नशे का बढ़ता कहर और नाबालिगों की बर्बादी, कम उम्र में ड्रग्स के लिए सिरिंज का इस्तेमाल

नशे का बढ़ता कहर और नाबालिगों की बर्बादी, कम उम्र में ड्रग्स के लिए सिरिंज का इस्तेमाल


Drug Addication in Teenagers: जिस उम्र में हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में अगर सिरिंज पकड़ी जाए, तो यह सिर्फ एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक गंभीर समस्या है. आज के युवाओं और नाबालिगों के बीच नशे का बढ़ता चलन समाज के भविष्य पर गहरा सवाल खड़ा करता है. स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चे जब ड्रग्स की गिरफ्त में आने लगें और नशा करने का जरिया बन जाए एक इंजेक्शन, तो समझ लीजिए कि हालात बेहद चिंताजनक हो चुके हैं.

एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग द्वारा किए गए हालिया अध्ययन में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न केवल डरावने हैं, बल्कि समाज को झकझोर देने वाले भी हैं. इस अध्ययन में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के कुल 5,602 सिरिंज से ड्रग्स लेने वालों को शामिल किया गया, जिसमें एक बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जो या तो बेरोजगार हैं, तलाकशुदा हैं, या फिर समाज से कटे हुए हैं.

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अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े

एम्स द्वारा किए गए इस सर्वे में पाया गया कि, 60.1% उपयोगकर्ता ऐसे थे ,जिनकी उम्र 30 वर्ष या उससे अधिक थी, लेकिन इस खतरे की शुरुआत बहुत कम उम्र में ही हो चुकी थी. इनमें से अधिकतर लोग बेरोजगार, तलाकशुदा या मानसिक रूप से अस्थिर थे. 84. प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों से थे और ज्यादातर कम पढ़े-लिखे थे.

एचआईवी का खतरा बढ़ रहा है

  • सिरिंज से ड्रग्स लेने की वजह से एचआईवी संक्रमण तेजी से फैल रहा है.
  • दिल्ली: 15.8 प्रतिशत है
  • उत्तराखंड: 9.77 प्रतिशत है
  • उत्तर प्रदेश: 5.4 प्रतिशत है
  • बिहार: 2.8 प्रतिशत है
  • नाबालिग क्यों हो रहे हैं शिकार?
  • किशोर अक्सर अपने दोस्तों के दबाव में या नई चीज़ों की चाह में नशे की ओर बढ़ते हैं.
  • टूटे हुए परिवार, घरेलू हिंसा, या माता-पिता का ध्यान न देना एक बड़ा कारण है.
  • आज के समय में ड्रग्स और नशे के साधन जैसे सिरिंज, बेहद आसानी से मिल जाते हैं.

समाधान होने की दिशा में कदम

  • स्कूलों में नशा विरोधी जागरूकता अभियान
  • परिवार और समुदाय की सक्रिय भूमिका
  • मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान
  • युवाओं के लिए रोजगार और स्किल ट्रेनिंग

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 से पहले भी आ सकता है मेनोपॉज, जानिए कैसे पड़ता है फर्टिलिटी पर असर

30 से पहले भी आ सकता है मेनोपॉज, जानिए कैसे पड़ता है फर्टिलिटी पर असर


Signs of Early Menopause: हममें से अधिकतर महिलाओं को यही लगता है कि, मेनोपॉज 45 या 50 की उम्र के बाद ही आता है, जब पीरियड्स हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. लेकिन क्या आप जानती हैं कि, कुछ महिलाओं को 30 की उम्र से पहले ही मेनोपॉज हो सकता है? सुनने में यह भले ही चौंकाने वाला लगे, लेकिन यह एक मेडिकल रियलिटी है, जिसे Premature Menopause कहा जाता है.

