाश्ते लेने से ब्लड शुगर जल्दी बढ़ता है और फिर अचानक गिर जाता है. इसका असर यह होता है कि कुछ घंटे बाद ही आपको फिर से भूख लगने लगती है, थकान महसूस होती है और एनर्जी कम हो जाती है. लंबे समय में यही आदत मेटाबॉलिज्म को धीमा कर सकती है. 

सुबह की चाय के नुकसान

चाय हर किसी की पहली पसंद बन गई है. वही चाय अगर फुल-फैट दूध और दो-तीन चम्मच चीनी से बनी हो तो वह आपकी सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकती है. एक कप ऐसी चाय में लगभग 150-200 कैलोरी तक होती है और अगर आप दिन में दो से तीन बार चाय पीते हैं तो ये कैलोरी धीरे-धीरे वजन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं. साथ ही चाय में मौजूद कैफीन थोड़ी मात्रा में फायदेमंद होती है.

यह मन को फ्रेश करती है और फोकस बढ़ाती है. ज्यादा मात्रा में यही कैफीन चिंता, नींद की समस्या और डिहाइड्रेशन का कारण बन सकती है. काली चाय में मौजूद टैनिन ज्यादा पीने पर आयरन के अवशोषण में भी बाधा डालते हैं, जिससे एनीमिया की संभावना बढ़ सकती है. अगर आप चाय के साथ हर रोज सफेद ब्रेड टोस्ट खाते हैं, तो आप अनजाने में हर सुबह हाई कार्ब और लो न्यूट्रिशन वाला नाश्ता ले रहे होते हैं, जो कुछ घंटों के लिए तो एनर्जी देता है लेकिन बाद में शरीर को सुस्त बना देता है. 

सफेद ब्रेड टोस्ट के नुकसान

टोस्ट सुनने में जितना आसान और हल्का लगता है, उतना सेहतमंद नहीं होता है. ज्यादातर लोग सफेद ब्रेड का यूज करते हैं, जिसमें से फाइबर और जरूरी पोषक तत्व प्रोसेसिंग के दौरान निकाल दिए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि सफेद ब्रेड सिर्फ खाली कार्बोहाइड्रेट होती है, जो जल्दी पचती है और ब्लड शुगर को तुरंत बढ़ा देती है. जिसके चलते थोड़ी ही देर में भूख फिर से लगने लगती है और आप जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं.

इसके अलावा सफेद ब्रेड में विटामिन B, आयरन, और मैग्नीशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व बहुत कम होते हैं और अगर ब्रेड को ज्यादा टोस्ट कर दिया जाए यानी बहुत कुरकुरी या जली हुई बना दी जाए तो उसमें एक्रिलामाइड नामक केमिकल बनता है, जो लंबे समय में कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है. टोस्ट के साथ लगाए जाने वाले टॉपिंग्स जैसे मक्खन, जैम, मार्जरीन या मीठे स्प्रेड, टेस्ट तो बढ़ाते हैं लेकिन इनमें छिपी हुई चीनी और ट्रांस फैट्स आपके शरीर के लिए और भी हानिकारक साबित होते हैं. 

कैसे बनाएं चाय और टोस्ट को हेल्दी?

अगर आप सोच रहे हैं कि अब चाय और टोस्ट छोड़ने पड़ेंगे तो घबराने की जरूरत नहीं, बस थोड़े से समझदारी भरे बदलाव से आप इस कॉम्बो को ज्यादा सेहतमंद बना सकते हैं. 

1.  चाय में बदलाव करें – धीरे-धीरे चीनी की मात्रा कम करें, फुल-फैट दूध की बजाय टोन्ड या प्लांट-बेस्ड दूध यूज करें. टेस्ट बढ़ाने के लिए इलायची, अदरक, दालचीनी जैसे मसाले डालें. ये न सिर्फ टेस्टी हैं, बल्कि इनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं. कोशिश करें कि दिन में दो से ज्यादा कप चाय न पिएं. 

2. टोस्ट को बेहतर बनाएं – सफेद ब्रेड छोड़कर साबुत अनाज, मल्टीग्रेन या ओट ब्रेड लें. इनमें फाइबर और जटिल कार्बोहाइड्रेट ज्यादा होते हैं, जिससे पाचन धीरे-धीरे होता है और भूख देर से लगती है. टोस्ट को ज्यादा जलाएं नहीं, हल्का सुनहरा रंग सबसे अच्छा होता है.  टॉपिंग के लिए एवोकाडो, अंडे, हम्मस या पीनट बटर जैसे हेल्दी ऑप्शन चुनें. 

