जब मौत गले लगा लेती है तब चलता है इन दो कैंसर का पता, जानें क्यों होता है ऐसा

जब मौत गले लगा लेती है तब चलता है इन दो कैंसर का पता, जानें क्यों होता है ऐसा


अक्सर लोग हेड एंड नेक कैंसर को सिर्फ माउथ कैंसर समझते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यह ग्रुप कई तरह के कैंसर को कवर करता है. इसमें ओरल कैविटी (मुंह), थ्रोट (गला), वॉइस बॉक्स (लैरिंक्स), नाक, साइनस, थायरॉइड, पैरोटिड ग्लैंड (सैलिवरी ग्लैंड) और यहां तक कि आई सॉकेट्स (आंखों का हिस्सा) तक के कैंसर शामिल हैं. लोग आमतौर पर इसे माउथ, गले या वॉइस बॉक्स के कैंसर से जोड़ते हैं, क्योंकि ये ज्यादा कॉमन हैं और इनका सीधा संबंध तंबाकू से है. चबाने वाला तंबाकू अक्सर माउथ कैंसर का कारण बनता है, जबकि स्मोकिंग से गले, वॉइस बॉक्स और एयरवे से जुड़ी बीमारियां होती हैं.

लेट डायग्नोसिस सबसे बड़ी समस्या

हेड एंड नेक कैंसर का सबसे बड़ा चैलेंज है डिले इन डायग्नोसिस (देरी से पहचान). ये देरी दोनों तरफ से होती है मरीज की तरफ से भी और डॉक्टर की तरफ से भी. डॉ. मंदीप सिंह मल्होत्रा, डायरेक्टर, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, सीके बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली के अनुसार, “कई बार मरीज को माउथ अल्सर, व्हाइट पैच या आवाज में बदलाव जैसी समस्याएं होती हैं, लेकिन लोग इसे इन्फेक्शन समझते हैं. डॉक्टर भी शुरुआत में एंटीबायोटिक, दर्द की दवा या स्टेरॉयड देकर मैनेज करते हैं, जिससे सही डायग्नोसिस में समय लग जाता है.” यहां तक कि डेंटल प्रोफेशनल्स भी कई बार ऐसे लक्षणों का कई राउंड दवा से इलाज करते हैं. जब ये ट्रीटमेंट काम नहीं करते, तब जाकर कैंसर का शक होता है.

बायोप्सी से जुड़ीं गलतफहमियां

अगर माउथ में अल्सर, व्हाइट पैच, या रेड लीजन पहली दवा से ठीक न हों, तो तुरंत ऑन्कोलॉजिस्ट को दिखाना और बायोप्सी कराना जरूरी है. डॉ. मल्होत्रा कहते हैं, “सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग मानते हैं कि बायोप्सी से कैंसर फैल जाएगा. यह पूरी तरह मिथक है और मरीज की जान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.”

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

थ्रोट, टॉन्सिल, बेस ऑफ टंग या लैरिंक्स के कैंसर की पहचान के लिए एंडोस्कोपी या लैरिंगोस्कोपी जैसे स्पेशल टेस्ट जरूरी होते हैं. ये सुविधाएं ज्यादातर बड़े शहरों के अस्पतालों में मिलती हैं. टियर-2 और टियर-3 सिटी में यह सुविधा नहीं होने से मरीजों को रेफर करने में देर होती है. दूसरी बड़ी दिक्कत है बायोप्सी रिपोर्ट का लंबा TAT (टर्नअराउंड टाइम). छोटे शहरों में सैंपल पहले लोकल लैब में जाते हैं, फिर वहां से मेट्रो सिटी के स्पेशल लैब में भेजे जाते हैं. इससे रिपोर्ट आने में काफी समय लग जाता है.

