रेबीज के इंजेक्शन लगाने के बाद भी कुछ लोगों की क्यों हो जाती है मौत? ये रहा जवाब

रेबीज के इंजेक्शन लगाने के बाद भी कुछ लोगों की क्यों हो जाती है मौत? ये रहा जवाब


Death after Rabies Vaccine: हम सभी ने सुना है कि कुत्ते के काटने पर रेबीज से बचने के लिए समय पर इंजेक्शन लगवाना बेहद जरूरी होता है. लेकिन फिर भी, कई बार ये सवाल उठता है कि जब व्यक्ति ने रेबीज के सारे इंजेक्शन समय पर लगवा लिए, तो फिर मौत कैसे हो गई? क्या वैक्सीन काम नहीं करती? क्या इलाज में कोई चूक रह गई? या फिर ये बीमारी ही इतनी खतरनाक है कि विज्ञान भी कई बार हार मान लेता है?

इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए डॉ. बीपीएस त्यागी बताया कि, रेबीज एक ऐसा वायरस है जो इंसान के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है और अगर एक बार लक्षण शुरू हो जाएं तो इसका कोई इलाज नहीं है. हालांकि समय पर और सही तरीके से दी गई वैक्सीन इस जानलेवा बीमारी से पूरी तरह बचा सकती है. लेकिन इसके बावजूद कुछ मामलों में मौत हो जाती है और इसके पीछे कुछ अहम कारण हो सकते हैं.

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देर से इंजेक्शन लगवाना

रेबीज वायरस काटने के बाद तेजी से नर्वस सिस्टम तक पहुंचता है. अगर पीड़ित व्यक्ति समय पर इंजेक्शन नहीं लगवाता या पहले कुछ घंटों में लापरवाही करता है, तो वैक्सीन का असर कम हो जाता है.

वैक्सीन कोर्स पूराकरना

कुछ लोग डर के कारण तो इंजेक्शन शुरू कर देते हैं, लेकिन बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं. रेबीज वैक्सीन का एक पूरा कोर्स होता है जिसे पूरा करना अनिवार्य है. अगर बीच में कोई डोज मिस हो गई, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.

रैबिस इम्यूनोग्लोबुलिनदेना

गंभीर काटने के मामलों सिर्फ वैक्सीन काफी नहीं होती. ऐसे में रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन भी देना जरूरी होता है, जिससे शरीर को तुरंत वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी मिलती है. कई बार यह दवा नहीं दी जाती, जिससे खतरा बढ़ जाता है.

गलत स्थान पर इंजेक्शन लगाना

रेबीज की वैक्सीन को खासतौर पर मांसपेशियों मेंलगाया जाता है. अगर यह गलत जगा लगा दी जाए, तो वैक्सीन असर नहीं दिखा पाती.

मरीज की इम्यूनिटी कमजोर होना

कभी-कभी बुजुर्ग, बच्चों या गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. ऐसे में उनका शरीर वैक्सीन के जवाब में पर्याप्त एंटीबॉडी नहीं बना पाता.

रेबीज एक ऐसा संक्रमण है, जिससे समय रहते सही कदम उठाकर पूरी तरह बचा जा सकता है. बस जल्दी इलाज शुरू करना, इंजेक्शन कोर्स पूरा करना और सही मेडिकल गाइडेंस लेना जरूरी है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ट्रंप की सेहत पर खतरे की घंटी! आखिर कितनी खतरनाक है ये बीमारी और क्या है इसका इलाज

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Donald Trump Health Update: दुनिया के सबसे चर्चित नेताओं में से एक डोनाल्ड ट्रंप की सेहत को लेकर हाल ही में आई मेडिकल रिपोर्ट ने सभी को चौंका दिया है. हर कोई जानना चाहता है कि आखिर ट्रंप को हुआ क्या है? क्या उनकी बीमारी गंभीर है और क्या इसका इलाज संभव है? जब किसी बड़े राजनीतिक चेहरे की तबीयत बिगड़ती है, तो सिर्फ उनका देश नहीं, पूरी दुनिया सतर्क हो जाती है.

