ये तो चमत्कार हो गया! 63 साल की बुजुर्ग ने कराया डेंटल इम्प्लांट, 10 साल बाद खुद ठीक हो गए कान

ये तो चमत्कार हो गया! 63 साल की बुजुर्ग ने कराया डेंटल इम्प्लांट, 10 साल बाद खुद ठीक हो गए कान


गुजरात के सूरत का  एक शॉकिंग और इंटरेस्टिंग केस इस समय मेडिकल क्षेत्र में चर्चा का विषय बन हुआ है.  दअरसल, 63 साल की महिला जैबुन्निशा एम. के साथ कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. पूरे मुंह के रीकंस्ट्रक्शन, टेम्पोरोमैन्डिबुलर जॉइंट के रीहैबिलिटेशन और नर्व डीकम्प्रेशन जैसी बड़ी डेंटल इम्प्लांट प्रोसीजर्स के बाद उनकी सुनने की कैपेसिटी में अमेजिंग इम्प्रूवमेंट आया. कमाल की बात तो यह है कि यह सब उनकी कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी से ठीक पहले हुआ, जिसकी प्रिपरेशन चल रही थी. 

हैरान है डॉक्टर पति, खुश हैं बेटियां

जैबुन्निशा एम. के पति अब्बास खुद एक डॉक्टर हैं. वह भी हैरान हैं कि ये चमत्कार कैसे हुआ है. उन्होंने कहा कि हम ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते हैं, जिन्होंने हमारी समस्या को दूर किया है. वहीं, उनकी रेडियोलॉजिस्ट बेटी तहजीब कहती हैं कि हम बेहद खुश हैं कि वो फिर से हम लोगों से बात करने लगी हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस केस से जुड़े डॉक्टर इम्प्लांट स्पेशलिस्ट डॉ. ऋषि भट्ट का मानना है कि उनकी सुनने की कैपेसिटी में यह इम्प्रूवमेंट डेंटल वर्क के दौरान कान से जुड़ी एक नर्व के डीकम्प्रेशन की वजह से हो सकता है. यह डेंटल स्ट्रक्चर्स और सुनने वाली नर्व्स के बीच एक पॉसिबल कनेक्शन की ओर इशारा करता है.

वहीं, जैबुन्निशा के ईएनटी सर्जन, डॉ. अशरफ मास्टर ने भी उनके ऑडियोटेस्ट में रिमार्केबल इम्प्रूवमेंट की कन्फर्मेशन दी है. इसी वजह से उन्हें अपनी प्लान की गई कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी को रोकना पड़ा. हालांकि, डॉक्टर्स इस सरप्राइजिंग रिजल्ट को साइंस और मिरेकल, दोनों का कॉम्बिनेशन मान रहे हैं. 

क्या डेंटल इम्प्लांट्स से सच में सुनने की कैपेसिटी बढ़ती है?

यह स्पेसिफिक केस बेशक बहुत ही अलग है और डेंटल वर्क व सुनने की कैपेसिटी के बीच एक अनूठे कनेक्शन को हाइलाइट करता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि डेंटल इम्प्लांट्स हियरिंग लॉस का कोई स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट नहीं है. 

हालांकि, बोन-एंकरड हियरिंग एड्स  के लिए डेंटल इम्प्लांट्स को एक प्लेटफॉर्म के तौर पर यूज करने पर रिसर्च चल रही है. स्टडीज से पता चला है कि डेंटल इम्प्लांट्स जबड़े की हड्डी के जरिए साउंड वाइब्रेशंस को इनर ईयर तक एफिशिएंटली ट्रांसमिट कर सकते हैं. यह कुछ तरह के हियरिंग लॉस के लिए ट्रेडिशनल हियरिंग एड्स का एक डिसक्रीट ऑप्शन बन सकता है. जैबुन्निशा के केस में ऐसा लगता है कि उनके पूरे मुंह के रीकंस्ट्रक्शन और नर्व डीकम्प्रेशन से रिलेटेड फैक्टर्स के एक यूनीक कॉम्बिनेशन ने ही इस अनएक्सपेक्टेड और पॉजिटिव रिजल्ट को पॉसिबल बनाया है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपको छू भी नहीं पाएगा मलेरिया का मच्छर, भारत की स्वदेशी वैक्सीन करेगी इस बीमारी का खात्मा

