सुबह-सुबह बना लें ये 5 हेल्दी रूटीन, कर देंगे आपको फिट और स्लिम
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मांसपेशियों में कमजोरी और थकान: विटामिन E की कमी से न्यूरोमस्कुलर सिस्टम प्रभावित होता है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी और जल्दी थकावट महसूस होती है. रोजमर्रा के छोटे काम भी थका देने लगते हैं.

नजर कमजोर होना या धुंधला दिखना: विटामिन E आंखों की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाता है. इसकी कमी से दृष्टि धुंधली हो सकती है, खासकर उम्र बढ़ने के साथ.

इम्यून सिस्टम का कमजोर होना: अगर आप बार-बार बीमार पड़ते हैं या वायरल इन्फेक्शन जल्दी पकड़ते हैं, तो इसकी एक वजह विटामिन E की कमी हो सकती है क्योंकि यह इम्यून सेल्स की कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद करता है.

स्किन ड्राई होना और जल्दी झुर्रियां आना: यह विटामिन त्वचा को नमी और सुरक्षा प्रदान करता है. इसकी कमी से स्किन रूखी, बेजान और समय से पहले उम्रदराज़ दिखने लगती है.

बालों का झड़ना और कमजोर होना: विटामिन E ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाकर बालों की जड़ों तक पोषण पहुंचाता है. इसकी कमी से बाल कमजोर होकर तेजी से टूटने लगते हैं.

नर्व डैमेज और संतुलन की समस्या: विटामिन E न्यूरोलॉजिकल हेल्थ के लिए जरूरी है. इसकी भारी कमी से नर्व डैमेज, हाथ-पैरों में झुनझुनाहट या शरीर के संतुलन में गड़बड़ी हो सकती है.
Published at : 04 Aug 2025 08:06 AM (IST)
बहुत से कपल्स पैरेंट बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन बार-बार प्रयास करने के बावजूद सफलता नहीं मिलती. इसकी सबसे बड़ी वजह सही समय का पता न होना है. महीने में कुछ दिन ऐसे होते हैं जब गर्भधारण की संभावना सबसे ज्यादा होती है. इस समय को ओव्यूलेशन पीरियड कहते हैं. अगर आप इन दिनों में रिलेशन बनाते हैं, तो प्रेग्नेंट होने के चांस काफी बढ़ जाते हैं.
हर महिला का ओव्यूलेशन समय अलग
गर्भधारण का सबसे अच्छा समय ओव्यूलेशन पीरियड माना जाता है. इस दौरान महिला के शरीर में अंडाणु तैयार होते हैं, जो 12 से 24 घंटे तक जीवित रहते हैं. लेकिन हर महिला का ओव्यूलेशन एक जैसा नहीं होता. यह उनके पीरियड साइकिल पर निर्भर करता है.
ओव्यूलेशन पीरियड कैसे पता करें?
अगर आपका मासिक धर्म चक्र 28 दिनों का है, तो आमतौर पर पीरियड शुरू होने के 14वें दिन ओव्यूलेशन होता है. ऐसे में 10वें दिन से 17वें दिन तक का समय फर्टाइल विंडो कहलाता है. इसी दौरान प्रेग्नेंसी के चांस सबसे ज्यादा रहते हैं. स्पर्म महिला के शरीर में लगभग 5 दिन तक जिंदा रह सकते हैं, इसलिए ओव्यूलेशन से 2-3 दिन पहले भी रिलेशन बनाने से गर्भधारण हो सकता है.
ओव्यूलेशन पहचानने के तरीके
ओव्यूलेशन किट: यह किट पेशाब में ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH) को मापती है. यह हार्मोन ओव्यूलेशन से पहले तेजी से बढ़ता है.
शरीर के संकेत: इस समय बॉडी टेम्परेचर हल्का बढ़ जाता है और कुछ महिलाओं के ब्रेस्ट में बदलाव महसूस होते हैं.
डॉक्टर की राय
गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. आशिक अली ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था. डॉ. अली के अनुसार, औसतन मासिक धर्म चक्र 28 दिनों का होता है और पीरियड का पहला दिन इसमें पहला दिन माना जाता है. आमतौर पर 14वें दिन ओव्यूलेशन होता है और 11वें से 17वें दिन तक का समय सबसे फर्टाइल माना जाता है. इस दौरान रिलेशन बनाने से गर्भधारण के चांस सबसे ज्यादा होते हैं.
वह कहती हैं कि अगर कपल्स इस समय में लगातार 1-2 महीने तक कोशिश करते हैं, तो प्रेग्नेंट होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. जिन महिलाओं के पीरियड्स रेगुलर नहीं होते, वे ओव्यूलेशन किट का इस्तेमाल कर सकती हैं या फॉलिक्युलर स्कैन करवा सकती हैं. यह टेस्ट डॉक्टर की मदद से किया जाता है, जिससे सही ओव्यूलेशन दिन पता चल जाता है. जरूरत पड़ने पर गाइनेकोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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गुरुग्राम के पारस हॉस्पिटल के डॉ. संजय गुप्ता बताते हैं कि ठंडी हवा लगने से पैरों की नसें सिकुड़ जाती हैं. इससे खून का प्रवाह कम हो जाता है और पैर ठंडे होने लगते हैं.

