पतंजलि का आध्यात्मिक मिशन: लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करने वाली क्रांति!

पतंजलि का आध्यात्मिक मिशन: लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करने वाली क्रांति!



पतंजलि का दावा है कि योग और आयुर्वेद की प्राचीन भारतीय परंपराओं को आधुनिक जीवनशैली से जोड़ने वाले पतंजलि योगपीठ का ‘आध्यात्मिक मिशन’ आज विश्व स्तर पर लाखों लोगों को स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा है. पतंजलि ने बताया कि हमारा संगठन न केवल योगासन और प्राणायाम के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत कर रहा है, बल्कि आध्यात्मिक जागरण के जरिए मानसिक शांति और नैतिक मूल्यों को भी पुनर्जीवित कर रहा है. अब लाखों लोग स्वदेशी उत्पादों और प्राकृतिक चिकित्सा अपनाकर रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम कर रहे हैं.

पतंजलि ने बताया, ”आध्यात्मिक मिशन महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर आधारित है, जो ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर मन की अशांति को दूर करने पर जोर देता है. हरिद्वार स्थित योगपीठ में प्रतिवर्ष लाखों लोग योग शिविरों में भाग लेते हैं, जहां बाबा रामदेव के व्याख्यान आध्यात्मिकता को दैनिक जीवन से जोड़ते हैं. योग न केवल शरीर का व्यायाम है, बल्कि आत्मा का संनादन है.”

हमारे प्रोडक्ट्स से बाजार में आई क्रांति- पतंजलि

पतंजलि का दावा है, ”इस मिशन ने ग्रामीण भारत से लेकर शहरी मध्यम वर्ग तक को प्रभावित किया है. पतंजलि आयुर्वेद के उत्पाद जैसे हर्बल दवाएं, ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ और कॉस्मेटिक्स ने बाजार में क्रांति ला दी है. 2024 में पतंजलि ने 50 लाख से अधिक परिवारों तक मुफ्त योग किट वितरित की, जिससे डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों में 30% कमी दर्ज की गई, जैसा कि संगठन के आंकड़ों से स्पष्ट है.”

पतंजलि का कहना है, ”यह मिशन केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. पतंजलि ने ‘स्वदेशी आंदोलन’ को आध्यात्मिक आयाम दिया है, जहां उपभोक्ताओं को विदेशी उत्पादों का बहिष्कार करने और भारतीय संस्कृति को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम, जैसे ‘महिला सशक्तिकरण योग शिविर’ और ‘युवा जागरण यात्रा’, ने लाखों को सशक्त बनाया है.”

आयुष मंत्रालय के मानकों पर आधारित हैं हमारे उत्पाद- पतंजलि

हालांकि, आलोचनाएं भी हैं. कुछ विशेषज्ञ पतंजलि के उत्पादों की वैज्ञानिक जांच पर सवाल उठाते हैं, लेकिन पतंजलि का दावा है कि सभी उत्पाद आयुष मंत्रालय के मानकों पर आधारित हैं. भविष्य में पतंजलि का ‘ग्लोबल योग एंबेसी’ प्रोजेक्ट लाखों को जोड़ेगा, जो आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा.

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अब जरूरी नहीं सुबह का नाश्ता, नई रिसर्च में सामने आई हैरान करने वाली बात

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पुरुषों से ज्यादा महिलाएं हैं हार्ट से जुड़ी बीमारियों की शिकार, रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

पुरुषों से ज्यादा महिलाएं हैं हार्ट से जुड़ी बीमारियों की शिकार, रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा



आज के समय में हार्ट डिजीज दुनिया भर में महिलाओं की मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह चौंकाने वाली बात है कि जहां पहले यह माना जाता था कि पुरुषों को हार्ट अटैक या दिल की बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है, वहीं अब आंकड़े बता रहे हैं कि महिलाएं भी इससे उतनी ही, बल्कि कुछ मामलों में ज्यादा प्रभावित हैं. महिलाएं अक्सर अपने लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं या फिर उन्हें किसी और बीमारी से जोड़ देती हैं, जिसकी वजह से इलाज में देरी होती है और जोखिम बढ़ जाता है, तो चलिए जानते हैं कि पुरुषों से ज्यादा हार्ट से जुड़ी बीमारियों की शिकार महिलाएं क्यों हैं. 

क्यों महिलाओं में बढ़ रहा है हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा?

