हर साल जरूर कराएं ये 5 टेस्ट, शरीर में घर बना चुकी हर बीमारी का बताते हैं पता

हर साल जरूर कराएं ये 5 टेस्ट, शरीर में घर बना चुकी हर बीमारी का बताते हैं पता


डॉक्टरों का कहना है कि सालाना हेल्थ चेकअप सिर्फ एक मेडिकल रूटीन नहीं, बल्कि खुद के प्रति जिम्मेदारी का संकेत है. रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में महिलाएं अक्सर खुद को पीछे कर देती हैं, लेकिन एक सालाना टेस्ट कई गंभीर बीमारियों की दिशा बदल सकता है.

कई समस्याएं खासकर हार्मोनल और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी शुरुआत में बिल्कुल चुप रहती हैं. इसलिए लक्ष्य साफ है: जो दिक्कतें छिपी हैं उन्हें समय रहते पकड़ना, जो उभर रही हैं उन्हें रोकना और आने वाले जोखिमों से बचाव करना. एक्सपर्ट कहते हैं कि कुछ वार्षिक जांचें महिलाओं में बड़ा फर्क लाती हैं.

कई समस्याएं खासकर हार्मोनल और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी शुरुआत में बिल्कुल चुप रहती हैं. इसलिए लक्ष्य साफ है: जो दिक्कतें छिपी हैं उन्हें समय रहते पकड़ना, जो उभर रही हैं उन्हें रोकना और आने वाले जोखिमों से बचाव करना. एक्सपर्ट कहते हैं कि कुछ वार्षिक जांचें महिलाओं में बड़ा फर्क लाती हैं.

सर्वाइकल और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वाइकल कैंसर कई साल तक बिना किसी चेतावनी के बढ़ सकता है. डॉक्टर 21 साल की उम्र से सालाना पॉप टेस्ट की सलाह देते हैं. यौन सक्रिय महिलाओं के लिए एचपीबी और एसटीआई जांच उपयोगी साबित होती है. पेल्विक एग्जाम और अल्ट्रासाउंड से फाइब्रॉइड, पीसीओडी, सिस्ट और एंडोमेट्रियोसिस जैसी आम समस्याएं जल्दी पकड़ी जा सकती हैं.

सर्वाइकल और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वाइकल कैंसर कई साल तक बिना किसी चेतावनी के बढ़ सकता है. डॉक्टर 21 साल की उम्र से सालाना पॉप टेस्ट की सलाह देते हैं. यौन सक्रिय महिलाओं के लिए एचपीबी और एसटीआई जांच उपयोगी साबित होती है. पेल्विक एग्जाम और अल्ट्रासाउंड से फाइब्रॉइड, पीसीओडी, सिस्ट और एंडोमेट्रियोसिस जैसी आम समस्याएं जल्दी पकड़ी जा सकती हैं.

ब्रेस्ट हेल्थ की सालाना जांच भी उतनी ही जरूरी है. युवा महिलाओं के लिए क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम या अल्ट्रासाउंड बेहतर विकल्प है, जबकि 40 की उम्र के बाद मैमोग्राफी छोटी से छोटी गांठ तक पकड़ लेती है. कई महिलाएं लक्षण न होने पर जांच टाल देती हैं, जबकि ब्रेस्ट से जुड़ी बीमारियां अक्सर चुपचाप बढ़ती रहती हैं.

ब्रेस्ट हेल्थ की सालाना जांच भी उतनी ही जरूरी है. युवा महिलाओं के लिए क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम या अल्ट्रासाउंड बेहतर विकल्प है, जबकि 40 की उम्र के बाद मैमोग्राफी छोटी से छोटी गांठ तक पकड़ लेती है. कई महिलाएं लक्षण न होने पर जांच टाल देती हैं, जबकि ब्रेस्ट से जुड़ी बीमारियां अक्सर चुपचाप बढ़ती रहती हैं.

ब्लड टेस्ट महिलाओं की सेहत की आधारशिला माने जाते हैं. CBC से एनीमिया और इंफेक्शन का पता चलता है, टीएसएच थायरॉयड समस्याओं की ओर इशारा करता है, शुगर और एचबीसी1c डायबिटीज का शुरुआती संकेत देते हैं और लिपिड प्रोफाइल हार्ट डिज़ीज के जोखिम को दिखाता है. लिवर और किडनी फंक्शन भी इन जांचों में शामिल होते हैं.