जब एक महिला को इतने कम उम्र में मेनोपॉज का सामना करना पड़ता है, तो यह सिर्फ उसके हार्मोनल बैलेंस को ही नहीं, बल्कि उसके मां बनने के सपने को भी गहराई से प्रभावित करता है. इसी विषय पर डॉ. सुप्रिया पुराणिक कहती हैं कि, अगर समय रहते इसकी पहचान और सही दिशा में इलाज न किया जाए, तो यह महिलाओं की फर्टिलिटी को स्थायी रूप से खत्म कर सकता है.

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मेनोपॉज जल्दी क्यों होता है

  • जेनेटिक फैक्टर: अगर परिवार में पहले भी महिलाओं को जल्दी मेनोपॉज हुआ है, तो इसकी संभावना बढ़ जाती है.
  • ऑटोइम्यून डिसऑर्डर: जब शरीर की इम्यून सिस्टम ओवरीज पर हमला करने लगे.
  • कीमोथेरेपी या रेडिएशन: कैंसर के इलाज के दौरान भी ओवरी डैमेज हो सकती है.
  • ओवरी सर्जरी या ओवरी हटाना: जिससे अंडाणु बनना बंद हो जाता है.
  • लाइफस्टाइल फैक्टर: स्मोकिंग, अत्यधिक स्ट्रेस और पोषण की कमी भी इसका कारण हो सकते हैं.

फर्टिलिटी पर कैसे पड़ता है असर?

  • जब मेनोपॉज जल्दी आ जाता है, तो महिला की ओवरीज़ में अंडाणु बनने बंद हो जाते हैं.
  • प्राकृतिक गर्भधारण मुश्किल हो जाता है.
  • हार्मोन का बैलेंस बिगड़ जाता है, जिससे यूट्रस की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है.
  • अंडाणुओं की संख्या और गुणवत्ता बहुत कम हो जाती है.
  • पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं या बिल्कुल बंद हो सकते हैं.

समाधान क्या है?

  • समय रहते यदि इस स्थिति की पहचान कर ली जाए, तो कुछ उपायों से फर्टिलिटी को कुछ हद तक बचाया जा सकता है.
  • ब्लड टेस्ट (FSH, AMH) और सोनोग्राफी से ओवरी रिजर्व की जांच करवाई जा सकती है.
  • अगर महिला अभी गर्भधारण नहीं करना चाहती, तो अपने अंडाणु सुरक्षित रख सकती है.
  • जिन महिलाओं की ओवरीज़ अंडाणु बनाना बंद कर देती हैं, उनके लिए यह एक विकल्प हो सकता है.

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योग से 40 पर्सेंट तक कम होता है टाइप-2 डायबिटीज का खतरा, नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

योग से 40 पर्सेंट तक कम होता है टाइप-2 डायबिटीज का खतरा, नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा


भारत में डायबिटीज बेहद कॉमन बीमारी बन चुकी है, जिससे लाखों लोग जूझ रहे हैं. समय-समय पर इस बीमारी को लेकर कई स्टडी सामने आती रहती हैं, लेकिन हाल ही में केंद्र सरकार को सौंपी गई एक नई रिपोर्ट ने सबका ध्यान खींचा है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नियमित योग अभ्यास से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 40% तक कम हो सकता है. खास बात यह है कि यह उन लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद है, जिनमें इस बीमारी का जोखिम ज्यादा होता है, जैसे कि जिनके परिवार में पहले से कोई डायबिटिक हो. यह रिपोर्ट योग और टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम पर आधारित है और इसे वैज्ञानिक रूप से तैयार किया गया है.

रिपोर्ट में क्या है खास?

इस रिपोर्ट को रिसर्च सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज इन इंडिया (RSSDI) ने तैयार किया है, जिसकी अगुवाई मशहूर एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. एस. वी. मधु ने की है. यह पहली बार है कि किसी वैज्ञानिक अध्ययन में योग को टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम से जोड़ा गया है. अब तक ज्यादातर शोध उन लोगों पर केंद्रित थे, जो पहले से डायबिटीज से पीड़ित हैं. लेकिन यह नई रिपोर्ट उन लोगों पर फोकस करती है, जिनमें डायबिटीज होने की संभावना ज्यादा है. 