नई टेक्नोलॉजी से उम्मीद

लिक्विड बायोप्सी एक नया और आसान तरीका है, जिसमें सिर्फ ब्लड सैंपल से कैंसर मार्कर डिटेक्ट किए जा सकते हैं. हालांकि यह फाइनल डायग्नोसिस नहीं देता, लेकिन शुरुआती अंदाजा जरूर लग जाता है. रोबोटिक सर्जरी ने भी हेड एंड नेक कैंसर के इलाज में क्रांति ला दी है. खासकर उन मरीजों के लिए जिनके कैंसर गले के अंदर, बेस ऑफ टंग या टॉन्सिल में होते हैं. रोबोटिक सिस्टम से बिना चेहरे पर बड़े कट लगाए कैंसर हटाया जा सकता है. फ्रोजन सेक्शन एनालिसिस जैसी तकनीक से अब सर्जरी के दौरान ही 20 मिनट में बायोप्सी रिपोर्ट मिल जाती है. इससे तुरंत फैसला लिया जा सकता है और मरीज को बार-बार सर्जरी नहीं करवानी पड़ती.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

 

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बारिश के मौसम में दिमाग डैमेज कर देता है यह कीड़ा, कैसे होते हैं इसकी चपेट में आने के लक्षण और

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मॉनसून का मौसम मुंबई जैसे शहरों में राहत तो लाता है, लेकिन इसके साथ कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इसी दौरान डॉक्टरों ने एक गंभीर संक्रमण को लेकर चेतावनी जारी की है, जिसका नाम है न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस (Neurocysticercosis). यह बीमारी दिमाग को प्रभावित करती है और समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा भी हो सकती है.

क्या है न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस?

न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस एक ब्रेन इंफेक्शन है, जो पोर्क टेपवर्म (Taenia solium) के लार्वा से होता है. यह संक्रमण तब शुरू होता है जब कोई व्यक्ति अधपका पोर्क खाता है या दूषित पानी और भोजन का सेवन करता है. शुरुआत में ये अंडे आंतों में जाकर टीनियासिस (Taeniasis) नाम की बीमारी पैदा करते हैं. अगर समय पर इलाज न हो, तो ये लार्वा खून के जरिए दिमाग तक पहुंचकर सिस्ट बना लेते हैं. इसी स्टेज को न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस कहा जाता है.

लक्षण और खतरे

शुरुआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन जैसे ही दिमाग में सिस्ट बनने लगते हैं, गंभीर समस्याएं शुरू हो जाती हैं.

सबसे आम लक्षण हैं:

  • बार-बार दौरे (Seizures) पड़ना
  • तेज और लगातार सिरदर्द
  • कन्फ्यूजन और चक्कर आना
  • गंभीर मामलों में स्थायी दिमागी नुकसान

यह बीमारी खासकर बच्चों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में ज्यादा खतरनाक साबित होती है.

मॉनसून में क्यों बढ़ता है खतरा?

बरसात के मौसम में गंदगी, बाढ़ और खराब सफाई के कारण पानी और खाने में संक्रमण बढ़ जाता है. इस वजह से टेपवर्म के अंडे आसानी से फैलते हैं.

कैसे होती है जांच?

इस बीमारी की पहचान के लिए MRI या CT स्कैन किया जाता है. जांच में पता चलता है कि सिस्ट किस स्टेज में है:

  • Vesicular Stage: शुरुआती स्टेज, सूजन नहीं होती
  • Colloidal Stage: सूजन और इंफ्लेमेशन बढ़ता है
  • Calcified Stage: पुराना सिस्ट जो सख्त हो चुका है

बचाव के आसान उपाय

इस खतरनाक बीमारी से बचाव के लिए कुछ साधारण आदतों का पालन करें:

  • कभी भी अधपका पोर्क न खाएं
  • सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही खाएं
  • केवल साफ और सुरक्षित पानी पिएं
  • खाने से पहले हाथ जरूर धोएं
  • मांस हमेशा भरोसेमंद जगह से ही खरीदें
  • इन आदतों को अपनाने से संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है.

समय पर इलाज क्यों जरूरी है?

अगर आपको लगातार सिरदर्द या अचानक दौरे पड़ने लगें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. पवन पाई के अनुसार, समय पर जांच और इलाज न होने पर दिमाग को स्थायी नुकसान हो सकता है. मॉनसून में सतर्क रहना बेहद जरूरी है, क्योंकि एक छोटी सी लापरवाही बड़ी परेशानी में बदल सकती है.

