भारत में बढ़ रहे NAFLD के केसेज, AIIMS के डॉक्टरों ने बताया- यह बीमारी कितनी खतरनाक?

भारत में बढ़ रहे NAFLD के केसेज, AIIMS के डॉक्टरों ने बताया- यह बीमारी कितनी खतरनाक?


नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) ऐसी बीमारी है, जिसमें बिना शराब पिए लिवर में चर्बी जमा होने लगती है. यह बीमारी नॉर्मल लेवल से शुरू होती है और मरीज की कंडीशन बेहद गंभीर भी हो सकती है. इसकी वजह से नॉन-अल्कोहॉलिक स्टिएटोहेपेटाइटिस (NASH) हो सकता है, जिससे लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ना) या यहां तक कि लिवर कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है. 

AIIMS की स्टडी में खुलासा

AIIMS दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉक्टरों के पैनल ने इस पर स्टडी की, जो जर्नल ऑफ क्लीनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें AIIMS दिल्ली के डॉ. शालीमार भी शामिल हैं. स्डटी में सामने आया कि दुनियाभर में करीब 25 पर्सेंट लोग NAFLD से प्रभावित हैं. यह बीमारी मिडिल ईस्ट और साउथ अमेरिका में सबसे फैल रही है, जबकि अफ्रीका में इसके केसेज काफी कम मिल रहे हैं. NASH का ग्लोबल रेट 1.5 पर्सेंट से 6.5 पर्सेंट के बीच है. 2017 की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार, हर साल NASH के लगभग 3.67 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं, जो 1990 की तुलना में दोगुने हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि फ्यूचर में NASH लिवर ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी वजह बन सकता है.

किन लोगों को NAFLD का खतरा सबसे ज्यादा?

  • डायबिटीज (55-60%)
  • मोटापा (65-95%)
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम (73%)

भारत में हालात बेहद खराब

भारत में 6.7% से 55.1% वयस्कों में NAFLD पाया गया है. लिवर एंजाइम के बिना लक्षण वाले बढ़ने के एक तिहाई मामलों की वजह NAFLD हो सकती है. लिवर ट्रांसप्लांट के लिए निकाले गए लिवर की जांच में पता चला कि दो-तिहाई क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस (जिसका कारण स्पष्ट नहीं) वाले मरीजों को NAFLD था. बच्चों में भी यह बीमारी बढ़ रही है, जिसमें 7.3% से 22.4% हेल्दी बच्चे प्रभावित हैं. यह बीमारी उम्र के साथ और गंभीर हो जाती है.

भारत में बढ़ रहीं मेटाबॉलिक बीमारियां

भारत में वयस्कों में प्री-डायबिटीज 19-22%, डायबिटीज 15-19%, और मेटाबॉलिक सिंड्रोम 30% तक पाया जाता है. ये समस्याएं शहरों के साथ-साथ गांवों में भी बढ़ रही हैं. मोटापा, डायबिटीज और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के बढ़ने से NAFLD के केसेज भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे हेल्थ सर्विसेज पर प्रेशर पड़ रहा है.

AIIMS के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रमोद गर्ग ने बताया कि पिछले 10-15 साल में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़े हैं. लिवर कैंसर के मामलों में भी इजाफा हुआ है, जिसकी मुख्य वजह गलत लाइफस्टाइल है. इसे ठीक करने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव जरूरी है.

खाने में तेल कम करें

AIIMS के डॉक्टरों जैसे डॉ. प्रमोद गर्ग, डॉ. गोविंद माखरिया, डॉ. शालीमार, डॉ. दीपक गुंजन, डॉ. समागरा अग्रवाल और डॉ. साग्निक बिस्वास ने NAFLD के कारणों और समाधान पर जोर दिया. डॉ. दीपक गुंजन ने बताया कि लाइफस्टाइल में बदलाव आज की सबसे बड़ी जरूरत है. खाने में तेल की मात्रा 10 पर्सेंट कम करना जरूरी है. स्टडी बताती है कि 2025 तक 40-50 पर्सेंट लोग मोटापे के शिकार हो सकते हैं, जिससे कई हेल्थ प्रॉब्लम्स बढ़ेंगी. तेल कम करने से न सिर्फ लिवर, बल्कि हार्ट, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा भी कम होगा.