ब्लड टेस्ट महिलाओं की सेहत की आधारशिला माने जाते हैं. CBC से एनीमिया और इंफेक्शन का पता चलता है, टीएसएच थायरॉयड समस्याओं की ओर इशारा करता है, शुगर और एचबीसी1c डायबिटीज का शुरुआती संकेत देते हैं और लिपिड प्रोफाइल हार्ट डिज़ीज के जोखिम को दिखाता है. लिवर और किडनी फंक्शन भी इन जांचों में शामिल होते हैं.

विटामिन D और B12 की कमी 30 की उम्र के बाद महिलाओं में बहुत आम है. ये कमियां चुपचाप बढ़ती हैं और थकान, बालों का झड़ना, मूड स्विंग और हड्डियों के दर्द जैसी परेशानियाँ पैदा करती हैं. सालाना जांच से इन कमियों को आसानी से पहचाना और सही किया जा सकता है.

विटामिन D और B12 की कमी 30 की उम्र के बाद महिलाओं में बहुत आम है. ये कमियां चुपचाप बढ़ती हैं और थकान, बालों का झड़ना, मूड स्विंग और हड्डियों के दर्द जैसी परेशानियाँ पैदा करती हैं. सालाना जांच से इन कमियों को आसानी से पहचाना और सही किया जा सकता है.

35 से 40 की उम्र के बाद दिल, हड्डियों और मेटाबॉलिज्म से जुड़े जोखिम बढ़ने लगते हैं. इसलिए ब्लड प्रेशर, BMI, कमर का माप, यूरिन टेस्ट, ECG और 40 से 50 के बाद बोन डेंसिटी स्कैन बेहद उपयोगी हैं. जिन महिलाओं के परिवार में दिल की बीमारी या कैंसर का हिस्ट्री है, उन्हें कुछ अतिरिक्त जांचों की भी सलाह दी जाती है.

35 से 40 की उम्र के बाद दिल, हड्डियों और मेटाबॉलिज्म से जुड़े जोखिम बढ़ने लगते हैं. इसलिए ब्लड प्रेशर, BMI, कमर का माप, यूरिन टेस्ट, ECG और 40 से 50 के बाद बोन डेंसिटी स्कैन बेहद उपयोगी हैं. जिन महिलाओं के परिवार में दिल की बीमारी या कैंसर का हिस्ट्री है, उन्हें कुछ अतिरिक्त जांचों की भी सलाह दी जाती है.

Published at : 05 Dec 2025 03:27 PM (IST)

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शरीर में कितने साल रहने पर HIV वायरस बन जाता है AIDS, जानें कब हो जाता है खतरनाक?

शरीर में कितने साल रहने पर HIV वायरस बन जाता है AIDS, जानें कब हो जाता है खतरनाक?



When HIV Symptoms Start To Appear: HIV यानी ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस एक ऐसा वायरस है जो हमारे शरीर की इम्क्षयून सिस्टम पर हमला करता है. यह खास तौर पर CD4 टी-सेल्स और मैक्रोफेज को निशाना बनाता है, जो शरीर को इंफेक्शन से बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वायरस धीरे-धीरे इन सेल्स को कमजोर करता जाता है, जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटती चली जाती है. जब इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है, तो शरीर सामान्य इंफेक्शन से भी लड़ नहीं पाता. ऐसे में कई तरह के रेयर इंफेक्शन और कैंसर आसानी से हमला कर सकते हैं. इन्हें ऑपर्च्युनिस्टिक इंफेक्शंस कहा जाता है, यानी ऐसे इंफेक्शन जो मौके का फायदा उठाते हैं.

AIDS क्या है?

AIDS का मतलब है एक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम. यह HIV इंफेक्शन का सबसे गंभीर स्टेप होता है, जब शरीर का इम्यून सिस्टम काफी हद तक नष्ट हो चुका होता है.  HIV ही AIDS का कारण है, और डॉक्टर इसकी पहचान विशेष तरह के इंफेक्शन और शरीर में आई इम्यून कमी के आधार पर करते हैं.

HIV के शुरुआती लक्षण

अधिकतर लोग HIV होने पर शुरुआत में समझ ही नहीं पाते कि वे इंफेक्टेड हो चुके हैं. कुछ लोगों में शुरुआती दिनों में फ्लू जैसे लक्षण दिख सकते हैं जैसे बुखार, रैश, जोड़ों में दर्द, लिम्फ नोड्स का सूजना. यह दौर सीरो-कन्वर्जन कहलाता है, यानी जब शरीर वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाना शुरू करता है। यह आमतौर पर संक्रमण के 1से 2 महीने के भीतर होता है.  भले ही लक्षण न दिखें, HIV से इंफेक्टेड व्यक्ति उस समय भी दूसरों को वायरस दे सकता है. HIV का पता केवल HIV टेस्ट से ही चलता है. समय के साथ HIV इम्यून सिस्टम को कमजोर करता रहता है. जब प्रतिरोधक क्षमता बहुत गिर जाती है, तो शरीर बार-बार इंफेक्शन्स का शिकार होता है, और यही स्थिति आगे चलकर AIDS में बदल जाती है

HIV कब AIDS बन जाता है?