ट्रंप की रिपोर्ट में सामने आई है नसों से जुड़ी बीमारी, जिसका नाम है (क्रॉनिक वीनस इनसफिशियंसी) इस बीमारी को लेकर डॉक्टरों की राय क्या है, इसके लक्षण क्या होते हैं, कितना खतरा है और इसका इलाज संभव है या नहीं. इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए ध्यान से पढ़िए…

डॉ. नवीन शर्मा बताते हैं कि, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पैरों की नसें सही तरीके से ब्लड को वापस हृदय तक नहीं पहुंचा पातीं. सामान्य रूप से नसों में वाल्व होते हैं, जो रक्त को एक ही दिशा में प्रवाहित करते हैं. लेकिन जब ये वाल्व कमजोर या खराब हो जाते हैं, तो रक्त पैरों में जमा होने लगता है, जिससे सूजन, दर्द और अन्य समस्याएं होने लगती हैं.

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क्रॉनिक वीनस इनसफिशियंसी के लक्षण

  • पैरों में लगातार भारीपन या थकान महसूस होना
  • टखनों और पिंडलियों में सूजन
  • पैरों की त्वचा का काली या भूरी हो जाना
  • त्वचा पर खुजली और जलन
  • लंबे समय तक खड़े रहने पर दर्द बढ़ जाना
  • अल्सर या घाव जो देर से भरते हैं

क्या यह बीमारी खतरनाक है?

यह बीमारी जानलेवा नहीं होती, लेकिन अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए तो यह मरीज की जीवनशैली को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है. पैरों में लगातार दर्द, सूजन और चलने में कठिनाई जैसे लक्षण व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से परेशान कर सकते हैं.

क्या इसका इलाज संभव है?

  • क्रॉनिक वीनस इनसफिशियंसी का इलाज संभव है. इसका इलाज लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है.
  • लाइफस्टाइल बदलाव: वजन नियंत्रित करना, रोज़ाना टहलना और लंबे समय तक एक ही स्थिति में न बैठना या खड़ा न रहना.
  • कॉम्प्रेशन स्टॉकिंग्स: ये विशेष मोजे पैरों में रक्त के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करते हैं.
  • दवाएं: सूजन और दर्द को कम करने के लिए कुछ दवाएं दी जाती हैं.
  • लेजर या सर्जरी: अगर हालत गंभीर हो तो लेजर ट्रीटमेंट या सर्जिकल उपाय किए जा सकते हैं.

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फार्मा और हेल्थ टेक में लीडर बनेगा यूपी, इन दो बड़े संस्थानों से कर ली यह डील

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उत्तर प्रदेश सरकार ने फार्मा, बायोटेक और मेडिकल डिवाइस फील्ड में राज्य को देश का टॉप सेंटर बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है. लखनऊ के लाल बहादुर शास्त्री भवन में शुक्रवार (18 जुलाई) को उत्तर प्रदेश प्रमोट फार्मा काउंसिल ने फरीदाबाद के ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (THSTI) और वाराणसी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-BHU) के साथ दो अहम एग्रीमेंट (MoU) साइन किए. इनका मकसद रिसर्च, नए आइडियाज, स्टार्टअप्स को सपोर्ट और स्किल डेवलपमेंट में मदद करना है.

इवेंट की अध्यक्षता मेडिकल एजुकेशन के प्रिंसिपल सेक्रेटरी आईएएस पार्थ सारथी सेन शर्मा ने की. अपनी स्पीच में उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश अब फार्मा और हेल्थ-टेक में देश का लीडर बनने को तैयार है. ये एग्रीमेंट्स रिसर्च, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, स्टार्टअप्स और पॉलिसी मेकिंग को एक साथ लाने में गेम-चेंजर होंगे.

एग्रीमेंट्स में क्या हुआ तय?

पहले उत्तर प्रदेश प्रमोट फार्मा काउंसिल और THSTI फरीदाबाद के बीच एग्रीमेंट हुआ. इसके बाद IIT-BHU वाराणसी के साथ दूसरा एग्रीमेंट साइन किया गया. दोनों इंस्टीट्यूट्स के मेंबर्स ने फार्मा, बायोटेक और हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी में रिसर्च, नए प्रोडक्ट्स, ट्रेनिंग और स्टार्टअप्स को सपोर्ट करने के लिए लंबे समय तक पार्टनरशिप का वादा किया.

