मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक… शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं महिलाएं, ऐसी होती है जर्न

मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक… शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं महिलाएं, ऐसी होती है जर्न



महिलाओं का शरीर सबसे खास होता है. टीनएज से लेकर मां बनने तक और फिर मेनोपॉज तक, यह शरीर कई तरह के बदलावों से गुजरता है. हर पड़ाव पर शरीर कुछ नया सिखाता है, कुछ बदलता है और कुछ छोड़ देता है. इस सफर में हार्मोन का उतार-चढ़ाव बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, जो न सिर्फ शरीर बल्कि मन को भी प्रभावित करता है. ऐसे में चलिए आज जानते हैं कि मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक महिलाएं शरीर में किन-किन बदलावों से गुजरती हैं. 

मां बनने से लेकर मेनोपॉज तक महिलाएं

1. टीनएज – लड़कियों में लगभग 11 से 14 साल की उम्र में हार्मोन बदलने लगते हैं. इन्हीं हार्मोनल बदलावों के कारण पीरियड्स की शुरुआत होती है. यह संकेत है कि अब शरीर प्रेग्नेंसी के लिए तैयार हो रहा है. इस समय शरीर में कई शारीरिक बदलाव होते हैं. जैसे ब्रेस्ट ग्रोथ, शरीर पर हल्के बाल, मूड में बदलाव, चिड़चिड़ापन या हार्मोन बदलाव. 
 
2. मां बनने का स्टेज – मां बनना हर महिला की जिंदगी का एक अनोखा एक्सपीरियंस होता है, लेकिन यह एक्सपिरियंस सिर्फ इमोशनल नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से भी बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है. प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. इससे बच्चे की ग्रोथ होती है, लेकिन साथ ही कई बदलाव भी आते हैं. जैसे थकान और नींद ज्यादा आना, मूड स्विंग्स, शरीर का वजन बढ़ना, पेट और कमर में दर्द, त्वचा और बालों में बदलाव, यह सब शरीर की तैयारी का हिस्सा होता है ताकि बच्चा स्वस्थ रूप से जन्म ले सके. 

3. डिलीवरी के बाद का समय – बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं पोस्टपार्टम फेज में प्रवेश करती हैं. इस समय शरीर धीरे-धीरे ठीक होता है और प्रेग्नेंसी में बढ़े हुए हार्मोन फिर से सामान्य होते हैं. कई बार इस दौरान महिलाओं को पोस्टपार्टम डिप्रेशन भी हो सकता है, जिसमें उदास, थकी हुई या परेशान महसूस करती हैं. यह इसलिए होता है क्योंकि हार्मोन अचानक घटने लगते हैं. इस दौरान अपने शरीर को आराम देना, हेल्दी खाना और डॉक्टर की सलाह लेना बहुत जरूरी है. 

4. मेनोपॉज की ओर सफर – 40 साल की उम्र के आसपास महिलाओं के हार्मोन फिर से बदलने लगते हैं. यह समय पेरिमेनोपॉज कहलाता है यानी मेनोपॉज से पहले का चरण, इस दौरान पिरियड अनियमित हो सकते हैं. कभी जल्दी आना, कभी देर से, कभी बहुत कम या बहुत ज्यादा. धीरे-धीरे जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स नहीं आते, तो इसे मेनोपॉज कहा जाता है.यह उम्र आमतौर पर 45 से 55 साल के बीच होती है. 

मेनोपॉज के दौरान शरीर में क्या-क्या बदलाव होते हैं?

मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक नेचुरल बायोलॉजिकल प्रोसेस है. लेकिन इसके साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं. जैसे 

1. हॉट फ्लैश और नाइट स्वेट – अचानक शरीर में गर्मी का एहसास होना, चेहरा लाल पड़ना और रात में पसीना आना यह बहुत आम लक्षण हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है. 

2. वजाइना में सूखापन – वजाइना की नमी कम हो जाती है, जिससे संबंध बनाने के दौरान डिसकंर्फट या जलन महसूस हो सकती है. 

3. नींद न आना और थकान – रात में पसीना आने, मूड स्विंग्स और चिंता के कारण नींद प्रभावित होती है. 

4. वजन बढ़ना – मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण पेट के आसपास चर्बी बढ़ जाती है. 

5. हड्डियां कमजोर होना – एस्ट्रोजन की कमी से कैल्शियम की मात्रा घट जाती है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर होने की समस्या हो सकती है. 

