बिस्किट खाने वालों के लिए चेतावनी, शरीर को हो सकता है भारी नुकसान

बिस्किट खाने वालों के लिए चेतावनी, शरीर को हो सकता है भारी नुकसान


Biscuit Side Effects: चाय की प्याली हो या ऑफिस की भूख मिटाने का आसान विकल्प, बिस्किट लगभग हर घर की रसोई का हिस्सा बन चुके हैं. बच्चे हों या बड़े, कुरकुरे और मीठे बिस्किट हर किसी को पसंद आते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो बिस्किट आप इतने चाव से खाते हैं, वो आपकी सेहत को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकते हैं?

बिस्किट को अक्सर हल्का और सुविधाजनक स्नैक माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो ये आपकी सेहत के लिए एक ‘मीठा जहर’ साबित हो सकते हैं. डॉ. बिमल छाचर कहते हैं कि, बिस्किट में इस्तेमाल होने वाला मैदा, रिफाइंड शुगर और हाइड्रोजेनेटेड ऑयल शरीर के मेटाबोलिज्म को खराब कर सकते हैं.

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डाइजेशन पर असर

बिस्किट में मैदा और कम फाइबर वाली चीजें होने के कारण यह पेट में आसानी से नहीं पचता. इसका लगातार सेवन कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है.

वजन बढ़ने का खतरा

बिस्किट में छिपी कैलोरीज़ और चीनी शरीर में चर्बी के रूप में जमा होने लगती हैं. जो लोग वजन कम करने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए बिस्किट का सेवन करना बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है.

ब्लड शुगर पर असर

डायबिटीज के मरीजों को बिस्किट से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. इनमें हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर तेजी से बढ़ सकता है.

हार्मोनल असंतुलन

डॉ. छाचर बताते हैं कि, बिस्किट में मौजूद ट्रांस फैट और संरक्षक शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकते हैं. खासकर महिलाओं में यह पिंपल्स, पीरियड्स की अनियमितता और थकान का कारण बन सकता है.

बच्चों के विकास पर असर

बच्चों को अक्सर बिस्किट दिया जाता है, लेकिन इसमें प्रोटीन, फाइबर या आवश्यक विटामिन की मात्रा बेहद कम होती है, इससे बच्चों की ग्रोथ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और इम्यूनिटी भी कमजोर हो सकती है.

बिस्किट खाने में जितने मासूम लगते हैं, उतना ही खतरनाक असर शरीर पर डाल सकते हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि, इस आदत को सुधारें और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प अपनाएं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट में कीड़े होने पर क्या करें? ये देसी उपाय दे सकते हैं राहत

पेट में कीड़े होने पर क्या करें? ये देसी उपाय दे सकते हैं राहत


लहसुन: लहसुन में एंटीबैक्टीरियल और एंटीपैरासाइट गुण होते हैं. रोज सुबह खाली पेट 2 कच्ची लहसुन की कलियां चबाना पेट के कीड़ों को मारने में मदद करता है.

कच्चा पपीता: कच्चा पपीता एंजाइम्स से भरपूर होता है जो कीड़ों को खत्म करने में मदद करता है. एक चम्मच कच्चा पपीता का रस, एक चम्मच शहद, गुनगुना पानी.

कच्चा पपीता: कच्चा पपीता एंजाइम्स से भरपूर होता है जो कीड़ों को खत्म करने में मदद करता है. एक चम्मच कच्चा पपीता का रस, एक चम्मच शहद, गुनगुना पानी.

नीम की पत्तियां: नीम की पत्तियों में पाए जाने वाले औषधीय तत्व पेट के कीड़ों को मारने में मदद करते हैं. 5-6 नीम की पत्त‍ियां पीसकर शहद के साथ सुबह खाली पेट लें.

नीम की पत्तियां: नीम की पत्तियों में पाए जाने वाले औषधीय तत्व पेट के कीड़ों को मारने में मदद करते हैं. 5-6 नीम की पत्त‍ियां पीसकर शहद के साथ सुबह खाली पेट लें.

हल्दी: हल्दी एक नेचुरल एंटीसेप्टिक है. रोज सुबह गर्म पानी या दूध के साथ एक चुटकी हल्दी लेने से पेट के कीड़ों में राहत मिल सकती है. कच्ची हल्दी का रस ज्यादा असरदार होता है.

हल्दी: हल्दी एक नेचुरल एंटीसेप्टिक है. रोज सुबह गर्म पानी या दूध के साथ एक चुटकी हल्दी लेने से पेट के कीड़ों में राहत मिल सकती है. कच्ची हल्दी का रस ज्यादा असरदार होता है.

