कई दिन से मेंटल स्ट्रेस और अकेलापन फील कर रहे आप, कहीं कुछ बड़ा इशारा तो नहीं दे रहा आपका दिमाग

कई दिन से मेंटल स्ट्रेस और अकेलापन फील कर रहे आप, कहीं कुछ बड़ा इशारा तो नहीं दे रहा आपका दिमाग


अगर आप कई दिनों से मेंटल स्ट्रेस और अकेलापन महसूस कर रहे हैं, तो इसे सिर्फ एक बुरा फेज मानकर इग्नोर न करें. आपका दिमाग शायद आपको कोई बड़ा वार्निंग साइन दे रहा है. ये फीलिंग्स सिर्फ टेम्परेरी मूड स्विंग्स नहीं होतीं, बल्कि अक्सर किसी गहरी प्रॉब्लम या इमोशनल नीड का इंडिकेशन होती हैं. लगातार स्ट्रेस और अकेलेपन की फीलिंग आपकी मेंटल हेल्थ के लिए अच्छी नहीं है. आपका ब्रेन इन फीलिंग्स के जरिए आपको बताने की कोशिश कर रहा है कि कुछ ऐसा है जिस पर आपको ध्यान देने की जरूरत है. आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से.

नोएडा सेक्टर-50 स्थित नियो हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजीव मोतियानी कहते हैं कि बीते कुछ साल में बिगड़ी लाइफस्टाइल, वर्कलोड, डिजिटल कनेक्टिविटी आदि फैक्टर्स ने हमारी मेंटल हेल्थ को और खराब कर दिया है. इन परिस्थितियों के लगातार बने रहने के कारण बहुत से लोग मेंटली थका हुआ या ‘लो’ फील कर रहे हैं, जिसे मेडिकल लैंग्वेज में ब्रेन फॉग कहते हैं.

डॉ. मोतियानी बताते हैं कि भारत में ब्रेन फॉग की बढ़ती समस्या मौजूदा लाइफस्टाइल की प्रॉब्लम्स, एनवायरनमेंटल पॉल्यूशन और कोविड-19 महामारी के बाद के इफेक्ट्स से जुड़ी हो सकती है. इसके फैक्टर्स में ये शामिल हो सकते हैं.

डिजिटल ओवरलोड और स्क्रीन पर डिपेंडेंसी

जेनरेशन जी और मिलेनियल्स में स्क्रीन के ज्यादा यूज के कारण अटेंशन स्पैन कम हो रही है और मेंटल थकान बढ़ रही है. लगातार ऐप स्विच करने और नोटिफिकेशंस के ओवरलोड होने से ब्रेन पर एक्सट्रीम बर्डन पड़ता है, जिससे वह फोकस करने और इंफॉर्मेशन को बेहतर ढंग से प्रोसेस करने में इनकैपेबल हो जाता है. ऐसी सिचुएशन को डिजिटल ओवरलोड सिंड्रोम के रूप में जाना जाता है, जो उन युवाओं में कॉमन है, जो लगातार स्क्रीन पर रहते हैं.

कोविड के बाद के न्यूरोलॉजिकल इफेक्ट्स

कोविड-19 से रिकवर हुए अधिकतर लोगों में लॉन्ग टर्म कॉग्निटिव सिम्प्टम्स डेवलप हुए हैं, जिन्हें ब्रेन फॉग के रूप में जाना जाता है. ये सिम्प्टम्स मेमोरी लॉस, कंसन्ट्रेशन की कमी और मेंटल एग्जॉशन के रूप में सामने आते हैं. अनुमान है कि लगभग 25-30% रिकवर्ड पेशेंट्स में ये न्यूरोलॉजिकल सिम्प्टम्स पाए जाते हैं.

क्रॉनिक स्ट्रेस के कारण मेंटल हेल्थ स्ट्रेस

स्ट्रेस को एक साथ बढ़ाने वाले तीन अलग-अलग फैक्टर्स में एकेडमिक स्ट्रेस, जॉब इनसिक्योरिटी और सोशल प्रेशर शामिल हैं. ये सभी मिलकर हाई लेवल का स्ट्रेस पैदा करते हैं. लगातार बना रहने वाला स्ट्रेस ब्रेन के फंक्शन को अफेक्ट करता है, जिससे मेमोरी वीक होती है और मेंटली शार्प नहीं रह पाता. 