आपको छू भी नहीं पाएगा मलेरिया का मच्छर, भारत की स्वदेशी वैक्सीन करेगी इस बीमारी का खात्मा


भारत ने मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ने के लिए बड़ा कदम उठाया है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भुवनेश्वर स्थित क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र (RMRCBB) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च (NIMR) के साथ मिलकर जैव प्रौद्योगिकी विभाग के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी (DBT-NII) के सहयोग से नई मलेरिया वैक्सीन बनाई है. इसका नाम AdFalciVax रखा गया है. ये भारत की पहली ऐसी वैक्सीन है, जो मलेरिया के सबसे खतरनाक परजीवी प्लाज्मोडियम फाल्सीपैरम को दो अलग-अलग लेवल पर टारगेट करता है. इसकी खासियत ये है कि ये न सिर्फ इंसानों को मलेरिया से बचाएगा, बल्कि मच्छरों के जरिए इसके फैलाव को भी रोकेगा.

AdFalciVax है क्या?

AdFalciVax खास तरह की वैक्सीन है, जो मलेरिया के परजीवी के दो अहम स्टेज पर हमला करता है. पहली स्टेज में जब परजीवी इंसान के शरीर में इंफेक्शन फैलाता है और दूसरी स्टेज जब मच्छरों के जरिए ये बीमारी एक इंसान से दूसरे तक पहुंचती है. इसका मतलब यह है कि ये वैक्सीन न सिर्फ आपको बीमार होने से बचाएगा, बल्कि मलेरिया को पूरे इलाके में फैलने से भी रोकेगा. जानवरों पर किए गए शुरुआती टेस्ट में ये वैक्सीन असरदार साबित हुई है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये मौजूदा वैक्सीन्स जैसे RTS, S/AS01 और R21/Matrix-M से कई मामलों में बेहतर हो सकती है.

इस बैक्टीरिया से बनाई गई वैक्सीन

इस वैक्सीन को बनाने में ‘लैक्टोकोकस लैक्टिस’ नाम के सेफ बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया, जो वैक्सीन डेवलपमेंट में पहले से जाना जाता है. इसमें दो अलग-अलग चरणों के खिलाफ असरदार तत्वों को मिलाकर मजबूत वैक्सीन बनाई गई है. ये वैक्सीन कमरे के तापमान पर 9 महीने तक खराब नहीं होती, जो इसे उन इलाकों के लिए बहुत उपयोगी बनाता है, जहां बिजली या ठंडी जगह की कमी है. साथ ही, इसे सस्ते और सुरक्षित पदार्थों से बनाया गया है, जिससे ये किफायती भी है.

क्यों खास है ये वैक्सीन?

AdFalciVax की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये मलेरिया के परजीवी को दो मोर्चों पर मारता है. आमतौर पर बाकी वैक्सीन्स सिर्फ एक स्टेज को टारगेट करती हैं, लेकिन ये दोनों चरणों पर काम करती है. इससे न सिर्फ इंसान को मलेरिया होने का खतरा कम होता है, बल्कि मच्छरों के जरिए बीमारी का फैलाव भी रुकता है. साथ ही, ये वैक्सीन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने की परजीवी की कोशिश को भी कम करता है और लंबे समय तक सुरक्षा देता है. इसे एलम जैसे सस्ते पदार्थों से बनाया गया है, जिससे ये ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती है.

आगे का प्लान क्या है?

AdFalciVax अभी शुरुआती डेवलपमेंट स्टेज में है. इसे आम लोगों तक पहुंचने में अभी समय लगेगा. ICMR के मुताबिक, वैक्सीन के डेवलपमेंट और टेस्टिंग का प्लान कुछ इस तरह है.

