अखरोट खाने का सही टाइम क्या है, जानिए कब और कैसे मिलता है इसका बेस्ट फायदा?

अखरोट खाने का सही टाइम क्या है, जानिए कब और कैसे मिलता है इसका बेस्ट फायदा?


स्वाद और न्यूट्रीशियन का खजाना है, अखरोट…जिसे सुपर फूड या ब्रेन फूड भी कहा जाता है. माना जाता है कि अखरोट ओमेगा-3 फैटी एसिड्स का सबसे बड़ा स्रोत हैं. ये ब्लड प्रेशर, हार्ट, गट  हेल्थ, मेल फर्टिलिटी के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. आपके दिमाग के लिए तो, ये ड्राई फ्रूट पावरहाउस की तरह काम करता है. फिर भी, क्या आपने कभी सोचा है कि इसे खाने का परफेक्ट टाइम क्या है, ताकि आपको इसका पूरा-पूरा फायदा मिल सके. अक्सर लोग कभी भी अखरोट खा लेते हैं,  लेकिन अगर आप इसे सही टाइम पर और सही तरीके से खाएं, तो इसके हेल्थ बेनेफिट्स कई गुना बढ़ जाते हैं. आइए जानते हैं कब और कैसे अखरोट हमारी बॉडी के लिए सबसे अच्छे से काम करता है.

अखरोट खाने का सबसे अच्छा समय

एक्सपर्ट्स और रिसर्च के हिसाब से, अखरोट खाने का सबसे अच्छा समय ये हो सकते हैं.

  • सुबह खाली पेट: दिल्ली की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट नेहा बंसल के मुताबिक, अगर आप अपनी सुबह की शुरुआत अखरोट से करते हैं तो ये आपके लिए पॉवर-पैक्ड हो सकता है. रात भर भिगोए हुए अखरोट को सुबह खाली पेट खाने से आपकी बॉडी उसके न्यूट्रिएंट्स को बेहतर तरीके से एब्जॉर्ब कर पाती है. इससे आपको एनर्जी मिलती है और आप दिन भर एक्टिव महसूस करते हैं। इसमें मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड्स और एंटीऑक्सीडेंट्स ब्रेन हेल्थ और हार्ट हेल्थ के लिए भी बहुत फायदेमंद होते हैं.
  • ईवनिंग स्नैक्स: कई बार शाम को हमें हल्की भूख लगती है और हम कुछ अनहेल्दी खा लेते हैं. ऐसे में, अखरोट एक स्मार्ट चॉइस हो सकता है. यह आपको फुल महसूस कराएगा और रात के खाने से पहले होने वाली ओवरईटिंग से बचाएगा. इसमें मौजूद फाइबर आपके डाइजेशन को भी स्लो करता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है.
  • रात को सोने से पहले: कुछ लोग रात को सोने से पहले अखरोट खाते हैं और इसके भी अपने फायदे हैं. अखरोट में मेलाटोनिन होता है, जो एक स्लीप-रेगुलेटिंग हॉर्मोन है.अगर आपको नींद आने में दिक्कत होती है, तो रात को सोने से करीब एक घंटा पहले थोड़े से अखरोट खा सकते हैं. यह आपको क्वालिटी स्लीप दिलाने में मदद कर सकता है.

कैसे खाएं अखरोट?

  • भिगोकर खाएं: अखरोट को हमेशा भिगोकर खाने की सलाह दी जाती है. रात भर पानी में भिगोने से अखरोट में मौजूद फाइटिक एसिड कम हो जाता है, जिससे आपके शरीर के लिए उसके न्यूट्रिएंट्स को डाइजेस्ट करना और एब्जॉर्ब करना आसान हो जाता है.
  • कितनी क्वांटिटी: आमतौर पर, एक दिन में 2-4 अखरोट की गिरी खाना काफी होता है. ज्यादा खाने से बचें, क्योंकि इनमें कैलोरी ज्यादा होती है.
  • किसके साथ खाएं: आप इसे सीधे खा सकते हैं, अपने दही या ओटमील में डालकर खा सकते हैं, या फिर स्मूदी में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बुढ़ापे में रहना है हेल्दी तो ये हैं जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स, जानें क्या होते हैं फायदे

बुढ़ापे में रहना है हेल्दी तो ये हैं जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स, जानें क्या होते हैं फायदे


आपकी बॉडी को सरवाइव करने और हेल्दी रहने के लिए विटामिन्स और मिनरल्स दो मेन न्यूट्रिएंट्स हैं. उम्र बढ़ने के साथ बॉडी की जरूरतें चेंज हो जाती हैं, इसलिए सीनियर एडल्ट्स के लिए कुछ खास न्यूट्रिएंट्स पर फोकस करना और भी इम्पोर्टेंट हो जाता है. 

