घुटनों के दर्द का ये है अचूक इलाज, बाबा रामदेव ने बताया रोजाना क्या करने से मिलेगा आराम

घुटनों के दर्द का ये है अचूक इलाज, बाबा रामदेव ने बताया रोजाना क्या करने से मिलेगा आराम


आजकल घुटनों में दर्द अब एक सामान्य समस्या बनती जा रही है, जिससे न केवल बुजुर्ग बल्कि युवा भी प्रभावित हो रहे हैं. इससे छुटकारा पाने के लिए कई लोग विभिन्न तरीके अपनाते हैं. योग गुरु बाबा रामदेव ने घुटनों के दर्द से निजात पाने के लिए कुछ प्रभावी उपाय बताए हैं, जिन्हें नियमित रूप से करने पर काफी राहत मिल सकती है.

रोजाना योगासन करने से होता है फायदा

बाबा रामदेव के अनुसार, घुटनों के दर्द में कुछ खास योगासन बहुत फायदेमंद होते हैं. ये आसन घुटनों की मांसपेशियों को मजबूत करते हैं और लचीलापन बढ़ाते हैं.  इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं ये,

  • मंडूकासन: यह आसन घुटनों और जांघों की मांसपेशियों को मजबूत करता है.
  • वज्रासन: यह पाचन के साथ-साथ घुटनों के लिए भी अच्छा माना जाता है.
  • पवनमुक्तासन: यह पेट के साथ-साथ घुटनों के आसपास की मांसपेशियों को भी आराम देता है.
  • सेतुबंधासन: यह पीठ और जांघों को मजबूत करता है, जिससे घुटनों पर दबाव कम होता है.
  • ताड़ासन: यह पूरे शरीर में खिंचाव लाकर जोड़ों को सक्रिय करता है. इन आसनों को किसी योग्य योग गुरु की देखरेख में ही करना चाहिए, खासकर अगर दर्द ज्यादा हो.

प्राणायाम का महत्व

बाबा रामदेव के अनुसार, योगासनों के साथ-साथ प्राणायाम भी शरीर में रक्त संचार को सुधारने और दर्द कम करने में मदद करता है. अनुलोम-विलोम और कपालभाति जैसे प्राणायाम शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं और सूजन कम करने में सहायक होते हैं.

घरेलू उपचार और आयुर्वेदिक नुस्खे

बाबा रामदेव कई प्राकृतिक और आयुर्वेदिक उपायों पर भी जोर देते हैं. उनके अनुसार, दर्द वाले घुटनों पर तेल से हल्के हाथों से मालिश करने से आराम मिल सकता है. इससे रक्त संचार बेहतर होता है और मांसपेशियों को आराम मिलता है. इसके अलावा, रात को मेथी दाना भिगोकर रखें और सुबह खाली पेट इसका सेवन करें. मेथी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो दर्द और सूजन को कम कर सकते हैं. रात को सोने से पहले हल्दी वाला दूध पीने से भी फायदा होता है. हल्दी में करक्यूमिन होता है, जो एक शक्तिशाली एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट है. अश्वगंधा और शतावरी जैसी जड़ी-बूटियों का सेवन भी जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है.

खान-पान और लाइफस्टाइल में बदलाव

अपनी डाइट में हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें. कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थ हड्डियों को मजबूत बनाते हैं. यही नहीं, शरीर का बढ़ा हुआ वजन घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे दर्द और बढ़ सकता है. वजन कम करना घुटनों के दर्द से राहत पाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है. इसके अलावा, शरीर को हाइड्रेटेड रखने से जोड़ों में चिकनाई बनी रहती है. दर्द वाले स्थान पर ठंडी या गरम सिकाई करने से भी आराम मिल सकता है.