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दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा से 70% बढ़ा प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा, रिपोर्ट में खुलासा

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उम्र बढ़ने के साथ लोग पाल लेते हैं ये तीन गलतफहमियां, इन्हें जान लेंगे तो एक्टिव रहेगा बुढ़ापा

उम्र बढ़ने के साथ लोग पाल लेते हैं ये तीन गलतफहमियां, इन्हें जान लेंगे तो एक्टिव रहेगा बुढ़ापा



जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, शरीर में कई बदलाव होते हैं. कई लोग सोचते हैं कि यह बदलाव सिर्फ झुर्रियों, वजन बढ़ने या हमारी जेनेटिक्स की वजह से होते हैं. इसके साथ ही उम्र बढ़ने के साथ हार्ट डिजीज, टाइप 2 डायबिटीज, गठिया, कैंसर और मनोभ्रंश जैसी लंबी अवधि की बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, लेकिन सही आदत और लाइफस्टाइल अपनाकर हम हेल्दी और एक्टिव बुढ़ापे की उम्मीद कर सकते हैं. 

हालांकि, उम्र बढ़ने से जुड़ी गलतफहमियों को जानना भी बहुत जरूरी है. फंक्शनल मेडिसिन के डॉक्टर और कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संजय भोजराज ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर शेयर किया कि उम्र बढ़ने को लेकर लोग तीन बड़ी गलतफहमियों में फंस जाते हैं. उनका कहना है कि अगर हम इन गलतफहमियों से बचें और सही आदतें अपनाएं, तो उम्र बढ़ने के प्रभाव को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. तो चलिए जानते हैं कि उम्र बढ़ने के बारे में आम गलतफहमियां क्या है.

1. उम्र बढ़ना सिर्फ झुर्रियों या जेनेटिक से संबंधित है – ज्यादातर लोग मानते हैं कि उम्र बढ़ने के लक्षण जैसे झुर्रियां, शरीर में वजन बढ़ना या धीमा मेटाबोलिज्म पूरी तरह से हमारे जीन पर निर्भर करता है. डॉ. भोजराज के अनुसार, ऐसा बिल्कुल नहीं है. सालों तक हार्ट पर काम करने और मरीजों का अध्ययन करने के बाद यह साफ हुआ कि हमारे जीवन की आदतें, खान-पान, एक्सरसाइज और मानसिक स्थिति हमारे शरीर और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को ज्यादा प्रभावित करती हैं. 

2. दिल आपकी उम्र को पहले दिखाता है – ज्यादातर लोग सोचते हैं कि उम्र सिर्फ बाहरी बदलावों से पता चलती है, जैसे चेहरे की झुर्रियां या बालों का सफेद होना. जबकि सच यह है कि आपका दिल और ब्लड सेल्स आपके वास्तविक स्वास्थ्य और उम्र को पहले ही बता देते हैं. अगर आप हार्ट के स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं तो आप अनजाने में अपने शरीर की उम्र को बढ़ा सकते हैं. 

3. छोटी आदतें भी बड़ी भूमिका निभाती हैं – अक्सर लोग सोचते हैं कि उम्र बढ़ना सिर्फ खानपान की वजह से होता है या कभी-कभार हेल्दी खाना खाने या एक्सरसाइज करने से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन डॉ. भोजराज कहते हैं कि रोजमर्रा की आदतें, जिन्हें हम सामान्य और स्वस्थ मानते हैं, हमारी सेल्स, आर्टरी और एनर्जी स्तर को प्रभावित कर सकती हैं. यही वजह है कि नियमित लाइफस्टाइल और छोटी-छोटी आदतें उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को स्लो या तेज कर सकती हैं. 

लंबी उम्र और हेल्थ बनाए रखने की आदतें

1. रोजाना एक्सरसाइज करें – हल्की या तेज एक्सरसाइज, चाहे वॉकिंग, योग, या जिम, हार्ट और मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखती है. 

2. बैलेंस और हेल्दी डाइट लें – ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और प्रोटीन हृदय और मेटाबॉलिज्म के लिए बेहद जरूरी हैं. 

3. ज्यादा से ज्यादा आराम और नींद लें – नींद न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य के लिए, बल्कि शरीर की मरम्मत और एनर्जी बनाए रखने के लिए भी जरूरी है. 

4. रिश्ते बनाए रखें – सामाजिक जुड़ाव और परिवार या दोस्तों के साथ संबंध मानसिक स्वास्थ्य और लाइफ  की क्वालिटी को बढ़ाते हैं. 

5. हीट थेरेपी या सॉना शामिल करें – यह ब्लड फ्लो को बढ़ावा देता है और हार्ट और आर्टरी के लिए फायदेमंद हो सकता है. 