रिपोर्ट में कुछ खास योग आसनों का जिक्र किया गया है, जो इस बीमारी को रोकने में मददगार साबित हुए हैं. ये आसन न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं, बल्कि तनाव को कम करने और शरीर में इंसुलिन के उपयोग को बेहतर करने में भी मदद करते हैं. हालांकि, यह रिपोर्ट अभी गैर-चिकित्सीय (नॉन-क्लिनिकल) अवलोकनों पर आधारित है और इसे और परीक्षणों के लिए भेजा गया है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में इस पर और गहन शोध होगा, ताकि योग के फायदों को और स्पष्ट रूप से समझा जा सके.

योग और आधुनिक विज्ञान का संगम

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, जो खुद एक वरिष्ठ डायबिटोलॉजिस्ट हैं, ने इस रिपोर्ट को भारत की पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणाली की वैज्ञानिक पुष्टि बताया है. उन्होंने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि योग जैसी प्राचीन विधाएं आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर स्वास्थ्य समस्याओं का कारगर समाधान दे सकती हैं. डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग इस दिशा में और शोध कर रहा है, ताकि यह समझा जा सके कि योग और अन्य पारंपरिक उपाय डायबिटीज की रोकथाम और उपचार में कितने प्रभावी हो सकते हैं.

डायबिटीज का बढ़ता खतरा

भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है. खराब लाइफस्टाइल, तनाव, गलत खानपान और कम फिजिकल एक्टिविटी इसके मुख्य कारण हैं. टाइप-2 डायबिटीज तब होती है, जब शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता. यह बीमारी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि हृदय रोग, किडनी की समस्याएं और आंखों की बीमारियों जैसी गंभीर जटिलताओं को भी जन्म दे सकती है. ऐसे में योग जैसे प्राकृतिक और सस्ते उपाय इस बीमारी से बचाव में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.

योग क्यों है फायदेमंद?

योग न केवल शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर करता है. यह तनाव को कम करता है, जो डायबिटीज का एक बड़ा कारण है. योग के कुछ आसन, जैसे सूर्य नमस्कार, धनुरासन, भुजंगासन और पश्चिमोत्तानासन, शरीर में रक्त संचार को बेहतर करते हैं और इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं. इसके अलावा, प्राणायाम और ध्यान जैसे अभ्यास तनाव को कम करने में मदद करते हैं, जिससे ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है.

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IVF से कर रहे हैं बेबी की प्लानिंग, ये जर्नी शुरू करने से पहले कैसी होनी चाहिए आपकी डाइट?

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Pre IVF Diet Plan: बच्चे की किलकारी सुनना हर दंपत्ति का सपना होता है. लेकिन जब यह सपना प्राकृतिक रूप से पूरा नहीं हो पाता, तो IVF की मदद से इसे साकार करने की कोशिश की जाती है. जो भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से जुड़ी होती है. इस जर्नी की सफलता कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है, जिनमें सबसे अहम है आपकी डाइट यानी खानपान.

IVF की शुरुआत करने से पहले अगर आप अपने शरीर को अंदर से तैयार कर लें, तो इसकी सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है. डाइट सिर्फ पोषण देने का माध्यम नहीं, बल्कि यह आपके रिप्रोडक्टिव हेल्थ को मजबूत करने का सबसे असरदार तरीका भी है.

डॉ. सुनील जिंदल बताते हैं कि, IVF से पहले शरीर को डिटॉक्स करना और पोषण से भरपूर बनाना बहुत जरूरी है. एक हेल्दी डाइट न केवल महिलाओं के अंडों के लिए बेहतर होता है, ब्लकि पुरुषों के शुक्राणुओं की गतिशीलता और क्वालिटी को भी सुधारती है.