बाबा रामदेव का मानना है कि इन उपायों को नियमित रूप से अपनाने से घुटनों के दर्द में काफी हद तक आराम पाया जा सकता है और स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है. हालांकि, किसी भी गंभीर दर्द या बीमारी की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना हमेशा बेहतर होता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बच्चों को भूलकर भी न खिलाएं ये 5 चीजें, घेर लेंगी इतनी सारी बीमारियां

बच्चों को भूलकर भी न खिलाएं ये 5 चीजें, घेर लेंगी इतनी सारी बीमारियां


बच्चों के फिजिकल और मेंटल डेवलपमेंट के हेल्दी डाइट बहुत जरूरी है. दरअसल, बचपन की खाने की आदतें बच्चों की लॉन्ग टर्म हेल्थ पर डायरेक्ट इफेक्ट डालती हैं, जिससे आगे चलकर हार्ट डिजीज, डायबिटीज और ओबेसिटी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. इसलिए आपको बच्चे की डाइट बहुत सोच समझकर तय करनी चाहिए. 

दिल्ली की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट नेहा बंसल पैरेंट्स को कुछ ऐसे फूड्स से बचने या उन्हें कम देने की सलाह देती हैं, जो बच्चों की फिजिकल और मेटाबॉलिक ग्रोथ पर नेगेटिव असर डाल सकते हैं. यहां हम आपको ऐसे ही 5 कॉमन फूड्स के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें एक्सपर्ट्स बच्चों को खिलाने से मना करते हैं  और इसके पीछे साइंस बेस्ड रीजन्स भी बताते हैं.

  • मीठा दही या फ्लेवर्ड योगर्ट: सादा दही तो बहुत अच्छा होता है, लेकिन बच्चों के लिए बने फ्लेवर्ड योगर्ट्स में अक्सर बहुत ज्यादा शुगर, आर्टिफिशियल कलर आदि कैमिकल पदार्थ होते हैं. ये इसे हेल्दी फूड कम और मिठाई ज्यादा बना देते हैं. बच्चों को एक दिन में 25 ग्राम से ज्यादा एक्स्ट्रा शुगर नहीं लेनी चाहिए. कई फ्रूट योगर्ट्स में एक सर्विंग में ही 20 ग्राम तक शुगर हो सकती है. इसकी जगह सादा दही चुनें और घर पर ताजे फल मिलाकर दें.
  • प्रोसेस्ड मीट: हॉट डॉग, बेकन और पैकेट वाले कोल्ड कट्स बच्चों के खाने में आम हो गए हैं, लेकिन, इनमें आमतौर पर सोडियम, नाइट्रेट्स जैसे प्रिज़र्वेटिव्स और अनहेल्दी सैचुरेटेड फैट्स बहुत ज्यादा होते हैं. इन्हें लगातार खाने से बच्चे के टीनएज में हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है. ऐेसे में प्रोटीन के लिए ग्रिल्ड चिकन, अंडे, दालें या फिश को चुना जा सकती है.
  • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स जैसे माइक्रोवेव पॉपकॉर्न भले ही टेस्टी लगे, पर कई ब्रांड्स सोडियम, आर्टिफिशियल फ्लेवर्स और अनहेल्दी फैट्स से भरे होते हैं. ये अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की कैटेगरी में आते हैं, जिनका लिंक खराब हार्ट हेल्थ से है. रिसर्च बताती है कि इन फूड्स से भरपूर डाइट बच्चों और किशोरों में सूजन, बढ़ता वजन और कोलेस्ट्रॉल लेवल्स में बढ़ोतरी से जुड़ी है. एयर पॉप्ड पॉपकॉर्न या कम से कम प्रोसेस्ड स्नैक्स ज्यादा हेल्दी ऑप्शन हैं.
  • सीरियल्स और सॉफ्ट ड्रिंक्स: बच्चों के लिए मार्केट में उपलब्ध कई ब्रेकफास्ट सीरियल्स बहुत ज्यादा रिफाइंड और शुगर से भरपूर होते हैं. इसी तरह, सोडा और फ्रूट-फ्लेवर्ड ड्रिंक्स जैसे चीनी वाले पेय ब्लड शुगर को अस्थिर करते हैं, एनर्जी कम करते हैं और लंबे समय तक वन बढ़ने में योगदान देते हैं. सीडीसी का कहना है कि ये ड्रिंक्स बच्चों की डाइट में एक्स्ट्रा शुगर का बड़ा सोर्स हैं और बचपन में ही इंसुलिन रेजिस्टेंस का कारण बन सकते हैं. इसकी जगह ओटमील जैसे साबुत अनाज दें और मीठे ड्रिंक्स की बजाय पानी या बिना चीनी का दूध पिलाएं.
  • फ्राइड फूड्स: चिप्स और नगेट्स जैसे तले हुए स्नैक्स और फास्ट फूड्स में अक्सर ट्रांस फैट और कैलोरी ज़्यादा होती है, लेकिन जरूरी पोषक तत्व कम होते हैं.  भले ही आपके बच्चे इन्हें पसंद करें,  ये अनहेल्दी फूड हैबिट्स को बढ़ावा देते हैं और अक्सर भूख की बजाय बस मजे या इमोशनल कंफर्ट के लिए खाए जाते हैं. रिसर्च बताती है कि तले हुए फूड्स के लगातार सेवन और युवाओं में खराब कोलेस्ट्रॉल और सूजन बढ़ने के बीच संबंध है. तले हुए फूड्स से बचें और बेक्ड किए हुए विकल्प चुनें.