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मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक… शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं महिलाएं, ऐसी होती है जर्न

मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक… शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं महिलाएं, ऐसी होती है जर्न



महिलाओं का शरीर सबसे खास होता है. टीनएज से लेकर मां बनने तक और फिर मेनोपॉज तक, यह शरीर कई तरह के बदलावों से गुजरता है. हर पड़ाव पर शरीर कुछ नया सिखाता है, कुछ बदलता है और कुछ छोड़ देता है. इस सफर में हार्मोन का उतार-चढ़ाव बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, जो न सिर्फ शरीर बल्कि मन को भी प्रभावित करता है. ऐसे में चलिए आज जानते हैं कि मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक महिलाएं शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं. 

मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक महिलाएं

1. टीनएज – लड़कियों में लगभग 11 से 14 साल की उम्र में हार्मोन बदलने लगते हैं. इन्हीं हार्मोनल बदलावों के कारण पीरियड्स की शुरुआत होती है. यह संकेत है कि अब शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार हो रहा है. इस समय शरीर में कई शारीरिक बदलाव होते हैं. जैसे ब्रेस्ट ग्रोथ, शरीर पर हल्के बाल, मूड में बदलाव, चिड़चिड़ापन या हार्मोन बदलाव. 
 
2. मां बनने का स्टेज – मां बनना हर महिला की जिंदगी का एक अनोखा एक्सपीरियंस होता है, लेकिन यह एक्सपिरियंस सिर्फ इमोशनल नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से भी बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है. प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. इससे बच्चे की ग्रोथ होती है, लेकिन साथ ही कई बदलाव भी आते हैं. जैसे थकान और नींद ज्यादा आना, मूड स्विंग्स, शरीर का वजन बढ़ना, पेट और कमर में दर्द, त्वचा और बालों में बदलाव, यह सब शरीर की तैयारी का हिस्सा होता है ताकि बच्चा स्वस्थ रूप से जन्म ले सके. 

3. डिलीवरी के बाद का समय – बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं पोस्टपार्टम फेज में प्रवेश करती हैं. इस समय शरीर धीरे-धीरे ठीक होता है और प्रेग्नेंसी में बढ़े हुए हार्मोन फिर से सामान्य होते हैं. कई बार इस दौरान महिलाओं को पोस्टपार्टम डिप्रेशन भी हो सकता है, जिसमें उदास, थकी हुई या परेशान महसूस करती हैं. यह इसलिए होता है क्योंकि हार्मोन अचानक घटने लगते हैं. इस दौरान अपने शरीर को आराम देना, हेल्दी खाना और डॉक्टर की सलाह लेना बहुत जरूरी है. 

4. मेनोपॉज की ओर सफर – 40 साल की उम्र के आसपास महिलाओं के हार्मोन फिर से बदलने लगते हैं. यह समय पेरिमेनोपॉज कहलाता है यानी मेनोपॉज से पहले का चरण, इस दौरान पिरियड अनियमित हो सकते हैं. कभी जल्दी आना, कभी देर से, कभी बहुत कम या बहुत ज्यादा. धीरे-धीरे जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स नहीं आते, तो इसे मेनोपॉज कहा जाता है.यह उम्र आमतौर पर 45 से 55 साल के बीच होती है. 

मेनोपॉज के दौरान शरीर में क्या-क्या बदलाव होते हैं?

मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक नेचुरल बायोलॉजिकल प्रोसेस है. लेकिन इसके साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं. जैसे 

1. हॉट फ्लैश और नाइट स्वेट – अचानक शरीर में गर्मी का एहसास होना, चेहरा लाल पड़ना और रात में पसीना आना यह बहुत आम लक्षण हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है. 

2. वजाइना में सूखापन – वजाइना की नमी कम हो जाती है, जिससे संबंध बनाने के दौरान डिसकंर्फट या जलन महसूस हो सकती है. 

3. नींद न आना और थकान – रात में पसीना आने, मूड स्विंग्स और चिंता के कारण नींद प्रभावित होती है. 

4. वजन बढ़ना – मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण पेट के आसपास चर्बी बढ़ जाती है. 

5. हड्डियां कमजोर होना – एस्ट्रोजन की कमी से कैल्शियम की मात्रा घट जाती है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर होने की समस्या हो सकती है. 

6. मूड स्विंग्स और डिप्रेशन – हार्मोनल बदलाव सीधे मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं.कई महिलाएं उदासी, चिड़चिड़ापन या चिंता महसूस करती हैं. 

7. स्किन और बालों में बदलाव – स्किन ढीली और रूखी हो जाती है, जबकि बाल पतले और कमजोर हो सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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