कच्चा आंवला-आंवला पाउडर या सूखा हुआ आंवला? जानें सेहत को किससे मिलता है सबसे ज्यादा फायदा

कच्चा आंवला-आंवला पाउडर या सूखा हुआ आंवला? जानें सेहत को किससे मिलता है सबसे ज्यादा फायदा


कच्चा आंवला पोषण से भरपूर होता है क्योंकि यह अपने नैचुरल फॉर्म में रहता है. इसमें विटामिन C की मात्रा संतरे से भी अधिक होती है, जो इम्यूनिटी बढ़ाने और स्किन हेल्थ के लिए बेहद जरूरी है. इसके अलावा, यह पाचन को दुरुस्त रखता है, कब्ज को कम करता है, बालों की ग्रोथ में मदद करता है और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करता है.

ताजा आंवले को सुखाकर और पीसकर तैयार किया गया पाउडर लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है. इसे पानी, शहद या स्मूदी में मिलाना आसान होता है. हालांकि ड्राइंग प्रोसेस में कुछ विटामिन C कम हो जाता है, लेकिन एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स इसमें रहते हैं. यह वजन कम करने, मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और लिवर डिटॉक्स में भी मददगार है.

ताजा आंवले को सुखाकर और पीसकर तैयार किया गया पाउडर लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है. इसे पानी, शहद या स्मूदी में मिलाना आसान होता है. हालांकि ड्राइंग प्रोसेस में कुछ विटामिन C कम हो जाता है, लेकिन एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स इसमें रहते हैं. यह वजन कम करने, मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और लिवर डिटॉक्स में भी मददगार है.

सूखा आंवला खाने में आसान और पचाने में अच्छा है क्योंकि इसमें फाइबर की मात्रा रहती है. यह आयरन के अवशोषण को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे एनीमिया का खतरा कम होता है. हालांकि मीठा किया हुआ सूखा आंवला हेल्दी नहीं माना जाता क्योंकि इसमें अतिरिक्त शुगर होती है. साथ ही, ड्राइंग प्रोसेस में विटामिन C का स्तर कम हो जाता है.

सूखा आंवला खाने में आसान और पचाने में अच्छा है क्योंकि इसमें फाइबर की मात्रा रहती है. यह आयरन के अवशोषण को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे एनीमिया का खतरा कम होता है. हालांकि मीठा किया हुआ सूखा आंवला हेल्दी नहीं माना जाता क्योंकि इसमें अतिरिक्त शुगर होती है. साथ ही, ड्राइंग प्रोसेस में विटामिन C का स्तर कम हो जाता है.

पी.डी. हिंदुजा हॉस्पिटल एंड एमआरसी, खार की क्लिनिकल डाइटेटिक्स डिप्टी मैनेजर, मिस रुतु धोडपकर के अनुसार,

पी.डी. हिंदुजा हॉस्पिटल एंड एमआरसी, खार की क्लिनिकल डाइटेटिक्स डिप्टी मैनेजर, मिस रुतु धोडपकर के अनुसार, “ताजा आंवले में संतरा, मौसमी और नींबू से कहीं ज्यादा विटामिन C पाया जाता है. इसे अक्सर इंडियन गूजबेरी कहा जाता है और 100 ग्राम ताजे आंवले में लगभग 600–700 mg विटामिन C होता है, जो इसे इस पोषक तत्व का सबसे बड़ा नैचुरल सोर्स बनाता है.

यह सुपरफूड विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है, जो इम्यूनिटी को मजबूत करते हैं. यह कब्ज को दूर करके पाचन में सुधार करता है, बालों का झड़ना कम करता है और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करके हार्ट हेल्थ को भी सपोर्ट करता है.

यह सुपरफूड विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है, जो इम्यूनिटी को मजबूत करते हैं. यह कब्ज को दूर करके पाचन में सुधार करता है, बालों का झड़ना कम करता है और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करके हार्ट हेल्थ को भी सपोर्ट करता है.

