MRI टेस्ट कराते वक्त क्यों हो जाती है मौत, जानें जांच कराते समय कैसे बचाएं जान?

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एमआरआई या मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों की डिटेल्ड इमेज निकालकर उस हिस्से में मौजूद बीमारी का पता लगाती है. कई बार हमारी बॉडी की बीमारी का सिंपल तरीके से पता लगाना डॉक्टर्स के लिए मुश्किल हो जाता है. ऐसे में सीटी स्कैन के जरिए भी बीमारी का ठीक से पता नहीं चल पाता.

सीटी स्कैन की तुलना में एमआरआई स्कैन शरीर के इन हिस्सों की बेहतर और डिटेल्ड पिक्चर निकालने की कैपेसिटी रखता है. इसके अलावा इसमें किसी तरह के रेडिएशन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जो बॉडी को नुकसान पहुंचाते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर्स एमआरआई स्कैन कराने की सलाह देते हैं.

सीटी स्कैन की तुलना में एमआरआई स्कैन शरीर के इन हिस्सों की बेहतर और डिटेल्ड पिक्चर निकालने की कैपेसिटी रखता है. इसके अलावा इसमें किसी तरह के रेडिएशन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जो बॉडी को नुकसान पहुंचाते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर्स एमआरआई स्कैन कराने की सलाह देते हैं.

एमआरआई स्कैन एक पावरफुल मेडिकल इमेजिंग टेक्नीक है, जो बॉडी की डिटेल्ड इमेज बनाने के लिए मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल करती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मशीन का मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड से 30 हजार गुना ज्यादा पावरफुल होता है. यह रूम में मौजूद किसी भी मेटल की चीज को अपनी ओर तेज़ी से खींचने की कैपेसिटी रखता है.

एमआरआई स्कैन एक पावरफुल मेडिकल इमेजिंग टेक्नीक है, जो बॉडी की डिटेल्ड इमेज बनाने के लिए मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल करती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मशीन का मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड से 30 हजार गुना ज्यादा पावरफुल होता है. यह रूम में मौजूद किसी भी मेटल की चीज को अपनी ओर तेज़ी से खींचने की कैपेसिटी रखता है.

एमआरआई मशीन रूम में रखी व्हीलचेयर या लोहे की अलमारी तक को अपनी ओर खींच सकती है, जिससे ये पेशेंट या उनके साथ आए लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. इससे हमेशा आग लगने या किसी और तरह के हादसे का खतरा बना रहता है.

एमआरआई मशीन रूम में रखी व्हीलचेयर या लोहे की अलमारी तक को अपनी ओर खींच सकती है, जिससे ये पेशेंट या उनके साथ आए लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. इससे हमेशा आग लगने या किसी और तरह के हादसे का खतरा बना रहता है.

हॉस्पिटल में एमआरआई स्कैन से पहले किसी भी पेशेंट की हेल्थ और मेडिकल इन्फॉर्मेशन मांगी जाती है, ताकि मेडिकल टीम ये पता कर सके कि स्कैन करना सेफ है या नहीं. इसके अलावा पेशेंट की परमिशन ली जाती है. स्कैनर के पावरफुल मैग्नेटिक फील्ड के कारण पेशेंट के शरीर पर या भीतर कोई मेटल ऑब्जेक्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जान का खतरा रहता है.

हॉस्पिटल में एमआरआई स्कैन से पहले किसी भी पेशेंट की हेल्थ और मेडिकल इन्फॉर्मेशन मांगी जाती है, ताकि मेडिकल टीम ये पता कर सके कि स्कैन करना सेफ है या नहीं. इसके अलावा पेशेंट की परमिशन ली जाती है. स्कैनर के पावरफुल मैग्नेटिक फील्ड के कारण पेशेंट के शरीर पर या भीतर कोई मेटल ऑब्जेक्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जान का खतरा रहता है.