एक्सपर्ट्स और ऑफिसर्स ने कही यह बात

फार्मा फील्ड के एक्सपर्ट डॉ. जी.एन. सिंह ने कहा कि इन एग्रीमेंट्स से उत्तर प्रदेश में रिसर्च और नए आइडियाज को नई दिशा मिलेगी. जरूरी इलाकों पर फोकस करके जल्दी रिजल्ट्स लाने की जरूरत है. वहीं, मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश कुमार अवस्थी ने कहा कि ये एग्रीमेंट्स $1 ट्रिलियन इकॉनमी, बल्क ड्रग पार्क और मेडिकल डिवाइस पार्क के टारगेट को हासिल करने में बड़ा रोल प्ले करेंगे. यमुना एक्सप्रेसवे पर मेडिकल डिवाइस पार्क और ललितपुर में ड्रग मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का काम तेजी से चल रहा है. ये कदम इनवेस्टमेंट, पॉलिसी मेकिंग और ग्लोबल पार्टनरशिप को भी बूस्ट करेंगे.

ऐसी है फ्यूचर की प्लानिंग

उत्तर प्रदेश प्रमोट फार्मा काउंसिल की मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO आईएएस कृतिका शर्मा ने कहा कि अब समय है कि उत्तर प्रदेश को फार्मा, बायोटेक और हेल्थ-टेक में देश का इनोवेशन हब बनाया जाए. इन एग्रीमेंट्स के जरिए हम मजबूत और प्लांड कदम उठा रहे हैं. इस इवेंट में मेडिकल एजुकेशन सेक्रेटरी अपर्णा यू, THSTI की डॉ. नित्या वाधवा, IIT-BHU के सुशांत कुमार श्रीवास्तव और प्रो. राजेश कुमार आदि भी शामिल थे.

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क्या आपकी सांसों से आती है बदबू? इन आसान तरीकों से लौटेगी ताजगी

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Oral Hygiene Routine: आप किसी जरूरी मीटिंग में हैं, किसी दोस्त से बात कर रहे हैं या फिर ऑफिस में लोगों के बीच हैं. लेकिन अचानक आपको महसूस होता है कि आपकी सांसों से बदबू आ रही है. ऐसे में सामने वाले के चेहरे का हाव-भाव बदल जाए, तो शर्मिंदगी और असहजता दोनों ही महसूस होती है. मुंह की बदबू सिर्फ एक सामान्य समस्या नहीं, बल्कि यह आपके आत्मविश्वास को भी कम कर सकती है.

अच्छी बात ये है कि इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए किसी महंगे ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं, बल्कि कुछ आसान घरेलू उपाय और साफ-सफाई की आदतें काफी असरदार साबित हो सकती हैं.  इस पर डॉ. विजय लक्ष्मी के अनुसार, मुंह से बदबू आने के पीछे कई वजह हो सकती है, जिस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है.

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मुंह की बदबू के आम कारण

  • मुंह की सफाई का ठीक से न होना
  • पाचन संबंधी समस्याएं
  • ज्यादा देर तक कुछ न खाना
  • मुंह सूखा रहना
  • दांतों के बीच फंसे भोजन का होना
  • धूम्रपान या तंबाकू का सेवन
  • मसूड़ों की बीमारी या कैविटी

ब्रश नियमित रूप से करें

दिन में दो बार ब्रश करना बेहद जरूरी है. इससे दांतों में फंसे खाने के कण निकल जाते हैं और बैक्टीरिया पनप नहीं पाते, जो बदबू का मुख्य कारण होते हैं.

गुनगुने पानी से कुल्ला करें

नमक में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं. रोज सुबह और रात को नमक मिले गुनगुने पानी से कुल्ला करने से मुंह की दुर्गंध कम होती है और मसूड़े भी स्वस्थ रहते हैं.

तुलसी या पुदीना चबाएं

ताजी तुलसी या पुदीने की पत्तियां चबाने से सांसों में ताजगी आती है. इनमें मौजूद प्राकृतिक तेल बदबू फैलाने वाले बैक्टीरिया को खत्म करते हैं.

नींबू और शहद का सेवन करें

रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू और शहद मिलाकर पीने से न केवल पाचन सुधरता है बल्कि मुंह से दुर्गंध की समस्या भी धीरे-धीरे कम होने लगती है.

पानी की कमी न होने दें

मुंह का सूखापन भी बदबू का बड़ा कारण होता है. दिनभर खूब पानी पीते रहें ताकि लार का निर्माण होता रहे और बैक्टीरिया की सफाई होती रहे.

फलों का करें सेवन

सेब, संतरा, अनार जैसे रसीले फलों में फाइबर होता है जो मुंह की सफाई में मदद करता है और सांसों को ताजा बनाए रखता है.