न्यूट्रिएंट्स की कमी

गलत खान-पान, जैसे प्रोसेस्ड फूड खाना और इरेगुलर मील टाइम, ब्रेन को उसके कुछ जरूरी न्यूट्रिएंट्स से वंचित कर सकते हैं. विटामिन बी12 और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी का कनेक्शन कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट और मेंटल फॉग से है.

एन्वॉयरमेंटल फैक्टर्स और क्लाइमेट स्ट्रेस

भारत के बढ़ता तापमान और ह्यूमिडिटी का भी मेंटल हेल्थ पर नेगेटिव इफेक्ट पड़ता पाया गया है. एक्सेसिव हीट से डिप्रेशन और अन्य मेंटल डिसऑर्डर्स का रिस्क बढ़ सकता है. खासकर उन वल्नरेबल इंडिविजुअल्स में जिनके पास कूलिंग इक्विपमेंट्स तक एक्सेस नहीं है.

नींद में खलल

पुअर या डिस्टर्ब्ड स्लीप ब्रेन को मेमोरीज को इफेक्टिवली कंसोलिडेट करने और एसेन्शियल फंक्शंस करने से रोकती है. सोने से पहले स्क्रीन के एक्सपोजर में रहना और इरेगुलर टाइम पर सोना, इसके मेन रीजन्स हैं, जिसके रिजल्ट के तौर पर लॉन्ग-टर्म मेंटल फॉग होता है.

ये ट्रीटमेंट ऑप्शंस ट्राई कर सकते हैं आप

ब्रेन फॉग से जूझ रहे लोगों के लिए कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय मौजूद हैं, जो दिमाग को फिर से स्पष्ट और तेज बनाने में मदद कर सकते हैं. इन उपायों में सबसे पहले डिजिटल डिटॉक्स शामिल है, जहां स्क्रीन के संपर्क को सीमित करना होता है.  इसके साथ ही, हर रात 7-8 घंटे की पर्याप्त नींद लेना बहुत जरूरी है. जरूरी न्यूट्रिएंट्स के लिए  बैलेंस्ड डाइट भी महत्वपूर्ण है. नियमित शारीरिक एक्टिविटीज भी तनाव कम करती हैं. 

माइंडफुलनेस, ध्यान या योग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है. अंत में, यदि लक्षण बने रहते हैं या आपके को प्रभावित करते हैं तो किसी डॉक्टर से परामर्श करना महत्वपूर्ण है, ताकि कारण का पता लगाया जा सके और उचित उपचार मिल सके.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पेट के आसपास ही क्यों जमा होता है सबसे ज्यादा फैट? डॉक्टर्स से समझें पूरी बात

पेट के आसपास ही क्यों जमा होता है सबसे ज्यादा फैट? डॉक्टर्स से समझें पूरी बात


पेट के आसपास फैट जमा होना एक बहुत ही कॉमन प्रॉब्लम है, जिससे आजकल यंगस्टर्स और एडल्ट्स दोनों ही परेशान हैं. लेकिन इसे सिर्फ़ बॉडी शेप या एस्थेटिक कंसर्न मानकर हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह कई हेल्थ प्रॉब्लम्स का इंडिकेशन हो सकती है.

नोएडा सेक्टर-50 स्थित नियो हॉस्पिटल के गैस्ट्रोलॉजिस्ट डॉ. संदीप गुलाटी बताते हैं कि बेली पर जमा यह फैट कई क्रॉनिक बीमारियों के रिस्क को बढ़ा सकता है. यह सिर्फ वेट बढ़ने की बात नहीं है, बल्कि यह पेट की चर्बी आपके ऑर्गन्स के आसपास जमा होती है, जिसे विसरल फैट  भी कहते हैं. यह फैट मेटाबॉलिकली एक्टिव होता है और बॉडी में इन्फ्लेमेशन को बढ़ावा देता है, जिससे कई हेल्थ इश्यूज पैदा हो सकते हैं.