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फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर चीजें खाएं

फल (जैसे बेरीज़, अनार, सेब), हरी पत्तेदार सब्जियाँ (पालक, मेथी), और साबुत अनाज शरीर में टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करते हैं और फर्टिलिटी को बढ़ाते हैं.

प्रोटीन का सेवन बढ़ाएं

अंडे, दालें, पनीर, नट्स और सीड्स (जैसे अलसी, चिया) जैसे स्रोतों से प्रोटीन मिल सकता है, जो शरीर के हार्मोन बैलेंस को ठीक रखता है और यूट्राइन लाइनिंग को मजबूत बनाता है.

फॉलिक एसिड से भरपूर चीजें शामिल करें

IVF की तैयारी कर रही महिलाओं को फॉलिक एसिड की आवश्यकता ज्यादा होती है. इसके लिए ब्रोकली, अंकुरित अनाज और सप्लीमेंट्स लिए जा सकते हैं. ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर चीजें जैसे अखरोट, अलसी के बीज और ऑलिव ऑयल आपके हार्मोन को बैलेंस करने में मदद करते हैं.

हाइड्रेशन का रखें ध्यान

IVF की तैयारी कर रही महिलाओं को दिनभर में कम से कम 8-10 गिलास पानी पीना चाहिए ताकि शरीर की सारी प्रणालियाँ ठीक तरह से काम करें।

इन चीजों से बचें

जंक फूड, अत्यधिक कैफीन (कॉफी/चाय), शराब, और धूम्रपान IVF की सफलता को प्रभावित कर सकते हैं. इनके सेवन से अंडाणुओं और शुक्राणुओं की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है.

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टेस्ट ही नहीं, सेहत का खजाना हैं ये रसोई के मसाले, जानिए पाचन में कैसे करते हैं मदद

टेस्ट ही नहीं, सेहत का खजाना हैं ये रसोई के मसाले, जानिए पाचन में कैसे करते हैं मदद


बारिश का मौसम हर किसी को अच्छा लगता है.ठंडी हवा, हल्की बारिश और गरमागरम चाय का मजा इस मौसम मे हर कोई लेता है. लेकिन इसी मौसम में कई बार पेट से जुड़ी समस्याएं, इंफेक्शन और दूसरी बीमारियां भी हो जाती हैं. ऐसे में हमें अपने खाने-पीने पर खास ध्यान देना चाहिए. सिर्फ तला-भुना या चटपटा खाना नहीं, बल्कि ऐसा खाना खाएं जो सेहत के लिए फायदेमंद हो.

साथ ही कुछ ऐसे घरेलू मसाले भी खाने में शामिल करने चाहिए जो न सिर्फ खाने का टेस्ट बढ़ाएं, बल्कि पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाएं.मानसून में ऐसे कुछ मसाले हैं जो ना सिर्फ खाने का टेस्ट बढ़ता है, बल्कि पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखते हैं. तो आइए जानते हैं जो टेस्ट ही नहीं सेहत का खजाना भी हैं औरआपके घर की रसोई में आसानी से मिल जाते हैं. 

1. दालचीनी टेस्ट के साथ सेहत का खजाना

दालचीनी एक हल्की मीठी खुशबू वाला मसाला है जो कई मीठे और नमकीन खाने में यूज होती है. ऐसे में आप इसे चाय, सूप या किसी गर्म ड्रिंक में डालकर यूज कर सकते हैं. इसके अलावा इसे पाउडर रूप में दूध या शहद के साथ भी लिया जा सकता है.यह पाचन तंत्र को बेहतर करती है. साथ ही मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद करती है. इसके अलावा ये ठंड और सर्दी-जुकाम में राहत देती है. 