Unaids के अनुसार, AIDS, HIV इंफेक्शन का सबसे एडवांस्ड स्टेज है. अगर इलाज न किया जाए, तो अधिकतर मरीज 8 से 10 साल के भीतर AIDS के लक्षण दिखाने लगते हैं. AIDS की पहचान कुछ विशेष इंफेक्शन और लक्षणों के आधार पर होती है-

  • स्टेज 1: बिना लक्षण- इसे AIDS नहीं माना जाता
  • स्टेज 2: त्वचा या म्यूकस की समस्याएं, बार-बार सर्दी-खांसी जैसी इंफेक्शन
  • स्टेज 3: एक महीने से ज्यादा चलने वाला दस्त, गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन, फेफड़ों का टीबी
  • स्टेज 4: गंभीर स्थितियां जैसे ब्रेन का टॉक्सोप्लाजमोसिस, खाने की नली या फेफड़ों में कैंडिडा, कपोसी सारकोमा आदि

ये सभी बीमारियां सामान्य इंसानों में आसानी से ठीक हो जाती हैं, लेकिन कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं.

इसे भी पढ़ें- अब वजन घटाने डाइट के लिए प्लान बनाना आसान, फिजियोथेरेपिस्ट ने बताया ChatGPT का स्मार्ट तरीका

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों का सुपरफूड: बथुआ खाने से किडनी और लिवर को मिलेगी नई जान, आचार्य बालकृष्ण ने बताए फायदे

सर्दियों का सुपरफूड: बथुआ खाने से किडनी और लिवर को मिलेगी नई जान, आचार्य बालकृष्ण ने बताए फायदे



Benefits of Eating Bathua in Winter: सर्दियों का मौसम अपने साथ स्वाद और सेहत का खजाना लेकर आता है. इस मौसम में बाजारों में हरी पत्तेदार सब्जियों की बहार आ जाती है. सरसों, मेथी और पालक के अलावा एक और साग है जो गुणों की खान है और वह है ‘बथुआ’. आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य बालकृष्ण ने सर्दियों में बथुआ खाने के ऐसे चमत्कारी फायदे बताए हैं, जिन्हें जानकर आप आज ही इसे अपनी डाइट का हिस्सा बना लेंगे.

पोषक तत्वों का पावरहाउस 

बथुआ को सर्दियों का ‘सुपरफूड’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. यह छोटा सा दिखने वाला हरा साग अमीनो एसिड, फाइबर और विटामिन्स का भंडार है. इसमें विटामिन A, B और C प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा, बथुआ आयरन, पोटैशियम, कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे जरूरी मिनरल्स से भी भरपूर होता है. यही कारण है कि भारतीय रसोई में ठंड के दिनों में बथुए का विशेष महत्व है.


आयुर्वेद की नजर में बथुआ 

आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, बथुआ केवल एक सब्जी नहीं बल्कि औषधि है. यह शरीर में वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित रखने में मदद करता है. आयुर्वेद में इसे पेट और पाचन तंत्र के लिए अमृत समान माना गया है.

किडनी और लिवर के लिए वरदान 

बथुआ का सबसे बड़ा फायदा हमारे शरीर के ‘फिल्टर’ यानी किडनी और लिवर को मिलता है. यह साग लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करता है, जिससे शरीर से विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं. किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी बथुआ राहत प्रदान करता है. इसका नियमित सेवन खून को साफ करता है, जिसका सीधा असर हमारी त्वचा पर दिखाई देता है. कील-मुंहासों से छुटकारा मिलता है और चेहरा प्राकृतिक रूप से चमकने लगता है.

पाचन और हड्डियों को मजबूती 

जिन लोगों को पेट की समस्या रहती है, उनके लिए बथुआ रामबाण है. इसमें मौजूद फाइबर और पानी की अधिक मात्रा कब्ज को दूर कर पेट साफ करती है और पाचन क्रिया को सुधारती है. साथ ही, इसमें मौजूद विटामिन C और कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाते हैं. इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं जो शरीर में सूजन और चोट को जल्दी ठीक करने में सहायक हैं. आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी बथुआ काफी कारगर है, खासकर उन लोगों के लिए जो ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं.