लंबे समय तक यह माना गया कि महिलाएं हार्ट डिजीज से सुरक्षित हैं, लेकिन हाल के शोध बताते हैं कि यह एक गलतफहमी थी. असल में महिलाएं भी कई तरह के जोखिम कारकों से घिरी होती हैं. जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, और खराब लाइफस्टाइल इनका असर पुरुषों और महिलाओं पर अलग-अलग होता है. 

1. डायबिटीज – डायबिटीज पीड़ित महिलाओं में हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और अचानक हार्ट फेल होने का खतरा पुरुषों से कहीं ज्यादा होता है. ऐसी महिलाओं में हार्ट अटैक के बाद मौत की संभावना भी ज्यादा पाई जाती है. इसलिए डायबिटीज को कंट्रोल में रखने के लिए नियमित जांच, बैलेंस डाइट और डॉक्टर की सलाह अनुसार दवाओं का सेवन बेहद जरूरी है. 

2.  हाई ब्लड प्रेशर – 60 साल की उम्र के बाद महिलाओं में ब्लड प्रेशर की समस्या ज्यादा देखी जाती है और इसे कंट्रोल करना भी मुश्किल होता है. ऐसे में नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच करें, नमक का सेवन सीमित करें, एक्सरसाइज करें और तनाव को कम करें. 

4. कोलेस्ट्रॉल – महिलाओं में हाई कोलेस्ट्रॉल का असर दिल की बीमारियों पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा गंभीर होता है. इसलिए डॉक्टर की दी गई स्टैटिन दवाएं नियमित रूप से लें और तेल, तले हुए और मीठा खाने से परहेज करें. 

5. मोटापा – महिलाओं में मोटापा हार्ट डिजीज का एक बड़ा कारण है. वजन बढ़ने से ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और शुगर तीनों बढ़ जाते हैं. इसलिए रोजाना 60 से 90 मिनट पैदल चलना, योग या अन्य एक्सरसाइज करें और हेल्दी डाइट लें. 

6. फिजिकल इन एक्टिविटी – महिलाओं के व्यस्त जीवन में खुद के लिए समय निकालना मुश्किल होता है, लेकिन यही सबसे बड़ी गलती है. इनएक्टिव रहने से दिल की मांसपेशियां कमजोर होती हैं और बल्ड फ्लो धीमा पड़ जाता है. इसलिए हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट नॉर्मल एक्सरसाइज या 75 मिनट तेज एक्सरसाइज जरूर करें.

7. धूम्रपान – धूम्रपान करने वाली महिलाओं में हार्ट अटैक का खतरा पुरुषों से कहीं ज्यादा होता है, खासकर मेनोपॉज के बाद, इसलिए धूम्रपान छोड़ें और पासिव स्मोकिंग से भी बचें. 

महिलाओं में खास जोखिम

1. मेनोपॉज – मेनोपॉज से पहले महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन होता है, जो दिल को सुरक्षा देता है. लेकिन मेनोपॉज के बाद जब यह हार्मोन कम हो जाता है, तो हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) हर महिला के लिए जरूरी नहीं है. बेहतर होगा कि महिलाएं नेचुरल तरीके अपनाएं. जैसे मेडिटेशन, एक्सरसाइज और बैलेंस डाइट. 

2. प्रेगेनेंसी कंपलिकेशन्स – जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रेशर समय से पहले प्रसव या डायबिटीज की समस्या हुई हो, उनमें आगे चलकर हार्ट डिजीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.  ऐसी महिलाओं को अपनी मेडिकल हिस्ट्री डॉक्टर को जरूर बतानी चाहिए और नियमित जांच करवानी चाहिए. 

दिल को हेल्दी रखने के आसान उपाय

1. धूम्रपान छोड़ें – यह दिल के लिए सबसे बड़ा खतरा है. 

2. एक्टिव रहें – हर दिन कम से कम 30 मिनट तेज चलें. 

3. बैलेंस डाइट लें – फल, सब्जियां, साबुत अनाज और मछली का सेवन करें. 

4. वजन कंट्रोल रखें – BMI 25 से कम और कमर 35 इंच से कम रखें. 

5. तनाव कम करें –  मेडिटेशन और पूरी नींद लें.

यह भी पढ़ें महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज कब हो जाता है खतरनाक, कब तक ये नॉर्मल है?