अगर शरीर में ब्लड फ्लो सही रहे तो शरीर को गर्माहट मिलती है. जब ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है तो ऑक्सीजन पैरों की स्किन तक नहीं पहुंच पाती है.

खून का प्रवाह कम होने से पैर ठंडे होने के साथ-साथ हल्के नीले दिखने लगते हैं. यह संकेत है कि आपके पैरों तक सही मात्रा में खून नहीं पहुंच रहा है.

अगर शरीर में थायराइड हॉर्मोन कम बनते हैं (हाइपोथायरायडिज्म) तो मेटाबोलिज्म धीमा हो जाता है. इससे ब्लड सर्कुलेशन, हार्ट बीट और बॉडी टेंपरेचर गड़बड़ा जाते हैं और पैर ठंडे रहते हैं.

एनीमिया यानी खून की कमी होने पर भी पैर ठंडे रहते हैं. आयरन, फॉलेट या विटामिन B12 की कमी से यह समस्या बढ़ सकती है. किडनी की बीमारी या डायलिसिस पर रहने वालों में भी ऐसा होता है.

नसों को नुकसान (नर्व डिसऑर्डर) या फ्रॉस्टबाइट से पैरों में दर्द और ठंडापन बना रहता है. किडनी या लिवर से जुड़ी बीमारियों में भी नसें डैमेज हो सकती हैं, जिससे कोल्ड फीट की समस्या होती है.