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ये 5 एक्सरसाइज रोजाना की तो लिवर कभी नहीं रहेगा फैटी, खुद को एकदम फिट फील करेंगे आप

ये 5 एक्सरसाइज रोजाना की तो लिवर कभी नहीं रहेगा फैटी, खुद को एकदम फिट फील करेंगे आप


जब आपके लिवर में फैट जमा होता है तो इससे शरीर की इंसुलिन और शुगर को मैनेज करने की क्षमता प्रभावित होती है, जिससे सूजन बढ़ सकती है. साथ ही, स्ट्रोक और दिल के दौरे का खतरा बढ़ जाता है. डरने वाली बात यह है कि जब तक आपको दिक्कत महसूस होती है, तब तक बहुत देर हो जाती है.

द लिवर डॉक्टर के नाम से मशहूर साइरिएक एबी फिलिप्स ने फैटी लिवर को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. उन्होंने बताया कि इसका कार्डियोमेटाबॉलिक हेल्थ से कैसा कनेक्शन है? साथ ही, उन्होंने ऐसे फिटनेस टेस्ट भी बताए, जिनकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि आप फिट हैं या नहीं.

द लिवर डॉक्टर के नाम से मशहूर साइरिएक एबी फिलिप्स ने फैटी लिवर को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. उन्होंने बताया कि इसका कार्डियोमेटाबॉलिक हेल्थ से कैसा कनेक्शन है? साथ ही, उन्होंने ऐसे फिटनेस टेस्ट भी बताए, जिनकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि आप फिट हैं या नहीं.

एक्स पर किए गए पोस्ट में उन्होंने लिखा कि फैटी लिवर का सबसे अच्छा इलाज अपनी कार्डियोमेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर करना है. उन्होंने फैटी लिवर के इलाज के लिए एक्सरसाइज करने की सलाह दी. साथ ही, अपनी फिटनेस का पता लगाने वाली एक्सरसाइज भी बताईं.

एक्स पर किए गए पोस्ट में उन्होंने लिखा कि फैटी लिवर का सबसे अच्छा इलाज अपनी कार्डियोमेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर करना है. उन्होंने फैटी लिवर के इलाज के लिए एक्सरसाइज करने की सलाह दी. साथ ही, अपनी फिटनेस का पता लगाने वाली एक्सरसाइज भी बताईं.

उन्होंने बताया कि कुर्सी पर एक मिनट की उठक-बैठक से आप अपने शरीर के निचले हिस्से की ताकत का पता लगा सकते हैं. इसके लिए 45 सेमी. ऊंची एक कुर्सी लीजिए और अपनी बांहों को अपने सीने के ऊपर रखें. इसके बाद 60 सेकंड में जितनी ज्यादा बार हो सके, कुर्सी पर बैठकर खड़े होते रहें. अगर आप 60 सेकंड में 20 बार ऐसा करते हैं तो इसे अच्छा रिजल्ट माना जा सकता है.

उन्होंने बताया कि कुर्सी पर एक मिनट की उठक-बैठक से आप अपने शरीर के निचले हिस्से की ताकत का पता लगा सकते हैं. इसके लिए 45 सेमी. ऊंची एक कुर्सी लीजिए और अपनी बांहों को अपने सीने के ऊपर रखें. इसके बाद 60 सेकंड में जितनी ज्यादा बार हो सके, कुर्सी पर बैठकर खड़े होते रहें. अगर आप 60 सेकंड में 20 बार ऐसा करते हैं तो इसे अच्छा रिजल्ट माना जा सकता है.

अपनी कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस को मापने के लिए थ्री मिनट स्टेप टेस्ट बेस्ट है. इसके लिए 12 इंच ऊंचे स्टेप या सीढ़ी को इस्तेमाल कर सकते हैं और इस पर 3 मिनट तक ऊपर चढ़कर नीचे उतरें. आपको एक मिनट में 24 बार यह प्रक्रिया दोहरानी है. एक्सरसाइज के तुरंत बाद अपनी पल्स चेक करें. अगर हार्टबीट 96 बीट्स प्रति मिनट से ज्यादा है तो आप फिट नहीं हैं. वहीं, रिकवरी पल्स 80 बीपीएम से कम हैं तो यह कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ अच्छी है.