6. मूड स्विंग्स और डिप्रेशन – हार्मोनल बदलाव सीधे मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं.कई महिलाएं उदासी, चिड़चिड़ापन या चिंता महसूस करती हैं. 

7. स्किन और बालों में बदलाव – स्किन ढीली और रूखी हो जाती है, जबकि बाल पतले और कमजोर हो सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मेनोपॉज के बाद अगर तेजी से बढ़ रहा है वजन तो हो जाइए सावधान, हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर

मेनोपॉज के बाद अगर तेजी से बढ़ रहा है वजन तो हो जाइए सावधान, हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर



आज के समय में मोटापा और ज्यादा वजन बढ़ना एक आम समस्या बन चुका है, लेकिन मेनोपॉज के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है. हाल ही में सामने आई एक स्टडी के अनुसार, मेनोपॉज के बाद महिलाओं में ज्यादा वजन या मोटापा ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ा देता है. दरअसल, मेनोपॉज के बाद महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल कम हो जाता है, ऐसे में जब ओवरीज हार्मोन को बनाना बंद कर देती है तो शरीर इससे फैट टिश्यू यानी चर्बी से बनाने लगता है. अगर शरीर में फैट ज्यादा है तो एस्ट्रोजन स्तर भी असामान्य रूप से बढ़ जाता है. यही एक्स्ट्रा एस्ट्रोजन ब्रेस्ट सेल्स की ग्रोथ को बढ़ावा देता है जो आगे चलकर कैंसर में बदल सकता है.

मोटापा और हार्ट डिजीज से बढ़ता है खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, हाई बीएमआई और हार्ट डिजीज से पीड़ित महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. इस रिसर्च में यूरोप और ब्रिटेन की करीब 1.68 लाख महिलाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया है. जब स्टडी को शुरू किया गया था तब इनमें से किसी को कैंसर, डायबिटीज या हार्ट से जुड़ी बीमारी नहीं थी, लेकिन करीब 11 साल के फॉलोअप के बाद 6,793 महिलाओं में मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर विकसित हुआ. इस रिसर्च में सामने आया कि जिन महिलाओं का बीएमआई 25 से ज्यादा था और जो पहले से दिल से जुड़ी बीमारियाें से पीड़ित थी उनमें यह खतरा 31 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ पाया गया था. वहीं इस रिसर्च के अनुसार जो महिलाएं पहले से दिल से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित नहीं थी उनमें यह खतरा 13 प्रतिशत बढ़ा हुआ पाया गया.

शरीर की चर्बी कैसे बढ़ाती है ब्रेस्ट कैंसर का खतरा?

अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, मेनोपॉज के बाद ओवरी एस्ट्रोजन बनाना बंद कर देती है. इस कंडीशन में शरीर का फैट टिश्यू ही एस्ट्रोजन का मेन सोर्स बन जाता है. इसलिए शरीर में जितनी ज्यादा चर्बी होती है, एस्ट्रोजन का लेवल उतना ही बढ़ता है. वहीं यह बढ़ा हुआ हार्मोन ब्रेस्ट सेल्स को बार-बार सक्रिय करता है, जिससे असामान्य कोशिकाओं की ग्रोथ होती है. यही प्रक्रिया आगे चलकर ब्रेस्ट कैंसर का कारण बन सकती है. साथ ही मोटापा इन्सुलिन रेजिस्टेंस को भी बढ़ता है. जब शरीर इंसुलिन को सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता है तो ब्लड में इसका लेवल बढ़ जाता है. वहीं हाई इन्सुलिन लेवल को भी कई प्रकार के कैंसर जैसे ब्रेस्ट कैंसर से जोड़ा गया है.

कैसे कर सकते हैं बचाव?

1. वजन कंट्रोल रखें- मोटापा कई बीमारियों की जड़ होता है, इसीलिए हेल्दी बीएमआई बनाए रखना जरूरी होता है.
2. नियमित व्यायाम करें- महिलाओं को हफ्ते में कम से कम 150 मिनट तक वॉक, योग्य या एक्सरसाइज करनी चाहिए. 
3. शराब और स्मोकिंग से बचें- महिलाओं को शराब और धूम्रपान जैसी चीजों से बचना चाहिए, क्योंकि यह दोनों ही हार्मोनल असंतुलन को बढ़ाते हैं.
4. हेल्दी फूड लें- महिलाओं को प्रोसेस्ड फूड, मीठी ड्रिंक और ज्यादा तेल वाली चीजों से दूरी बनानी चाहिए. जिससे वजन कंट्रोल में रहे. 