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40 की उम्र पार करते ही महिला और पुरुष को कराने चाहिए ये टेस्ट, यहां देख लें अलग-अलग लिस्ट

40 की उम्र पार करते ही महिला और पुरुष को कराने चाहिए ये टेस्ट, यहां देख लें अलग-अलग लिस्ट


पुरुषों में 40 की उम्र के बाद प्रोस्टेट ग्रंथि में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. इसे समय रहते पहचानना बहुत जरूरी है. इसके लिए टेस्ट अलग-अलग हैं. जैसे PSA टेस्ट, यह ब्लड टेस्ट है जो प्रोस्टेट से जुड़े एंटीजन के स्तर को मापता है, DRE, डॉक्टर प्रोस्टेट ग्रंथि को सीधे जांचते हैं और प्रोस्टेट बायोप्सी, प्रोस्टेट के टिशू का नमूना लेकर जांच की जाती है.

40 के बाद पुरुषों में मूत्राशय कैंसर का खतरा भी बढ़ता है. इसके लिए समय-समय पर यूरिन टेस्ट या अन्य जांच कराना जरूरी है.

40 के बाद पुरुषों में मूत्राशय कैंसर का खतरा भी बढ़ता है. इसके लिए समय-समय पर यूरिन टेस्ट या अन्य जांच कराना जरूरी है.

पुरुषों में 40 की उम्र के बाद डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. ब्लड शुगर टेस्ट से टाइप 2 डायबिटीज का पता चलता है. इस उम्र में  शुगर होने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए नियमित जांच जरूरी है.

पुरुषों में 40 की उम्र के बाद डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. ब्लड शुगर टेस्ट से टाइप 2 डायबिटीज का पता चलता है. इस उम्र में शुगर होने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए नियमित जांच जरूरी है.

महिलाओं के लिए जरूरी टेस्ट में पहला सीबीसी टेस्ट है. सीबीसी टेस्ट एक ब्लड टेस्ट है जो शरीर में रेड ब्लड सेल्स , व्हाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन की मात्रा को मापता है. यह टेस्ट एनीमिया, संक्रमण और कुछ कैंसर का पता लगाने में मदद करता है.

महिलाओं के लिए जरूरी टेस्ट में पहला सीबीसी टेस्ट है. सीबीसी टेस्ट एक ब्लड टेस्ट है जो शरीर में रेड ब्लड सेल्स , व्हाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन की मात्रा को मापता है. यह टेस्ट एनीमिया, संक्रमण और कुछ कैंसर का पता लगाने में मदद करता है.

महिलाओं के लिए 40 की उम्र के बाद किडनी के स्वास्थ्य के लिए किडनी फंक्शन टेस्ट टेस्ट जरूरी है. इसमें ब्लड में क्रिएटिनिन, यूरिया और यूरिक एसिड की मात्रा मापी जाती है. इससे किडनी की कार्यप्रणाली का सही अंदाजा लगता है.

महिलाओं के लिए 40 की उम्र के बाद किडनी के स्वास्थ्य के लिए किडनी फंक्शन टेस्ट टेस्ट जरूरी है. इसमें ब्लड में क्रिएटिनिन, यूरिया और यूरिक एसिड की मात्रा मापी जाती है. इससे किडनी की कार्यप्रणाली का सही अंदाजा लगता है.

40 की उम्र के बाद महिलाओं को नियमित रूप से स्तन कैंसर की जांच करवानी चाहिए. जैसे मैमोग्राम टेस्ट, यह टेस्ट स्तन में किसी भी असामान्य गांठ का पता लगाने में मदद करता है, CA 15-3 टेस्ट, यह ब्लड में स्तन कैंसर से जुड़े प्रोटीन के स्तर को मापता है.

40 की उम्र के बाद महिलाओं को नियमित रूप से स्तन कैंसर की जांच करवानी चाहिए. जैसे मैमोग्राम टेस्ट, यह टेस्ट स्तन में किसी भी असामान्य गांठ का पता लगाने में मदद करता है, CA 15-3 टेस्ट, यह ब्लड में स्तन कैंसर से जुड़े प्रोटीन के स्तर को मापता है.

40 की उम्र के बाद महिलाओं को कोलन और रेक्टल कैंसर टेस्ट भी करवाना चाहिए. CEA टेस्ट रक्त में CEA प्रोटीन के स्तर को मापता है. बढ़ा हुआ स्तर कोलन या रेक्टल कैंसर का संकेत दे सकता है.

40 की उम्र के बाद महिलाओं को कोलन और रेक्टल कैंसर टेस्ट भी करवाना चाहिए. CEA टेस्ट रक्त में CEA प्रोटीन के स्तर को मापता है. बढ़ा हुआ स्तर कोलन या रेक्टल कैंसर का संकेत दे सकता है.