2. जीरा टेस्ट के साथ पाचन और वजन कम करने में फायदेमंद

जीरा हर रसोई का आम मसाला है जो तड़के में यूज होता है, लेकिन इसके फायदे सिर्फ टेस्ट तक सीमित नहीं हैं. यह खासतौर पर पाचन और वजन कम करने में बहुत फायदेमंद माना जाता है.इसको लेने के लिए आप एक गिलास पानी में एक चम्मच जीरा रात भर भिगोकर रखें फिर सुबह उठकर इस पानी को छान लें और खाली पेट पी जाएं. चाहें तो इसे हल्का उबालकर भी पी सकते है. ये पाचन को सुधारता है, शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज करता है, वजन कम करने में मदद करता है, साथ ही गैस और पेट दर्द से राहत देता है. 

3. अजवाइन गैस और अपच का घरेलू इलाज

अगर आपको पेट फूलने, गैस बनने या खाना पचने में दिक्कत हो रही है, तो अजवाइन एक असरदार घरेलू उपाय है.एक चम्मच अजवाइन लें, उसमें एक थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाएं और गर्म पानी के साथ इसे लें. इससे गैस, अपच और पेट दर्द जैसी समस्याओं से राहत मिलती है. अजवाइन में ऐसे गुण होते हैं जो पेट के अंदर गैस को बाहर निकालने और पाचन को सही करने में मदद करते हैं. 

अजवाइन, दालचीनी और जीरा, ये तीनों मसाले आपके खाने का टेस्ट तो बढ़ाते ही हैं,लेकिन साथ में आपके पाचन तंत्र और इम्यून सिस्टम को भी मजबूत करते हैं. मानसून के मौसम में जब बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है, तब इन मसालों का सेवन आपको हेल्दी और एक्टिव बनाए रखता है. 

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घर में अकेले हैं और पड़ गया दिल का दौरा, ऐसी स्थिति में क्या करें? डॉक्टर्स से समझिए

घर में अकेले हैं और पड़ गया दिल का दौरा, ऐसी स्थिति में क्या करें? डॉक्टर्स से समझिए


मानेसर स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल के कार्डियक सर्जरी डिपार्टमेंट में कार्डियक एंड वस्कुलर सर्जन डॉ. महेश वाधवानी ने बताया है कि अगर अकेले में दिल को दौरा पड़े तो क्या करना चाहिए?

डॉ. वाधवानी बताते हैं कि  दिल की समस्याओं के खास लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है. चलते समय सीने में भारीपन या दर्द, थोड़ी मेहनत पर सांस फूलना या अचानक सांस रुकना/घबराहट महसूस होना. ऐसे कोई भी संकेत मिलने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें, यह आपकी सेहत के लिए बेहद अहम है.

डॉ. वाधवानी बताते हैं कि दिल की समस्याओं के खास लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है. चलते समय सीने में भारीपन या दर्द, थोड़ी मेहनत पर सांस फूलना या अचानक सांस रुकना/घबराहट महसूस होना. ऐसे कोई भी संकेत मिलने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें, यह आपकी सेहत के लिए बेहद अहम है.

तुरंत एम्बुलेंस को कॉल करें: ये सबसे पहला और अहम कदम है. अपने मोबाइल से तुरंत एम्बुलेंस को फोन करें (भारत में 108 या 112). कॉल करते समय अपनी स्थिति और सटीक लोकेशन साफ-साफ बताएं. कोशिश करें कि फोन कॉल चालू रहे, ताकि मदद तेजी से आप तक पहुंच सके.

तुरंत एम्बुलेंस को कॉल करें: ये सबसे पहला और अहम कदम है. अपने मोबाइल से तुरंत एम्बुलेंस को फोन करें (भारत में 108 या 112). कॉल करते समय अपनी स्थिति और सटीक लोकेशन साफ-साफ बताएं. कोशिश करें कि फोन कॉल चालू रहे, ताकि मदद तेजी से आप तक पहुंच सके.