विटामिन्स बॉडी की ग्रोथ और प्रॉपर फंक्शनिंग में हेल्प करते हैं. 13 जरूरी विटामिन्स जैसे विटामिन ए,सी, डी, ई, के, बी-ग्रुप के आठ विटामिन्स अलग-अलग रोल प्ले करते हैं. इसमें इन्फेक्शंस से बचाना, नर्व्स को हेल्दी रखना, फूड अब्जॉर्ब्शन या ब्लड क्लॉटिंग में हेल्प करना आदि शामिल है. एक बैलेंस्ड डाइट से यूज़ुअली इनकी इनफ क्वांटिटी मिल जाती है. 

शरीर के लिए मिनरल्स कितने जरूरी?

मिनरल्स भी बॉडी को प्रॉपर्ली वर्क करने में हेल्प करते हैं. ये ऐसे एलिमेंट्स हैं जो धरती पर और हमारे फूड में पाए जाते हैं और इनकी बॉडी को काम करने के लिए जरूरत होती है. आयोडीन और फ्लोराइड जैसे कुछ की बहुत कम क्वांटिटी चाहिए, जबकि कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे दूसरे मिनरल्स की अधिक नीड होती है. 

इन बातों का रखें ध्यान

बुजुर्गों को अपनी डाइट पर खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उम्र के साथ न्यूट्रिएंट्स का अब्जॉर्ब्शन कम हो सकता है. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या डाइटिशियन की एडवाइस पर सप्लीमेंट्स लेना बेनिफिशियल हो सकता है. आइए जानते हैं ऐसे महत्वपूर्ण विटामिन और मिनरल्स, तो बुढ़ापे में स्वस्थ और मजबूत रहने में मदद करेंगे.

  • मैग्नीशियम: मैग्नीशियम 300 से ज्यादा बॉडी प्रोसेसेज में इन्वॉल्व होता है, जिसमें मसल्स और नर्व फंक्शन, ब्लड शुगर कंट्रोल, ब्लड प्रेशर रेगुलेशन और बोन हेल्थ शामिल हैं. यह एनर्जी प्रोडक्शन में भी हेल्प करता है. आपको मैग्नीशियम पत्तेदार हरी वेजीटेबल्स, नट्स, सीड्स (कद्दू के सीड्स, चिया सीड्स), लेग्यूम्स और होल ग्रेन्स से मिल जाएगा.
  • विटामिन बी12: विटामिन बी12 नर्व फंक्शन, रेड ब्लड सेल्स के फॉर्मेशन और ब्रेन हेल्थ के लिए इम्पोर्टेंट है. एज बढ़ने के साथ, बॉडी के लिए बी12 को अब्जॉर्ब करना मुश्किल हो जाता है, जिससे इसकी डेफिशियेंसी का रिस्क बढ़ जाता है. विटामिन बी12 एनिमल-बेस्ड फूड्स में पाया जाता है जैसे मीट, फिश, एग्स और डेयरी प्रोडक्ट्स. वेजिटेरियन और वीगन लोगों को सप्लीमेंट्स या फोर्टिफाइड फूड्स की नीड हो सकती है.
  • कैल्शियम: कैल्शियम हड्डियों और टीथ का मेन कॉम्पोनेंट है. एज बढ़ने के साथ ऑस्टियोपोरोसिस का रिस्क बढ़ जाता है. इसलिए इनफ कैल्शियम का इंटेक हड्डियों की डेंसिटी को मेंटेन करने के लिए जरूरी है. इसकी जरूरत मिल्क, योगर्ट, चीज, हरी पत्तेदार वेजीटेबल्स, ब्रोकली और फोर्टिफाइड फूड्स से मिल जाता है.
  • विटामिन डी: विटामिन डी कैल्शियम को अब्जॉर्ब करने में हेल्प करता है, जो हड्डियों को स्ट्रॉन्ग रखने के लिए क्रिटिकल है. एज बढ़ने के साथ बॉडी की विटामिन डी को सिंथेसाइज करने की कैपेसिटी कम हो जाती है. यह इम्यूनिटी को भी बूस्ट करता है. वैसे तो सनलाइट इसका बेस्ट नेचुरल सोर्स है. इसके अलावा, फैटी फिश, अंडे की योक और फोर्टिफाइड मिल्क व सीरियल्स में भी यह मिलता है. डॉक्टर की एडवाइस पर सप्लीमेंट्स भी लिए जा सकते हैं.
  • ओमेगा-3 फैटी एसिड्स: ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे एसेंशियल फैट्स हैं, जिनकी आपकी बॉडी को जरूरत होती है. ये आपके हार्ट और ब्रेन की हेल्थ के लिए बहुत बेनिफिशियल होते हैं. ये बॉडी में इन्फ्लेमेशन को कम करने, हार्ट डिजीज के रिस्क को लो करने, और कॉग्निटिव डिक्लाइन और अल्जाइमर जैसी बीमारियों से प्रोटेक्ट करने में हेल्प करते हैं। फैटी फिश ओमेगा-3 के रिच सोर्सेज हैं. इसके अलावा, फ्लैक्स सीड्स और चिया सीड्स भी ओमेगा-3 प्रोवाइड करते हैं.