Published at : 04 Nov 2025 06:12 PM (IST)



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खून में घुसकर नसों में सूजन पैदा कर रहा दिल्ली का प्रदूषण, धीरे-धीरे मौत के करीब आ रहा आम इंसान

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महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज कब हो जाता है खतरनाक, कब तक ये नॉर्मल है?

महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज कब हो जाता है खतरनाक, कब तक ये नॉर्मल है?



महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज आना एक सामान्य प्रक्रिया होती है. इसे मेडिकल लैंग्वेज में ल्यूकोरिया कहा जाता है. यह वजाइना को साफ, नम और संक्रमण से सुरक्षित रखने में मदद करता है. ज्यादातर महिलाओं में यह ओव्यूलेशन पीरियड से पहले या बाद में या हार्मोनल बदलाव के कारण होता है. कभी-कभी तनाव कमजोरी या नींद की कमी की वजह से भी व्हाइट डिस्चार्ज हो सकता है.

जब तक व्हाइट डिस्चार्ज में कोई बदबू, खुजली या रंग में बदलाव नहीं होता है, तब तक यह पूरी तरह सामान्य माना जाता है और शरीर के हेल्दी फंक्शन का संकेत होता है, लेकिन कई बार महिलाओं में व्हाइट डिस्चार्ज खतरनाक हो जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि महिलाओं में कब व्हाइट डिस्चार्ज खतरनाक हो जाता है.

कब होता है व्हाइट डिस्चार्ज खतरनाक?

अगर व्हाइट डिस्चार्ज की मात्रा ज्यादा हो जाए, रंग पीला, हरा या भूरा दिखने लगे और उसमें बदबू आने लगे तो यह किसी संक्रमण या बीमारी का संकेत हो सकता है. ऐसी कंडीशन में वजाइना में खुजली, जलन या दर्द महसूस होता है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि नॉर्मल डिस्चार्ज से डरने की बात नहीं होती है, लेकिन इसके रंग या गंध में बदलाव कई बीमारियों का संकेत दे सकता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि बैक्टीरियल वेजिनोसिस जैसी समस्याओं में डिस्चार्ज पतला और बदबूदार हो जाता है. वहीं ट्राइकोमोनियासिस में डिस्चार्ज पीला या हरा दिखता है. इसके अलावा फंगल इन्फेक्शन में यह गाढ़ा दिखाई देता है.

 व्हाइट डिस्चार्ज  के आम कारण

  • हार्मोनल बदलाव- ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन के बढ़ने से वजाइना में व्हाइट डिस्चार्ज होता है.
  • प्रेगनेंसी- शुरुआती प्रेगनेंसी में हार्मोनल बदलाव के कारण भी व्हाइट डिस्चार्ज बढ़ सकता है.
  • यीस्ट इंफेक्शन- फंगस ज्यादा होने की वजह से महिलाओं में वाइट डिस्चार्ज हो सकता है.
  • बैक्टीरियल वेजिनोसिस- वजाइना के बैक्टीरिया में असंतुलन के कारण भी वाइट डिस्चार्ज हो सकता है.
  • तनाव और नींद की कमी- तनाव और नींद की कमी भी अस्थाई रूप से हार्मोन के लेवल को प्रभावित करती है, जिसके कारण महिलाओं में वाइट डिस्चार्ज होता है.

किन लक्षणों के होने पर करना चाहिए डॉक्टर से संपर्क?

  • अगर व्हाइट डिस्चार्ज  के समय खुजली, जलन या बदबू आने लगे तो आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.
  • इसके अलावा  व्हाइट डिस्चार्ज गंध या झागदार बनने लगे तो भी डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
  • डिस्चार्ज का रंग पीला, हरा या भूरा होने पर भी आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
  • अगर व्हाइट डिस्चार्ज के समय रेशे या स्किन में सूजन जैसे दिक्कतें होती है तो भी आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

 व्हाइट डिस्चार्ज के संक्रमण से बचने के लिए क्या करें?

  • व्हाइट डिस्चार्ज में होने वाले संक्रमण से बचने के लिए महिलाओं को रोजाना वजाइना की साफ-सफाई का ध्यान रखना और सिंथेटिक के बजाए सूती अंडर गारमेंट्स पहनने चाहिए.
  • इसके अलावा गीले कपड़े या पेटी लाइनर लंबे समय तक नहीं पहने चाहिए.
  • वहीं प्राइवेट पार्ट्स को सूखा और साफ रखना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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