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जिंदा इंसान का दिमाग दो हिस्सों में काट दें तो क्या होगा? 1960 में हो चुके ऐसे एक्सपेरिमेंट

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क्या आप यकीन करेंगे कि आपके दिमाग के दो हेमिस्फेयर दुनिया को अलग-अलग तरह से देखते हैं? उनके विश्वास, क्षमताएं और यहां तक कि पर्सनैलिटी भी थोड़ी अलग हो सकती हैं? कई टॉप साइकोलॉजी बुक्स इस पॉपुलर गलत धारणा को डिस्कस करती हैं कि लॉजिकल लोग लेफ्ट-ब्रेन वाले होते हैं और आर्टिस्टिक लोग राइट-ब्रेन वाले. 

यह पूरी तरह से सच नहीं है…हालांकि, यह बिल्कुल सही है कि दिमाग के लेफ्ट और राइट साइड अलग-अलग फंक्शन्स के लिए स्पेशलाइज्ड होते हैं. जैसे, लेफ्ट ब्रेन लैंग्वेज के कामों में ज्यादा कैपेबल होता है.  वहीं राइट ब्रेन स्पेशियल मैपिंग जैसे टास्क में कमाल का होता है. जब इन्हें अलग कर दिया जाए, तो वे दो बिल्कुल डिफरेंट पर्सन्स की तरह बिहेव करते लगते हैं.

क्या है स्प्लिट ब्रेन रिसर्च? 

1960 के दशक में, गंभीर मिर्गी के कुछ पेशेंट्स का ट्रीटमेंट एक बहुत ही कॉन्ट्रोवर्शियल प्रोसीजर से किया जाता था. कॉर्पस कैलोसम, जो दिमाग के दोनों हेमिस्फेयर को आपस में जोड़ता है और उन्हें कम्युनिकेट करने में हेल्प करता है, उसे सर्जरी करके काट दिया गया. यह ट्रीटमेंट इफेक्टिव रहा और इससे पेशेंट्स की मिर्गी ठीक हो गई. सबसे सरप्राइजिंग बात ये थी कि इसका पेशेंट्स की डेली लाइफ पर कोई बड़ा इम्पैक्ट नहीं पड़ा, वे नॉर्मल बिहेव करते रहे.

स्प्लिट-ब्रेन रिसर्च के चौंकाने वाले खुलासे

जब इस सर्जरी के बाद साइंटिस्ट्स ने इन मरीजों पर स्टडी की, तो उन्हें कुछ बेहद दिलचस्प बातें पता चलीं. इसने  ब्रेन वर्किंग को लेकर हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया.

  • दो अलग-अलग कॉन्शियसनेस: सबसे बड़ी बात जो सामने आई वो ये कि जब दोनों हेमिस्फेयर आपस में कम्युनिकेट नहीं कर पा रहे थे, तो वे कुछ हद तक अलग-अलग कॉन्शियसनेस की तरह बिहेव कर रहे थे. ऐसा लगता था जैसे एक ही बॉडी में दो अलग-अलग माइंड काम कर रहे हों.
  • स्पेशलाइज्ड फंक्शंस: इन एक्सपेरिमेंट्स ने प्रूव किया कि ब्रेन के दोनों हेमिस्फेयर अलग-अलग कामों में स्पेशलाइज्ड होते हैं: लेफ्ट हेमिस्फेयर मुख्य रूप से लैंग्वेज, लॉजिक और एनॉलिटिकल थिंकिंग के लिए रिस्पॉन्सिबल होता हैॅ. वहीं, राइट हेमिस्फेयर परसेप्शन, फेसेस पहचानना, इमोशंस और क्रिएटिविटी से जुड़ा होता है.
  • अजीब बिहेवियर: वैसे तो इन पेशेंट्स की पर्सनैलिटी, इंटेलिजेंस और इमोशंस में कोई बड़ा चेंज नहीं आया, लेकिन जब उन पर स्पेशल टेस्ट किए गए, तो कुछ अजीब बिहेवियर सामने आए. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी चीज को सिर्फ लेफ्ट आई (जो राइट हेमिस्फेयर से जुड़ी है) से दिखाया जाता था, तो पेशेंट उसे देख पाता था और लेफ्ट हैंड से पहचान पाता था, लेकिन बोलकर नहीं बता पाता था कि उसने क्या देखा, क्योंकि बोलने का सेंटर लेफ्ट हेमिस्फेयर में होता है.
  • लिमिटेड कम्युनिकेशन: इन पेशेंट्स में दोनों हेमिस्फेयर एक-दूसरे के बारे में इंफॉर्मेशन नहीं जानते थे. अगर कोई इंफॉर्मेशन सिर्फ एक हेमिस्फेयर को मिलती थी.