  • GMP निर्माण और टॉक्सिसिटी टेस्टिंग: इसमें करीब 2 साल लगेंगे.
  • फेज 1 क्लिनिकल ट्रायल: शुरुआती मानव टेस्टिंग के लिए 2 साल और चाहिए.
  • फेज 2b और फेज 3 ट्रायल: बड़े पैमाने पर टेस्टिंग के लिए 2.5 साल का समय.
  • अंतिम अप्रूवल और मार्केटिंग लाइसेंस: इसके लिए 6 और महीने की जरूरत होगी.

हर चरण में 6 महीने का अतिरिक्त समय भी रखा गया है, ताकि कोई देरी होने पर भी काम पूरा हो सके. कुल मिलाकर, अगर सब कुछ ठीक रहा तो ये वैक्सीन करीब 7 साल में लोगों तक पहुंच सकती है.

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पेट में 10.6 किलो का ट्यूमर देख उड़े डॉक्टरों के होश, 6 घंटे की सर्जरी कर हटाया

पेट में 10.6 किलो का ट्यूमर देख उड़े डॉक्टरों के होश, 6 घंटे की सर्जरी कर हटाया


दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में डॉक्टरों ने बहुत बड़ी और जोखिम भरी सर्जरी करके एक मरीज की जान बचा ली. इस मरीज के पेट में 10.6 किलो का ट्यूमर था, जो इतना बड़ा हो गया था कि वह पेट के कई जरूरी हिस्सों में फैल चुका था. यह सर्जरी VMMC और सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने मिलकर की. डॉक्टरों ने बताया कि मरीज पिछले आठ महीनों से इस बीमारी से परेशान थी. ट्यूमर इतना बड़ा था कि वह पेट के कई अंगों पर दबाव डाल रहा था, जिससे मरीज की हालत बहुत खराब हो रही थी.

इन डॉक्टरों ने की सर्जरी

करीब 6 घंटे तक चले इस मुश्किल ऑपरेशन को डॉ. शिवानी बी. परुथी ने लीड किया. उनके साथ VMMC और सफदरजंग अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. संदीप बंसल, सर्जरी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. आर.के. चेझारा और गायनिक डिपार्टमेंट की हेड डॉ. कविता ने गाइड किया. सर्जरी के दौरान एनस्थीसिया की जिम्मेदारी डॉ. डी.के. मीणा, डॉ. सपना भाटिया और डॉ. विष्णु ने संभाली. 

इतनी बुरी हो चुकी थी हालत

डॉक्टरों ने बताया कि ट्यूमर का साइज और उसका आंतों, ब्लैडर और दूसरे अंगों से चिपके होने की वजह से सर्जरी बहुत मुश्किल थी. ट्यूमर को निकालना आसान नहीं था, क्योंकि गलती से किसी अंग को नुकसान हो सकता था. डॉक्टरों ने सटीक तकनीक से इस 10.6 किलो के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्ट्रोमल ट्यूमर (GIST) को पूरी तरह निकाल लिया.

GIST ट्यूमर क्या है?

डॉ. संदीप बंसल ने बताया कि GIST एक रेयर टाइप का कैंसर है, जो पेट और आंतों के टिश्यू में होता है. ये ट्यूमर खास तरह की कोशिकाओं से बनता है, जिन्हें ‘इंटरस्टिशियल सेल्स ऑफ काजल’ कहते हैं. ये कोशिकाएं आंतों को कंट्रोल करने में मदद करती हैं. अगर इसका सही समय पर इलाज न हो तो ये तेजी से बढ़ सकता है और शरीर के दूसरे हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकता है.

डॉक्टरों ने दी यह जानकारी

VMMC और सफदरजंग अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. संदीप बंसल ने कहा, ‘ये सर्जरी हमारी टीम के टैलेंट और मेहनत का सबूत है. इतना बड़ा ट्यूमर निकालना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन हमारी टीम ने इसे कर दिखाया. हम आगे भी ऐसे मुश्किल ऑपरेशन करके मरीजों को नई जिंदगी देने की कोशिश करेंगे.’ उन्होंने यह भी बताया कि सर्जरी के बाद मरीज की हालत अब स्थिर है और उसे मेडिकल ऑन्कोलॉजी की टीम देख रही है, ताकि वह जल्दी ठीक हो सके.