अपनी कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस को मापने के लिए थ्री मिनट स्टेप टेस्ट बेस्ट है. इसके लिए 12 इंच ऊंचे स्टेप या सीढ़ी को इस्तेमाल कर सकते हैं और इस पर 3 मिनट तक ऊपर चढ़कर नीचे उतरें. आपको एक मिनट में 24 बार यह प्रक्रिया दोहरानी है. एक्सरसाइज के तुरंत बाद अपनी पल्स चेक करें. अगर हार्टबीट 96 बीट्स प्रति मिनट से ज्यादा है तो आप फिट नहीं हैं. वहीं, रिकवरी पल्स 80 बीपीएम से कम हैं तो यह कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ अच्छी है.

अपनी ताकत और फिटनेस का पता लगाने का सबसे आसान तरीका फोरआर्म प्लैंक है. अगर आप 30 सेकंड से भी कम वक्त तक टिक पाते हैं तो यह कमजोर फिटनेस की निशानी है. अगर होल्डिंग टाइम 90 से 120 सेकंड है तो यह अच्छी फिटनेस की पहचान है.

अपनी ताकत और फिटनेस का पता लगाने का सबसे आसान तरीका फोरआर्म प्लैंक है. अगर आप 30 सेकंड से भी कम वक्त तक टिक पाते हैं तो यह कमजोर फिटनेस की निशानी है. अगर होल्डिंग टाइम 90 से 120 सेकंड है तो यह अच्छी फिटनेस की पहचान है.

द वॉल सिट टेस्ट को आइसोमेट्रिक स्क्वाट टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है. इससे शरीर के निचले हिस्से की ताकत और सहनशक्ति का पता चलता है.   इसके लिए अपनी पीठ को दीवार से सटाकर और हाथ को क्रॉस करके रखें. आप इस पोजिशन में जितनी देर बैठ सकते हैं, उतनी देर तक बैठें. अगर 30 सेकंड से कम वक्त तक बैठ पाते हैं तो लोअर बॉडी की फिटनेस बेहद कम है. 75 सेकंड से ज्यादा देर तक बैठने की क्षमता से अच्छी फिटनेस का पता चलता है.

द वॉल सिट टेस्ट को आइसोमेट्रिक स्क्वाट टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है. इससे शरीर के निचले हिस्से की ताकत और सहनशक्ति का पता चलता है. इसके लिए अपनी पीठ को दीवार से सटाकर और हाथ को क्रॉस करके रखें. आप इस पोजिशन में जितनी देर बैठ सकते हैं, उतनी देर तक बैठें. अगर 30 सेकंड से कम वक्त तक बैठ पाते हैं तो लोअर बॉडी की फिटनेस बेहद कम है. 75 सेकंड से ज्यादा देर तक बैठने की क्षमता से अच्छी फिटनेस का पता चलता है.

अगर आपकी उम्र 40 से 59 साल के बीच है तो आप मोडिफाइड पुश-अप टू फटीग टेस्ट की मदद से अपने शरीर के ऊपरी हिस्से की ताकत चेक कर सकते हैं. इसके लिए घुटनों के बल बैठ जाएं और हाथों को कंधे की चौड़ाई से थोड़ी ज्यादा दूरी पर रखें. अपने शरीर को तब तक नीचे करें, जब तक आपका सीना लगभग जमीन को न छू ले. इसके बाद सिर से घुटनों तक एक सीधी रेखा बनाते हुए वापस ऊपर की ओर धक्का दें. यह प्रक्रिया तब तक दोहराएं, जब तक आप इसे आराम से कर सकें. अगर आप 10-12 से कम बार यह प्रोसेस कर पाते हैं तो ताकत कम है. वहीं, 25 बार से ज्यादा को एवरेज से ज्यादा माना जाता है.

अगर आपकी उम्र 40 से 59 साल के बीच है तो आप मोडिफाइड पुश-अप टू फटीग टेस्ट की मदद से अपने शरीर के ऊपरी हिस्से की ताकत चेक कर सकते हैं. इसके लिए घुटनों के बल बैठ जाएं और हाथों को कंधे की चौड़ाई से थोड़ी ज्यादा दूरी पर रखें. अपने शरीर को तब तक नीचे करें, जब तक आपका सीना लगभग जमीन को न छू ले. इसके बाद सिर से घुटनों तक एक सीधी रेखा बनाते हुए वापस ऊपर की ओर धक्का दें. यह प्रक्रिया तब तक दोहराएं, जब तक आप इसे आराम से कर सकें. अगर आप 10-12 से कम बार यह प्रोसेस कर पाते हैं तो ताकत कम है. वहीं, 25 बार से ज्यादा को एवरेज से ज्यादा माना जाता है.

Published at : 19 Jul 2025 07:40 AM (IST)

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