पेट के आसपास चर्बी जमा होने के ये हैं मुख्य कारण 

  • जेनेटिक्स: कुछ लोगों में जेनेटिकली यह टेंडेंसी होती है कि उनके शरीर में फैट कुछ खास एरियाज, जैसे पेट, हिप्स या थाइज में ज्यादा जमा हो. अगर आपकी फैमिली में पेट की चर्बी की प्रॉब्लम कॉमन है, तो आपको भी इसका रिस्क हो सकता है.
  • हार्मोन्स: इंसुलिन लेवल में इम्बैलेंस होने से पेट के आसपास फैट जमा हो सकता है. कोर्टिसोल, इसे स्ट्रेस हार्मोन भी कहते हैं. जब आप ज्यादा स्ट्रेस में होते हैं, तो बॉडी में कोर्टिसोल का लेवल बढ़ता है, जो पेट के एरिया में फैट जमा करने में हेल्प करता है. वहीं, सेक्स हार्मोन्स जैसे एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन आदि शरीर में फैट के डिस्ट्रीब्यूशन को अफेक्ट करते हैं.
  • लाइफस्टाइल: अगर आप फिजिकली एक्टिव नहीं रहते और ज्यादातर टाइम बैठे रहते हैं, तो कैलोरी बर्न कम होती है, जिससे फैट जमा होता है. वहीं, बहुत ज्यादा रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स, चीनी और अनहेल्दी फैट का कंजम्पशन पेट की चर्बी बढ़ाने में सीधा जिम्मेदार है. हाई स्ट्रेस लेवल और अपर्याप्त नींद दोनों ही हार्मोन्स को डिस्टर्ब करते हैं, जिससे पेट की चर्बी बढ़ती है.
  • उम्र बढ़ना या एजिंग: उम्र बढ़ने के साथ लोगों के पेट के आसपास चर्बी जमा होना आम बात है. जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, हार्मोन्स बदलते हैं और वजन बढ़ने लगता है. फैट का डिस्ट्रीब्यूशन भी चेंज होता है, जिसका मतलब है कि लोगों के धड़ के आसपास चर्बी ज्यादा और बाहों और पैरों में कम हो सकती है.

ये हो सकती हैं हेल्थ प्रॉब्लम्स

एक्स्ट्रा पेट की चर्बी एक बड़ी हेल्थ कंसर्न है, क्योंकि यह कई क्रॉनिक बीमारियों के हाई रिस्क से जुड़ी है, जिनमें  हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, टाइप 2 डायबिटीज, कैंसर, स्ट्रोक आदि शामिल हैं. अगर आप अपनी पेट की चर्बी को लेकर चिंतित हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना सबसे अच्छा रहेगा.

कैसे कम करें पेट की चर्बी?

पेट की चर्बी कम करना कोई जादू नहीं, बल्कि सही लाइफस्टाइल अपनाने से पॉसिबल है. इसके लिए हेल्दी और बैलेंस्ड डाइट अपनाना सबसे जरूरी है, जिसमें साबुत फूड्स, लीन प्रोटीन और साबुत अनाज शामिल हों और मीठे व प्रोसेस्ड फूड से बचें. रेगुलर एक्सरसाइज बेहद अहम है. इसके साथ ही, हर रात 7-9 घंटे की पर्याप्त नींद लें और स्ट्रेस मैनेजमेंट पर फोकस करें, क्योंकि स्ट्रेस से पेट पर चर्बी बढ़ती है. हाइड्रेटेड रहना और धूम्रपान व अत्यधिक शराब से बचना भी बेहद जरूरी है.

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क्या है लिप फिलर, जिसे हटवाने के बाद सूज गया उर्फी जावेद का चेहरा?

क्या है लिप फिलर, जिसे हटवाने के बाद सूज गया उर्फी जावेद का चेहरा?


Lip Filler Side Effect: फैशन और ब्यूटी की दुनिया में उर्फी जावेद का नाम हमेशा चर्चा में रहता है. अपने बोल्ड स्टाइल और बयानों से वो अक्सर सुर्खियों में बनी रहती हैं. हाल ही में उर्फी एक बार फिर खबरों में आईं, लेकिन इस बार वजह थी उनकी सुंदरता से जुड़ी एक कॉस्मेटिक प्रक्रिया, लिप फिलर.