उन्होंने आगे कहा,

उन्होंने आगे कहा, “एक जरूरी बात यह है कि कटा हुआ आंवला अपना विटामिन C जल्दी खो देता है और इसकी शेल्फ लाइफ सिर्फ दो दिन होती है. सुखाने से आंवला ज्यादा दिन तक सुरक्षित रहता है, लेकिन इससे विटामिन C की मात्रा कम हो जाती है. पाउडर बनाने की प्रोसेस में भी विटामिन C का लेवल और घटता है. फिर भी, सूखा आंवला मेटाबॉलिज्म बढ़ाने, वजन कम करने और स्किन व बालों की सेहत सुधारने में मदद करता है. इसे स्मूदी, शहद या पानी के साथ लिया जा सकता है. आंवला लिवर को डिटॉक्स करने और शरीर का pH लेवल बनाए रखने में भी सहायक है.”

आजकल कई लोग आंवला, हल्दी, खीरा, नींबू, संतरा, चुकंदर और गाजर को पानी में डालकर रातभर छोड़ देते हैं और अगले दिन इसे अल्कलाइन वॉटर के रूप में पीते हैं. इसके अलावा, पारंपरिक प्रोबायोटिक ड्रिंक 'कांजी' इन सामग्रियों को तीन दिन धूप में पानी में रखकर बनाई जाती है, जो आंतों के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ावा देती.

आजकल कई लोग आंवला, हल्दी, खीरा, नींबू, संतरा, चुकंदर और गाजर को पानी में डालकर रातभर छोड़ देते हैं और अगले दिन इसे अल्कलाइन वॉटर के रूप में पीते हैं. इसके अलावा, पारंपरिक प्रोबायोटिक ड्रिंक ‘कांजी’ इन सामग्रियों को तीन दिन धूप में पानी में रखकर बनाई जाती है, जो आंतों के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ावा देती.

Published at : 27 Jul 2025 05:23 PM (IST)

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इन आदतों के कारण तेजी से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल, कैसे मिलती है इससे राहत?

इन आदतों के कारण तेजी से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल, कैसे मिलती है इससे राहत?


आजकल हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है. लंबे समय तक अगर इसका ध्यान न दिया जाए, तो यह हार्ट अटैक, स्ट्रोक और ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है. कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन जब यह अधिक मात्रा में बढ़ता है, तो खतरनाक हो जाता है.

कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने वाली आदतें- 

ज्यादा जंक फूड का सेवन
बाजार में मिलने वाला फास्ट फूड और डीप फ्राइड चीजें ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट से भरपूर होती हैं. बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज और पैक्ड स्नैक्स को बार-बार खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का स्तर बढ़ जाता है.

अत्यधिक मीठा और रिफाइंड कार्ब्स
मीठी चीजें, कोल्ड ड्रिंक्स, केक और सफेद ब्रेड में हाई शुगर होती है, जो ब्लड शुगर को बढ़ाने के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी प्रभावित करती है.

शारीरिक गतिविधि की कमी
पूरे दिन बैठे रहना, एक्सरसाइज न करना और एक्टिविटी की कमी भी कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का बड़ा कारण है. फिजिकल एक्टिविटी न होने से शरीर में फैट जमा होने लगता है, जिससे LDL बढ़ता है और HDL (गुड कोलेस्ट्रॉल) कम होता है.

धूम्रपान और शराब का सेवन
धूम्रपान करने से न केवल हृदय की सेहत खराब होती है, बल्कि यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को कम कर देता है. वहीं, शराब का अत्यधिक सेवन ट्राइग्लिसराइड्स को बढ़ाता है.

तनाव और नींद की कमी
लगातार तनाव और नींद पूरी न होना भी कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित करता है. स्ट्रेस के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जिससे लिपिड मेटाबॉलिज्म बिगड़ जाता है.

South Denver Cardiology Associates के अनुसार, कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के लिए ये कदम उठाएं-:

डाइट में बदलाव करें
हरी सब्जियां, फल, ओट्स, ब्राउन राइस और हाई फाइबर डाइट को शामिल करें. खाना ऑयली और डीप फ्राइड कम से कम लें. सैचुरेटेड फैट की जगह हेल्दी फैट जैसे ऑलिव ऑयल, फ्लैक्स सीड्स और नट्स को अपनाएं.

नियमित एक्सरसाइज करें
रोजाना कम से कम 30 मिनट वॉक या योग करना जरूरी है. नियमित शारीरिक गतिविधि से HDL बढ़ता है और LDL कम होता है.