यदि किसी व्यक्ति के शरीर में पेसमेकर, मेटल वाले नकली दांत, सुनने की मशीन या ऐसे ही दूसरे इम्प्लांट्स हों तो उनका एमआरआई नहीं किया जा सकता. इसके अलावा घड़ी, ज्वेलरी या कोई भी मेटल ऑब्जेक्ट रूम के अंदर ले जाने की परमिशन नहीं होती.

यदि किसी व्यक्ति के शरीर में पेसमेकर, मेटल वाले नकली दांत, सुनने की मशीन या ऐसे ही दूसरे इम्प्लांट्स हों तो उनका एमआरआई नहीं किया जा सकता. इसके अलावा घड़ी, ज्वेलरी या कोई भी मेटल ऑब्जेक्ट रूम के अंदर ले जाने की परमिशन नहीं होती.

इसके अलावा जो लोग बंद जगह से डरते हैं, उनके लिए भी ये मशीन खतरनाक हो सकती है, क्योंकि स्कैनिंग में कई बार लंबा टाइम लगता है. ऐसे में उन्हें पैनिक अटैक आ सकता है. प्रेग्नेंसी में डॉक्टर्स इससे बचने की सलाह देते हैं. एमआरआई मशीन की एक और कमी ये है कि स्कैनिंग के दौरान इससे बहुत तेज आवाज आती है. यह आवाज 100 से 120 डेसिबल तक जा सकती है, जो कानों के लिए नुकसानदायक हो सकती है.

इसके अलावा जो लोग बंद जगह से डरते हैं, उनके लिए भी ये मशीन खतरनाक हो सकती है, क्योंकि स्कैनिंग में कई बार लंबा टाइम लगता है. ऐसे में उन्हें पैनिक अटैक आ सकता है. प्रेग्नेंसी में डॉक्टर्स इससे बचने की सलाह देते हैं. एमआरआई मशीन की एक और कमी ये है कि स्कैनिंग के दौरान इससे बहुत तेज आवाज आती है. यह आवाज 100 से 120 डेसिबल तक जा सकती है, जो कानों के लिए नुकसानदायक हो सकती है.

Published at : 23 Jul 2025 06:48 AM (IST)

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प्याज और लहसुन खाने के कई फायदे, इन चीजों में डालकर जरूर खाएं

प्याज और लहसुन खाने के कई फायदे, इन चीजों में डालकर जरूर खाएं


Health Benefits of Onion and Garlic: रसोई की सबसे आम और ताकतवर चीजें कौन सी हैं? ज्यादातर लोग नमक, हल्दी या मिर्च का नाम लेंगे, लेकिन जो असली ‘हीरो’ होते हैं, वो अक्सर चुपचाप अपना काम करते हैं, जैसे प्याज और लहसुन. ये दोनों ही चीजें खाने में स्वाद का तड़का लगाने के साथ-साथ आपकी सेहत के लिए भी किसी औषधि से कम नहीं हैं.

डॉ. नेहा मेहता कहती हैं कि, प्याज और लहसुन खाने से इम्युनिटी बढ़ती है और पाचन भी ठीक रहता है. प्याज की खुशबू कभी रुला सकती है,और लहसुन की गंध कई बार नाक सिकोड़ने पर मजबूर कर देती है, लेकिन अगर इनके फायदे जान लेंगे तो इन्हें रोज की डाइट में शामिल किए बिना मन नहीं मानेगा. प्याज और लहसुन दोनों को ही स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से भरपूर माना गया है.

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प्याज खाने के फायदे

दिल के लिए फायदेमंद

प्याज में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स और सल्फर कंपाउंड्स ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखते हैं और कोलेस्ट्रॉल घटाने में मदद करते हैं.

इम्युनिटी बूस्टर

प्याज में एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर होते हैं जो शरीर को बैक्टीरिया और वायरल इन्फेक्शन से बचाते हैं.

पाचन में मददगार

कच्चा प्याज पेट को ठंडक देता है और पाचन क्रिया को सुचारु रखता है.