नारियल: नारियल में पाए जाने वाले तत्व कीड़ों को शरीर से बाहर निकालते हैं. सुबह नाश्ते में एक चम्मच नारियल का तेल या कसा हुआ नारियल खाना लाभकारी होता है.

नारियल: नारियल में पाए जाने वाले तत्व कीड़ों को शरीर से बाहर निकालते हैं. सुबह नाश्ते में एक चम्मच नारियल का तेल या कसा हुआ नारियल खाना लाभकारी होता है.

अजवाइन:  पेट की सफाई करता है और गुड़ शरीर को ऊर्जा देता है. एक चम्मच अजवाइन को गुड़ के साथ रोज सुबह खाएं.

अजवाइन: पेट की सफाई करता है और गुड़ शरीर को ऊर्जा देता है. एक चम्मच अजवाइन को गुड़ के साथ रोज सुबह खाएं.

Published at : 26 Jul 2025 05:45 PM (IST)

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कहीं आपकी उंगलियां तो नहीं दे रहीं लिवर डैमेज का संकेत? जानिए लक्षण

कहीं आपकी उंगलियां तो नहीं दे रहीं लिवर डैमेज का संकेत? जानिए लक्षण


नाखूनों का पीला या सफेद पड़ जाना: अगर आपके नाखून पीले या सफेद पड़ते जा रहे हैं, तो यह लिवर की कार्यक्षमता में कमी का संकेत हो सकता है. लिवर डैमेज के कारण शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ता है, जिससे नाखूनों का रंग बदल सकता है.

उंगलियों का सूजन या मोटा होना: लिवर फेलियर या सिरोसिस जैसी स्थितियों में शरीर में फ्लूइड रिटेंशन होने लगती है, जिससे हाथ और खासतौर पर उंगलियों में सूजन आ सकती है. अगर उंगलियां भारी या फूली हुई महसूस हो रही हैं, तो सतर्क हो जाएं.

उंगलियों का सूजन या मोटा होना: लिवर फेलियर या सिरोसिस जैसी स्थितियों में शरीर में फ्लूइड रिटेंशन होने लगती है, जिससे हाथ और खासतौर पर उंगलियों में सूजन आ सकती है. अगर उंगलियां भारी या फूली हुई महसूस हो रही हैं, तो सतर्क हो जाएं.

हथेलियों में लालिमा: जिसे

हथेलियों में लालिमा: जिसे “पामर एरिथेमा” कहा जाता है, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हथेलियों और उंगलियों की जड़ें लाल दिखाई देने लगती हैं. यह लिवर सिरोसिस या हार्मोनल असंतुलन की वजह से हो सकता है.

नाखूनों में सफेद लकीरें या धब्बे: लिवर की खराबी से प्रोटीन लेवल गिर सकता है, जिससे नाखूनों पर सफेद लकीरें या स्पॉट्स बनने लगते हैं. यह एक गंभीर संकेत हो सकता है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

नाखूनों में सफेद लकीरें या धब्बे: लिवर की खराबी से प्रोटीन लेवल गिर सकता है, जिससे नाखूनों पर सफेद लकीरें या स्पॉट्स बनने लगते हैं. यह एक गंभीर संकेत हो सकता है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

उंगलियों के नाखूनों का टेढ़ा-मेढ़ा: लिवर की बीमारियों का असर नाखूनों की बनावट पर भी पड़ता है. अगर नाखून असामान्य रूप से टेढ़े या धुंधले हो रहे हैं, तो यह लिवर सिरोसिस या हेपेटाइटिस का लक्षण हो सकता है.

उंगलियों के नाखूनों का टेढ़ा-मेढ़ा: लिवर की बीमारियों का असर नाखूनों की बनावट पर भी पड़ता है. अगर नाखून असामान्य रूप से टेढ़े या धुंधले हो रहे हैं, तो यह लिवर सिरोसिस या हेपेटाइटिस का लक्षण हो सकता है.

नाखूनों का नीला या बैंगनी रंग लेना: यह ऑक्सीजन की कमी और लिवर सिरोसिस का संकेत हो सकता है. यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत मेडिकल अटेंशन की जरूरत होती है.

नाखूनों का नीला या बैंगनी रंग लेना: यह ऑक्सीजन की कमी और लिवर सिरोसिस का संकेत हो सकता है. यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत मेडिकल अटेंशन की जरूरत होती है.

Published at : 26 Jul 2025 04:52 PM (IST)

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मानसून में नाक भी हो जाती है बीमार, ये 5 समस्याएं सबसे आम

मानसून में नाक भी हो जाती है बीमार, ये 5 समस्याएं सबसे आम


Nose Infection During Rainy Season: झमाझम बारिश हो रही है, सावन का मजा भी लोग ले रहे हैं. लेकिन भीगी सड़कें, गीले कपड़े और बदलता तापमान, ये सब मिलकर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करते हैं. खासकर हमारी नाक, जो मानसून में सबसे अधिक प्रभावित होती है.