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सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए सही उम्र कौन-सही? जान लें हर बात कहीं हो न जाए देर

सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए सही उम्र कौन-सही? जान लें हर बात कहीं हो न जाए देर


पहले पति, बच्चों और परिवार के बाकी लोगों की जिम्मेदारी उठाना भारतीय महिलाएं अपना कर्तव्य मानती हैं. इन्हीं सब के चक्कर में वे अपना ही ध्यान रखना भूल जाती हैं. छोटी-मोटी दिक्कतों को तो वे यूं ही नजरअंदाज कर देती हैं, जिसका नुकसान उन्हें बड़ी परेशानी से उठाना पड़ता है. दरअसल, इस लाइफस्टाइल के कारण महिलाएं अपनी हेल्थ को लेकर ज्यादा सीरियस नहीं होती हैं. ऐसा ट्रेंड उम्रदराज ही नहीं, बल्कि कम उम्र की महिलाओं और युवतियों में भी देखा जाता है. यही वजह है कि सर्वाइकल कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां धीरे-धीरे उन्हें अपना शिकार बना लेती हैं. आइए जानते हैं कि महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए सही उम्र कौन-सी होती है? इसके लिए कौन-सा टेस्ट बेस्ट है और इस पर कितना खर्च आता है?

एम्स दिल्ली के डॉक्टर ने कही यह बात
बता दें कि एम्स दिल्ली में हाल ही में कैंसर के मसले पर एक वर्कशॉप आयोजित की गई. इसमें एम्स के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर ने बताया कि अगर आपकी उम्र 30 साल या उससे ज्यादा है तो सर्वाइकल कैंसर की बार-बार स्क्रीनिंग कराने की जरूरत नहीं है. अब एचपीवी डीएनए टेस्ट के रूप में ऐसा ऑप्शन मिल चुका है, जिससे पांच साल में कैंसर के आने वाले खतरे की जानकारी मिल जाती है. उन्होंने बताया कि एचपीवी डीएनए टेस्ट न सिर्फ कैंसर की शुरुआती स्टेज की पहचान करता है, बल्कि यह वायरस के इंफेक्शन को भी पकड़ लेता है. 

कैसे होता है यह टेस्ट?
डॉ. शंकर के मुताबिक, एचपीवी (ह्यूमन पेपिलोमावायरस) डीएनए टेस्ट 95 पर्सेंट तक सटीक रिजल्ट देता है और यह पैप स्मीयर टेस्ट के मुकाबले ज्यादा कारगर है. इस टेस्ट में महिलाओं के सर्विक्स यानी गर्भाशय ग्रीवा से सैंपल लिया जाता है. कुछ ही मिनटों में डॉक्टरों को यह पता चल जाता है कि महिला के शरीर में एचपीवी वायरस का डीएनए मौजूद है या नहीं. उन्होंने बताया कि यह टेस्ट एम्स में कराया जा सकता है. खास बात यह है कि इस टेस्ट के लिए सैंपल भी महिलाएं खुद दे सकती हैं. 

