क्या आपको बार-बार होता है सिरदर्द? ये हो सकते हैं ब्रेन कैंसर के शुरुआती संकेत
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आंवला को वैज्ञानिक रूप से फिलांथस एम्ब्लिका या एम्ब्लिका ऑफिसिनैलिस के नाम से जाना जाता है. इसे इंडियन गूजबेरी भी कहते हैं, जो एक सुपर फूड है. यह अपने पीले-हरे, गोल्फ बॉल के आकार के खाने योग्य फलों के लिए प्रसिद्ध है, जिनका स्वाद कसैला और खट्टा का अनूठा मिश्रण होता है. इसे अनगिनत मेडिसिनल प्रॉपर्टीज के चलते सदियों से इस्तेमाल किया जा रहा है. यह फल विटामिन सी का एक उत्कृष्ट स्रोत है और इसमें शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को हेल्दी और फिट बनाने में मदद करते हैं.
जानें आंवला के उपयोग
आंवला को कई तरह से उपयोग किया जाता है, जो आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत करने, त्वचा की सेहत को सुधारने और सूजन को कम करने में काफी मदद करता है. साथ ही, सर्दी-जुकाम और फ्लू से बचाव करने में भी आंवला सहायक है. इसे सीधे खाया जा सकता है, हालांकि इसका स्वाद काफी खट्टा होता है.
आजकल आंवला का जूस भी बहुत पॉपुलर है और इसे रोज सुबह पिया जा सकता है. यही नहीं, सूखे आंवला का पाउडर बनाकर स्टोर किया जा सकता है और इसे पानी या शहद के साथ लिया जा सकता है. स्वाद के लिए इसे मुरब्बा या कैंडी के रूप में भी खाया जाता है. यह च्यवनप्राश का एक मुख्य इंग्रेडिएंट है. इसके अलावा शैंपू, तेल, फेस पैक और क्रीम जैसे कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स में इसका इस्तेमाल होता है.
ये होते हैं आंवला खाने के फायदे
आंवला एक बहुत ही पौष्टिक फल है, लेकिन इसका सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए. अगर इसे सही तरीके से और उचित मात्रा में खाया जाए तो यह शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है. आंवला के सेवन से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं. विटामिन-सी से भरपूर होने के कारण यह इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है और इन्फेक्शन्स से लड़ने में मदद करता है. यह डाइजेशन को बेहतर बनाता है, कब्ज से राहत देता है और पेट संबंधी समस्याओं को दूर करता है.
आंवला आंखों की रोशनी बढ़ाता है और आंखों से जुड़ी कई बीमारियों से बचाता है. इसके अलावा आंवला बालों को मजबूत, घना और चमकदार बनाता है. साथ ही, त्वचा को हेल्दी और ग्लोइंग बनाने में मदद करता है. यह एजिंग साइंस को कम करने में भी सहायक है. कुछ स्टडीज के अनुसार, यह ब्लड शुगर लेवल्स को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है, जो डायबिटीज पेशेंट्स के लिए फायदेमंद है. यह बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने और गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद कर सकता है.
आंवला की हीलिंग प्रॉपर्टीज
आंवला में कई हीलिंग प्रॉपर्टीज होती हैं, जो हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होती हैं. इसमें एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण होते हैं जो सूजन और दर्द को कम करने में मदद करते हैं. यह बैक्टीरिया और फंगस से लड़ने में प्रभावी है, जिससे इन्फेक्शन्स का खतरा कम होता है. इसमें मौजूद पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से सेल्स को बचाते हैं, जिससे कई बीमारियों का खतरा कम होता है. यह लिवर को डैमेज से बचाने में मदद करता है और उसके फंक्शन को बेहतर बनाता है.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Plastic Tiifin for Kids: जब बच्चों को स्कूल भेजने की बात आती है तो मां-बाप हर चीज में सुविधा और रंग-बिरंगे विकल्पों को ध्यान में रखते हैं. ऐसा ही एक फैसला है, बच्चों के लिए टिफिन बॉक्स का चुनाव. अधिकतर माता-पिता प्लास्टिक के टिफिन इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि ये हल्के, सस्ते और आकर्षक डिज़ाइन वाले होते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो टिफिन आप हर दिन अपने बच्चे को दे रहे हैं, वो कहीं उसकी सेहत के लिए नुकसानदायक तो नहीं?