ब्लड शुगर कंट्रोल

डायबिटीज के मरीजों के लिए प्याज फायदेमंद है क्योंकि यह ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखने में मदद करता है.

लहसुन खाने के फायदे

हृदय रोगों से सुरक्षा

लहसुन में एलिसिन नामक तत्व होता है जो खून को पतला करता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम होता है.

एंटीबायोटिक गुण

यह प्राकृतिक एंटीबायोटिक की तरह काम करता है और संक्रमण से लड़ने में मदद करता है.

इम्यून सिस्टम मजबूत करता है

रोजाना लहसुन खाने से सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं से लड़ने की शक्ति बढ़ती है.

कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक

यह शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को घटाता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बनाए रखता है.

किन चीजों में डालकर खाएं प्याज और लहसुन

  • लहसुन और प्याज का तड़का न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है, बल्कि पौष्टिकता भी.
  • खासकर ठंड के मौसम में लहसुन की चटनी बेहद फायदेमंद होती है.
  • खाने के साथ प्याज का सलाद पाचन के लिए बेहद अच्छा होता है.
  • लहसुन और प्याज का काढ़ा सर्दी-खांसी में रामबाण है.

लहसुन की पत्तियों या प्याज को भरकर पराठा बनाना एक स्वादिष्ट और हेल्दी विकल्प है.

प्याज और लहसुन न केवल आपके भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं, बल्कि ये प्राकृतिक औषधियों की तरह काम करते हैं। नियमित रूप से इनका सेवन करने से कई बीमारियों से बचाव संभव है. तो अगली बार जब आप किचन में जाएं, तो प्याज और लहसुन को हल्के में न लें, ये सेहत के सुपरस्टार हैं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. 

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हर रोज पिएं ये हेल्दी ड्रिंक्स, किडनी हमेशा रहेगी फिट और फाइन

हर रोज पिएं ये हेल्दी ड्रिंक्स, किडनी हमेशा रहेगी फिट और फाइन


नींबू पानी: नींबू पानी में सिट्रिक एसिड होता है, जो यूरिन में जमा होने वाले कैल्शियम को घुलने में मदद करता है. इससे किडनी स्टोन बनने का खतरा कम होता है. सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर पीना किडनी के लिए फायदेमंद होता है.

नारियल पानी: नारियल पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स और पोटैशियम भरपूर होते हैं, जो ब्लड प्रेशर को बैलेंस करते हैं और किडनी पर स्ट्रेस कम करते हैं. यह यूरिन के ज़रिए टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है और शरीर को हाइड्रेट रखता है.

नारियल पानी: नारियल पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स और पोटैशियम भरपूर होते हैं, जो ब्लड प्रेशर को बैलेंस करते हैं और किडनी पर स्ट्रेस कम करते हैं. यह यूरिन के ज़रिए टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद करता है और शरीर को हाइड्रेट रखता है.

हर्बल चाय: हर्बल चाय किडनी को डिटॉक्स करने में असरदार होती है. ये चाय पेशाब की मात्रा बढ़ाकर शरीर से अतिरिक्त नमक और वेस्ट को बाहर निकालती है. बिना शक्कर के सेवन करना सबसे बेहतर है.

हर्बल चाय: हर्बल चाय किडनी को डिटॉक्स करने में असरदार होती है. ये चाय पेशाब की मात्रा बढ़ाकर शरीर से अतिरिक्त नमक और वेस्ट को बाहर निकालती है. बिना शक्कर के सेवन करना सबसे बेहतर है.

लौकी का जूस: लौकी यानी बोतल गार्ड का जूस किडनी को कूलिंग इफेक्ट देता है और यूरिन के ज़रिए टॉक्सिन्स बाहर निकालता है। यह जूस खासतौर पर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिनकी किडनी पर गर्मी या सूजन का असर हो रहा हो.