भारत में क्या है सर्वाइकल कैंसर का हाल?

एम्स के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड डॉ. सुमन भास्कर के मुताबिक, भारत में सर्वाइकल कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. हर साल 75 हजार से ज्यादा महिलाओं की मौत सर्वाइकल कैंसर की वजह से होती है. वहीं, 70 से 80 फीसदी केस उस वक्त सामने आते हैं, जब बीमारी अपने आखिरी स्टेज में पहुंच चुकी होती है. अगर शुरुआत में ही बीमारी का पता लग जाए तो इलाज काफी आसान है. सिर्फ सर्जरी या रेडिएशन से इस बीमारी से बचा जा सकता है. 

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कहीं आपके ब्रेस्ट में तो नहीं बन रही गांठ? घर में खुद ऐसे कर सकते हैं जांच

कहीं आपके ब्रेस्ट में तो नहीं बन रही गांठ? घर में खुद ऐसे कर सकते हैं जांच


ब्रेस्ट में गांठ का पता चलना यकीनन डराने वाला हो सकता है, क्योंकि अक्सर ये पहली बार में ब्रेस्ट कैंसर का सिग्नल लग सकता है. ब्रेस्ट में कोई भी स्वेलिंग चिंता पैदा करती है, चाहे वो कैसी भी दिखे या फील हो. यहां तक कि आधे इंच से बड़े ट्यूमर को भी छूकर फील किया जा सकता है.

हालांकि, ये समझना बहुत जरूरी है कि हर ब्रेस्ट लंप कैंसरस  नहीं होता है. खासकर यंग वीमेन में, ब्रेस्ट में गांठें एक बेनाइन कंडीशन का इंडिकेशन हो सकती हैं, जिसका मतलब है कि वो कैंसर नहीं हैं और लाइफ के लिए डेंजरस नहीं होतीं.
अगर आपको अपने ब्रेस्ट टिश्यूजमें कोई गांठ फील होती है, तो कैंसर को रूल आउट करना बहुत जरूरी है. अगर आपको कोई नई गांठ दिखे या आपके ब्रेस्ट टिश्यूज का टेक्सचर नॉर्मल से अलग फील हो, तो तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करें..टाइम पर चेकअप और डायग्नोसिस बहुत इंपॉर्टेंट है.

क्या है बेस्ट लम्प्स या गांठ?

एम्स दिल्ली में कैंसर एक्सपर्ट डॉ. अभिषेक शंकर के मुताबिक, ब्रेस्ट में गांठ पीरियड्स या प्रेग्नेंसी जैसे हार्मोनल बदलावों से भी हो सकती है. ब्रेस्ट टिशू में एक उभार है. अक्सर लोग इसे कैंसर मानकर घबरा जाते हैं, जबकि ज्यादातर गांठें नॉर्मल होती हैं और दवाओं से ठीक हो सकती हैं. हालांकि, हर नई गांठ को डॉक्टर को दिखाना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह ब्रेस्ट कैंसर का भी एक अहम लक्षण हो सकता है.

ब्रेस्ट में गांठ के कारण

ब्रेस्ट में गांठ कई अलग-अलग वजहों से बन सकती हैं और इनमें से ज्यादातर कैंसर वाली नहीं होतीं. इनमें हमर्टोमा, दूध के सिस्ट, लिपोमा और ब्रेस्ट सिस्ट शामिल हैं. इसके अलावा, फाइब्रोएडीनोमा और इंट्राडक्टल पेपिलोमा भी कारण हो सकते हैं. फाइब्रोसिस्टिक ब्रेस्ट या ब्रेस्ट में चोट लगने से भी गांठ बन सकती है. यदि कोई महिला स्तनपान करा रही है, तो मास्टिटिस भी गांठ का कारण हो सकता है. यह समझना जरूरी है कि भले ही इनमें से ज्यादातर गांठें सॉफ्ट हों, पर किसी भी नई या असामान्य गांठ का पता लगने पर हमेशा डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए, ताकि सही डायग्नोसिस और जरूरत पड़ने पर ट्रीटमेंट मिल सके.

कैसे करें ब्रेस्ट की खुद से जांच?

