युवाओं में होने वाला तीसरा सबसे कॉमन है ये कैंसर, शुरुआती संकेत ही होते हैं बेहद खतरनाक

युवाओं में होने वाला तीसरा सबसे कॉमन है ये कैंसर, शुरुआती संकेत ही होते हैं बेहद खतरनाक


अब तक माना जाता था कि कैंसर जैसी बीमारियाँ सिर्फ बुजुर्गों को होती हैं. लेकिन हाल की रिसर्च से साफ हो गया है कि कोलोन कैंसर (बड़ी आंत का कैंसर) अब युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है. खासकर 20 से 40 साल की उम्र के बीच के लोग अब इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं. American Cancer Society और World Health Organization (WHO) के अनुसार, कोलोन कैंसर अब युवाओं में होने वाला तीसरा सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर बन चुका है.

रिसर्च क्या कहती है?

JAMA Network और NIH (National Institutes of Health) की रिपोर्ट के अनुसार, 20 से 49 साल के युवाओं में कोलोन और रेक्टल कैंसर के मामले पिछले दो दशकों में लगातार बढ़े हैं. American Cancer Society की 2024 की रिपोर्ट में बताया गया है कि 50 साल से कम उम्र के लोगों में कैंसर के जो नए मामले सामने आते हैं, उनमें से तीसरे नंबर पर कोलोन कैंसर है. यही नहीं, 1990 के बाद जन्मे युवाओं में इस कैंसर का खतरा 1950 के दशक में जन्मे लोगों की तुलना में दोगुना हो गया है.

कोलोन कैंसर तीसरे नंबर पर क्यों?

कई शोध और कैंसर रजिस्ट्री डेटा बताते हैं कि युवाओं में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कैंसर इस क्रम में आते हैं, ब्रेस्ट कैंसर (महिलाओं में) टेस्टिकुलर या स्किन कैंसर (पुरुषों में) थायरॉइड या लिंफोमा कोलोन और रेक्टल कैंसर (सामूहिक रूप से कोलोरेक्टल कैंसर) यानी यह युवाओं में तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है.

लक्षण जो दिखते हैं, पर कर दिए जाते हैं नजरअंदाज

  • पेट दर्द या मरोड़
  • मल में खून आना
  • कब्ज या बार-बार दस्त
  • कमजोरी और थकान
  • वजन का अचानक गिरना
  • पेट में फुलाव या भारीपन

चूंकि ये लक्षण आम पाचन समस्याओं जैसे लगते हैं, इसलिए कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन यही गलती बीमारी को बढ़ा सकती है.

कम उम्र में क्यों हो रहा कैंसर?

  • जंक फूड और रेड मीट का अधिक सेवन
  • डाइट में फाइबर की कमी
  • लंबे समय तक बैठकर काम करना
  • अल्कोहल और स्मोकिंग
  • नींद और तनाव की समस्या
  • पेट के अच्छे बैक्टीरिया का असंतुलन

कैसे बचें?

  • फल, सब्जियां और फाइबर से भरपूर चीजें खाएं
  • रोजाना थोड़ी एक्सरसाइज करें
  • पानी ज्यादा पिएं
  • धूम्रपान और शराब से बचें
  • पेट की किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें

कोलोन कैंसर अब केवल उम्रदराज़ लोगों की नहीं, बल्कि युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही गंभीर बीमारी है. रिसर्च कहती है कि यह अब युवाओं में होने वाला तीसरा सबसे आम कैंसर है. इसकी पहचान जल्दी हो जाए तो इलाज संभव है. इसलिए शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें और समय पर जांच कराएं.

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पैरों में जलन होना इन गंभीर बीमारियों का है संकेत, कहीं आप तो नहीं कर रहे इग्नोर

पैरों में जलन होना इन गंभीर बीमारियों का है संकेत, कहीं आप तो नहीं कर रहे इग्नोर


डायबिटिक न्यूरोपैथी: अगर आपको डायबिटीज है और पैरों में जलन महसूस होती है, तो यह न्यूरोपैथी का संकेत हो सकता है. इसमें शरीर की नसें धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. अगर समय रहते इलाज न किया जाए तो यह स्थायी नुकसान कर सकती है.

