क्या सोते समय ब्रा पहनने घटने लगता है ब्रेस्ट साइज? दूर कर लीजिए कंफ्यूजन

क्या सोते समय ब्रा पहनने घटने लगता है ब्रेस्ट साइज? दूर कर लीजिए कंफ्यूजन


बहुत से लोग सोचते हैं कि रात को ब्रा पहनने से ब्रेस्ट का आकार छोटा हो सकता है या समय के साथ साइज घट सकता है. यह बात समाज में बहुत आम है. लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों और एक्सपर्ट की राय इस मिथक को पूरी तरह खारिज करती है. दरअसल, ब्रेस्ट का आकार मुख्य रूप से जीन, हार्मोन और बॉडी फैट पर निर्भर करता है. सोते समय ब्रा पहनना या न पहनना सीधे तौर पर ब्रेस्ट टिशू या आकार को प्रभावित नहीं करता. इसका मतलब यह हुआ कि रात में ब्रा पहनने से आपका ब्रेस्ट छोटा नहीं होता और न ही बढ़ता है.

ब्रा पहनने के फायदे

  • सपोर्ट और आराम – कुछ महिलाओं के लिए, खासकर जिनके ब्रेस्ट बड़े हैं, सोते समय सपोर्टिव ब्रा पहनना आरामदायक हो सकता है. यह ब्रेस्ट को ढीला होने या खिंचाव से बचाता है.
  • स्टाइल और पोज – रात को ब्रा पहनने से सुबह ब्रेस्ट का आकार थोड़ा फर्म दिख सकता है. लेकिन यह असली साइज में कोई बदलाव नहीं करता.

ब्रा न पहनने के फायदे

  • कम दबाव – रात में बिना ब्रा सोने से ब्रेस्ट पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता.
  • स्किन की सेहत – कुछ महिलाओं को बिना ब्रा सोने पर त्वचा पर रेशे या ब्रा की लाइन से जलन कम महसूस होती है.

प्लास्टिक सर्जन और एक्सपर्ट विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्रेस्ट का आकार केवल हार्मोनल बदलाव, वजन बढ़ने या घटने और उम्र के साथ बदलता है. न कि ब्रा पहनने से. कई रिसर्च में पाया गया कि सोते समय ब्रा पहनने से ब्रेस्ट की शेप या साइज पर कोई वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता.

मिथक का कारण

यह मिथक शायद इसलिए फैल गया क्योंकि कुछ महिलाओं को रात में ब्रा पहनने से असहजता होती है और वे सोचती हैं कि इसका असर उनके ब्रेस्ट पर पड़ रहा है. वास्तविकता में यह केवल असुविधा है, आकार में बदलाव नहीं.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं

डॉ. शंकीला मित्तल, जो दिल्ली के एक प्रसिद्ध त्वचा विशेषज्ञ हैं. अपने वीडियो में वह बताती हैं कि सोते समय ब्रा पहनने से ब्रेस्ट साइज पर कोई असर नहीं पड़ता. वह कहती हैं कि यह सिर्फ एक मिथक है. ब्रेस्ट का आकार हार्मोनल बदलाव, वजन में परिवर्तन और उम्र के साथ बदलता है, न कि ब्रा पहनने से. उन्होंने ब्रेस्ट रैशेज, फंगल इंफेक्शन्स और स्किन हाइजीन के बारे में भी जानकारी दी. तो अगली बार जब कोई कहे कि “रात को ब्रा पहनने से ब्रेस्ट छोटा हो जाता है,” तो जान लें कि यह सिर्फ एक मिथक है. हकीकत में, आराम और पसंद ही तय करती है कि आपको ब्रा पहननी चाहिए या नहीं.

अगर सरल शब्दों में कहा तो  सोते समय ब्रा पहनना या न पहनना पूरी तरह व्यक्तिगत पसंद और आराम पर निर्भर करता है. ब्रेस्ट का साइज घटने या बढ़ने का इससे कोई लेना-देना नहीं है. अगर आप रात में आराम से सो पाती हैं तो ब्रा पहन सकती हैं. और अगर असुविधा होती है तो बिल्कुल न पहनें.