कैसे करें सेवन? 

बथुए को आप कई तरीकों से खा सकते हैं. इसका जूस खाली पेट पीना सबसे ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा आप इसे दाल में मिलाकर, इसका रायता बनाकर या फिर इसके स्वादिष्ट पराठे बनाकर भी खा सकते हैं.

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Garlic Benefits: सर्दी में लहसुन है ‘सेहत का खजाना’, आचार्य बालकृष्ण ने बताए गजब के फायदे

Garlic Benefits: सर्दी में लहसुन है ‘सेहत का खजाना’, आचार्य बालकृष्ण ने बताए गजब के फायदे



Benefits of Garlic: सर्दियों का मौसम आते ही खाने-पीने की आदतों में बदलाव जरूरी हो जाता है. इस मौसम में शरीर को गर्म रखने और बीमारियों से बचाने के लिए रसोई में मौजूद चीजें ही औषधि का काम करती हैं. पतंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण ने हाल ही में लहसुन (Garlic) को लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं. उन्होंने बताया कि लहसुन केवल खाने का जायका बढ़ाने वाला मसाला नहीं है, बल्कि यह सर्दियों में शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

दिल और जोड़ों के लिए रामबाण 

आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, अगर लहसुन का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह दिल की सेहत (Heart Health) के लिए बेहद फायदेमंद है. यह खून में जमा खराब कोलेस्ट्रॉल (Bad Cholesterol) को कम करने में मदद करता है, जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और हार्ट संबंधी बीमारियों का खतरा कम होता है. इसके अलावा, सर्दियों में अक्सर लोगों को जोड़ों के दर्द और जकड़न की शिकायत रहती है. लहसुन का सेवन इन समस्याओं में भी राहत दिलाता है.

इम्यूनिटी बूस्टर और डिटॉक्स 

सर्दियों में इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है, जिससे सर्दी-जुकाम जल्दी पकड़ लेता है. लहसुन शरीर की गर्मी को बरकरार रखता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. आचार्य जी बताते हैं कि यह शरीर से विषैले पदार्थों (Toxins) को बाहर निकालने और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में भी मददगार है.

सेवन का सही तरीका लहसुन के फायदों को अधिकतम करने के लिए आचार्य बालकृष्ण ने इसे खाने का एक खास तरीका बताया है:

  • रात में भिगोकर: रात को लहसुन की 1-2 कलियों को छीलकर पानी में भिगो दें. सुबह खाली पेट इस पानी को पी लें या लहसुन की कलियों को चबाकर खाएं. यह तरीका कोलेस्ट्रॉल और बीपी को कंट्रोल करने में सबसे ज्यादा असरदार है.
  • गुनगुने पानी के साथ: आप सुबह खाली पेट 1-2 कच्ची कलियां गुनगुने पानी के साथ भी ले सकते हैं.

दर्द के लिए लहसुन का तेल जोड़ों के दर्द, सूजन या मांसपेशियों की जकड़न के लिए आचार्य जी ने लहसुन के तेल की मालिश की सलाह दी है. इसे बनाने की विधि बहुत सरल है:

  • लगभग 50 ग्राम लहसुन को कूट लें.
  • इसे 100 से 200 ग्राम सरसों, नारियल या जैतून के तेल में पकाएं.
  • जब लहसुन काला पड़ जाए, तो तेल को छानकर रख लें. इस तेल से दर्द वाले हिस्से पर मालिश करने से काफी आराम मिलता है. यह नर्वस सिस्टम को भी मजबूत बनाता है और वात दोष को शांत करता है.

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30 साल उम्र के बाद नजर आएं ये 4 साइन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना कोलन कैंसर बना लेगा शिकार

30 साल उम्र के बाद नजर आएं ये 4 साइन तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना कोलन कैंसर बना लेगा शिकार


साल 2025 में करीब 1,07,320 नए कोलन कैंसर केस आने का अनुमान था. सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोलन कैंसर अब युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहा है. आमतौर पर यह 50 साल के बाद देखा जाता है, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं और इसका कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है.

ऐसे में सबसे जरूरी है इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना. समय पर लक्षण दिख जाएं तो ठीक जल्दी होता है और इलाज आसान बन जाता है. डॉक्टर लगातार सलाह दे रहे हैं कि छोटी-छोटी चेतावनियों को भी हल्के में न लें.