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कम स्पर्म काउंट वाले पिता के बच्चों में कैंसर का रिस्क हो जाता है 150 गुना, चौंका देगी यह स्टडी

कम स्पर्म काउंट वाले पिता के बच्चों में कैंसर का रिस्क हो जाता है 150 गुना, चौंका देगी यह स्टडी



आजकल की खराब लाइफस्टाइल और तनाव भरी जिंदगी के बीच कम स्पर्म काउंट की समस्या आम हो गई है. क्या आप जानते हैं कि एक पिता की फर्टिलिटी बच्चों की हेल्थ पर भी असर डाल सकती है. हाल ही में किए गए एक हैरान कर देने वाले शोध ने इस बात की पुष्टि की है कि जिन पुरुषों के स्पर्म बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, उनके बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों में कम उम्र में कैंसर होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. तो चलिए जानते हैं कि कम स्पर्म काउंट वाले पिता के बच्चों में कैंसर का रिस्क 150 गुना क्यों हो जाता है. 

शोध में क्या पाया गया?

यूटा विश्वविद्यालय (University of Utah) के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर अब तक का सबसे बड़ा और पहला अध्ययन किया. उन्होंने 1996 से 2017 के बीच यूटा के प्रजनन क्लीनिकों में इलाज कराने वाले 786 पुरुषों के आंकड़ों का विश्लेषण किया. इन पुरुषों में से 426 पुरुषों में स्पर्म पूरी तरह अनुपस्थित यानी Azoospermia थे. 360 पुरुषों में स्पर्म की संख्या बहुत कम यानी Oligospermia थी. इनकी तुलना उन्होंने सामान्य पुरुषों से की, जिनके बच्चे थे और जिनकी स्पर्म संख्या सामान्य थी. 

कम स्पर्म काउंट वाले पिता के बच्चों में कैंसर का रिस्क 150 गुना

शोध में पाया गया कि जिन पुरुषों में स्पर्म काउंट बहुत कम था, उनके परिवारों में कैंसर का खतरा 150 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया. वहीं, जिन पुरुषों में स्पर्म की संख्या बहुत कम थी, उनके रिश्तेदारों में भी कई तरह के कैंसर का खतरा बढ़ा हुआ पाया गया. स्पर्म न होने वाले पुरुषों के परिवार में हड्डी और जोड़ों के कैंसर का खतरा 156 प्रतिशत तक बढ़ा, लिम्फोमा का खतरा 60 प्रतिशत तक बढ़ा, सॉफ्ट टिश्यू कैंसर का खतरा 56 प्रतिशत बढ़ा, थायराइड कैंसर का खतरा 54 प्रतिशत बढ़ा और गर्भाशय कैंसर का खतरा 27 प्रतिशत बढ़ा है.

इसके अलावा कम स्पर्म वाले पुरुषों के परिवार में हड्डी और जोड़ों के कैंसर का खतरा 143 प्रतिशत बढ़ा, टेस्टीक्युलर कैंसर का खतरा 134 प्रतिशत बढ़ा और कोलोन कैंसर का खतरा 16 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन एक कैंसर ऐसा था जिसका खतरा कम पाया गया. यह ईसोफेगल कैंसर था, जिसमें रिस्क 61 प्रतिशत घटा है. 

क्यों बढ़ रहा है यह खतरा?

वैज्ञानिकों का मानना है कि जब किसी परिवार के कई सदस्यों में एक जैसी बीमारियां दिखाई देती हैं, तो इसके पीछे जेनेटिक या पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं. यूटा विश्वविद्यालय की शोधकर्ता जोमी रामसे (Joemy Ramsey) कहती हैं कि अगर परिवारों में कैंसर का एक जैसा पैटर्न दिखता है, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उनके जीन या लाइफस्टाइल की आदतें एक जैसी हैं. इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि इनफर्टिलिटी और कैंसर दोनों के पीछे कौन से जैविक कारण काम करते हैं. वैज्ञानिक अब इन परिवारों के जीनों का डीएनए सीक्वेंसिंग कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन-से जीन म्यूटेशन इस संबंध को जन्म देते हैं. 