अपने घर तक पहुंच आसान बनाएं: जब आप मदद का इंतजार कर रहे हों तो कुछ तैयारियां कर लें. यदि रात का समय है, तो घर की सभी लाइट्स जला दें. मुख्य दरवाजा खोल दें, ताकि मेडिकल टीम आसानी से अंदर आ सके.

अपने घर तक पहुंच आसान बनाएं: जब आप मदद का इंतजार कर रहे हों तो कुछ तैयारियां कर लें. यदि रात का समय है, तो घर की सभी लाइट्स जला दें. मुख्य दरवाजा खोल दें, ताकि मेडिकल टीम आसानी से अंदर आ सके.

खुद को आराम की स्थिति में रखें: मेडिकल मदद आने तक अपनी ऊर्जा बचाना जरूरी है. अगर आप खड़े हैं, तो तुरंत बैठ जाएं या लेट जाएं. सबसे अच्छा होगा कि पीठ के बल लेट जाएं और पैरों को थोड़ा ऊपर रखें. इससे दिल पर दबाव कम होता है और रक्त संचार सुधरता है.

खुद को आराम की स्थिति में रखें: मेडिकल मदद आने तक अपनी ऊर्जा बचाना जरूरी है. अगर आप खड़े हैं, तो तुरंत बैठ जाएं या लेट जाएं. सबसे अच्छा होगा कि पीठ के बल लेट जाएं और पैरों को थोड़ा ऊपर रखें. इससे दिल पर दबाव कम होता है और रक्त संचार सुधरता है.

अपने किसी करीबी को फोन करें: इस गंभीर स्थिति में किसी भरोसेमंद व्यक्ति जैसे परिजन, पड़ोसी या मित्र को कॉल करें. उन्हें बताएं कि आपने एम्बुलेंस को बुलाया है और आपकी हालत कैसी है. वे आपकी मेडिकल हिस्ट्री या जरूरी जानकारी डॉक्टरों को दे सकते हैं, जिससे इलाज बेहतर हो सके.

अपने किसी करीबी को फोन करें: इस गंभीर स्थिति में किसी भरोसेमंद व्यक्ति जैसे परिजन, पड़ोसी या मित्र को कॉल करें. उन्हें बताएं कि आपने एम्बुलेंस को बुलाया है और आपकी हालत कैसी है. वे आपकी मेडिकल हिस्ट्री या जरूरी जानकारी डॉक्टरों को दे सकते हैं, जिससे इलाज बेहतर हो सके.

एस्पिरिन लें (यदि उपलब्ध हो): अगर आपको एस्पिरिन से कोई एलर्जी नहीं है, तो 300 मिलीग्राम की एक एस्पिरिन चबा लें. यह खून को पतला करके खून के थक्के बनने की संभावना को कम करती है.

एस्पिरिन लें (यदि उपलब्ध हो): अगर आपको एस्पिरिन से कोई एलर्जी नहीं है, तो 300 मिलीग्राम की एक एस्पिरिन चबा लें. यह खून को पतला करके खून के थक्के बनने की संभावना को कम करती है.

डॉक्टर्स की मानें तो कुछ खास लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम अधिक होता है और उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए. इनमें 50 वर्ष से अधिक उम्र वाले वे लोग शामिल हैं, जिनके परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा हो. इसके अलावा डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को भी दिक्कत होती है. साथ ही, सिगरेट या तंबाकू का ज्यादा सेवन करते हैं.

डॉक्टर्स की मानें तो कुछ खास लोगों में हार्ट अटैक का जोखिम अधिक होता है और उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए. इनमें 50 वर्ष से अधिक उम्र वाले वे लोग शामिल हैं, जिनके परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा हो. इसके अलावा डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को भी दिक्कत होती है. साथ ही, सिगरेट या तंबाकू का ज्यादा सेवन करते हैं.

Published at : 26 Jul 2025 06:54 AM (IST)

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