स्मोकिंग और शराब से दूरी बनाएं
स्मोकिंग और शराब छोड़ना हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने का सबसे प्रभावी तरीका है.

तनाव को मैनेज करें
मेडिटेशन, ब्रिदिंग एक्सरसाइज और पर्याप्त नींद लेकर स्ट्रेस को कंट्रोल करें.

नियमित जांच कराएं
समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट करवाएं. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से मेडिसिन लें.

हाई कोलेस्ट्रॉल को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. गलत खानपान, लाइफस्टाइल और तनाव इसकी मुख्य वजह हैं. अगर समय रहते डाइट, एक्सरसाइज और हेल्दी आदतों को अपनाया जाए, तो कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है और दिल की सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या होता है ओजेम्पिक ट्रीटमेंट, इसका इंजेक्शन लगवाना कितना खतरनाक?

क्या होता है ओजेम्पिक ट्रीटमेंट, इसका इंजेक्शन लगवाना कितना खतरनाक?


ओजेम्पिक को सेमाग्लूटाइड के नाम से भी जाना जाता है. असल में टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों के लिए बनाई गई दवा है. ये हमारे शरीर में ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करती है, लेकिन पिछले कुछ समय से लोग इसे वजन कम करने के लिए भी खूब इस्तेमाल कर रहे हैं. दरअसल, कुछ रिसर्च में इसे वजन कम करने के लिए फायदेमंद बताया गया था. हालांकि, अब इस दवा को लेकर एक नई और चिंताजनक बात सामने आई है. 

ओजेम्पिक के सेवन से लोगों के मूड और पर्सनालिटी पर भी असर पड़ रहा है. इसके साइड-इफेक्ट्स के तौर पर मूड स्विंग्स और पर्सनालिटी डिसऑर्डर जैसी शिकायतें मिल रही हैं, जो यकीनन सेहत के लिए सही नहीं हैं. इसके अंधाधुंध इस्तेमाल से अब नए खतरे सामने आ रहे हैं. इस लेख में विशेषज्ञ बता रहे हैं कि ओजेम्पिक क्या है, क्या यह सेफ है और इसके कुछ साइड इफेक्ट्स तो नहीं हैं. 

क्या है ओजेम्पिक?

ओजेम्पिक को 2017 में अमेरिकी एफडीए से 18 साल से ज्यादा उम्र के टाइप 2 डायबिटीज मरीजों के लिए मंजूरी मिली थी. वेट लॉस एक्सपर्ट डॉ. रीमा अरोरा बताती हैं कि यह एक इंजेक्शन है, जिसे हफ्ते में एक बार डॉक्टर की सलाह पर लगाया जाता है और ये शरीर में इंसुलिन बढ़ाने का काम करता है. हालांकि, इसे वजन घटाने के लिए आधिकारिक तौर पर मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन फिर कई बार डॉक्टर इसे लिख देते हैं.

ये दवा शरीर में बनने वाले नेचुरल हार्मोन की तरह काम करती है. जब हार्मोन का लेवल बढ़ता है, तो ये दिमाग को पेट भरे होने का सिग्नल भेजते हैं. ये खाने के पाचन को भी धीमा कर देती है, जिससे खाना देर से पचता है, जो कुछ हद तक बेरिएट्रिक सर्जरी जैसा असर देता है. ओजेम्पिक का इस्तेमाल डायबिटीज के इलाज में लंबे समय तक किया जाता है और वजन कम होना इसका एक आम साइड इफेक्ट है.

ओजेम्पिक ट्रीटमेंट: रिस्क और बेनिफिट्स 

एक्सपर्ट डायटीशियन आरती जैन कहती हैं कि ओजेम्पिक का यूज हमेशा डॉक्टर की स्ट्रिक्ट सुपरविजन में ही होना चाहिए. बिना सुपरविजन के यूज करने से सीरियस हेल्थ रिस्क और साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.

  • वजन का फिर से बढ़ना: कई यूजर्स दवा बंद करने के बाद वेट फिर से गेन करने का एक्सपीरियंस करते हैं. ये शायद इसलिए होता है, क्योंकि बॉडी अडैप्ट कर लेती है और भूख बढ़ जाती है.
  • गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रॉब्लम्स: कॉमन साइड-इफेक्ट्स में मतली, उल्टी, दस्त और कब्ज शामिल हैं, क्योंकि ये दवा डाइजेशन को स्लो कर देती है.
  • हाइपोग्लाइसीमिया का रिस्क: ब्लड शुगर में अचानक गिरावट (हाइपोग्लाइसीमिया) का रिस्क होता है, खासकर अगर इसे दूसरी डायबिटीज मेडिसन के साथ लिया जाए.