नाक बहना, बंद होना या उसमें जलन होना, ये समस्याएं इस मौसम में आम हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है।. डॉ. वी.के. मिश्रा बताते हैं कि, मानसून के दौरान हवा में मौजूद नमी और बैक्टीरिया नाक की सेहत को सबसे पहले निशाना बनाते हैं. आइए जानते हैं मानसून में नाक से जुड़ी सबसे सामान्य पांच बीमारियों के बारे में और उनसे कैसे बचा जा सकता है.

ये भी पढ़े- दिल, दिमाग और हार्मोन्स को सेहतमंद रख सकता है आपका अपना चाय का प्याला, चौंका देगी यह स्टडी

एलर्जिक राइनाइटिस

मानसून में नमी और फफूंद की मौजूदगी बढ़ जाती है. इससे बहुत से लोगों को एलर्जिक राइनाइटिस हो जाता है, जिसमें बार-बार छींकें आना, नाक बहना और आंखों में जलन जैसी समस्याएं होती हैं. अपने कमरे को सूखा और हवादार रखें, बेडशीट और पर्दों को नियमित रूप से धोएं और धूल-मिट्टी से दूर रहें.

साइनस इंफेक्शन

बारिश के मौसम में साइनस की समस्या तेजी से बढ़ती है. सिर दर्द, गालों में भारीपन, नाक बंद रहना इसके प्रमुख लक्षण हैं. भाप लें, गर्म पानी पीएं और सिर को गीला रखने से बचें. अगर समस्या बनी रहे तो डॉक्टर से परामर्श लें.

नाक बंद होना

ठंडी हवा और लगातार नमी के संपर्क में आने से नाक की अंदरूनी परत सूज जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है. गुनगुने पानी से नाक साफ करें, नासिका स्प्रे का उपयोग करें और ठंडी चीज़ों से परहेज करें.

नाक से खून आना

मानसून में कई बार वातावरण में अचानक बदलाव से नाक की नसें फट जाती हैं और खून आने लगता है. नाक में नमी बनाए रखें, बार-बार नाक न झाड़ें और खून आने पर सिर झुकाकर रुकने का प्रयास करें.

फंगल इंफेक्शन

बारिश में नमी के कारण फंगल संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है. इससे नाक में खुजली, बदबू और सांस में दिक्कत होने लगती है. अपने आसपास सफाई रखें, नमी से बचें और फंगल संकेत मिलने पर तुरंत इलाज करवाएं.

मानसून में नाक की समस्याएं आम हैं, लेकिन अगर इन्हें समय रहते न संभाला जाए तो ये बड़ी परेशानी बन सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि, आप अपनी नाक की देखभाल करें, गर्म पानी पिएं, भाप लें और मौसम के अनुसार सावधानी बरतें.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मानसून में नाक भी हो जाती है बीमार, ये 5 समस्याएं सबसे आम

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Nose Infection During Rainy Season: झमाझम बारिश हो रही है, सावन का मजा भी लोग ले रहे हैं. लेकिन भीगी सड़कें, गीले कपड़े और बदलता तापमान, ये सब मिलकर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करते हैं. खासकर हमारी नाक, जो मानसून में सबसे अधिक प्रभावित होती है.

नाक बहना, बंद होना या उसमें जलन होना, ये समस्याएं इस मौसम में आम हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है।. डॉ. वी.के. मिश्रा बताते हैं कि, मानसून के दौरान हवा में मौजूद नमी और बैक्टीरिया नाक की सेहत को सबसे पहले निशाना बनाते हैं. आइए जानते हैं मानसून में नाक से जुड़ी सबसे सामान्य पांच बीमारियों के बारे में और उनसे कैसे बचा जा सकता है.

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एलर्जिक राइनाइटिस

मानसून में नमी और फफूंद की मौजूदगी बढ़ जाती है. इससे बहुत से लोगों को एलर्जिक राइनाइटिस हो जाता है, जिसमें बार-बार छींकें आना, नाक बहना और आंखों में जलन जैसी समस्याएं होती हैं. अपने कमरे को सूखा और हवादार रखें, बेडशीट और पर्दों को नियमित रूप से धोएं और धूल-मिट्टी से दूर रहें.