उर्फी जावेद ने सोशल मीडिया पर खुलासा किया कि, उन्होंने अपने लिप फिलर्स हटवाए, लेकिन इसके बाद उनका चेहरा सूज गया और उन्हें काफी तकलीफ का सामना करना पड़ा. इस घटना के बाद लोग जानना चाहते हैं कि आखिर लिप फिलर होता क्या है, इसे क्यों लगवाया जाता है और इसे हटवाने से क्या खतरे हो सकते हैं?

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क्या होता है लिप फिलर?

लिप फिलर एक कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट है, जिसमें हयालुरोनिक एसिड जैसे पदार्थ को होठों में इंजेक्ट किया जाता है, ताकि होंठ मोटे, भरे हुए और आकर्षक दिखें. यह प्रक्रिया आमतौर पर कुछ मिनटों में पूरी हो जाती है और इसके नतीजे तुरंत दिखने लगते हैं.

क्यों कराते हैं लोग लिप फिलर?

  • वो अपने होठों को अधिक आकर्षक और भरा हुआ दिखाना चाहते हैं
  • बढ़ती उम्र के कारण होठों वैसे नहीं दिखते, जैसे पहने दिखते थे. इसलिए इसे दोबारा लाने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई जाती है
  • कुछ लोग सेल्फी या कैमरे में बेहतर दिखने के लिए लिप फिलर को एक आसान समाधान मानते हैं
  • लिप फिलर हटवाना क्यों पड़ता है?
  • कई बार लोग लिप फिलर से संतुष्ट नहीं होते या समय के साथ इसके साइड इफेक्ट्स सामने आने लगते हैं.

होंठों में असमानता

  • बहुत अधिक सूजन या कठोरता
  • प्राकृतिक लुक का न होना
  • ऐसे में लोग इसे हटवाने का निर्णय लेते हैं, जिसके लिए हयालुरोनिडेस नामक एंजाइम का उपयोग होता है. यह फिलर को तोड़कर शरीर में अवशोषित कर देता है.

उर्फी जावेद के मामले में क्या हुआ?

उर्फी ने बताया कि, उन्होंने एक समय पर लिप फिलर बहुत अधिक मात्रा में लगवा लिए थे, जिससे उनका लुक बिगड़ने लगा. जब उन्होंने इसे हटवाया तो उनके होठों और चेहरे में काफी सूजन और दर्द हुआ. उन्होंने अपनी तस्वीरें भी शेयर कीं, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि उनके होंठ काफी सूजे हुए थे.

क्या लिप फिलर से जुड़े हैं जोखिम?

  • एलर्जिक रिएक्शन
  • ब्लड वेसल ब्लॉकेज
  • असंतुलित लुक
  • संक्रमण का खतरा

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जगदीप धनखड़ के बेटे को थी ये गंभीर बीमारी, 14 साल की उम्र में होई थी मौत; अब भी मुश्किल है इलाज

जगदीप धनखड़ के बेटे को थी ये गंभीर बीमारी, 14 साल की उम्र में होई थी मौत; अब भी मुश्किल है इलाज


Jagdeep Dhankhar Family Tragedy: किसी मां-बाप के लिए अपने बच्चे को खोना दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी होती है. चाहे कोई आम हो या खास, इस दर्द को कोई नहीं झेलना चाहता. ऐसा ही कुछ जगदीप धनखड़ के साथ हुआ था.

उन्होंने एक ऐसा ही दर्द अपने जीवन में सहा है, जिसे वह भुला नहीं सकते, उनके बेटे दीपक धनखड़ की मौत महज 14 साल की उम्र में हो गई थी और इसकी वजह थी एक बेहद गंभीर और जटिल बीमारी, ब्रेन हेमरेज. यह सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि इस बात की गवाही भी है कि आज के समय में भी कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जिनका इलाज विज्ञान के इतने विकास के बावजूद बेहद चुनौतीपूर्ण है.आइए जानते हैं कि आखिर क्यों यह बीमारी आज भी इंसान की जान के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई है.

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इतना खतरनाक क्यों होता है यह रोग?

ब्रेन हेमरेज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि, यह अचानक होता है और अक्सर लोग लक्षणों को समझ नहीं पाते है. कई मामलों में इलाज शुरू करने से पहले ही स्थिति गंभीर हो जाती है. इसके इलाज में ऑपरेशन, दवाइयां और लंबे समय तक मेडिकल मॉनिटरिंग की जरूरत होती है. आज भी यह बीमारी जानलेवा मानी जाती है, खासकर अगर मरीज की उम्र कम हो. बच्चों में इस तरह की स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है, क्योंकि उनका शरीर इसे सहन नहीं कर पाता.