ब्रेस्ट एग्जामिशनेशन करना आपको अपने ब्रेस्ट में होने वाले किसी भी बदलाव को जल्दी पहचानने में हेल्प कर सकता है, ले कन ये सिर्फ एक सेल्फ-चेक है, न कि मेडिकल चेकअप का ऑप्शन. आप लेटकर, अपने दाहिने हाथ को सिर के पीछे रखकर, बाएं हाथ की उंगलियों से ब्रेस्ट को चेक कर सकती हैं. आर्मपिट और निप्पल को भी चेक करें. किसी भी डिस्चार्ज पर ध्यान दें. शीशे के सामने खड़े होकर ब्रेस्ट के साइज़, शेप, कलर और स्किन में बदलाव जैसे डिमलिंग या ऑरेंज पील जैसी स्किन को ऑब्जर्व करें. अगर आपको कोई नई गांठ, दर्द, स्किन में चेंज, निप्पल से डिस्चार्ज या कोई भी अबनॉर्मल बदलाव महसूस होता है, तो तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करें. 

ये भी पढ़ें: कैसे खत्म हो जाती है घुटनों की ग्रीस? जानें इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए

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क्या है सेकेंड्री इनफर्टिलिटी? दूसरा बच्चा पैदा करने में कपल्स को क्यों आने लगती है दिक्कत

क्या है सेकेंड्री इनफर्टिलिटी? दूसरा बच्चा पैदा करने में कपल्स को क्यों आने लगती है दिक्कत


अगर आप पहले प्रेग्नेंट हो चुकी हैं, लेकिन अब दोबारा प्रेग्नेंट होना मुश्किल हो रहा है, तो हो सकता है कि आप सेकेंड्री इनफर्टिलिटी फेस कर रही हों. ये ज्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज्यादा कॉमन है. विशेषज्ञों की मानें, तो सभी इनफर्टिलिटी केसेस में लगभग 50% सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के कारण होते हैं. दूसरी बार फर्टिलिटी को इफेक्ट करने वाले कई फैक्टर्स हो सकते हैं, जिनमें ब्लॉक्ड फैलोपियन ट्यूब्स, स्पर्म काउंट जैसी मेल इनफर्टिलिटी प्रॉब्लम्स या फीमेल इनफर्टिलिटी रिस्क फैक्टर्स में चेंज शामिल हैं. सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के एक्चुअल कारणों को समझने से  राइट फर्टिलिटी ट्रीटमेंट फाइंड करने और जरूरी सपोर्ट पाने में बहुत हेल्प मिल सकती है. आइए जानें कि ऐसा क्यों होता है और क्या हैं कारण.

क्या है सेकेंड्री इनफर्टिलिटी?

सेकेंड्री इनफर्टिलिटी का मतलब है पहले नॉर्मल डिलीवरी के बाद प्रेग्नेंट होने या बेबी को कंसीव करने में डिफिकल्टी. ये पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, स्कार टिश  या रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स को इफेक्ट करने वाले हार्मोनल इम्बैलेंस के कारण हो सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि वर्ल्डवाइड लगभग 10-15% कपल्स इनफर्टिलिटी से इफेक्टेड हैं. सेकेंड्री इनफर्टिलिटी कई फैक्टर्स पर डिपेंड करती है,  सिर्फ उम्र पर नहीं. 

ये हैं सेकेंड्री इनफर्टिलिटी के मुख्य कारण

उम्र से रिलेटेड फर्टिलिटी डिक्लाइन: जैसे-जैसे फीमेल्स की ऐज बढ़ती है, उनके एग्स की क्वालिटी तेजी से गिरने लगती है, खासकर 35 की उम्र के बाद. अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स की मानें तो, 32 से 37 साल की ऐज के बीच एग्स का नंबर लगभग 50% कम हो जाता है. हार्मोन लेवल्स और ओवेरियन डिस्फंक्शन भी आपकी नेचुरली कंसीव करने की एबिलिटी को और ज़्यादा इफेक्ट कर सकते हैं.

ब्लॉक्ड फैलोपियन ट्यूब्स: पेल्विक इन्फेक्शन या ट्यूबल लिगेशन सर्जरी के कारण बनने वाले स्कार टिशू, फैलोपियन ट्यूब्स को ब्लॉक कर सकते हैं. सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इन्फेक्शंस कई फीमेल्स में सेकेंड्री इनफर्टिलिटी का एक हिडन रीजन होते हैं. यूटराइन फाइब्रॉइड्स और यूटराइन लाइनिंग प्रॉब्लम्स भी फर्टिलाइज्ड एग को इंप्लांट होने से रोक सकती हैं.