विटामिन बी12 की कमी: शरीर में विटामिन B12 की कमी से भी पैरों में झनझनाहट, सुन्नता और जलन हो सकती है. यह नसों के कामकाज को प्रभावित करता है और तंत्रिका तंत्र की कार्यक्षमता को कमजोर करता है.

विटामिन बी12 की कमी: शरीर में विटामिन B12 की कमी से भी पैरों में झनझनाहट, सुन्नता और जलन हो सकती है. यह नसों के कामकाज को प्रभावित करता है और तंत्रिका तंत्र की कार्यक्षमता को कमजोर करता है.

किडनी फेल होना: किडनी की बीमारी या क्रॉनिक किडनी फेलियर में शरीर से विषैले तत्व पूरी तरह बाहर नहीं निकलते. ये टॉक्सिन्स नसों को प्रभावित कर सकते हैं और पैरों में जलन या झनझनाहट का कारण बन सकते हैं.

किडनी फेल होना: किडनी की बीमारी या क्रॉनिक किडनी फेलियर में शरीर से विषैले तत्व पूरी तरह बाहर नहीं निकलते. ये टॉक्सिन्स नसों को प्रभावित कर सकते हैं और पैरों में जलन या झनझनाहट का कारण बन सकते हैं.

थायराइड की समस्या: हाइपोथायरायडिज्म यानी थायराइड का कम काम करना भी पैरों में जलन का कारण बन सकता है. इसमें शरीर की मेटाबॉलिज्म धीमी हो जाती है और नसों पर असर पड़ता है, जिससे जलन या चुभन महसूस हो सकती है.

थायराइड की समस्या: हाइपोथायरायडिज्म यानी थायराइड का कम काम करना भी पैरों में जलन का कारण बन सकता है. इसमें शरीर की मेटाबॉलिज्म धीमी हो जाती है और नसों पर असर पड़ता है, जिससे जलन या चुभन महसूस हो सकती है.

परिधीय संचार विकार:  (Peripheral Artery Disease - PAD) पैरों तक ब्लड सप्लाई कम हो जाती है, जिससे ऑक्सीजन की कमी से नसों में जलन, दर्द या ऐंठन हो सकती है. यह स्थिति दिल की बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है.

परिधीय संचार विकार: (Peripheral Artery Disease – PAD) पैरों तक ब्लड सप्लाई कम हो जाती है, जिससे ऑक्सीजन की कमी से नसों में जलन, दर्द या ऐंठन हो सकती है. यह स्थिति दिल की बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है.

शराब का अधिक सेवन: ज्यादा शराब पीने से अल्कोहलिक न्यूरोपैथी हो सकती है, जो नसों को प्रभावित करती है. इससे पैरों में जलन, सुन्नता और कमजोरी महसूस होती है. यह स्थिति धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है.

शराब का अधिक सेवन: ज्यादा शराब पीने से अल्कोहलिक न्यूरोपैथी हो सकती है, जो नसों को प्रभावित करती है. इससे पैरों में जलन, सुन्नता और कमजोरी महसूस होती है. यह स्थिति धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है.

Published at : 07 Aug 2025 03:36 PM (IST)

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ये 5 गलतियां बढ़ा देती हैं डिमेंशिया का खतरा, डॉक्टरों ने बता दिया बचने का तरीका

ये 5 गलतियां बढ़ा देती हैं डिमेंशिया का खतरा, डॉक्टरों ने बता दिया बचने का तरीका


DementiaPrevention: डिमेंशिया एक ऐसी बीमारी है, जो आपके दिमाग के सोचने, समझने और याददाश्त की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है. यह सिर्फ मामूली भूलने की आदत नहीं होती, बल्कि यह इतनी ज्यादा गंभीर है कि इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी में रुकावट बन सकती है. डिमेंशिया से पीड़ित लोगों को नाम याद रखने, बातचीत करने और दिन-तारीख याद रखने में दिक्कत होती है. जैसे-जैसे समय बीतता है, उन्हें चीजों की योजना बनाने, सही फैसले लेने और अपने करीबी लोगों या जगहों को पहचानने में भी मुश्किल हो सकती है. डिमेंशिया कई तरह का हो सकता है, जिनमें सबसे आम अल्जाइमर रोग है. इसके अलावा वैस्कुलर डिमेंशिया, लेवी बॉडी डिमेंशिया और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया भी बेहद खतरनाक होते हैं. भले ही इनके नाम अलग हों, लेकिन इनके लक्षण अक्सर मिलते-जुलते होते हैं. इनमेंं भ्रम, मूड बदलना या बोलने में परेशानी होना आदि शामिल हैं. 