जो लोग ज्यादा तनाव या एंग्जाइटी में रहते हैं, उनमें पैरों में खून का प्रवाह कम हो जाता है. जैसे ही तापमान गिरता है, पैर ठंडे हो जाते हैं. स्ट्रेस कंट्रोल करना जरूरी है.
Published at : 03 Aug 2025 05:25 PM (IST)
क्या आप रात को बिस्तर पर लेटे हुए बस सोचते रहते हैं? यह आम बात है, लेकिन इससे नींद खराब होती है. अपनी नींद की क्वालिटी सुधारने और रात में ज्यादा सोचने से बचने के लिए आप कुछ साइकोलॉजिक्ल ट्रिक्स इस्तेमाल कर सकते हैं. आइए जानते हैं इन ट्रिक्स और टेक्निक्स के बारे में.
क्या आप रात को बिस्तर पर लेटे हुए बस सोचते रहते हैं? यह आम बात है, पर इससे नींद खराब होती है. अपनी नींद की क्वालिटी सुधारने और रात में ज़्यादा सोचने से बचने के लिए यहाँ 9 आसान और असरदार तरीके दिए गए हैं.
ब्रेन डंपिंग: सोने से पहले एक नोटबुक और पेन लें. आपके दिमाग में जो भी चल रहा है, जैसे चिंताएं, अधूरे काम, फीलिंग्स आदि सब लिख डालें. यह आपके दिमाग को खाली करने और चीजों को व्यवस्थित करने में मदद करता है, जिससे आप आराम से सो सकते हैं.
कंट्रोल्ड ब्रीदिंग: गहरी सांस लेने की टेक्निक्स आपके नर्वस सिस्टम को शांत करती हैं. आप 4-7-8 टेक्नीक ट्राई कर सकते हैं. 4 सेकंड के लिए नाक से सांस अंदर लें, 7 सेकंड के लिए सांस रोकें और 8 सेकंड के लिए मुंह से सांस बाहर छोड़ें. यह आपके मन को शांत करेगा.
प्रोग्रेसिव मसल रिलैक्सेशन: अपने शरीर के अलग-अलग मसल ग्रुप्स को धीरे-धीरे टाइट करें और फिर उन्हें ढीला छोड़ दें. पैरों से शुरू करके ऊपर की ओर बढ़ें. यह बॉडी के स्ट्रेस को कम करता है और रिलैक्सेशन को बढ़ावा देता है.
ग्रैटिट्यूड जर्नल: सोने से पहले उन तीन चीजों के बारे में लिखें, जिनके लिए आप आभारी हैं. यह आपका फोकस पॉजिटिव चीजों पर शिफ्ट करता है और नेगेटिव थॉट्स को कम करने में हेल्प करता है.
स्क्रीन टाइम कम करें: सोने से कम से कम एक घंटे पहले अपने फोन, टैबलेट और कंप्यूटर का इस्तेमाल बंद कर दें. स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आपके नींद के साइकिल को डिस्टर्ब कर सकती है.
रेगुलर स्लीप शेड्यूल: हर दिन एक ही टाइम पर सोएं और उठें, चाहे वीकेंड ही क्यों न हो. यह आपके शरीर की इंटरनल क्लॉक को सेट करने में मदद करता है, जिससे आपको बेहतर नींद आती है.
शांत माहौल: अपने बेडरूम को शांत, अंधेरा और ठंडा रखें. यह नींद के लिए एक आरामदायक माहौल बनाता है.
कैफीन और अल्कोहल से बचें: सोने से कुछ घंटे पहले कैफीन (चाय, कॉफी) और अल्कोहल का सेवन न करें, क्योंकि ये दोनों आपकी नींद में रुकावट डाल सकते हैं.
पॉजिटिव सेल्फ टॉक: अपने आप से पॉजिटिव बातें करें. खुद को याद दिलाएं कि आप सेफ हैं और आप आराम से सो सकते हैं. यह आपके माइंड को शांत करने में हेल्प करेगा. ये टेक्निक्स आपको रात में ज्यादा सोचने को रोकने और बेहतर नींद लेने में मदद कर सकती हैं. यदि आपको लगातार नींद की समस्या हो रही है, तो किसी डॉक्टर या मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से सलाह जरूर लें.
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लहसुन सिर्फ हमारे खाने का टेस्ट ही नहीं बढ़ाता, बल्कि यह एक नेचुरल सुपरफूड भी है, जिसके कई अमेजिंग हेल्थ बेनिफिट्स हैं. पका हुआ लहसुन भी अच्छा होता है, लेकिन कच्चा लहसुन खाने से आपको और भी ज्यादा न्यूट्रीएंटस मिलते हैं. यह आपकी इम्यूनिटी बढ़ाने से लेकर हार्ट हेल्थ सुधारने तक, आपकी बॉडी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है. आइए जानते हैं, क्यों आपको अपनी डेली रूटीन में कच्चा लहसुन क्यों शामिल करना चाहिए.