क्यों जरूरी है बचपन से ही हेल्दी फूड चॉइस?

बचपन में हेल्दी खाने की आदतें डालना जिंदगी भर की अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है, जो बच्चे कम प्रोसेस्ड फूड और ज़्यादा पौष्टिक खाना खाते हैं. उनका दिल ज्यादा हेल्दी रहता है, एनर्जी लेवल्स बेहतर होते हैं और इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. पैरेंट्स बच्चों की खाने की पसंद और पोषण के प्रति उनके रवैये को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. ऐसे में आप प्रोसेस्ड, शुगर से भरे और फ्राइड फूड्स से बचकर बेहतर फूड हैबिट्स को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे भविष्य में पुरानी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है. आज बच्चों को पौष्टिक खाने के विकल्प देकर एक हेल्दी कल की नींव रखी जा सकती है.

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समोसा, जलेबी से कितने ज्यादा खतरनाक हैं डिब्बा बंद प्रोसेस्ड फूड? हैरान रह जाएंगे आप

समोसा, जलेबी से कितने ज्यादा खतरनाक हैं डिब्बा बंद प्रोसेस्ड फूड? हैरान रह जाएंगे आप


हम इंडियंस को समोसे और जलेबी बहुत पसंद हैं. अक्सर हम इन्हें सेहत के लिए बुरा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पैकेज्ड या डिब्बा बंद प्रोसेस्ड फूड हमारी सेहत के लिए कितने ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं? आप शायद हैरान हो जाएंगे जब जानेंगे कि ये प्रोसेस्ड फूड तो कई बार हमारे प्यारे देसी समोसे-जलेबी से भी कहीं ज्यादा नुकसानदायक निकलते हैं.

आजकल  मार्केट में आपको हर तरह का पैकेज्ड फूड मिल जाएगा. चिप्स से लेकर कुकीज तक और इंस्टेंट नूडल्स से लेकर फ्रोजन मील्स तक. हम अक्सर इन्हें इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि ये झटपट तैयार हो जाते हैं या फिर एक आसान ऑप्शन लगते हैं. लेकिन, जब बात हमारी सेहत की आती है, तो इन चमचमाते पैकेट्स के अंदर छिपी सच्चाई आपको वाकई चौंका देगी. इन फूड्स को जिस तरह बनाया जाता है, वो इन्हें हमारे समोसे और जलेबी से भी कहीं ज्यादा नुकसानदायक बना सकते हैं. आइए समझते हैं कैसे….