बता दें कि इन स्प्लिट ब्रेन एक्सपेरिमेंट्स को रोजर स्पेरी और माइकल गजानिगा जैसे साइंटिस्ट्स ने किया था. स्पेरी को इसके लिए 1981 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था. इन अध्ययनों ने हमें दिमाग की लेटरलाइजेशन और कॉन्शियसनेस की प्रकृति के बारे में अभूतपूर्व जानकारी दी.

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शरीर का यह अंग खराब हुआ तो 2 कदम भी चलना मुश्किल, इन तरीकों से बनाएं इसकी हेल्थ

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घुटने हमारी बॉडी के ऐसे अहम जॉइंट्स हैं, जो हर रोज की एक्टिविटीज जैसे चलना, दौड़ना या बैठना, हर काम में एक्टिव रहते हैं. इसलिए, घुटनों की सही केयर बहुत जरूरी हो जाती है. कई लोग नी पेन से रिलीफ पाने के लिए घरेलू इलाज अपनाते हैं. हालांकि, लंबे टाइम तक घुटनों को दर्द बना रहे, तो ये बड़े खतरे का संकेत हो सकता है. इससे आप दो कदम भी चलने में असमर्थ हो जाएं.

ऑर्थोपेडिक स्पेशलिस्ट डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव बताते हैं कि आपके घुटने अगर ठीक से काम न करें, तो दो कदम चलना भी मुश्किल हो सकता है. उम्र बढ़ने, चोट लगने या कुछ बीमारियों के कारण ये खराब हो सकते हैं, जिससे दर्द और गतिशीलता में कमी आती है. ऐसे में इनका ख्याल रखना बहुत जरूरी हो जाता है।

घुटनों को कैसे रखें हेल्दी और स्ट्रॉन्ग?

आपके घुटने बॉडी के सबसे इम्पोर्टेंट और कॉम्प्लेक्स जॉइंट्स में से हैं. इनकी सही केयर करना बहुत जरूरी है, क्योंकि नी प्रॉब्लम्स आपकी मोबिलिटी और लाइफ क्वॉलिटी को बुरी तरह अफेक्ट कर सकती हैं. 