ओव्यूलेशन डिसऑर्डर्स: हार्मोनल डिसऑर्डर्स और रिप्रोडक्टिव एंडोक्राइनोलॉजी से जुड़ी प्रॉब्लम्स ओव्यूलेशन को पूरी तरह से स्टॉप कर सकती हैं.क्लोमिड जैसी फर्टिलिटी मेडिसिन अक्सर सेफली ओव्यूलेशन को इंड्यूस करने के लिए दी जाती हैं. ओवरीजमें स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स को ठीक करने से कभी-कभी इस सिचुएशन को रिवर्स किया जा सकता है.

यूटराइन या एंडोमेट्रियल इश्यूज: यूटराइन लाइनिंग की पुअर हेल्थ इंप्लांटेशन रेट को इफेक्ट करती है.एंडोमेट्रियोसिस के कारण हेल्दी एग्स स्कार टिशू में ट्रैप हो सकते हैं. मेडिकल ट्रीटमेंट्स से एंडोमेट्रियोसिस को अर्ली स्टेज में ट्रीट करने से सफलता का मौका अधिक होता हैं.

मेल फैक्टर्स जैसे एनलार्ज्ड प्रोस्टेट: स्पर्म प्रोडक्शन  में कमी या पुअर स्पर्म क्वालिटी (मेल फ़र्टिलिटी को इफेक्ट कर सकती है। एनलार्ज्ड प्रोस्टेट या टेस्टिकुलर वैरिकोसेल स्पर्म काउंट और स्पर्म को इफेक्टिवली होल्ड करने की एबिलिटी को इफेक्ट करता है. ब्लड टेस्ट और सीमन एनालिसिस से इनफर्टिलिटी की प्रॉब्लम्स को एक्युरेटली डायग्नोज किया जा सकता है.

लाइफस्टाइल फैक्टर्स और एक्सेसिव वेट गेन: बहुत ज्यादा अल्कोहल, ओबेसिटी और एन्वॉयरमेंटल टॉक्सिन्स हार्मोनल बैलेंस को डिस्टर्ब कर सकते हैं. अगर वेट रिलेटेड प्रॉब्लम्स को मैनेज नहीं किया जाता, तो रिप्रोडक्टिव प्रोसेस ठीक से काम नहीं कर सकती हैं. परमानेंट वेट लॉस से हेल्दी प्रेग्नेंसी के मौके बढ़ जाते हैं.

मेडिकल कंडीशंस: डायबिटीज या थायराइड प्रॉब्लम्स की मेडिकल हिस्ट्री साइलेंट फर्टिलिटी रिस्क क्रिएट करती है. फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से रेगुलर चेकअप कराने से इन्हें जल्दी डिटेक्ट करने में हेल्प मिलती है.इनफर्टाइल कपल्स में अक्सर एक से ज्यादा फैक्टर्स इन्वॉल्व होते हैं.

स्ट्रेस और इमोशनल हेल्थ: इमोशनल स्ट्रेस रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स को इफेक्ट करता है. इनफर्टिलिटी ओवरऑल मेंटल हेल्थ पर भी बहुत डिपेंड करती है. शांत और सपोर्टेड रहने से जितना ज्यादातर लोगों को लगता है, उससे कहीं ज्यादा फर्क पड़ता है.

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मानसून आते ही प्राइवेट पार्ट्स में बढ़ जाता है संक्रमण का खतरा, समस्या से पहले ऐसे करें बचाव

मानसून आते ही प्राइवेट पार्ट्स में बढ़ जाता है संक्रमण का खतरा, समस्या से पहले ऐसे करें बचाव


बदलते मौसम के तापमान के कारण प्राइवेट पार्ट्स में बैक्टीरिया और फंगस के पनपने से यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन होने की पॉसिबिलिटी बढ़ जाती है. इतना ही नहीं, हवा में नमी ज्यादा होने से पसीना भी ज्यादा निकलता है, जिससे बॉडी में पानी की कमी होने लगती है. इसकी वजह से मेल और फीमेल का पीएच लेवल भी कम हो जाता है और बैक्टीरिया व फंगस का रिस्क बना रहता है.