इम्यूनिटी को स्ट्रॉन्ग करता है लहसुन
अगर आप बार-बार सर्दी-ज़ुकाम और इन्फेक्शन से परेशान रहते हैं, तो कच्चा लहसुन आपकी हेल्प कर सकता है. इसमें स्ट्रॉन्ग एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल प्रॉपर्टीज होती हैं, जो आपकी बॉडी को बीमारियों से फाइट करने में हेल्प करती हैं. एक स्टडी के अकॉर्डिंग, कच्चे लहसुन में एलिसिन नाम का एक कंपाउंड होता है, जो आपकी इम्यूनिटी को बूस्ट करता है और हार्मफुल बैक्टीरिया को दूर रखता है. दिल्ली की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट डॉ. दीपा बंसल कहती हैं कि इसे रेगुलर खाने से सर्दी-जुकाम, फ्लू और दूसरे इन्फेक्शंस की सीवियरिटी और फ्रीक्वेंसी को कम किया जा सकता है.
हार्ट हेल्थ और ब्लड प्रेशर में फायदेमंद
हाई ब्लड प्रेशर एक साइलेंट किलर है और कच्चा लहसुन इसे कंट्रोल में रखने में हेल्प कर सकता है. स्टडीज से पता चला है कि लहसुन ब्लड वेसल्स को रिलैक्स करता है और ब्लड सर्कुलेशन को इम्प्रूव करता है, जिससे हार्ट डिजीज का रिस्क कम होता है. रिसर्च बताती है कि लहसुन कार्डियोवैस्कुलर प्रॉब्लम्स को प्रिवेंट करने में इफेक्टिव हो सकता है. यह बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और गुड कोलेस्ट्रॉल को स्टेबल रखता है, जिससे ओवरऑल हार्ट हेल्थ को प्रमोट किया जा सकता है.
नेचुरली डिटॉक्स करता है बॉडी
हमारी बॉडी लगातार खाने, पॉल्यूशन और दूसरे सोर्सेस से टॉक्सिन्स के कॉन्टैक्ट में रहती है. कच्चा लहसुन हार्मफुल सब्सटेंस को बाहर निकालकर आपके लिवर को क्लीन करने में हेल्प करता है. इसमें सल्फर कंपाउंड्स भी होते हैं, जो हैवी मेटल पॉइजनिंग से प्रोटेक्ट करते हैं, जिससे लिवर और किडनी जैसे ऑर्गन्स को होने वाले डैमेज को कम किया जा सकता है.
डाइजेशन में करता है हेल्प
एक हेल्दी गट ओवरऑल हेल्थ के लिए बहुत इम्पोर्टेंट है और लहसुन डाइजेशन इम्प्रूव करने में अहम रोल प्ले करता है. यह डाइजेस्टिव एंजाइम्स के प्रोडक्शन को बढ़ाता है, जिससे आपकी बॉडी को खाने को ज्यादा एफिशिएंटली डाइजेस्ट करने में हेल्प मिलती है. साथ ही, इसके एंटीबैक्टीरियल गुण हार्मफुल गट बैक्टीरिया को कंट्रोल में रखते हैं और गुड बैक्टीरिया की ग्रोथ को सपोर्ट करते हैं.
कैंसर रिस्क को करता है कम
डॉ. बंसल के मुताबिक, लहसुन में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो फ्री रेडिकल्स से फाइट करते हैं. ये फ्री रेडिकल्स सेल डैमेज और एजिंग के लिए रिस्पॉन्सिबल होते हैं. रिसर्च बताती है कि कच्चे लहसुन का रेगुलर सेवन कुछ कैंसर, जैसे पेट और कोलोरेक्टल कैंसर, के रिस्क को कम कर सकता है. यह सेल म्यूटेशन को रोकता है और ट्यूमर की ग्रोथ को स्लो करता है.
कच्चे लहसुन का कैसे करें उपयोग
अगर कच्चे लहसुन का स्ट्रांग टेस्ट आपको पसंद नहीं, तो इन टिप्स को फॉलो करें. इसे काटकर या कुचलकर खाने से पहले 10 मिनट के लिए रख दें. इससे एलिसिन की मात्रा एक्टिव हो जाती है. तीखे टेस्ट को बैलेंस करने के लिए इसे हनी (शहद) के साथ मिक्स करें. हल्के टेस्ट के लिए इसे स्मूदी या सलाद में ऐड करें.
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