लौकी का जूस: लौकी यानी बोतल गार्ड का जूस किडनी को कूलिंग इफेक्ट देता है और यूरिन के ज़रिए टॉक्सिन्स बाहर निकालता है। यह जूस खासतौर पर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिनकी किडनी पर गर्मी या सूजन का असर हो रहा हो.

क्रैनबेरी जूस: क्रैनबेरी जूस यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) से बचाव में बहुत असरदार है. यह बैक्टीरिया को ब्लैडर और किडनी में चिपकने से रोकता है, जिससे किडनी को संक्रमण से सुरक्षित रखा जा सकता है. बिना शक्कर वाला जूस चुनना ज़रूरी है.

क्रैनबेरी जूस: क्रैनबेरी जूस यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) से बचाव में बहुत असरदार है. यह बैक्टीरिया को ब्लैडर और किडनी में चिपकने से रोकता है, जिससे किडनी को संक्रमण से सुरक्षित रखा जा सकता है. बिना शक्कर वाला जूस चुनना ज़रूरी है.

ग्रीन टी: ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स किडनी की कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं. यह शरीर की सफाई करने में भी सहायक होती है और नियमित रूप से पीने से किडनी को हेल्दी रखने में मदद मिलती है.

ग्रीन टी: ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स किडनी की कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं. यह शरीर की सफाई करने में भी सहायक होती है और नियमित रूप से पीने से किडनी को हेल्दी रखने में मदद मिलती है.

Published at : 22 Jul 2025 06:03 PM (IST)

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स्वाद के चक्कर में न करें लीवर से खिलवाड़, ये 6 फूड्स खाने से बचें

स्वाद के चक्कर में न करें लीवर से खिलवाड़, ये 6 फूड्स खाने से बचें


डीप फ्राइड फूड्स: समोसे, पकोड़े, फ्रेंच फ्राइज या चिप्स, डीप फ्राई किए गए फूड्स में ट्रांस फैट होता है, जो लीवर को फैटी बना देता है. इससे नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज का खतरा बढ़ जाता है. ये फूड्स लीवर को सूजने और कमजोर होने की दिशा में ले जाते हैं.

रेड मीट: मटन और बीफ जैसे रेड मीट में हाई प्रोटीन होता है, लेकिन इन्हें पचाना लीवर के लिए भारी काम होता है. खासकर अगर पहले से लीवर की दिक्कत हो, तो रेड मीट उसका बोझ और बढ़ा सकता है. इसलिए संतुलन में सेवन करना ही बेहतर है.

रेड मीट: मटन और बीफ जैसे रेड मीट में हाई प्रोटीन होता है, लेकिन इन्हें पचाना लीवर के लिए भारी काम होता है. खासकर अगर पहले से लीवर की दिक्कत हो, तो रेड मीट उसका बोझ और बढ़ा सकता है. इसलिए संतुलन में सेवन करना ही बेहतर है.

शुगर युक्त ड्रिंक्स: कोल्ड ड्रिंक्स, पैक्ड जूस या फ्लेवर वाली एनर्जी ड्रिंक्स में फ्रक्टोज़ की मात्रा ज़्यादा होती है. ये लिवर में फैट जमा करते हैं और धीरे-धीरे उसे डैमेज कर सकते हैं. रोजाना मीठे पेय पीने से फैटी लिवर और इंसुलिन रेसिस्टेंस की समस्या बढ़ जाती है.

शुगर युक्त ड्रिंक्स: कोल्ड ड्रिंक्स, पैक्ड जूस या फ्लेवर वाली एनर्जी ड्रिंक्स में फ्रक्टोज़ की मात्रा ज़्यादा होती है. ये लिवर में फैट जमा करते हैं और धीरे-धीरे उसे डैमेज कर सकते हैं. रोजाना मीठे पेय पीने से फैटी लिवर और इंसुलिन रेसिस्टेंस की समस्या बढ़ जाती है.