डॉ. केशव शर्मा की माने तो प्लास्टिक से बने टिफिन बॉक्स, खासतौर पर जब उसमें गर्म खाना रखा जाता है, तो उसमें से निकलने वाले केमिकल्स बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।. यह सिर्फ एक मामूली चिंता नहीं, बल्कि बच्चों के हार्मोनल बैलेंस, पाचन तंत्र और यहां तक कि भविष्य की बीमारियों से जुड़ा हुआ विषय है.
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बीपीए केमिकल मौजूद होता है
कुछ प्लास्टिक टिफिन ऐसे होते हैं, जसिमें BPA (Bisphenol) जैसे केमिकल्स मौजूद होते हैं. जो गर्मी के संपर्क में आकर खाने को खराब कर देते हैं. ये हार्मोनल असंतुलन, बच्चों के विकास में बाधा और व्यवहार में परिवर्तन का कारण बन सकते हैं.
कैंसर का खतरा
कुछ अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि लंबे समय तक बीपीए और दूसरे केमिकल्स के संपर्क में रहने से कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, विशेषकर अगर बच्चा रोजाना प्लास्टिक टिफिन में खाना खा रहा है.
पाचन तंत्र पर असर
गर्म खाना जब प्लास्टिक टिफिन में रखा जाता है, तो उसमें से निकलने वाले जहरीले रसायन धीरे-धीरे बच्चे के पाचन तंत्र को कमजोर कर सकते हैं, जिससे गैस, अपच और पेट दर्द हो सकता है.
इम्युनिटी पर असर
प्लास्टिक से निकलने वाले टॉक्सिन्स बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वे बार-बार बीमार पड़ सकते हैं.
सुरक्षित विकल्प क्या हैं
अपने बच्चे की सेहत के लिए थोड़ा सचेत रहना और सही टिफिन बॉक्स का चुनाव करना बेहद जरूरी है. रंग-बिरंगे टिफिन की चमक के पीछे छुपे खतरों को नजरअंदाज न करें. एक छोटी सी सावधानी, आपके बच्चे को कई बड़ी बीमारियों से बचा सकती है.
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Survival After Being Shot: सिनेमा हो या खबरें, जब भी गोली चलने का जिक्र होता है, तो हमारे दिमाग में तेज आवाज, खून और अचानक हुई मौत की तस्वीरें उभर आती हैं. फिल्मों में तो अक्सर गोली लगते ही इंसान जमीन पर गिरकर तुरंत दम तोड़ देता है, लेकिन हकीकत इससे थोड़ी अलग होती है. असल जीवन में गोली लगना एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है और मौत का समय इस बात पर निर्भर करता है कि गोली शरीर के किस हिस्से में लगी, कितनी गहराई तक गई, कितनी ब्लीडिंग हुई और पीड़ित को कितनी जल्दी मेडिकल सहायता मिली.
डॉ. राजेश मिश्रा बताते हैं कि, हर गोली जानलेवा नहीं होती, लेकिन सही समय पर इलाज न मिलने पर मामूली घाव भी जान ले सकता है. कुछ मामलों में मौत कुछ ही मिनटों में हो जाती है, जबकि कुछ लोग घंटों तक जीवित रह सकते हैं.
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गोली लगने के बाद मौत का समय किन बातों पर निर्भर करता है?
शरीर के कौनसे अंग में गोली लगी है
ब्लीडिंग की मात्रा का निर्भर करता है
यदि गोली से कोई बड़ी नस पर लगी है तो शरीर से बहुत तेजी से खून बहता है और मौत 5 मिनट में हो सकती है. लेकिन ब्लीडिंग कंट्रोल में हो, तो व्यक्ति कई घंटों तक भी जीवित रह सकता है.