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कहीं समय से पहले तो नहीं आ गया मेनोपॉज? दिल से लेकर हड्डी तक हो जाती हैं खोखली

कहीं समय से पहले तो नहीं आ गया मेनोपॉज? दिल से लेकर हड्डी तक हो जाती हैं खोखली


मेनोपॉज एक बायोलॉजिकल चेंज है, जब महिलाओं का मेंस्ट्रुअल साइकिल एंड हो जाता है. इस फेज में महिलाओं को अक्सर कई तरह के फिजिकल और साइकोलॉजिकल चेंजेस एक्सपीरियंस होते हैं, जो कभी-कभी काफी डिस्टर्बिंग हो सकते हैं. प्रीमैच्योर मेनोपॉज या समय से पहले मेनोपॉज, महिलाओं मे 40 साल की उम्र से पहले मेनोपॉज का स्टार्ट होना है. ये महिलाओं में कई बीमारियों और मृत्यु दर के बढ़े हुए रिस्क से जुड़ा है. प्रीमैच्योर मेनोपॉज प्राइमरी ओवेरियन इनसफिशिएंसी या सर्जिकल प्रोसीजर्स जैसे हिस्टेरेक्टॉमी  की वजह से हो सकता है.

इंडियन मेनोपॉज सोसायटी की हालिया रिपोर्ट के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं कि भारत में प्रीमैच्योर मेनोपॉज की प्रीवैलेंस में तेजी से इजाफा हुआ है, जो एक सिग्निफिकेंट पब्लिक हेल्थ कंसर्न है. रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में प्रीमेच्योर मेनोपॉज की समस्या 100 गुना तक बढ़ गई है. लगभग 10 साल पहले तक देश में 10 हजार महिलाओं में से किसी एक महिला में यह समस्या मिलती थी, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 100 महिलाओं में से एक हो गया है. इस लेख में हम समय से पहले मेनोपॉज के फैक्टर्स, समस्याओं और उपायों पर चर्चा करेंगे.

रायपुर में पहलाजानी टेस्ट ट्यूब बेबी एवं आईवीएफ सेंटर की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नीरज पहलाजानी के मुताबिक, आमतौर पर महिलाओं को 45 से 55 की उम्र के बीच मेनोपॉज होता है, लेकिन करीब 1% महिलाओं को 40 साल की उम्र से पहले ही मेनोपॉज का सामना करना पड़ता है. इसे प्रीमैच्योर मेनोपॉज या प्रीमैच्योर ओवेरियन इंसफीसिएंसी कहते हैं. इससे दिल की बीमारी, हडि्डयों को कमजोर होना, डिप्रेशन जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा निम्नलिखित समस्याएं भी हो सकती है.

प्रीमेच्योर मेनोपॉज में ये हो सकती हैं ये समस्याएं

  • इनफर्टिलिटी: प्रीमैच्योर मेनोपॉज में आपको कंसीव करने में दिक्कत आ सकती है. अनियमित पीरियड्स और ओवरीज़ के ठीक से काम न करने की वजह से इंफर्टिलिटी हो सकती है.
  • हार्मोनल बदलाव: प्रीमैच्योर मेनोपॉज होने पर एस्ट्रोजेन और दूसरे रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स का लेवल कम हो जाता है. इसकी वजह से मूड स्विंग्स, हॉट फ्लैश, वजाइनल ड्राइनेस और शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा में कमी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
  • बोन हेल्थ: आपकी हड्डियों को मजबूत रखने के लिए एस्ट्रोजेन हार्मोन बहुत जरूरी होता है, लेकिन प्रीमैच्योर मेनोपॉज के कारण एस्ट्रोजेन का लेवल कम होने लगता है. इससे हड्डियों के कमजोर होने और हड्डी टूटने का खतरा बढ़ जाता है.
  • हार्ट हेल्थ: यही नहीं, एस्ट्रोजेन हार्मोन ब्लड वेसल्स को हेल्दी रखने और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में अहम रोल निभाता है. हालांकि, प्रीमैच्योर मेनोपॉज की वजह से एस्ट्रोजेन का लेवल कम होने पर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि जो  महिलाएं प्रीमेच्योर मेनोपॉज से गुजर रही हैं. वो डॉक्टर से संपर्क करें और इसके लक्षणों को मैनेज करने, सेहत से जुड़ी किसी परेशानी और फर्टिलिटी से जुड़ी बातों के बारे में बात करें. हार्मोन थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव करके इसके लक्षणों को कम करने में काफी मदद मिल सकती है. 