इन लोगों को ज्यादा होती है दिक्कत

ये बीमारी आमतौर पर बुजुर्गों को प्रभावित करती है, लेकिन यह बढ़ती उम्र का स्वाभाविक हिस्सा नहीं है. कुछ लोगों को 40 या 50 की उम्र में भी डिमेंशिया हो सकता है. हालांकि ऐसा कम ही होता है. पारिवारिक हिस्ट्री, हाई ब्लड प्रेशर, डायबटीज और काम शारीरिक और मानसिक सक्रियता इसके खतरे को बढ़ा सकते हैं.

न्यूरोसर्जन डॉ. जायद अलमादीदी ने एक वीडियो के जरिए बताया कि डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों से कैसे बचा जा सकता हैं. लोग अक्सर उनसे पूछते हैं कि क्या मैं अल्जाइमर से बच सकता हूं? इस पर उन्होंने सीडीसी द्वारा बताए गए पांच कारणों पर चर्चा की, जिनकी वजह से अल्जाइमर और डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. चलिए जानते हैं 5 अहम खतरे, जिनसे डिमेंशिया बढ़ सकता है.

1. फिजिकल एक्टिविटीज में कमी

सबसे पहले बात करते हैं एक्सरसाइज की. अगर आपका ज्यादा एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो इसका असर हमारे दिल या पेट पर ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी पड़ता हैं. नियमित रूप से एक्सरसाइज करने से दिमाग में खून का बहाव बढ़ता है, जिससे याददाश्त तेज होती है और दिमाग की सूजन कम होती है. हालांकि, जो लोग ज्यादातर समय बैठे रहते हैं या एक्टिव नहीं रहते, उनमें उम्र बढ़ने के साथ दिमागी ताकत घटने का खतरा ज्यादा होता है. ऐसे में जरूरी यह नहीं कि आप जिम जाएं या लंबी दौड़ लगाएं. बस हफ्ते में कुछ दिन हल्की-फुल्की एक्सरसाइज जैसे टहलना, तैरना, डांस या योग करना भी फायदेमंद हो सकता है.

2. डायबिटीज से भी खतरा

अगर आपका शुगर लेवल लगातार ऊपर-नीचे होता रहता है और कंट्रोल में नहीं रहता तो इसका असर आपके दिमाग पर भी पड़ सकता है. अगर काफी वक्त तक ब्लड शुगर हाई रहता है तो ब्रेन की नसें डैमेज हो सकती हैं. इससे याददाश्त कमजोर होने लगती है और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. अगर आप समय पर दवाएं और हेल्दी डाइट लें. साथ ही, समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच कराते रहें तो अपने दिमाग को इन खतरों से बचा सकते हैं. 

3. हाई ब्लड प्रेशर

हमारा दिमाग स्पंज की तरह होता है, जिसे बेहतर तरीके से काम करने के लिए लगातार खून की जरूरत होती है. जब ब्लड प्रेशर बढ़ता है तो ये ब्लड फ्लो गड़बड़ा जाता है, जिससे स्ट्रोक, भूलने की बीमारी और वैस्कुलर डिमेंशिया जैसी परेशानियों का खतरा बढ़ जाता है. परेशानी यह है कि हाई ब्लड प्रेशर अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाता, इसलिए समय-समय पर इसकी जांच कराना जरूरी है. हेल्दी डाइट, रोजाना थोड़ा चलने-फिरने और जरूरत होने पर दवाएं लेकर इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है.

4. बहरापन 

अक्सर लोग सोचते हैं कि बहरापन सिर्फ कानों की समस्या है, लेकिन यह दिमाग पर भी असर डाल सकता है. जब हम ठीक से नहीं सुन पाते तो हमारा दिमाग आवाजें पकड़ने में ज्यादा मेहनत करता है, जिससे उसकी बाकी जरूरी कामों में क्षमता घटने लगती है. इनमें याददाश्त और सोचने की ताकत जैसी चीजें शामिल हैं. इसके अलावा सुनाई न देना अक्सर लोगों को समाज से दूर कर देता है, यह मानसिक सेहत के लिए भी खतरनाक हो सकता है.  ऐसे में डिमेंशिया का खतरा बढ़ जाता है.