मेडिकल सहायता कितनी जल्दी मिली
गोली लगने के तुरंत बाद खून रोकने की प्रक्रिया और हॉस्पिटल में ट्रॉमा केयर मिलने से कई जानें बचाई जा सकती हैं.
गोली की ताकत और दूरी
नजदीक से चली गोली का प्रभाव ज्यादा घातक होता है. जबकि दूर से लगी गोली शरीर को छेद सकती है, पर उतनी गहराई तक असर नहीं कर सकती.
गोली लगने के बाद इंसान की मौत का समय निश्चित नहीं होता, यह पूरी तरह से परिस्थितियों पर निर्भर करता है. फिल्मों में दिखाई जाने वाली तात्कालिक मृत्यु अक्सर सही नहीं होती. वास्तविकता में सही समय पर इलाज और सतर्कता से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं.
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हेल्थ मिनिस्ट्री की नई पहल के तहत अब देश के प्रमुख अस्पतालों में भी लोगों को हेल्दी लाइफस्टाइल के लिए जागरूक किया जा रहा है. इसी कड़ी में अब दिल्ली के एम्स अस्पताल में भी शुगर एंड ऑयल बोर्ड लगाए जाएंगे. इसका मकसद लोगों को यह जानकारी देना है कि वे जो खाना खा रहे हैं, उसमें कितना तेल और चीनी है. इससे मरीजों, उनके परिजनों और अस्पताल स्टाफ को अपनी डाइट को लेकर बेहतर फैसले लेने में मदद मिलेगी.
यह कदम कितना जरूरी?
एम्स की प्रोफेसर और मीडिया प्रवक्ता डॉ. रीमा दादा ने इस फैसले को बेहद जरूरी और पॉजिटिव स्टेप बताया. उन्होंने कहा कि आजकल लोगों में मोटापे की समस्या बहुत तेजी से बढ़ रही है. यह सिर्फ बड़ों में नहीं, बल्कि बच्चों में भी देखने को मिल रही है. पहले डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां सिर्फ बड़ों लोगों में होती थीं, वे अब बच्चों में भी होने लगी हैं. उन्होंने इसकी सबसे बड़ी वजह अनहेल्दी लाइफस्टाइल को बताया, जिसमें लोग ज्यादा तेल और चीनी वाला खाना खाते हैं. इनमें फास्ट फूड सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. इसका सीधा असर शरीर पर पड़ता है और मोटापा, हार्ट की बीमारी, डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
एम्स अस्पताल में होगी नई पहल
डॉ. रीमा ने यह भी बताया कि एम्स के डायरेक्टर पहले ही इस तरह की पहल के पक्ष में थे. उन्होंने कहा था कि अस्पताल के कैफेटेरिया और कैंटीन में हेल्दी फूड परोसा जाए. वहां शुगर और ऑयल से संबंधित बोर्ड लगाए जाएं, जिससे लोगों में जागरूकता बढ़े. अब इस निर्देश को पूरी तरह लागू किया जा रहा है. इस पहल के तहत एम्स की कैंटीनों और खाने की जगहों पर अब बोर्ड लगाए जाएंगे, जिन पर यह साफ लिखा होगा कि परोसे जा रहे खाने में कितनी कैलोरी, कितना तेल और कितनी चीनी है. इससे हर व्यक्ति अपने खाने के बारे में जागरूक हो सकेगा और जरूरत से ज्यादा ऑयल या शुगर लेने से बच सकेगा.
स्वस्थ भारत की दिशा में एक और कदम
एम्स दिल्ली जैसे बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान में इस तरह की पहल पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकती है. स्वास्थ्य मंत्रालय की यह कोशिश न सिर्फ मरीजों, बल्कि आम लोगों को भी हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने के लिए प्रेरित करेगी. यह पहल दर्शाती है कि अब बीमार होने के बाद इलाज से ज्यादा बीमारी से पहले बचाव पर ध्यान दिया जा रहा है.
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