इसे भी पढ़ें- किडनी फेलियर के ये 7 लक्षण कभी न करें इग्नोर, जान लें इन्हें पहचानने का तरीका

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस उम्र में कराएंगी IVF तो गुड न्यूज मिलनी पक्की, डॉक्टरों ने ढूंढ निकाला तगड़ा फॉर्म्युला

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आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) यानी टेस्ट ट्यूब बेबी की मदद से मां बनने की चाहत रखने वाली महिलाओं के लिए बड़ी खुशखबरी है. लंदन के किंग्स कॉलेज के वैज्ञानिकों ने नई रिसर्च में देखा कि अगर 35 से 42 साल की महिलाएं आईवीएफ कराने से पहले भ्रूण का खास टेस्ट कराएं तो उनके मां बनने की संभावना बढ़ सकती है. इस टेस्ट को पीजीटी-ए (प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग फॉर एनीयूप्लॉइडी) कहते हैं, जो भ्रूण को गर्भाशय में डालने से पहले उसकी जेनेटिक जांच करता है. आइए जानते हैं कि यह कैसे काम करता है और क्यों है इतना खास?

पीजीटी-ए टेस्ट क्या है?

जब कोई महिला आईवीएफ के जरिए बच्चा पैदा करना चाहती है तो भ्रूण को लैब में तैयार करके गर्भाशय में डाला जाता है. हालांकि, कई बार भ्रूण में क्रोमोसोम्स की गड़बड़ी की वजह से कंसीव नहीं हो पाता या मिसकैरेज हो जाता है. खासकर 35 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है. पीजीटी-ए टेस्ट में भ्रूण की जांच की जाती है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसमें क्रोमोसोम्स सही हैं या नहीं. अगर भ्रूण में कोई गड़बड़ी नहीं है तो उसे गर्भाशय में डाला जाता है, जिससे गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है.

रिसर्च में क्या पाया गया?

किंग्स कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च में 100 महिलाओं को शामिल किया. इनमें 50 महिलाओं ने पीजीटी-ए टेस्ट के साथ आईवीएफ कराया, जबकि बाकी 50 ने नॉर्मल तरीके से आईवीएफ कराया. जिन महिलाओं ने पीजीटी-ए टेस्ट कराया, उनमें 72% ने हेल्दी बेबी को जन्म दिया. वहीं, सामान्य तरीके से आईवीएफ कराने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 52 पर्सेंट रहा. इसके अलावा पीजीटी-ए टेस्ट कराने वाली महिलाओं को कम बार भ्रूण ट्रांसफर करने की जरूरत पड़ी. इससे उनका समय बचा और बार-बार असफल होने का स्ट्रेस भी कम हुआ. ये उन महिलाओं के लिए राहत की बात है, जो काफी समय से मां बनने की कोशिश कर रही हैं.

ये टेस्ट इतना जरूरी क्यों?

35 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में भ्रूण में क्रोमोसोम्स की गड़बड़ी की आशंका बढ़ जाती है. इसकी वजह से कई बार गर्भधारण नहीं हो पाता या फिर गर्भपात का खतरा रहता है. किंग्स कॉलेज के डॉ. यूसुफ बीबीजौन बताते हैं कि आजकल बहुत सी महिलाएं 35 साल से ज्यादा उम्र में परिवार शुरू करने की योजना बनाती हैं, लेकिन इस उम्र में भ्रूण में क्रोमोसोम्स की समस्या होने का खतरा ज्यादा होता है. इससे कंसीव करने में मुश्किल आती है. हमारी रिसर्च दिखाती है कि पीजीटी-ए टेस्ट का सही इस्तेमाल करने से ज्यादा महिलाएं जल्दी मां बन सकती हैं.

ये भी पढ़ें: मेंटल हेल्थ करनी है मजबूत तो रोजाना खेलें ये इनडोर गेम्स, डॉक्टर भी करते हैं रेकमंड

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खाने के बाद तुरंत सोना सही या एक्सरसाइज करना? जान लें सेहत के फायदे की बात

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खाने के तुरंत बाद बैठने या लेटने की बजाय हल्का मूवमेंट करें. ये शरीर को भोजन पचाने और ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद करता है.

पैरों की एड़ियों को उठाना और नीचे रखना (calf raises) ग्लूकोज को मसल्स में जाने में मदद करता है. इससे ब्लड शुगर स्पाइक कम होता है.

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Research बताती है कि खाने के बाद हल्की physical activity postprandial glucose levels कम कर सकती है. Light walking या calf raises दोनों कारगर हैं.

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हल्की एक्सरसाइज ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाती है. इससे पेट और इंटेस्टाइन में रक्त प्रवाह बेहतर होता है और digestion सुचारू रहता है.