ऐसे में जरूरी है कि मानसून के मौसम में आप अपने प्राइवेट पार्ट्स का बेहतर तरीके से ध्यान रखें, ताकि कोई वायरस या बैक्टीरिया न पनप सके. मानसून के दौरान प्राइवेट की हेल्थ को मेंटेन रखने के लिए आप यहां बताए गए कुछ सिंपल और जरूरी टिप्स को फॉलो कर सकते हैं.

मानसून में क्यों बढ़ जाती है समस्या?

मानसून में फंगल इन्फेक्शन की समस्या इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि हवा में नमी  और पसीना  ज्यादा होता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये इन्फेक्शन बॉडी के किसी भी पार्ट में हो सकते हैं, जैसे पैरों की उंगलियों के बीच, गर्दन, पीठ, अंडरआर्म्स और प्राइवेट पार्ट्स में. बारिश के मौसम में, जब बॉडी जल्दी सूख नहीं पाती, तो फंगस को पनपने के लिए परफेक्ट माहौल मिल जाता है.

अगर इन दिनों गीले या हल्के नम कपड़े ज्यादा देर तक पहने जाएं और पर्सनल हाइजीन  का ध्यान न रखा जाए, तो बैक्टीरिया और फंगस आसानी से फैल सकते हैं. फंगल इन्फेक्शन के आम लक्षणों में बार-बार खुजली, स्किन  का छिलना या फटना, कभी-कभी बदबू आना और छाले या जलन शामिल हैं. अगर समय पर ट्रीटमेंट न मिले, तो ये इन्फेक्शन फैल सकता है और दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है.

फंगल इन्फेक्शन से ऐसे करें बचाव

  • स्किन को सूखा और साफ रखें: नहाने के बाद बॉडी को अच्छी तरह से पोंछें, खासकर अंडरआर्म्स, गर्दन, पैरों के बीच और प्राइवेट पार्ट्स को. याद रखें, नमी फंगल ग्रोथ का सबसे बड़ा कारण है, इसलिए स्किन को ड्राई रखना सबसे जरूरी है.
  • ढीले और कॉटन के कपड़े पहनें: सिंथेटिक कपड़े पसीना सोख नहीं पाते और बॉडी से चिपकते हैं, जिससे स्किन में जलन और इन्फेक्शन हो सकता है. हल्के, कॉटन के और ढीले कपड़े पहनें, ताकि स्किन को हवा लगती रहे.
  • गीले कपड़े और जूते तुरंत बदलें: अगर आप बारिश में भीग जाएं, तो घर आते ही गीले कपड़े और मोजे तुरंत बदलें. गीले जूते पहनने से फंगल इन्फेक्शन, खासकर एथलीट फुट का रिस्क बढ़ता है.
  • एंटी-फंगल पाउडर या क्रीम का यूज करें: जो लोग पसीने से ज्यादा परेशान रहते हैं. उन्हें एंटी-फंगल पाउडर या डॉक्टर द्वारा सजेस्ट की गई क्रीम का इस्तेमाल करना चाहिए. इससे इन्फेक्शन को बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है.
  • साफ-सफाई का रखें खास ध्यान: रोज नहाएं और अपने तौलिए को धूप में सुखाएं. दूसरों के तौलिया, सॉक्स या अंडरगारमेंट्स का इस्तेमाल न करें. जिम या स्वीमिंग पूल जैसी पब्लिक जगहों पर साफ-सफाई को लेकर और भी ज्यादा सावधानी बरतें.

अगर इंफेक्शन हो जाए तो क्या करें?

मानसून के सीजन में अगर इचिंग या रेडनेस लगातार लंबे टाइम तक बनी रहे, तो तुरंत ही किसी डर्मेटोलॉजिस्ट से कॉन्टैक्ट करें. बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी क्रीम या मेडिसिन इस्तेमाल न करें. कुछ क्रीम में स्टेरॉइड्स होते हैं, जो प्रॉब्लम को और बिगाड़ सकते हैं. फंगल इन्फेक्शन के ट्रीटमेंट में टाइम लगता है, इसलिए आपको सब्र भी रखना होगा और एंटीफंगल दवाओं का कोर्स पूरा करना होगा.

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