5. तंबाकू और शराब का सेवन

धूम्रपान और ज्यादा शराब पीना, दोनों ही आपके दिमाग के दुश्मन हैं. सिगरेट पीने से मस्तिष्क में खून और ऑक्सीजन की सप्लाई कम हो जाती है, जिससे उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ता है. वहीं, अगर आप लगातार काफी ज्यादा शराब पीते हैं तो इससे दिमाग की कोशिकाएं सिकुड़ सकती हैं. अगर पहले से कोई बीमारी हो तो हल्की शराब भी नुकसान पहुंचा सकती है. अगर आप दिमाग और शरीर दोनों को हेल्दी रखना चाहते हैं तो स्मोकिंग और शराब से दूरी बना लें.

कैसे कराएं डिमेंशिया का इलाज? 

डिमेंशिया का फिलहाल कोई इलाज नहीं है, लेकिन अगर इसकी पहचान सही समय पर हो जाए और सही देखभाल मिले तो इसके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है. दवाओं, थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव करके इसके लक्षणों को तेजी से बढ़ने से रोका जा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि शारीरिक रूप से एक्टिव रहें, दिमाग को बिजी रखें और सामाजिक तौर पर दूसरों से जुड़े रहें, इससे डिमेंशिया से निपटना थोड़ा आसान हो सकता है.

ये भी पढ़ें: डाइट में शामिल किए ये 4 फूड्स तो थायराइड नहीं करेगा परेशान, लेकिन इन तीन से रहें दूर

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डाइट में शामिल किए ये 4 फूड्स तो थायराइड नहीं करेगा परेशान, लेकिन इन तीन से रहें दूर

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आपकी गर्दन में एक छोटी-सी थायराइड ग्लैंड होती है, लेकिन इसका काम बहुत बड़ा होता है. यह मेटाबॉलिज्म, एनर्जी, दिल की धड़कन और मूड जैसी जरूरी चीजों को कंट्रोल करती है. जब यह ठीक से काम नहीं करती तो आपको थकान, वजन बढ़ना और बाल झड़ने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.

आगरा में गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. गौरी राय के अनुसार थायराइड प्रॉब्लम्स के लिए दवाएं जरूरी हैं, लेकिन सही डाइट भी बहुत मदद कर सकती है. आइए जानते हैं कि कौन से फूड्स आपके थायराइड के लिए बेस्ट हैं और किनसे आपको दूर रहना चाहिए?

थायराइड के लिए  बेस्ट फूड्स

सी वीड या समुद्री शैवाल: नोरी, केल्प और वाकामे जैसे सीवीड में बहुत सारा आयोडीन होता है. आयोडीन थायराइड हॉर्मोन बनाने के लिए बहुत जरूरी है. अगर आपको पहले से ही थायराइड की बीमारी है तो इसे ज्यादा खाने से बचें.

ब्राजील नट्स: ये सेलेनियम का बेहतरीन सोर्स हैं. सेलेनियम थायराइड हॉर्मोन को एक्टिवेट करने में मदद करता है और ग्लैंड को डैमेज होने से बचाता है. हर दिन बस एक या दो ब्राजील नट्स खाने से शरीर की सेलेनियम की जरूरत पूरी हो सकती है.

अंडे: अंडे में आयोडीन और सेलेनियम के साथ अच्छी क्वालिटी का प्रोटीन भी होता है. थायराइड के लिए पूरे अंडे (सिर्फ एग व्हाइट नहीं) खाना ज्यादा फायदेमंद है.

दही और डेयरी प्रोडक्ट्स: इनमें आयोडीन और विटामिन डी दोनों होते हैं. विटामिन डी की कमी से ऑटोइम्यून थायराइड बीमारियां हो सकती हैं. इसलिए, इन्हें अपनी डाइट में जरूर शामिल करें.

इन  फूड्स से रहें सावधान

क्रूसिफेरस वेजिटेबल्स: ब्रोकली, पत्तागोभी और केल जैसी सब्ज़ियों में गोइट्रोजन नाम का पदार्थ होता है. ये थायराइड की आयोडीन सोखने की कैपेसिटी को कम कर सकते हैं. अगर आपको आयोडीन की कमी है, तो इन सब्जियों को पकाकर और कम मात्रा में खाएं.