दीपक की मौत ने पूरे परिवार को तोड़ दिया

दीपक की मौत के बाद जगदीप धनखड़ और उनका परिवार पूरी तरह टूट गया था. हालांकि समय के साथ उन्होंने खुद को संभाला और समाजसेवा तथा राजनीति में पूरी निष्ठा से लग गए. लेकिन यह दर्द आज भी उनके जीवन का एक गहरा अध्याय बना हुआ है.

अब भी मुश्किल है इलाज

ब्रेन हेमरेज का इलाज आज भी पूरी तरह निश्चित नहीं है. यह इस पर निर्भर करता है कि, रक्तस्राव कितना है, कहां हुआ है और मरीज की उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति कैसी है. समय रहते इलाज मिलने पर कुछ मामलों में मरीज ठीक हो जाता है, लेकिन जोखिम हमेशा बना रहता है.

दीपक धनखड़ की कम उम्र में हुई मौत न सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी थी, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि कई गंभीर बीमारियों के आगे हम आज भी असहाय हैं. ब्रेन हेमरेज जैसी बीमारियों को लेकर हमें जागरूकता बढ़ाने, समय पर लक्षण पहचानने और इलाज की दिशा में रिसर्च को बढ़ावा देने की जरूरत है.

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लीवर को रखना है स्वस्थ तो खाएं ये चीजें, बढ़ापे में भी नहीं होगा खराब!

लीवर को रखना है स्वस्थ तो खाएं ये चीजें, बढ़ापे में भी नहीं होगा खराब!


लहसुन: लहसुन में मौजूद सल्फर कंपाउंड्स लीवर को डिटॉक्स करने में मदद करते हैं. यह एंजाइम को एक्टिव करता है, जो शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालते हैं. हर दिन सुबह खाली पेट लहसुन की एक कली खाना बेहद फायदेमंद होता है.

हल्दी: हल्दी को प्राकृतिक डिटॉक्स एजेंट माना जाता है. इसमें मौजूद करक्यूमिन लीवर की कोशिकाओं को सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाता है. रोज़ाना गुनगुने पानी या दूध में हल्दी लेना लीवर के लिए टॉनिक जैसा है.

हल्दी: हल्दी को प्राकृतिक डिटॉक्स एजेंट माना जाता है. इसमें मौजूद करक्यूमिन लीवर की कोशिकाओं को सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाता है. रोज़ाना गुनगुने पानी या दूध में हल्दी लेना लीवर के लिए टॉनिक जैसा है.

आंवला: विटामिन C से भरपूर आंवला लीवर को साफ रखने और फ्री रेडिकल्स से लड़ने में बेहद असरदार है. यह लीवर की रिपेयर प्रक्रिया को भी तेज करता है। आप इसे कच्चा, जूस में या चूर्ण के रूप में ले सकते हैं.

आंवला: विटामिन C से भरपूर आंवला लीवर को साफ रखने और फ्री रेडिकल्स से लड़ने में बेहद असरदार है. यह लीवर की रिपेयर प्रक्रिया को भी तेज करता है। आप इसे कच्चा, जूस में या चूर्ण के रूप में ले सकते हैं.

हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, सरसों जैसी हरी सब्जियां लीवर को टॉक्सिन्स से बचाने में मदद करती हैं. ये बाइल फ्लो को बढ़ाती हैं जिससे शरीर से गंदगी बाहर निकलती है और लीवर पर लोड कम होता है.

हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, सरसों जैसी हरी सब्जियां लीवर को टॉक्सिन्स से बचाने में मदद करती हैं. ये बाइल फ्लो को बढ़ाती हैं जिससे शरीर से गंदगी बाहर निकलती है और लीवर पर लोड कम होता है.

अखरोट: अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड और ग्लूटाथायोन लीवर को डीटॉक्स करने में मदद करते हैं. साथ ही ये फैटी लिवर की समस्या से भी बचाते हैं। एक मुट्ठी अखरोट रोज़ खाना फायदेमंद है.