हेल्दी लाइफ के लिए अपनाएं हेल्दी थ्री फॉर्म्युला

  • हेल्दी डाइट: आधी प्लेट में हरी सब्जियां और फल होने चाहिए. जंक और पैकेज्ड फूड से बचें, क्योंकि इनमें ट्रांस फैट होता है, जो लिवर के लिए नुकसानदायक है.
  • एक्सरसाइज: रोज 30-40 मिनट व्यायाम या खेलकूद जरूरी है. यह पूरे शरीर के लिए फायदेमंद है.
  • हेल्दी स्लीप: समय पर सोना और उठना, साथ ही तनाव कम करना बहुत जरूरी है.

सिर्फ दवाएं नहीं, लाइफस्टाइल भी जरूरी

डॉ. साग्निक बिस्वास ने बताया कि फैटी लिवर का इलाज सिर्फ दवाओं से नहीं हो सकता. यह ऐसी बीमारी है, जिसका सबसे बड़ा इलाज हेल्दी लाइफस्टाइल है. अगर मरीज को डायबिटीज, मोटापा या स्लीप एपनिया जैसी अन्य समस्याएं हैं तो डॉक्टर दवाएं दे सकते हैं. NAFLD का पता अल्ट्रासाउंड और लिवर फंक्शन टेस्ट से चलता है. यह बीमारी चार स्टेज में होती है, जिसमें स्टेज 4 यानी सिरोसिस सबसे गंभीर है.

इन बातों का रखें ध्यान

  • शराब पूरी तरह छोड़ें: शराब से लिवर को ज्यादा नुकसान होता है.
  • वजन और डाइट पर ध्यान: सही डाइट और वजन कंट्रोल से फैटी लिवर को ठीक कर सकते हैं.
  • डॉक्टर से सलाह: डायबिटीज या अन्य दिक्कतों वाले मरीजों को डॉक्टर से मिलना जरूरी है.

इंडियन डाइट में बैलेंस जरूरी

डॉ. साग्निक ने बताया कि भारतीय डाइट में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और आयरन का बैलेंस होना चाहिए. जंक और पैकेज्ड फूड इस बैलेंस को बिगाड़ते हैं. ट्रांस फैट से बचना जरूरी है, क्योंकि यह लिवर और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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महिलाओं में होने वाले कैल्शियम की कमी को कैसे करें दूर, ये उपाय आजमाएं

महिलाओं में होने वाले कैल्शियम की कमी को कैसे करें दूर, ये उपाय आजमाएं


Calcium Deficiency in Women: क्या आपको अक्सर थकान महसूस होती है, मांसपेशियों में ऐंठन रहती है या हड्डियां कमजोर लगती हैं? अगर हां तो यह संकेत हो सकता है कि आपके शरीर में कैल्शियम की कमी हो रही है.

डॉ. शालिनी सिंह बताती हैं कि, खासकर महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, क्योंकि प्रेगनेंसी, पीरियड्स, ब्रेस्टफीडिंग और मेनोपॉज जैसे शारीरिक बदलावों के कारण शरीर की कैल्शियम जरूरत अधिक होती हैं. अगर समय रहते कैल्शियम की कमी पूरीकी जाए, तो यह हड्डियों से जुड़ी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है.

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महिलाओं में कैल्शियम की कमी के कारण

  • अनियमित खानपान: अधिकतर महिलाएं वजन घटाने या डाइटिंग के चक्कर में दूध, पनीर, दही जैसे कैल्शियम युक्त आहार नहीं लेतीं.
  • हॉर्मोनल बदलाव: पीरियड्स, प्रेगनेंसी और मेनोपॉज़ के दौरान एस्ट्रोजेन का स्तर घटता है, जिससे हड्डियों से कैल्शियम निकलता है.
  • सूरज की रोशनी की कमी: विटामिन D की कमी कैल्शियम के अवशोषण में बाधा डालती है.
  • शारीरिक गतिविधियों की कमी: एक्सरसाइज की कमी से हड्डियां कमजोर होने लगती हैं.