ऐसे में सबसे जरूरी है इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना. समय पर लक्षण दिख जाएं तो ठीक जल्दी होता है और इलाज आसान बन जाता है. डॉक्टर लगातार सलाह दे रहे हैं कि छोटी-छोटी चेतावनियों को भी हल्के में न लें.

एक वायरल इंस्टाग्राम वीडियो में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहाब ने 30 की उम्र में दिखने वाले चार संभावित लक्षण बताए हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरा बढ़ा सकता है, लेकिन इन्हें समय पर पहचानने से जीवन बच सकता है.

एक वायरल इंस्टाग्राम वीडियो में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहाब ने 30 की उम्र में दिखने वाले चार संभावित लक्षण बताए हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरा बढ़ा सकता है, लेकिन इन्हें समय पर पहचानने से जीवन बच सकता है.

पहला संकेत है बेहद थकान. डॉक्टर के अनुसार, कोलन कैंसर धीरे-धीरे खून में कमी ला सकता है, जिससे कमजोरी और ज्यादा नींद आने लगती है. रिसर्च का भी मानता है कि कैंसर से जुड़ी थकान की एक बड़ी वजह एनीमिया ही है.

पहला संकेत है बेहद थकान. डॉक्टर के अनुसार, कोलन कैंसर धीरे-धीरे खून में कमी ला सकता है, जिससे कमजोरी और ज्यादा नींद आने लगती है. रिसर्च का भी मानता है कि कैंसर से जुड़ी थकान की एक बड़ी वजह एनीमिया ही है.

दूसरा संकेत है रात में पसीना. डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर सेल्स इंफ्लेमेटरी प्रोटीन छोड़ते हैं, जिससे शरीर में हल्का बुखार और रात में पसीना आने लगता है. कई रिपोर्टों में यह बताया गया है कि कैंसर से जुड़े नाइट स्वेट्स अक्सर बहुत तेज और असामान्य होते हैं.

दूसरा संकेत है रात में पसीना. डॉक्टर बताते हैं कि कैंसर सेल्स इंफ्लेमेटरी प्रोटीन छोड़ते हैं, जिससे शरीर में हल्का बुखार और रात में पसीना आने लगता है. कई रिपोर्टों में यह बताया गया है कि कैंसर से जुड़े नाइट स्वेट्स अक्सर बहुत तेज और असामान्य होते हैं.

तीसरा बड़ा संकेत है बॉवेल हैबिट में बदलाव, जैसे अचानक कब्ज या दस्त बढ़ जाना. यह आमतौर पर कैंसर से बनने वाले ब्लॉकेज के कारण होता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पेट दर्द, दस्त, कब्ज ये सभी कोलोरेक्टल कैंसर के संकेत हो सकते हैं.

तीसरा बड़ा संकेत है बॉवेल हैबिट में बदलाव, जैसे अचानक कब्ज या दस्त बढ़ जाना. यह आमतौर पर कैंसर से बनने वाले ब्लॉकेज के कारण होता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पेट दर्द, दस्त, कब्ज ये सभी कोलोरेक्टल कैंसर के संकेत हो सकते हैं.

चौथा और सबसे अहम संकेत है स्टूल में खून. डॉक्टर इसे  कोलन कैंसर का क्लासिक निशान बताते हैं. जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के अनुसार, मल में खून आना अक्सर कोलन या रेक्टम में कहीं से ब्लीडिंग का संकेत होता है. अगर यह बार-बार हो, तो इसे हल्के में बिल्कुल नहीं लेना चाहिए.

चौथा और सबसे अहम संकेत है स्टूल में खून. डॉक्टर इसे कोलन कैंसर का क्लासिक निशान बताते हैं. जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के अनुसार, मल में खून आना अक्सर कोलन या रेक्टम में कहीं से ब्लीडिंग का संकेत होता है. अगर यह बार-बार हो, तो इसे हल्के में बिल्कुल नहीं लेना चाहिए.

युवाओं में बढ़ते मामलों को देखते हुए, इन छोटे लेकिन गंभीर संकेतों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. समय पर पहचान न सिर्फ कैंसर पकड़ने में मदद करती है, बल्कि इलाज के नतीजों को भी बेहतर बनाती है.

युवाओं में बढ़ते मामलों को देखते हुए, इन छोटे लेकिन गंभीर संकेतों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. समय पर पहचान न सिर्फ कैंसर पकड़ने में मदद करती है, बल्कि इलाज के नतीजों को भी बेहतर बनाती है.

Published at : 05 Dec 2025 12:41 PM (IST)

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