रेयर और सीरियस

  • साइड-इफेक्ट्स: हालांकि ये अनकॉमन हैं, फिर भी पैनक्रियाटाइटिस और यहां तक कि कुछ थायरॉइड ट्यूमर का भी हल्का रिस्क होता है. दूसरे जनरल साइड-इफेक्ट्स में चक्कर आना, सिरदर्द और थकान शामिल हो सकते हैं.
  • मसल्स लॉस: प्रॉपर डाइट और एक्सरसाइज़ के बिना, कुछ इंडिविजुअल्स को ओजेम्पिक लेते समय मांसपेशियों में कमी का एक्सपीरियंस हो सकता है.
  • सबके लिए नहीं (Not for Everyone): वेट लॉस बेनिफिट्स के बावजूद ये ओबेसिटी का यूनिवर्सल सॉल्यूशन नहीं है. डॉक्टर इसे डायबिटीज या ओबेसिटी के स्पेसिफिक मेडिकल क्राइटेरिया के बेसिस पर ही लिखते हैं, न कि सिर्फ कॉस्मेटिक वेट लॉस के लिए.

ओजेम्पिक एक इफेक्टिव मेडिसन है, जब इसे सही परपज के लिए और प्रॉपर तरीके से यूज किया जाए. हालांकि, इसके यूज के लिए पोटेंशियल रिस्क को कम करने और पेशेंट सेफ्टी एंश्योर करने के लिए केयरफुल मेडिकल गाइडेंस की जरूरत होती है.

ये भी पढ़ें: कितनी शराब पीने पर कम होने लगती है उम्र? चौंकाने वाला आंकड़ा आखिरकार आ गया सामने

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सोते-सोते क्यों हो जाती है लोगों की मौत? 99 पर्सेंट लोग नहीं जानते हैं ये कारण

सोते-सोते क्यों हो जाती है लोगों की मौत? 99 पर्सेंट लोग नहीं जानते हैं ये कारण


आज के समय में हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और उनमें से एक गंभीर समस्या है क्रॉनिक हार्ट फेलियर (Chronic Heart Failure). यह एक ऐसी स्थिति है, जब हृदय शरीर की जरूरत के अनुसार पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता. यह स्थिति धीरे-धीरे विकसित होती है और कई बार लोग शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे रोग बढ़कर गंभीर हो जाता है.

लक्षण (Symptoms)
क्रॉनिक हार्ट फेलियर((Chronic Heart Failure) के शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते. जैसे-जैसे हृदय की कार्यक्षमता कम होती है, शरीर के कई हिस्सों पर असर दिखने लगता है. सबसे पहले मरीज को लगातार थकान महसूस होने लगती है. पैरों, टखनों और पंजों में सूजन आ जाती है. कई बार रात में बार-बार यूरिन पास करने की समस्या भी बढ़ जाती है. गंभीर स्थिति में सांस लेने में तकलीफ, घरघराहट, सीने में जकड़न और अनियमित धड़कनें देखने को मिलती हैं. अगर ऐसे संकेत नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

पुरुषों में ज्यादा खतरा मिथक या सच?
कई लोग मानते हैं कि क्रॉनिक हार्ट फेलियर पुरुषों में ज्यादा होता है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है. बीएलके हार्ट सेंटर, नई दिल्ली के कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अजय कौल के अनुसार, 45 वर्ष की उम्र से पहले पुरुषों में इस रोग का खतरा महिलाओं की तुलना में अधिक होता है और इस उम्र तक अनुपात 7:3 रहता है. लेकिन 50 वर्ष के बाद यह अनुपात लगभग बराबर हो जाता है. यानी उम्र बढ़ने के साथ पुरुष और महिलाएं दोनों समान रूप से जोखिम में आते हैं.