प्रोसेस्ड फूड्स: पिज्जा, बर्गर, सॉसेज और इंस्टेंट नूडल्स जैसे प्रोसेस्ड फूड्स में प्रिज़र्वेटिव्स, नमक और अनहेल्दी फैट्स की भरमार होती है. ये लीवर के नेचुरल फंक्शन में बाधा डालते हैं और लीवर इंफ्लेमेशन की वजह बन सकते हैं.

प्रोसेस्ड फूड्स: पिज्जा, बर्गर, सॉसेज और इंस्टेंट नूडल्स जैसे प्रोसेस्ड फूड्स में प्रिज़र्वेटिव्स, नमक और अनहेल्दी फैट्स की भरमार होती है. ये लीवर के नेचुरल फंक्शन में बाधा डालते हैं और लीवर इंफ्लेमेशन की वजह बन सकते हैं.

अल्कोहल:थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भी अगर नियमित रूप से अल्कोहल का सेवन किया जाए तो ये लीवर सेल्स को नुकसान पहुंचाता है. अधिक शराब पीने से लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है. इसलिए अल्कोहल को लिमिट में रखना बेहद ज़रूरी है.

अल्कोहल:थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भी अगर नियमित रूप से अल्कोहल का सेवन किया जाए तो ये लीवर सेल्स को नुकसान पहुंचाता है. अधिक शराब पीने से लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है. इसलिए अल्कोहल को लिमिट में रखना बेहद ज़रूरी है.

एक्स्ट्रा नमक: नमक जरूरी है, लेकिन ज्यादा मात्रा में इसका सेवन लीवर में पानी जमा करने और सूजन का कारण बनता है. जंक फूड्स, नमकीन और प्रोसेस्ड आइटम्स में पहले से ही काफी नमक होता है, जिससे लीवर को धीरे-धीरे नुकसान होता है.

एक्स्ट्रा नमक: नमक जरूरी है, लेकिन ज्यादा मात्रा में इसका सेवन लीवर में पानी जमा करने और सूजन का कारण बनता है. जंक फूड्स, नमकीन और प्रोसेस्ड आइटम्स में पहले से ही काफी नमक होता है, जिससे लीवर को धीरे-धीरे नुकसान होता है.

Published at : 22 Jul 2025 05:10 PM (IST)

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अमेरिकन रिसर्चर्स ने विकसित की नई mRNA वैक्सीन, कैंसर के खिलाफ इम्यून सिस्टम को करेगी बूस्ट

अमेरिकन रिसर्चर्स ने विकसित की नई mRNA वैक्सीन, कैंसर के खिलाफ इम्यून सिस्टम को करेगी बूस्ट


कैंसर दशकों से मानवता के लिए एक गंभीर चुनौती रही है, लेकिन अब इसके खिलाफ वैक्सीन बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिली है. यह नई खोज लाखों जिंदगियों को बचाने की उम्मीद जगाती है. दरअसल, फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के रिसर्चर्स की एक टीम ने डॉ. एलियास सयूर के नेतृत्व में एक जबरदस्त mRNA वैक्सीन बनाई है. यह वैक्सीन शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर पर हमला करने के लिए ट्रेंड करती है और इसके शुरुआती नतीजे काफी प्रॉमिसिंग हैं. यह एक यूनिवर्सल कैंसर वैक्सीन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है.

चूहों पर किए प्रयोग में मिली बड़ी सफलता

नेचर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में पब्लिश हुई एक स्टडी के अनुसार, इस एक्सपेरिमेंटल mRNA वैक्सीन ने चूहों में इम्यून सिस्टम को इफेक्टिवली एक्टिवेट करने और मुश्किल ट्यूमर्स को कम करने की एबिलिटी दिखाई है. वो भी किसी खास कैंसर टाइप को टारगेट किए बिना. रिसर्चर्स का मानना है कि यह वैक्सीन फ्यूचर में एक यूनिवर्सल कैंसर ट्रीटमेंट के तौर पर काम कर सकती है. 