सोया प्रोडक्ट्स: टोफू और सोया दूध जैसे सोया प्रोडक्ट्स आपकी थायराइड की दवा के एब्जॉर्प्शन में रुकावट डाल सकते हैं. अगर आप थायराइड की दवा लेते हैं, तो दवा लेने के कुछ घंटों के भीतर सोया न खाएं.

ग्लूटेन: हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस जैसी बीमारियों वाले लोगों के लिए ग्लूटेन प्रॉब्लम कर सकता है. अगर आपको ग्लूटेन से सेंसिटिविटी है, तो डॉक्टर से पूछकर ग्लूटेन-फ्री डाइट फॉलो करना बेहतर हो सकता है.
कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले, खास कर अगर आपको कोई हेल्थ प्रॉब्लम है, तो अपने डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट से जरूर सलाह लें.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बरसात में शाम होते ही घर में आने लगे हैं कीट-पतंगे, ऐसे पा सकते हैं समस्या से निजात

बरसात में शाम होते ही घर में आने लगे हैं कीट-पतंगे, ऐसे पा सकते हैं समस्या से निजात


Insects in Rainy Season: बरसात की रिमझिम फुहारें जहां मौसम को खुशनुमा बना देती हैं, वहीं यह मौसम कुछ मेहमानों को भी साथ ले आता है,  जैसे मच्छर, छिपकलियां, तिलचट्टे और उड़ने वाले कीट-पतंगे.जैसे ही शाम ढलती है और घरों की लाइटें जलती हैं, वैसे ही कीट-पतंगों का एक झुंड घर की ओर आकर्षित होने लगता है. 

खिड़कियों, दरवाज़ों और यहां तक कि बाथरूम की जाली से भी यह अनचाहे मेहमान आपके घर में घुस जाते हैं. ये सिर्फ असहजता ही नहीं, कई बार यह कीट बीमारियों का कारण भी बन सकते हैं.  जैसे डेंगू, मलेरिया, स्किन इंफेक्शन या एलर्जी. 

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बारिश में कीट-पतंगों के घर में आने के मुख्य कारण

  • नमी और गीले कोनों की मौजूदगी
  • घर के आसपास पानी का जमा होना
  • खुली खिड़कियां और बिना जाली वाले दरवाजे
  • घर में रखी खराब हो रही सब्ज़ियां या गंदा कचरा
  • इन उपायों से पाएं कीट-पतंगों से निजात
  • खिड़की और दरवाजों पर मच्छरदानी या नेट लगाएं
  • शाम होते ही खिड़कियां बंद करें या नेट का इस्तेमाल करें, ताकि उड़ने वाले कीट अंदर न आ सकें

नीम और कपूर का धुआं करें

नीम की पत्तियों या कपूर को जलाकर उसका धुआं फैलाएं। इसका तेज़ गंध कीटों को दूर रखता है

नमी वाली जगहों को रखें सूखा

बाथरूम, किचन और सिंक के पास पानी जमा न होने दें। नम स्थानों को रोज़ाना सुखाएं

एसेंशियल ऑयल का प्रयोग करें

लेमनग्रास, सिट्रॉनेला और यूकेलिप्टस ऑयल को पानी में मिलाकर स्प्रे करने से कीट दूर रहते हैं

खिड़की के पास पीले रंग की बल्ब लगाएं

सामान्य सफेद या नीली लाइट की जगह पीले बल्ब का प्रयोग करें, जिससे कीट आकर्षित नहीं होते

घर के आसपास सफाई बनाए रखें

गमलों में पानी जमा न होने दें, कूड़ेदान समय से साफ करें और बाथरूम की सफाई नियमित करें

बरसात का मौसम जितना खूबसूरत होता है, उतनी ही चुनौतियां भी लाता है. कीट-पतंगों का घर में प्रवेश न केवल परेशान करता है, बल्कि सेहत के लिए भी खतरा बन सकता है. ऐसे में जरूरी है कि हम समय रहते सतर्क हो जाएं और कुछ आसान घरेलू उपायों को अपनाकर अपने घर को इन अनचाहे मेहमानों से बचाएं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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