  • वेट को कंट्रोल करें: आपके घुटनों पर सबसे ज्यादा लोड आपकी बॉडी का वेट डालता है. एक्स्ट्रा वेट सीधे तौर पर घुटनों के कार्टिलेज पर प्रेशर बढ़ाता है, जिससे उनका डैमेज तेजी से होता है और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.
  • रेगुलर और सही एक्सरसाइज करें: घुटनों को स्ट्रॉन्ग और फ्लेक्सिबल बनाए रखने के लिए फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है. नियमित हल्के से मीडियम इंटेंसिटी वाली एक्सरसाइज जैसे तेज वॉकिंग, साइक्लिंग, स्विमिंग या योगा चुनें. ये एक्सरसाइज घुटनों पर कम प्रेशर डालती हैं, जबकि उनके आसपास की मसल्स को स्ट्रॉन्ग करती हैं। 
  • बैलेंस्ड और न्यूट्रिएंट्स से भरपूर डाइट लें: आपकी डाइट का सीधा असर आपकी बोंस और जॉइंट्स की हेल्थ पर पड़ता है. अपनी डाइट में कैल्शियम, विटामिन डी और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर चीजें शामिल करें. ये न्यूट्रिएंट्स बोन डेंसिटी को मेंटेन रखने और जॉइंट्स में इन्फ्लेमेशन को कम करने में हेल्प करते हैं, जिससे घुटने हेल्दी रहते हैं.
  • सही पोस्चर अपनाएं: खड़े होते, बैठते या चलते टाइम हमेशा सही पोस्चर मेंटेन करना जरूरी है. गलत पोस्चर घुटनों और स्पाइन पर अननेसेसरी प्रेशर डालता है, जिससे टाइम के साथ प्रॉब्लम्स क्रिएट हो सकती हैं. सीधे खड़े हों, शोल्डर्स पीछे रखें और वेट को दोनों पैरों पर इक्वली डिस्ट्रीब्यूट करें.
  • रेस्ट और इंजरी से बचाव: अगर आपको घुटनों में पेन, स्वेलिंग या कोई प्रॉब्लम फील हो, तो उन्हें इनफ रेस्ट देना जरूरी है. ओवरएग्जर्शन से बचें और इंजरी होने पर इमीडिएट ट्रीटमेंट करवाएं. स्पोर्ट्स या हैवी वर्क करते टाइम सही सेफ्टी इक्विपमेंट का यूज करें. 
  • हॉट और कोल्ड कंप्रेशन का यूज: पेन या स्वेलिंग होने पर हॉट या कोल्ड कंप्रेशन से काफी रिलीफ मिल सकता है. कोल्ड कंप्रेशन (आइस पैक) स्वेलिंग और पेन को कम करने में हेल्प करता है, स्पेशली इंजरी के तुरंत बाद. वहीं, हॉट कंप्रेशन (हीटिंग पैड) मसल्स को रिलैक्स करता है और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जो क्रॉनिक पेन में बेनिफिशियल हो सकता है.
  • डॉक्टर से रेगुलर कंसल्टेशन: यदि आपको घुटनों में कंटीन्यूअस पेन, स्टिफनेस, स्वेलिंग या किसी भी टाइप की प्रॉब्लम फील हो रही है, तो तुंरत किसी ऑर्थोपेडिक स्पेशलिस्ट से कंसल्ट करें. वे आपकी कंडीशन का सही डायग्नोसिस कर आपकी एज, हेल्थ कंडीशन और लाइफस्टाइल के अकॉर्डिंग प्रॉपर ट्रीटमेंट और मैनेजमेंट प्लान बता सकते हैं.

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भारत में बढ़ रहे NAFLD के केसेज, AIIMS के डॉक्टरों ने बताया- यह बीमारी कितनी खतरनाक?

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नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) ऐसी बीमारी है, जिसमें बिना शराब पिए लिवर में चर्बी जमा होने लगती है. यह बीमारी नॉर्मल लेवल से शुरू होती है और मरीज की कंडीशन बेहद गंभीर भी हो सकती है. इसकी वजह से नॉन-अल्कोहॉलिक स्टिएटोहेपेटाइटिस (NASH) हो सकता है, जिससे लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ना) या यहां तक कि लिवर कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है. 

AIIMS की स्टडी में खुलासा

AIIMS दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉक्टरों के पैनल ने इस पर स्टडी की, जो जर्नल ऑफ क्लीनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें AIIMS दिल्ली के डॉ. शालीमार भी शामिल हैं. स्डटी में सामने आया कि दुनियाभर में करीब 25 पर्सेंट लोग NAFLD से प्रभावित हैं. यह बीमारी मिडिल ईस्ट और साउथ अमेरिका में सबसे फैल रही है, जबकि अफ्रीका में इसके केसेज काफी कम मिल रहे हैं. NASH का ग्लोबल रेट 1.5 पर्सेंट से 6.5 पर्सेंट के बीच है. 2017 की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार, हर साल NASH के लगभग 3.67 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं, जो 1990 की तुलना में दोगुने हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि फ्यूचर में NASH लिवर ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी वजह बन सकता है.

किन लोगों को NAFLD का खतरा सबसे ज्यादा?

  • डायबिटीज (55-60%)
  • मोटापा (65-95%)
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम (73%)

भारत में हालात बेहद खराब

भारत में 6.7% से 55.1% वयस्कों में NAFLD पाया गया है. लिवर एंजाइम के बिना लक्षण वाले बढ़ने के एक तिहाई मामलों की वजह NAFLD हो सकती है. लिवर ट्रांसप्लांट के लिए निकाले गए लिवर की जांच में पता चला कि दो-तिहाई क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस (जिसका कारण स्पष्ट नहीं) वाले मरीजों को NAFLD था. बच्चों में भी यह बीमारी बढ़ रही है, जिसमें 7.3% से 22.4% हेल्दी बच्चे प्रभावित हैं. यह बीमारी उम्र के साथ और गंभीर हो जाती है.