कैल्शियम की कमी को दूर कैसे करें

कैल्शियम युक्त आहार अपनाएं

अपनी डेली डाइट में दूध, दही, पनीर, छाछ, टोफू, तिल, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, मैथी) आदि को शामिल करें. बादाम, अंजीर, नारियल, चिया सीड्स भी अच्छे स्रोत हैं.

विटामिन D लेनाभूलें

विटामिन D शरीर में कैल्शियम की कमी दूर करता है. रोजाना 15 मिनट सुबह की धूप लें. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेकर सप्लीमेंट्स लें.

रेगुलर एक्सरसाइज करें

नियमित वॉकिंग, योग, स्ट्रेचिंग और हल्के वजन उठाने वाले व्यायाम करने से हड्डियों की मजबूती बनी रहती है.

कैफीन और कोल्ड ड्रिंक्स से दूरी

ज्यादा चाय, कॉफी और सोडा कैल्शियम को शरीर से बाहर निकालने का काम करते हैं.

सप्लीमेंट्स का सहारा

अगर खानपान से जरूरत पूरी नहीं हो रही है, तो डॉक्टर की सलाह से कैल्शियम और विटामिन D के सप्लीमेंट्स लें.

महिलाओं के लिए कैल्शियम सिर्फ हड्डियों की मजबूती के लिए ही नहीं, बल्कि मांसपेशियों, दांतों, हार्मोन संतुलन और नर्व फंक्शन के लिए भी जरूरी है. इसलिए आज से ही अपनी डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं और अपने शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाएं.

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क्रैश डाइट करने के 6 बड़े नुकसान, जान लेंगे तो कभी नहीं करेंगे

क्रैश डाइट करने के 6 बड़े नुकसान, जान लेंगे तो कभी नहीं करेंगे


एनर्जी लेवल में भारी गिरावट: क्रैश डाइट करने से शरीर को पर्याप्त कैलोरी और पोषण नहीं मिलता, जिससे एनर्जी लेवल गिर जाता है. आप हर समय थका-थका महसूस करते हैं और कोई भी काम करने में मन नहीं लगता.

मेटाबॉलिज्म स्लो हो जाता है: जब शरीर को पर्याप्त खाना नहीं मिलता तो वह

मेटाबॉलिज्म स्लो हो जाता है: जब शरीर को पर्याप्त खाना नहीं मिलता तो वह “सेव मोड” में चला जाता है और मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है. इससे वजन घटने की प्रक्रिया और मुश्किल हो जाती है.

हार्मोनल असंतुलन: एक्स्ट्रीम डाइटिंग से शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे महिलाओं को पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं और मूड स्विंग्स जैसी परेशानियां हो सकती हैं.

हार्मोनल असंतुलन: एक्स्ट्रीम डाइटिंग से शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे महिलाओं को पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं और मूड स्विंग्स जैसी परेशानियां हो सकती हैं.

इम्यून सिस्टम कमजोर होता है: जब शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिलता, तो इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है. इससे बार-बार बीमार पड़ने की संभावना बढ़ जाती है और संक्रमण जल्दी पकड़ लेते हैं.

इम्यून सिस्टम कमजोर होता है: जब शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिलता, तो इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है. इससे बार-बार बीमार पड़ने की संभावना बढ़ जाती है और संक्रमण जल्दी पकड़ लेते हैं.

मांसपेशियों में दिक्कत:  वजन तेजी से कम होता तो है, लेकिन फैट के साथ-साथ मांसपेशियां भी गलने लगती हैं. इससे बॉडी स्ट्रेंथ कम होती है और शरीर कमजोर महसूस करने लगता है.

मांसपेशियों में दिक्कत: वजन तेजी से कम होता तो है, लेकिन फैट के साथ-साथ मांसपेशियां भी गलने लगती हैं. इससे बॉडी स्ट्रेंथ कम होती है और शरीर कमजोर महसूस करने लगता है.

वजन दोबारा बढ़ने का खतरा: क्रैश डाइट से जो वजन कम होता है, वो लंबे समय तक टिकता नहीं. जैसे ही आप नॉर्मल खाना शुरू करते हैं, वजन दोगुनी तेजी से वापस आ सकता है.