शुगर, नमक और अनहेल्दी फैट

समोसे या जलेबी में हमें पता होता है कि कितनी चीनी या तेल है. हम उसे ताजा बनते देखते हैं, लेकिन प्रोसेस्ड फूड में ऐसा नहीं होता. ये फूड्स अक्सर शुगर, नमक और ट्रांस फैट या हाइड्रोजनीकृत तेलों से भरे होते हैं. ये चीजें प्रोडक्ट का स्वाद बढ़ाती हैं और उसे लंबे समय तक खराब होने से बचाती हैं, लेकिन हमारी सेहत के लिए बेहद हानिकारक हैं. इनसे डायबिटीज, मोटापे और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा होता है। 

न्यूट्रीशियंस की कमी और अधिक कैलोरीज

समोसा और जलेबी, भले ही फ्राइड हों, फिर भी उनमें मैदा, आलू या चीनी जैसे कुछ बेसिक इंग्रीडिएंट्स होते हैं. प्रोसेस्ड फूड में अक्सर पोषक तत्व जैसे विटामिन, मिनरल, फाइबर आदि न के बराबर होते हैं. इनसे पेट तो भर जाता है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता. इससे शरीर में धीरे-धीरे पोषक तत्वों की कमी होने लगती है.

आर्टिफिशियल रंग, स्वाद और प्रिजर्वेटिव्स: पैकेज्ड फूड को स्वादिष्ट बनाने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए ढेर सारे आर्टिफिशियल कलर्स और फ्लेवर्स के साथ प्रिजर्वेटिव्स का उपयोग होता है. इन केमिकल्स का लंबे समय तक सेवन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है. इनसे एलर्जी, व्यवहार संबंधी समस्याएं और कुछ बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. 

फाइबर की कमी

अधिकतर प्रोसेस्ड फूड में फाइबर की मात्रा बहुत कम होती है या बिल्कुल नहीं होती. इसकी कमी से कब्ज, पाचन संबंधी समस्याएं और आंतों की सेहत खराब हो सकती है. समोसे में आलू और मैदा होता है, जिसमें थोड़ा बहुत फाइबर फिर भी मिल जाता है. जबकि प्रोसेस्ड स्नैक्स में अक्सर फाइबर न के बराबर होता है.

एडिक्टिव नेचर

प्रोसेस्ड फूड को इस तरह से बनाया जाता है कि वे एडिक्टिव हों. शुगर, नमक और फैट का सही कॉम्बिनेशन आपके दिमाग में डोपामाइन रिलीज करता है, जिससे आप उन्हें और ज्यादा खाना चाहते हैं. इससे आप ओवरईटिंग करते हैं और अनहेल्दी चीजों की लत लग जाती है.

क्या समोसा-जलेबी हेल्दी हैं?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. ये भी तले हुए और मीठे होते हैं. इसलिए इनका सेवन भी संयम से ही करना चाहिए. लेकिन, जब बात रोजाना के खान-पान की आती है, तो पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड कहीं ज्यादा बड़ा खतरा पैदा करते हैं। ऐसे में अगली बार जब आप किसी पैकेज्ड स्नैक की ओर हाथ बढ़ाएं, तो एक बार जरूर सोचें. 

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यूरिक एसिड बढ़ने से क्या-क्या परेशानी होती है? जानकर हैरान रह जाएंगे आप

यूरिक एसिड बढ़ने से क्या-क्या परेशानी होती है? जानकर हैरान रह जाएंगे आप


आजकल  की भागदौड़ भरी जिंदगी और हमारी बिगड़ी हुई फूड हैबिट्स की वजह से शरीर में ढेरों बीमारियां पनप रही हैं. इन्हीं में से एक है यूरिक एसिड की समस्या, जो सीधे तौर पर हमारे गलत खान-पान से जुड़ी है. जब शरीर में यूरिक एसिड बढ़ जाता है, तो यह कई गंभीर दिक्कतें पैदा कर सकता है. वैसे तो, यूरिक एसिड हमारे शरीर में बनने वाला एक वेस्ट प्रोडक्ट है. ये हम जो कुछ भी खाते हैं, खासकर प्यूरीन वाली चीजों के ऑर्ब्जाबशन से बनता है. आम तौर पर, हमारी किडनी इसे छानकर पेशाब के जरिए बाहर निकाल देती है. 