कम स्पर्म का मतलब क्या है?

सामान्य रूप से किसी पुरुष के स्पर्म में 1 मिलीलीटर में 15 मिलियन या उससे ज्यादा स्पर्म होते हैं. अगर संख्या 15 मिलियन से कम है, तो इसे ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है. अगर स्पर्म पूरी तरह अनुपस्थित हैं, तो यह एजोस्पर्मिया (Azoospermia) कहलाता है. कम स्पर्म वाले पुरुषों में अक्सर स्पर्म की स्पीड और क्वालिटी भी खराब होती है, जिससे प्रेगनेंसी की संभावना कम हो जाती है. अनुमान लगाया गया है कि हर 20 में से 1 पुरुष इनफर्टिलिटी का सामना करता है. कई बार यह जेनेटिक कारणों से होता है, लेकिन कुछ मामलों में इसका कारण लाइफस्टाइल भी होती है, जैसे ज्यादा शराब सेवन, धूम्रपान, नशीले पदार्थों का सेवन, रेडिएशन, हाई टेंपरेचर या हार्मोनल इंबैलेंस
 
कम स्पर्म काउंट का कैसे दिखा असर?

शोध में यह भी पाया गया कि जिन परिवारों के पुरुषों में स्पर्म की संख्या बहुत कम थी, उनमें कई पीढ़ियों में कैंसर का खतरा बढ़ा हुआ पाया गया. कुछ ग्रुप में  युवाओं में कैंसर का खतरा बढ़ा, वहीं कई मामलों में बचपन में कैंसर का रिस्क भी बढ़ा, कुछ परिवारों में कई प्रकार के कैंसर एक साथ पाए गए.

इसका मतलब है कि कम स्पर्म काउंट सिर्फ एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की जेनेटिक हेल्थ से जुड़ी हो सकती है. ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन से डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलेगी कि किन परिवारों में कैंसर का खतरा ज्यादा है और उन्हें रोकथाम और समय पर जांच  की सलाह दी जा सकेगी. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल्ली में रहना है तो फेफड़ों का रखें खास ख्याल, घर पर ही ऐसे कर सकते हैं लंग टेस्ट

दिल्ली में रहना है तो फेफड़ों का रखें खास ख्याल, घर पर ही ऐसे कर सकते हैं लंग टेस्ट



दिल्ली एनसीआर की हवा एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है. दिवाली के बाद स्मॉग, धूल और धुएं के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो गया है. दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 का लेवल भी काफी गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया है. इस जहरीली हवा का सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर पड़ रहा है. डॉक्टरों का कहना है कि अब प्रदूषण सिर्फ एलर्जी या अस्थमा तक नहीं रहा, बल्कि फेफड़ों के कैंसर तक पहुंच गया है

दिल्ली का एयर पॉल्यूशन अब यह केवल स्मोकर्स के लिए ही नहीं बल्कि नॉन स्मोकर्स के लिए भी खतरनाक बन चुका है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि दिल्ली में रहना है तो फेफड़े का कैसे खास ख्याल रखें और घर पर ही लंग टेस्ट कैसे कर सकते हैं . 

सबसे ज्यादा इन लोगों को खतरा 

  • एक्सपर्ट्स बताते हैं कि दिल्ली के प्रदूषण से तीन तरह के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. इसमें सबसे पहले वह लोग आ रहे हैं, जिनके फेफड़े अब तक स्वस्थ थे, लेकिन रोजाना प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं. 
  • वहीं दूसरे ग्रुप में बच्चे और बुजुर्ग शामिल है, जिनकी लंग कैपेसिटी उम्र के कारण पहले से ही कम है. 
  • इसके अलावा तीसरे ग्रुप में वह मरीज है, जिन्हें पहले से फेफड़ों की बीमारियां है. जैसे कि लंग कैंसर, COPD या जो कीमोथेरेपी से गुजर चुके हैं. 

ऐसे पहचानें फेफड़ों पर असर के शुरुआती लक्षण 

  • सांस फूलना या भारीपन महसूस होना. 
  • बार-बार वायरल यह हल्का बुखार होना.
  • सीने में जकड़न होना और लगातार खांसी रहना. 
  • लगातार थकान या कम एनर्जी महसूस होना. 