वजन दोबारा बढ़ने का खतरा: क्रैश डाइट से जो वजन कम होता है, वो लंबे समय तक टिकता नहीं. जैसे ही आप नॉर्मल खाना शुरू करते हैं, वजन दोगुनी तेजी से वापस आ सकता है.

Published at : 28 Jul 2025 06:01 PM (IST)

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हर बार पेट दर्द गैस की वजह से नहीं होता, ये 6 कारण भी कर सकते हैं परेशान

हर बार पेट दर्द गैस की वजह से नहीं होता, ये 6 कारण भी कर सकते हैं परेशान


पथरी: अगर आपके पेट के दाईं ऊपरी हिस्से में अचानक तेज दर्द हो रहा है, तो ये पथरी हो सकती है यह दर्द खाने के बाद और तेज हो जाता है. पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, उल्टी, पसीना आना

अपेंडिसाइटिस: पेट के दाहिने निचले हिस्से में अचानक तेज दर्द हो और चलने या खांसने से और बढ़ जाए, तो यह अपेंडिक्स में सूजन का संकेत हो सकता है. भूख कम लगना, मतली, बुखार के साथ दर्द होना.

अपेंडिसाइटिस: पेट के दाहिने निचले हिस्से में अचानक तेज दर्द हो और चलने या खांसने से और बढ़ जाए, तो यह अपेंडिक्स में सूजन का संकेत हो सकता है. भूख कम लगना, मतली, बुखार के साथ दर्द होना.

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन: अगर पेशाब करते वक्त जलन हो और पेट के निचले हिस्से में हल्का दर्द हो रहा हो, तो यह UTI हो सकता है. महिलाओं में यह ज्यादा सामान्य है.बार-बार पेशाब आना, बदबूदार पेशाब, हल्का बुखार.

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन: अगर पेशाब करते वक्त जलन हो और पेट के निचले हिस्से में हल्का दर्द हो रहा हो, तो यह UTI हो सकता है. महिलाओं में यह ज्यादा सामान्य है.बार-बार पेशाब आना, बदबूदार पेशाब, हल्का बुखार.

कब्ज: पेट में कब्ज की दिक्कत होना. जब पेट साफ नहीं होता, तो भारीपन और दर्द की समस्या हो जाती है. मल त्याग में कठिनाई, पेट में फूलेपन का एहसास.

कब्ज: पेट में कब्ज की दिक्कत होना. जब पेट साफ नहीं होता, तो भारीपन और दर्द की समस्या हो जाती है. मल त्याग में कठिनाई, पेट में फूलेपन का एहसास.

अल्सर: ज्यादा तीखा या ऑयली खाना पेट में एसिड बनने की प्रक्रिया को बढ़ा सकता है. लंबे समय तक यही स्थिति अल्सर जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है. सीने में जलन, खट्टे डकार, पेट दर्द होना

अल्सर: ज्यादा तीखा या ऑयली खाना पेट में एसिड बनने की प्रक्रिया को बढ़ा सकता है. लंबे समय तक यही स्थिति अल्सर जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है. सीने में जलन, खट्टे डकार, पेट दर्द होना

तनाव और एंग्जायटी: मानसिक तनाव का असर केवल दिमाग पर नहीं, पेट पर भी पड़ता है. स्ट्रेस के कारण पेट की मांसपेशियों में ऐंठन और पाचन तंत्र में गड़बड़ी हो सकती है. पेट में घबराहट, भूख न लगना, उल्टी जैसा महसूस होना.

तनाव और एंग्जायटी: मानसिक तनाव का असर केवल दिमाग पर नहीं, पेट पर भी पड़ता है. स्ट्रेस के कारण पेट की मांसपेशियों में ऐंठन और पाचन तंत्र में गड़बड़ी हो सकती है. पेट में घबराहट, भूख न लगना, उल्टी जैसा महसूस होना.