क्रॉनिक हार्ट फेलियर के प्रकार और उपचार
यह बीमारी चार चरणों (Type 1 से Type 4) में विभाजित है. टाइप 1 शुरुआती अवस्था होती है, जहां दवाइयों से उपचार संभव है. टाइप 2 और 3 में केवल दवाइयां काफी नहीं होतीं, इन मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है. टाइप 4 सबसे गंभीर अवस्था है, जब हृदय की कार्यक्षमता 85-90 प्रतिशत तक खत्म हो जाती है. इस स्थिति में हार्ट ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है. डॉ. अजय कौल का कहना है कि अगर हृदय 50 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त हो चुका है, तो समय पर इलाज से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है, लेकिन 65 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर जटिलताएं बढ़ जाती हैं.

रोकथाम और लाइफस्टाइल मैनेजमेंट
इस बीमारी को रोकने के लिए जीवनशैली में बदलाव करना जरूरी है. सबसे पहले ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें, क्योंकि अधिक बीपी होने पर हृदय को रक्त पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. दिनभर में दो लीटर से ज्यादा तरल पदार्थ न लें, क्योंकि यह ब्लड वॉल्यूम बढ़ाता है और हृदय पर दबाव डालता है. नमक का सेवन कम करें, हेल्दी डाइट लें और धूम्रपान व शराब से दूर रहें. इसके अलावा, नियमित रूप से हेल्थ चेकअप कराना भी बेहद जरूरी है.

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नॉन-वेज लवर्स सावधान! रोजाना मांस खाने से हो सकती हैं ये समस्याएं

नॉन-वेज लवर्स सावधान! रोजाना मांस खाने से हो सकती हैं ये समस्याएं


Non Veg Side Effects: जैसे ही किसी प्लेट में लजीज चिकन करी, तंदूरी कबाब या मटन बिरयानी आती है, नॉन-वेज प्रेमियों की भूख और भी बढ़ जाती है. भारत में बड़ी संख्या में लोग नॉन-वेज फूड को स्वाद, ताकत और प्रोटीन के लिए पसंद करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि, रोजाना मांस खाना आपकी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है?

डॉ. नवनीत कालरा बताते हैं कि नॉन-वेज का अत्यधिक सेवन कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकता है. विशेष रूप से तब, जब व्यक्ति हफ्ते के हर दिन इसे खाता हो और फाइबर, हरी सब्जियों और संतुलित आहार की अनदेखी कर रहा हो. आइए जानते हैं रोजाना मांस खाने से किन समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

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पाचन तंत्र पर असर

मांस को पचने में शरीर को अधिक समय और मेहनत लगती है. जब व्यक्ति रोजाना नॉन-वेज खाता है, तो पाचन तंत्र पर लगातार दबाव बनता है, जिससे गैस, कब्ज और अपच जैसी समस्याएं होने लगती हैं.

कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग

लाल मांस में सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है. इससे दिल की बीमारियों, हार्ट अटैक और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा भी बढ़ सकता है.

गुर्दे पर बोझ

नॉन-वेज प्रोटीन का मुख्य स्रोत है, लेकिन जब इसे जरूरत से ज्यादा खाया जाता है, तो शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है. इससे किडनी पर असर पड़ता है और समय के साथ किडनी स्टोन या किडनी फेलियर की आशंका भी बन सकती है.

गैस्ट्रिक समस्याएं और एसिडिटी

डेली नॉन-वेज सेवन से पेट में अम्लीयता बढ़ जाती है. इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें और पेट फूलने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं, जो लंबे समय में पेट के अल्सर का कारण भी बन सकती हैं.

कैंसर का खतरा

कुछ रिसर्च बताते हैं कि रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट का अत्यधिक सेवन आंतों के कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है. खासकर जब मांस को डीप फ्राय या ओवरकुक किया गया हो.

वजन बढ़ना

रोज मांस खाने से कैलोरी और फैट का इनटेक बढ़ जाता है, जिससे शरीर में चर्बी जमा होने लगती है मोटापा, थकावट और मेटाबॉलिक समस्याएं.

नॉन-वेज अगर सीमित मात्रा में खाया जाए तो यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन हर दिन मांस खाना धीरे-धीरे शरीर में कई बीमारियों को न्योता देता है. इसलिए स्वाद के साथ-साथ सेहत का भी रखें ध्यान, क्योंकि जब शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेगा, तो स्वाद का क्या मतलब?

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