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हल्की वॉक या जगह पर march करने से पेट भारीपन और bloating कम होती है. Gastroenterology studies भी इसे सपोर्ट करती हैं.

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खाने के बाद हल्की मूवमेंट अपनाएं. Blood sugar कंट्रोल में रहे और digestion बेहतर हो. Simple steps, long-term benefits.

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Published at : 26 Aug 2025 07:52 PM (IST)


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कुत्ता काटने से किन-किन बीमारियों का रहता है खतरा, जानें कितने घंटे के अंदर इंजेक्शन लगाना है जरूरी

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रेबीज़: कुत्ता काटने से सबसे बड़ा खतरा रेबीज़ का होता है. यह वायरस दिमाग और नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है. समय पर इंजेक्शन न लगे तो यह जानलेवा साबित होता है.

टिटनस: कुत्ते के दांत और पंजे पर मौजूद बैक्टीरिया घाव के जरिए शरीर में जाकर टिटनस पैदा कर सकते हैं. इससे मांसपेशियों में जकड़न और सांस लेने में तकलीफ हो सकती है.

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बैक्टीरियल इंफेक्शन: कुत्ते के मुंह में मौजूद बैक्टीरिया घाव में जाकर सूजन, लालिमा और पस का कारण बनते हैं. कई बार यह इंफेक्शन शरीर में फैलकर सेप्सिस तक का खतरा पैदा कर सकता है.

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स्किन एलर्जी और जलन: कुछ लोगों को कुत्ता काटने के बाद स्किन पर एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है. इसमें घाव के आसपास खुजली, लाल दाने और तेज जलन महसूस होती है.

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इंजेक्शन कब लगवाएं: डॉक्टरों के मुताबिक, कुत्ता काटने के 24 घंटे के अंदर रेबीज़ का पहला इंजेक्शन लगवाना जरूरी है. देरी करने से वायरस शरीर में फैल सकता है.

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कितने इंजेक्शन लगते हैं: रेबीज से बचाव के लिए आमतौर पर 4 से 5 इंजेक्शन लगाए जाते हैं. ये अलग-अलग दिनों पर दिए जाते हैं ताकि बॉडी वायरस से लड़ने की क्षमता बना सके.

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तुरंत क्या करें: कुत्ता काटने पर सबसे पहले घाव को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं. किसी घरेलू नुस्खे के बजाय तुरंत डॉक्टर के पास जाएं और इंजेक्शन लगवाएं.

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Published at : 26 Aug 2025 05:39 PM (IST)


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किडनी फेलियर के ये 7 लक्षण  कभी न करें इग्नोर, जान लें इन्हें पहचानने का तरीका

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सबसे पहला संकेत यूरिन में बदलाव है. अगर अचानक यूरिन कम हो जाए या झागदार (फोमी) यूरिन दिखे, तो यह किडनी के प्रोटीन लीक होने का संकेत हो सकता है.

सूजन (एडेमा) भी किडनी की खराबी का आम लक्षण है. पैरों, टखनों और चेहरे पर अचानक सूजन आना इस बात का संकेत है कि शरीर में अतिरिक्त पानी जमा हो रहा है.

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लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना भी किडनी फेलियर का लक्षण है. यह इसलिए होता है क्योंकि किडनी लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करने वाले हार्मोन की क्षमता कम कर देती हैं.

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किडनी की समस्या से सांस फूलना भी शुरू हो सकता है. जब फेफड़ों में पानी भरने लगता है, तो हल्की गतिविधि या लेटने पर भी सांस लेने में कठिनाई होती है.

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बार-बार मतली और उल्टी होना भी किडनी फेलियर की निशानी है. खून में अपशिष्ट पदार्थ जमा होने से पेट में जलन, भूख कम लगना और मुंह में धातु जैसा स्वाद आने लगता है.

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किडनी की खराबी से त्वचा पर खुजली और रूखापन भी हो सकता है. शरीर से टॉक्सिन बाहर न निकलने के कारण यह समस्या बढ़ती जाती है, खासकर बीमारी के आगे के चरणों में.

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आख़िर में, किडनी फेलियर दिमाग को भी प्रभावित कर सकता है. इससे भ्रम, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और याददाश्त की दिक्कतें होने लगती हैं, जो गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती हैं.

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Published at : 26 Aug 2025 05:21 PM (IST)


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