Published at : 28 Jul 2025 04:58 PM (IST)

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बचपन में ही पता लग जाएगा कि जवानी में मोटापा आएगा या नहीं? यह तकनीक खोलेगी राज

बचपन में ही पता लग जाएगा कि जवानी में मोटापा आएगा या नहीं? यह तकनीक खोलेगी राज


यह जानना कि बच्चा बड़ा होकर मोटा होगा या नहीं, अब मुश्किल नहीं. हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि 6 साल की उम्र में ही इसका पता लगाया जा सकता है. डच वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले पांच साल बच्चे के स्वस्थ जीवन के लिए सबसे अहम होते हैं. 3,500 से अधिक बच्चों के रिकॉर्ड खंगालने पर पाया गया कि अगर 6 साल की उम्र में बॉडी मास इंडेक्स में सिर्फ एक यूनिट की भी बढ़ोतरी होती है, तो 18 साल की उम्र तक मोटापे या अधिक वजन का खतरा दो गुना से ज्यादा हो जाता है. रिसर्चर्स जोर देते हैं कि बचपन में ही ऐसी नीतियां बननी चाहिए, जिनसे बच्चों में मोटापा न बढ़े. 

कितना खतरनाक होता है मोटापा?

गाजियाबाद में पीडियाट्रिशियन डॉ. आशीष प्रकाश बताते हैं कि मोटापा एक साइलेंट किलर है, जो ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों को जन्म देता है. कई स्टडीज में पाया गया है कि बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है. करीब आधा बच्चे समय से पहले ज्यादा वजन के शिकार हो जाते हैं. यूरोपीय कांग्रेस ऑन ओब्सिटी में पेश एक अलग रिसर्च में बताया गया कि पिछले 15 वर्षों में किशोरों में मोटापे की दर 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है. इसमें पाया गया है कि बच्चों में मोटापा के लिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स और खराब जीवनशैली सबसे बड़े जिम्मेदार कारक हैं. ऐसे में जरूरी है कि बचपन में ही पता चल जाए कि जवानी में मोटापा आएगा या नहीं. विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही नई तकनीकों और अध्ययनों से यह बात सामने आई है. 

बचपन में मोटापे का अनुमान बताने वाली तकनीक

हाल ही में, वैज्ञानिकों ने जेनेटिक टेस्ट (पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर) विकसित किया है , जो पांच-छह साल की उम्र तक यह बता सकता है कि बच्चे को वयस्कता में मोटापा होने का कितना खतरा है.  यह टेस्ट डीएनए से प्राप्त जेनेटिक डाटा का विश्लेषण करता है और उन हजारों जेनेटिक वैरिएंट्स को पहचानता है, जो मोटापे के जोखिम को बढ़ाते हैं. 

यह कैसे काम करता है?

  • जेनेटिक फैक्टर्स: यदि माता-पिता मोटे हैं, तो बच्चों में भी मोटापे का खतरा अधिक होता है. नए जेनेटिक टेस्ट इसी आनुवंशिक प्रवृत्ति को समझने में मदद करते हैं. 
  • बॉडी मास इंडेक्स: बच्चों में बीएमआई की गणना उनकी उम्र और लिंग के अनुसार की जाती है. दो साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों में बीएमआई का 95वें परसेंटाइल से अधिक होना मोटापे का संकेत माना जाता है. हालांकि, केवल बीएमआई वर्तमान मोटापे का संकेत देता है, भविष्य के मोटापे का नहीं.
  • मशीन लर्निंग: एआई और मशीन लर्निंग मॉडल बचपन के मोटापे की भविष्यवाणी में सटीकता बढ़ाते हैं. ये मॉडल बच्चे के जन्म के समय के बीएमआई गर्भकालीन आयु और विभिन्न क्लिनिकल विजिट  से प्राप्त बीएमआई जैसे बुनियादी डाटा का उपयोग करके पांच साल की उम्र तक बच्चे की मोटापे की श्रेणी का अनुमान लगा सकते हैं.