अखरोट: अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड और ग्लूटाथायोन लीवर को डीटॉक्स करने में मदद करते हैं. साथ ही ये फैटी लिवर की समस्या से भी बचाते हैं। एक मुट्ठी अखरोट रोज़ खाना फायदेमंद है.

ग्रीन टी: ग्रीन टी में मौजूद कैटेचिन्स लीवर की फैट मेटाबॉलिज्म प्रक्रिया को सुधारते हैं. यह लीवर को सूजन से बचाती है और लंबे समय तक हेल्दी बनाए रखती है. दिन में 1-2 कप ग्रीन टी पीना काफी है.

ग्रीन टी: ग्रीन टी में मौजूद कैटेचिन्स लीवर की फैट मेटाबॉलिज्म प्रक्रिया को सुधारते हैं. यह लीवर को सूजन से बचाती है और लंबे समय तक हेल्दी बनाए रखती है. दिन में 1-2 कप ग्रीन टी पीना काफी है.

Published at : 22 Jul 2025 09:59 AM (IST)

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किन बीमारियों से जूझ रहे जगदीप धनखड़, जिनसे परेशान होकर छोड़ा उपराष्ट्रपति का पद?

किन बीमारियों से जूझ रहे जगदीप धनखड़, जिनसे परेशान होकर छोड़ा उपराष्ट्रपति का पद?


भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई को अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने इस्तीफे की वजह हेल्थ प्रॉब्लम्स को बताया. सवाल यह है कि आखिर वे कौन-सी बीमारियां थीं, जिनकी वजह से उन्हें इतना बड़ा फैसला लेना पड़ा? आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

किस वजह से जगदीप धनखड़ ने दिया इस्तीफा?

जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर अपने इस्तीफे का ऐलान किया. उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि वह डॉक्टरों की सलाह पर और अपनी सेहत को प्राथमिकता देते हुए यह कदम उठा रहे हैं. उनके पत्र के मुताबिक, ‘स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए मैं भारत के उपराष्ट्रपति पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 67(ए) में प्रावधान है.’ उन्होंने कार्यकाल के दौरान मिले समर्थन के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संसद के सदस्यों का आभार जताया. हालांकि, उनके पत्र में उनकी बीमारी की सटीक जानकारी नहीं दी गई. 

इस बीमारी की वजह से छोड़ा पद?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जगदीप धनखड़ को 9 मार्च 2025 को सीने में अचानक दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद दिल्ली के AIIMS अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें क्रिटिकल केयर यूनिट (CCU) में रखा गया और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट की निगरानी में उनका इलाज हुआ. उस वक्त उनकी हालत स्थिर बताई गई थी और 12 मार्च को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया. माना जा रहा है कि उनकी सेहत पूरी तरह ठीक नहीं हुई, क्योंकि इसके बाद भी उनकी तबीयत बिगड़ती रही.

सूत्रों के हवाले से पता चला है कि धनखड़ को दिल से जुड़ी गंभीर समस्या थी, जिसका काफी समय से इलाज चल रहा था. कुछ खबरों में ये भी कहा गया कि इस साल की शुरुआत में उन्हें नैनीताल में भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था. हालांकि, उनकी बीमारी की सटीक जानकारी अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है. हालांकि, इतना साफ है कि उनकी सेहत इतनी खराब थी, जिसके चलते डॉक्टरों ने उन्हें तनाव से दूर रहने और आराम करने की सलाह दी.

उपराष्ट्रपति के पद पर क्या होती है जिम्मेदारी?

उपराष्ट्रपति का पद सिर्फ संवैधानिक ही नहीं, बल्कि बहुत जिम्मेदारी वाला भी है. वे राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, जहां उन्हें कठिन बहस और राजनीतिक टेंशन को संभालना पड़ता है. उपराष्ट्रपति के तौर पर भी उन्हें कई बार विपक्ष के सवालों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. ये तनाव उनकी सेहत पर और असर डाल सकता था. डॉक्टरों की सलाह शायद यही थी कि वह तनाव से बचें और अपनी सेहत को प्राथमिकता दें. उनके इस्तीफे के पत्र में भी ये साफ झलकता है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाना चाहते थे, लेकिन सेहत की वजह से ऐसा करना उनके लिए मुमकिन नहीं रहा. 

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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