साइनस इंफेक्शन

बारिश के मौसम में साइनस की समस्या तेजी से बढ़ती है. सिर दर्द, गालों में भारीपन, नाक बंद रहना इसके प्रमुख लक्षण हैं. भाप लें, गर्म पानी पीएं और सिर को गीला रखने से बचें. अगर समस्या बनी रहे तो डॉक्टर से परामर्श लें.

नाक बंद होना

ठंडी हवा और लगातार नमी के संपर्क में आने से नाक की अंदरूनी परत सूज जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है. गुनगुने पानी से नाक साफ करें, नासिका स्प्रे का उपयोग करें और ठंडी चीज़ों से परहेज करें.

नाक से खून आना

मानसून में कई बार वातावरण में अचानक बदलाव से नाक की नसें फट जाती हैं और खून आने लगता है. नाक में नमी बनाए रखें, बार-बार नाक न झाड़ें और खून आने पर सिर झुकाकर रुकने का प्रयास करें.

फंगल इंफेक्शन

बारिश में नमी के कारण फंगल संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है. इससे नाक में खुजली, बदबू और सांस में दिक्कत होने लगती है. अपने आसपास सफाई रखें, नमी से बचें और फंगल संकेत मिलने पर तुरंत इलाज करवाएं.

मानसून में नाक की समस्याएं आम हैं, लेकिन अगर इन्हें समय रहते न संभाला जाए तो ये बड़ी परेशानी बन सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि, आप अपनी नाक की देखभाल करें, गर्म पानी पिएं, भाप लें और मौसम के अनुसार सावधानी बरतें.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल, दिमाग और हार्मोन्स को सेहतमंद रख सकता है आपका अपना चाय का प्याला, चौंका देगी यह स्टडी

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Disposable Paper Cup Side Effects: चाय या कॉफी पीना हमारे दिन की शुरुआत का अहम हिस्सा बन चुका है. लेकिन अगर आप ये प्लास्टिक या पेपर के डिस्पोजेबल कप में पीते हैं तो सावधान हो जाइए! ये आदत आपकी सेहत पर धीरे-धीरे जहर बनकर असर डाल सकती है.

जो कप आपको बाहर सफर या ऑफिस में आसान लगते हैं, वही कप हर दिन आपके शरीर में हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण पहुंचा रहे हैंऔर आपको पता भी नहीं चलता. हाल ही में IIEST की चेयरपर्सन तेजस्विनी अनंतकुमार ने भी सोशल मीडिया पर यही बात साझा की और सभी को सलाह दी कि, वे यात्रा करते समय अपना खुद का कप लेकर चलें.

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क्या कहती है रिसर्च?

IIT खड़गपुर की 2021 की एक स्टडी में यह खुलासा हुआ कि जब किसी पेपर या प्लास्टिक कप में 85 से 90 डिग्री सेल्सियस तापमान की चाय या कॉफी डाली जाती है तो सिर्फ 15 मिनट में उस पेय में लगभग 25,000 माइक्रोप्लास्टिक कण घुल जाते हैं. यह स्टडी डॉ. सुधा गोयल द्वारा की गई थी। उनके मुताबिक, अगर आप दिन में तीन बार ऐसे कप में चाय या कॉफी पीते हैं, तो रोजना आप 75,000 माइक्रोप्लास्टिक कण अपने शरीर में ले रहे हैं.

क्या है माइक्रोप्लास्टिक और कैसे होता है नुकसान?

माइक्रोप्लास्टिक बहुत छोटे-छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते हैं, जो हमारी आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर में जाकर बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं. इन प्लास्टिक कप्स के कोटिंग में कई हानिकारक केमिकल होते हैं जैसे…

  • बिस्फेनोल्स
  • फ्थेलेट्स
  • डायॉक्सिन्स

क्या-क्या समस्या हो सकती है

  • हार्मोनल असंतुलन
  • महिलाओं और पुरुषों में प्रजनन संबंधी समस्याएं
  • बच्चों की वृद्धि में बाधा
  • मोटापा
  • कैंसर का खतरा
  • मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को नुकसान
  • इम्यून सिस्टम की कमजोरी

क्या करें बचाव के लिए?

  • सबसे आसान उपाय यह है कि आप अपना स्टील या कांच का कप साथ लेकर चलें, खासकर जब बाहर गर्म पेय पीने का प्लान हो
  • सेहत के लिए सुरक्षित
  • प्लास्टिक का इस्तेमाल कम होता है
  • पर्यावरण के लिए भी बेहतर विकल्प

डिस्पोजेबल कप में चाय या कॉफी पीना जितना आसान लगता है, उतना ही खतरनाक भी है. हर दिन आप अनजाने में अपने शरीर में माइक्रोप्लास्टिक भर रहे हैं, जो भविष्य में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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