भारत में बढ़ रहीं मेटाबॉलिक बीमारियां

भारत में वयस्कों में प्री-डायबिटीज 19-22%, डायबिटीज 15-19%, और मेटाबॉलिक सिंड्रोम 30% तक पाया जाता है. ये समस्याएं शहरों के साथ-साथ गांवों में भी बढ़ रही हैं. मोटापा, डायबिटीज और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के बढ़ने से NAFLD के केसेज भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे हेल्थ सर्विसेज पर प्रेशर पड़ रहा है.

AIIMS के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रमोद गर्ग ने बताया कि पिछले 10-15 साल में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़े हैं. लिवर कैंसर के मामलों में भी इजाफा हुआ है, जिसकी मुख्य वजह गलत लाइफस्टाइल है. इसे ठीक करने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव जरूरी है.

खाने में तेल कम करें

AIIMS के डॉक्टरों जैसे डॉ. प्रमोद गर्ग, डॉ. गोविंद माखरिया, डॉ. शालीमार, डॉ. दीपक गुंजन, डॉ. समागरा अग्रवाल और डॉ. साग्निक बिस्वास ने NAFLD के कारणों और समाधान पर जोर दिया. डॉ. दीपक गुंजन ने बताया कि लाइफस्टाइल में बदलाव आज की सबसे बड़ी जरूरत है. खाने में तेल की मात्रा 10 पर्सेंट कम करना जरूरी है. स्टडी बताती है कि 2025 तक 40-50 पर्सेंट लोग मोटापे के शिकार हो सकते हैं, जिससे कई हेल्थ प्रॉब्लम्स बढ़ेंगी. तेल कम करने से न सिर्फ लिवर, बल्कि हार्ट, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा भी कम होगा.

हेल्दी लाइफ के लिए अपनाएं हेल्दी थ्री फॉर्म्युला

  • हेल्दी डाइट: आधी प्लेट में हरी सब्जियां और फल होने चाहिए. जंक और पैकेज्ड फूड से बचें, क्योंकि इनमें ट्रांस फैट होता है, जो लिवर के लिए नुकसानदायक है.
  • एक्सरसाइज: रोज 30-40 मिनट व्यायाम या खेलकूद जरूरी है. यह पूरे शरीर के लिए फायदेमंद है.
  • हेल्दी स्लीप: समय पर सोना और उठना, साथ ही तनाव कम करना बहुत जरूरी है.

सिर्फ दवाएं नहीं, लाइफस्टाइल भी जरूरी

डॉ. साग्निक बिस्वास ने बताया कि फैटी लिवर का इलाज सिर्फ दवाओं से नहीं हो सकता. यह ऐसी बीमारी है, जिसका सबसे बड़ा इलाज हेल्दी लाइफस्टाइल है. अगर मरीज को डायबिटीज, मोटापा या स्लीप एपनिया जैसी अन्य समस्याएं हैं तो डॉक्टर दवाएं दे सकते हैं. NAFLD का पता अल्ट्रासाउंड और लिवर फंक्शन टेस्ट से चलता है. यह बीमारी चार स्टेज में होती है, जिसमें स्टेज 4 यानी सिरोसिस सबसे गंभीर है.

इन बातों का रखें ध्यान

  • शराब पूरी तरह छोड़ें: शराब से लिवर को ज्यादा नुकसान होता है.
  • वजन और डाइट पर ध्यान: सही डाइट और वजन कंट्रोल से फैटी लिवर को ठीक कर सकते हैं.
  • डॉक्टर से सलाह: डायबिटीज या अन्य दिक्कतों वाले मरीजों को डॉक्टर से मिलना जरूरी है.

इंडियन डाइट में बैलेंस जरूरी

डॉ. साग्निक ने बताया कि भारतीय डाइट में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और आयरन का बैलेंस होना चाहिए. जंक और पैकेज्ड फूड इस बैलेंस को बिगाड़ते हैं. ट्रांस फैट से बचना जरूरी है, क्योंकि यह लिवर और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है.

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