घर पर ऐसे करें आसान लंग टेस्ट 

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बिना किसी महंगे टेस्ट के आप घर बैठे अपने फेफड़ों की क्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं. इसके लिए आप बस एक लंबी सांस खींचे और उसे रोक कर रखें. इसके बाद अगर आप 40 सेकंड तक सांस रोक सकते हैं तो समझ लें कि आपके फेफड़े पूरी तरह फिट है. वहीं अगर आप 20 से 25 सेकंड तक सांस रोक पा रहे हैं तो यह भी नॉर्मल माना जाता है. इसके अलावा अगर आप 20 सेकंड से पहले ही सांस छोड़ देते हैं तो यह संकेत है कि आपका फेफड़ों पर प्रदूषण का असर हो रहा है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि लोगों को डीप ब्रीदिंग और ब्रेथ होल्डिंग टेस्ट हफ्ते में एक बार जरूर करना चाहिए. लगातार सांस लेने में भारीपन, खांसी या थकान महसूस हो रही है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. डॉक्टर PFT, Chest X-ray या CT Scan जैसी जांच से यह पता लगा सकते हैं कि प्रदूषण में आपके फेफड़ों को कितना नुकसान पहुंचा है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गलत तरीके से बनाया गया हेल्दी फूड भी बढ़ा सकता है फैट, जानें सही तरीका

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पतंजलि का आध्यात्मिक मिशन: लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करने वाली क्रांति!

पतंजलि का आध्यात्मिक मिशन: लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करने वाली क्रांति!



पतंजलि का दावा है कि योग और आयुर्वेद की प्राचीन भारतीय परंपराओं को आधुनिक जीवनशैली से जोड़ने वाले पतंजलि योगपीठ का ‘आध्यात्मिक मिशन’ आज विश्व स्तर पर लाखों लोगों को स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा है. पतंजलि ने बताया कि हमारा संगठन न केवल योगासन और प्राणायाम के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत कर रहा है, बल्कि आध्यात्मिक जागरण के जरिए मानसिक शांति और नैतिक मूल्यों को भी पुनर्जीवित कर रहा है. अब लाखों लोग स्वदेशी उत्पादों और प्राकृतिक चिकित्सा अपनाकर रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम कर रहे हैं.

पतंजलि ने बताया, ”आध्यात्मिक मिशन महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर आधारित है, जो ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर मन की अशांति को दूर करने पर जोर देता है. हरिद्वार स्थित योगपीठ में प्रतिवर्ष लाखों लोग योग शिविरों में भाग लेते हैं, जहां बाबा रामदेव के व्याख्यान आध्यात्मिकता को दैनिक जीवन से जोड़ते हैं. योग न केवल शरीर का व्यायाम है, बल्कि आत्मा का संनादन है.”

हमारे प्रोडक्ट्स से बाजार में आई क्रांति- पतंजलि

पतंजलि का दावा है, ”इस मिशन ने ग्रामीण भारत से लेकर शहरी मध्यम वर्ग तक को प्रभावित किया है. पतंजलि आयुर्वेद के उत्पाद जैसे हर्बल दवाएं, ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ और कॉस्मेटिक्स ने बाजार में क्रांति ला दी है. 2024 में पतंजलि ने 50 लाख से अधिक परिवारों तक मुफ्त योग किट वितरित की, जिससे डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों में 30% कमी दर्ज की गई, जैसा कि संगठन के आंकड़ों से स्पष्ट है.”

पतंजलि का कहना है, ”यह मिशन केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. पतंजलि ने ‘स्वदेशी आंदोलन’ को आध्यात्मिक आयाम दिया है, जहां उपभोक्ताओं को विदेशी उत्पादों का बहिष्कार करने और भारतीय संस्कृति को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम, जैसे ‘महिला सशक्तिकरण योग शिविर’ और ‘युवा जागरण यात्रा’, ने लाखों को सशक्त बनाया है.”

आयुष मंत्रालय के मानकों पर आधारित हैं हमारे उत्पाद- पतंजलि

हालांकि, आलोचनाएं भी हैं. कुछ विशेषज्ञ पतंजलि के उत्पादों की वैज्ञानिक जांच पर सवाल उठाते हैं, लेकिन पतंजलि का दावा है कि सभी उत्पाद आयुष मंत्रालय के मानकों पर आधारित हैं. भविष्य में पतंजलि का ‘ग्लोबल योग एंबेसी’ प्रोजेक्ट लाखों को जोड़ेगा, जो आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा.

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