इस तकनीक का महत्व

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कम उम्र में ही उन बच्चों की पहचान करने में मदद करती है, जिन्हें जेनेटिकली मोटापे का अधिक खतरा है. इससे माता-पिता और हेल्थ प्रोफेशनल्स को कम उम्र में ही जीवनशैली में हस्तक्षेप करने का अवसर मिलता है, जिससे भविष्य में मोटापे और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सके. यह तकनीक निश्चित रूप से भविष्य में मोटापे के जोखिम को बचपन में ही पहचानने का राज खोल सकती है. यह शुरुआती हस्तक्षेप और रोकथाम के लिए एक शक्तिशाली उपकरण साबित हो सकती है, जिससे बच्चों को स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिलेगी.

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क्या आप पब्लिक टॉयलेट में सीट पर बैठने से बचती हैं? ये आदत आपकी सेहत को बिगाड़ सकती है

क्या आप पब्लिक टॉयलेट में सीट पर बैठने से बचती हैं? ये आदत आपकी सेहत को बिगाड़ सकती है


Hovering Over Toilet Seat: जब भी महिलाएं पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में आता है.गंदा है, कहीं इन्फेक्शन न हो जाए!” और इसी डर से ज्यादातर महिलाएं टॉयलेट सीट पर ठीक से बैठने के जगह हाफ-स्क्वॉट या सीट के ऊपर झुक कर पेशाब करना पसंद करती हैं. लेकिन क्या आप जानती हैं कि ये आदत जितनी साफ-सुथरी लगती है, उतनी ही आपकी ब्लैडर हेल्थ के लिए खतरनाक हो सकती है?

डॉक्टर्स के अनुसार, यह तरीका पेशाब को पूरी तरह से बाहर नहीं निकलने देता, जिससे यूरीन रिटेंशन, बार-बार यूरिनरी इंफेक्शन (UTI) और पेल्विक फ्लोर मसल्स में कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. यूरोलॉजी, PSRI अस्पताल की एसोसिएट डायरेक्टर, डॉ. निखिल खट्टर बताती हैं कि, पेशाब करते समय बिना बैठकर पेशाब करने से ब्लैडर पर दबाव बढ़ता है और यह आदत धीरे-धीरे शरीर को अधूरा पेशाब करने का आदी बना देती है.

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टॉयलेट सीट से ज्यादा खतरनाक है गलत पोजीशन

कई महिलाएं संक्रमण से बचने के लिए सीट पर नहीं बैठतीं, लेकिन इससे ब्लैडर को पूरा खाली नहीं किया जाता, जो और ज्यादा नुकसान करता है. अगर आप या तो पेशाब रोककर रखती हैं, या ठीक से बैठकर पेशाब नहीं करतीं, दोनों ही आदतें पेल्विक फ्लोर मसल्स को नुकसान पहुंचाती हैं.

टॉयलेट से संक्रमण का डर कितना सही?

  • टॉयलेट सीट से संक्रमण का खतरा उतना ज्यादा नहीं होता, जितना हम समझते हैं.
  • अच्छी बात यह है कि, आप चाहें तो टॉयलेट सीट को सैनिटाइज़र या टिशू से साफ कर, या सीट कवर का इस्तेमाल कर सुरक्षित तरीके से बैठ सकती हैं.
  • खुद को नुकसान पहुंचाने वाली गलत आदतें छोड़कर, थोड़ी सी साफ-सफाई और सतर्कता से आप खुद को सुरक्षित रख सकती हैं.

सुरक्षित और हेल्दी रहने के लिए क्या करें?

  • हमेशा टॉयलेट सीट पर ठीक से बैठें
  • सीट को पहले सैनिटाइज कर लें
  • जरूरत होने पर डिस्पोजेबल सीट कवर इस्तेमाल करें
  • पेशाब बिल्कुल न रोकें
  • बहुत लंबे समय तक पेशाब रोके रहना पेल्विक मसल्स को कमजोर करता है
  • खूब पानी पिएं ताकि यूरिन साफ और पतला रहे
  • अगर बार-बार UTI हो रहा है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें

पब्लिक टॉयलेट से संक्रमण से बचना जरूरी है, लेकिन गलत पोजीशन अपनाकर पेशाब करना उससे कहीं ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है. बेहतर है कि, आप साफ-सफाई पर ध्यान दें और टॉयलेट सीट का सही तरीके से इस्तेमाल करें.

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