वैक्सीन का इनोवेटिव अप्रोच

कैंसर एक्सपर्ट बताते हैं कि  नॉर्मल कैंसर ट्रीटमेंट्स से अलग, जो कैंसर के म्यूटेशन्स पर फोकस करते हैं. यूएफ टीम ने इस वैक्सीन को ऐसे डिजाइन किया है कि यह शरीर के वायरस से लड़ने के तरीके को मिमिक करे. यह स्ट्रैटेजी एक स्ट्रॉन्ग इम्यून रिस्पॉन्स पैदा करती है, जिससे बॉडी के लिए ट्यूमर्स को पहचानना और उन पर अटैक करना आसान हो जाता है. खासकर जब इसे एक कॉमन कैंसर ड्रग के साथ कंबाइन किया जाए, जो इम्यून सिस्टम को अपना काम करने में हेल्प करती है.

इम्प्रैसिव रिजल्ट्स और फ्यूचर की पॉसिबिलिटीज

स्किन, बोन और ब्रेन कैंसर वाले चूहों में इस वैक्सीन का एक पावरफुल इफेक्ट हुआ. कुछ केसेस में, ट्यूमर्स पूरी तरह से गायब हो गए. इस रिसर्च के को-ऑथर डॉ. डुआने मिशेल ने इस अप्रोच को कैंसर इम्यूनोथेरेपी में एक नया पैराडिग्म बताया. न्यूरोलॉजिस्ट और ब्रेन ट्यूमर एक्सपर्ट मिशेल ने बताते हैं कि हम सीधे कैंसर को टारगेट नहीं कर रहे हैं. हम इम्यून सिस्टम को एक्टिवेट कर रहे हैं और यह काम कर रहा है.

टी-सेल्स को एक्टिवेट करती है ये वैक्सीन

ऐसा लगता है कि यह वैक्सीन इनएक्टिव टी-सेल्स को फिर से एक्टिवेट करती है, जो एक टाइप की वाइट ब्लड सेल होती है, जो बॉडी को इन्फेक्टेड या एब्नॉर्मल सेल्स को रिकॉग्नाइज करने और उन्हें डिस्ट्रॉय करने में हेल्प करती है. इससे वे मल्टीप्लाई होकर कैंसर सेल्स को मार सकती हैं.  रिसर्चर्स का मानना है कि इम्यून सिस्टम की यह ब्रॉड स्टिमुलेशन उन ट्यूमर्स से लड़ने में क्रूशियल हो सकती है, जो यूज़ुअली ट्रीटमेंट को रेजिस्ट करते हैं.

यूएफ टीम अब इस फॉर्मूलेशन को और इम्प्रूव कर रही है और ह्यूमन ट्रायल्स की प्रिपरेशन कर रही है. उनका लक्ष्य एक यूनिवर्सल कैंसर वैक्सीन डेवलप करना है. ये सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन जैसे करेंट ट्रीटमेंट्स का सप्लीमेंट हो सके या यहां तक कि फ्यूचर में उनकी जगह भी ले सके. यह रिसर्च कैंसर के खिलाफ लड़ाई में एक नई आशा जगाता है.

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नसों की इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप, हाथ-पैर में ऐसे दिखते हैं लक्षण

नसों की इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप, हाथ-पैर में ऐसे दिखते हैं लक्षण


अमेरिकी पूर्व प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प को क्रोनिक वेनस इनसफीशिएंसी डायग्नोस किया गया है. यह एक ऐसी कंडीशन है  जो उनके लेग्स की वेन्स को प्रभावित करती है. यह डायग्नोसिस उनके लेग्स के लोअर पार्ट में स्वेलिंग की रिपोर्ट्स के बाद हुआ, जिसके चलते मेडिकल इवैल्यूएशन किया गया. व्हाइट हाउस ने इस डायग्नोसिस की कन्फर्मेशन देते हुए कहा है कि यह एक कॉमन कंडीशन है. खासकर 70 साल से ज्यादा की एज वाले पर्सन्स में.