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नींद कम…स्ट्रेस ज्यादा, स्क्रीन की लत टीनएजर्स को बना रही बीमार?

नींद कम…स्ट्रेस ज्यादा, स्क्रीन की लत टीनएजर्स को बना रही बीमार?


Screen Time Effect on Teenagers: एक ऐसा दौर जहां सुबह की शुरुआत मोबाइल अलार्म से होती है और रात खत्म होती है सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग पर. ये कहानी सिर्फ बड़ों की नहीं, बल्कि अब तो बच्चों और टीनएजर्स की भी बन चुकी है. स्क्रीन अब सिर्फ पढ़ाई या जानकारी का जरिया नहीं, बल्कि मनोरंजन और सोशल कनेक्शन का भी सबसे बड़ा साधन बन चुका है. लेकिन इसी स्क्रीन की लत धीरे-धीरे टीनएजर्स को बीमार बना रही है. शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी.

स्क्रीन टाइम से बढ़ती परेशानियां

डॉक्टर्स की मानें तो टीनएजर्स में स्क्रीन टाइम का अत्यधिक उपयोग कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है. मोबाइल, लैपटॉप या टैबलेट की रोशनी और लगातार बदलती कंटेंट की जानकारी न सिर्फ आंखों को थकाती है, बल्कि दिमाग को भी ज्यादा एक्टिव रखती है, जिससे नींद की क्वालिटी प्रभावित होती है.

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नींद की कमी

रोजाना अगर बच्चा 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहा है तो उसकी नींद का साइकल पूरी तरह डिस्टर्ब हो सकता है. नींद की कमी से थकान, चिड़चिड़ापन, फोकस की कमी और यहां तक कि डिप्रेशन जैसे लक्षण भी उभर सकते हैं.

तनाव और सोशल कंपैरिजन

सोशल मीडिया पर दिखने वाली परफेक्ट लाइफ, फिल्टर्ड चेहरे और ग्लैमरस लाइफस्टाइल को देखकर किशोरों में अपनी जिंदगी से असंतोष पनपने लगता है. वे खुद को दूसरों से कम समझने लगते हैं और यही भावनात्मक अस्थिरता डिप्रेशन, स्ट्रेस और एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याओं की वजह बनती है.

फिजिकल हेल्थ पर असर

  • आंखों में जलन और थकावट
  • माइग्रेन और सिर दर्द
  • गलत पोस्चर से गर्दन और पीठ का दर्द
  • शारीरिक गतिविधियों की कमी से मोटापा

समाधान क्या है?

  • स्क्रीन टाइम लिमिट करें बच्चों के लिए रोज़ाना 2 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए
  • डिजिटल डिटॉक्स दिनहफ्ते में कम से कम एक दिन डिजिटल ब्रेक लें
  • फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएंस्पोर्ट्स, योग या आउटडोर गेम्स को समय दें
  • सोशल मीडिया पर ओपन बातचीतबच्चों से संवाद करें कि सोशल मीडिया की रियलिटी क्या होती है
  • स्क्रीन-फ्री स्लीप रूटीनसोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन से दूरी रखें

स्क्रीन की लत एक आधुनिक समस्या है, जो धीरे-धीरे हमारे बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बना रही है. जागरूक पैरेंटिंग, रूटीन कंट्रोल और हेल्दी लाइफस्टाइल के जरिए हम इस डिजिटल डिपेंडेंसी को काबू में कर सकते हैं.

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