कभी-कभी या तो हमारा शरीर जरूरत से अधिक यूरिक एसिड बनाने लगता है, या फिर किडनी इसे ठीक से बाहर नहीं निकाल पाती. ऐसे में, ये यूरिक एसिड हमारे खून में जमा होने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में हाइपरयूरिसीमिया कहते हैं. जब ये अतिरिक्त यूरिक एसिड खून में बढ़ता है, तो ये छोटे-छोटे, नुकीले क्रिस्टल बन जाते हैं. सोचिए, कांच के छोटे-छोटे टुकड़े! ये क्रिस्टल फिर हमारे जोड़ों और शरीर के दूसरे हिस्सों में जमा होने लगते हैं और यहीं से शुरू होती है ढेर सारी दर्दनाक और गंभीर परेशानियां.

यूरिक एसिड बढ़ने से होती हैं ये दिक्कतें

  • गाउट या जोड़ों का असहनीय दर्द: यूरिक एसिड बढ़ने का ये सबसे आम और सबसे अधिक दर्दनाक नतीजा है. जब ये यूरिक एसिड क्रिस्टल हमारे जोड़ों में घुस जाते हैं, तो अचानक से इतना तेज दर्द उठता है कि आप हिल भी नहीं पाते. अक्सर ये दर्द पैर के अंगूठे, टखनों, घुटनों और उंगलियों में होता है. जिस जोड़ में ये होता है, वो सूज जाता है, लाल पड़ जाता है और छूने पर बहुत गरम लगता है.
  • किडनी स्टोन: बढ़ा हुआ यूरिक एसिड सिर्फ जोड़ों तक ही सीमित नहीं रहता, ये हमारी किडनी में भी क्रिस्टल बना सकता है. ये क्रिस्टल धीरे-धीरे बड़े होकर पथरी बन जाते हैं. अगर ये पथरी बड़ी हो जाए, तो ये पेशाब के रास्ते को ब्लॉक कर सकती है. इससे आपको पीठ के निचले हिस्से या पेट में जानलेवा दर्द, पेशाब में खून, बार-बार पेशाब आना, उल्टी और मतली जैसी समस्याएं हो सकती हैं. 
  • किडनी डैमेज: हमारी किडनी का काम है खून से गंदगी को फिल्टर करना, जिसमें यूरिक एसिड भी शामिल है. जब यूरिक एसिड लगातार बढ़ा रहता है, तो हमारी किडनी पर बहुत अधिक बोझ पड़ता है. ये क्रिस्टल धीरे-धीरे किडनी के अंदरूनी हिस्सों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं, जिससे आगे चलकर क्रोनिक किडनी डिजीज और किडनी फेलियर का भी खतरा बढ़ जाता है.
  • हाई ब्लड प्रेशर: शायद आपको जानकर हैरानी हो, पर रिसर्च बताती है कि बढ़ा हुआ यूरिक एसिड हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ा हो सकता है. यूरिक एसिड हमारी ब्लड वेसल्स को सिकोड़ सकता है और उन्हें सख्त बना सकता है. इससे खून का फ्लो ठीक से नहीं हो पाता और आपका ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है.
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम: मेटाबॉलिक सिंड्रोम कई स्वास्थ्य समस्याओं का एक बंडल है, जिसमें पेट के चारों ओर मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर, हाई ट्राइग्लिसराइड्स शामिल है. कई रिसर्च बताती हैं कि  यूरिक एसिड इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है, जो मेटाबॉलिक सिंड्रोम का एक बड़ा कारण है.
  • हार्ट डिजीज का रिस्क: जब यूरिक एसिड का स्तर ज्यादा होता है, तो ये हमारी ब्लड वेसल्स में सूजन और स्ट्रेस पैदा कर सकता है. इससे वेसल्स की अंदरूनी परत डैमेज होती है और वे सख्त व कम लचीली हो जाती हैं. समय के साथ, ये हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियों और यहां तक कि अचानक हार्ट अटैक के जोखिम को भी बढ़ा सकता है.

अक्सर, यूरिक एसिड बढ़ने के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. इसलिए अपनी सेहत पर नजर रखना और समय-समय पर जांच करवाते रहना बहुत जरूरी है. अगर आपको ऊपर बताए गए कोई भी लक्षण महसूस होते हैं, तो बिना देर किए डॉक्टर से जरूर मिलें.

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