क्या है क्रोनिक वेनस इनसफीशिएंसी?

क्रोनिक वेनस इनसफीशिएंसी, सीवीआई एक ऐसी कंडीशन है, जिसमें आपके हाथ-पैरों की नसें डैमेज या वीक हो जाती हैं. हमारा ब्लड हार्ट तक वापस नसों के जरिए ऊपर की तरफ जाता है. इन नसों में छोटे-छोटे वाल्व होते हैं, जो ब्लड को नीचे की तरफ वापस बहने से रोकते हैं और ग्रेविटी के अगेंस्ट ऊपर धकेलते हैं. सीवीआई होने पर ये वाल्व खराब हो जाते हैं या ठीक से काम नहीं करते. इससे ब्लड पैरों में ही जमा होने लगता है, जिसे ब्लड पूलिंग कहते है. इस ब्लड जमाव के कारण नसों में प्रेशर बढ़ जाता है, जिससे पैरों में सूजन आ सकती है और दूसरी कॉम्प्लीकेशन्स भी हो सकती हैं.

ये है सीवीआई के लक्षण, इन्हें पहचानना जरूरी

हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. साक्षी गुप्ता बताती हैं कि क्रोनिक वेनस इनसफीशिएंसी, सीवीआई के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ आम संकेत हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए. इनमें पैरों और टखनों में सूजन शामिल है. पैरों में दर्द, भारीपन या बेचैनी महसूस होना, खासकर चलने या खड़े होने पर भी इसका एक लक्षण है. स्किन में बदलाव जैसे रंग, मोटा होना या खुजली भी दिख सकती है. इसके अतिरिक्त, वैरिकाज नसें और टखनों के पास खुले घाव या अल्सर जो ठीक न हों, सीवीआई के मुख्य लक्षण हैं. ये लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.

सीवीआई के रिस्क फैक्टर्स और कारण

सीवीआई  डेवलप होने के रिस्क को कई फैक्टर्स बढ़ा सकते हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है ताकि समय रहते सावधानी बरती जा सके. सीवीआई ओल्डर एडल्ट्स में ज्यादा कॉमन है; उम्र बढ़ने के साथ नसें और उनमें मौजूद वाल्व कमजोर होने लगते हैं, जिससे इसका खतरा बढ़ता है. इसके अतिरिक्त, सीवीआई का फैमिली हिस्ट्री भी एक महत्वपूर्ण जोखिम है, जो दर्शाता है कि जेनेटिक्स इसमें भूमिका निभा सकते हैं. मोटापा भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि अधिक वन होने से पैरों की नसों पर एक्स्ट्रा प्रेशर पड़ता है. वहीं, लंबे समय तक खड़े रहना या बैठे रहना जैसी जीवनशैली भी सीवीआई का रिस्क बढ़ाती है. आखिर में, डीप वेन थ्रोम्बोसिस या पैरों में ब्लड क्लॉट की हिस्ट्री सीवीआई के डेवलपमेंट का एक बड़ा कारण है.

ऐसे करें सीवीआई का मैनेजमेंट

हालांकि सीवीआई लाइफ थ्रेटनिंग नहीं होता, लेकिन यह लाइफ की क्वॉलिटी को प्रभावित कर सकता है. इसकी मैनेजमेंट स्ट्रैटेजीज में कई ट्रिक्स शामिल हैं. पहला है लाइफस्टाइल चेंजेस. जैसे वेट कंट्रोल, रेगुलर एक्सरसाइज और लॉन्ग टाइम तक स्टैंडिंग या सिटिंग से बचना. इसके अलावा, कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स, जो ब्लड फ्लो में इम्प्रूवमेंट और स्वेलिंग कम करने में हेल्प करता है. सीवियर केसेस में मेडिसिन, लेजर ट्रीटमेंट या सर्जरी शामिल हो सकती है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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