वॉक करने के कितनी देर बाद पीना चाहिए पानी, ज्यादातर लोग नहीं जानते ये बात

वॉक करने के कितनी देर बाद पीना चाहिए पानी, ज्यादातर लोग नहीं जानते ये बात


मॉर्निंग वॉक या कोई भी एक्सरसाइज करने के बाद अक्सर लोगों को तुरंत प्यास लगती है. ऐसे में कई लोग बिना सोचे-समझे झट से पानी पी लेते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि वॉक के तुरंत बाद पानी पीना आपके हेल्थ के लिए सही नहीं होता है? ज्यादातर लोग इस बात से अंजान होते हैं कि वर्कआउट के बाद पानी पीने का एक सही टाइम और तरीका होता है.

वॉक के तुरंत बाद पानी क्यों नहीं पीना चाहिए?

जब हम वॉक या एक्सरसाइज करते हैं तो हमारी बॉडी का टेंपरेचर बढ़ जाता है और हमें पसीना आता है. इस दौरान हमारा ब्लड सर्कुलेशन तेज होता है और बॉडी को कूल डाउन होने में थोड़ा टाइम लगता है. अगर हम तुरंत पानी पी लेते हैं तो कई दिक्कतें हो सकती हैं. आइए इनके बारे में जानते हैं.

  • सर्द-गर्म हो सकता है: बॉडी का बढ़ा हुआ टेंपरेचर अचानक कम होने से आपको सर्दी-जुकाम या गले में खराश जैसी प्रॉब्लम हो सकती है.
  • पेट में दर्द हो सकता है: तेज़ प्यास में एक साथ ज्यादा पानी पीने से पेट में दर्द या ऐंठन हो सकती है.
  • पाचन पर असर: तुरंत पानी पीने से पाचन क्रिया धीमी हो सकती है.

वॉक करने के कितनी देर बाद पिएं पानी?

एक्सपर्ट्स के अनुसार, वॉक या किसी भी एक्सरसाइज को खत्म करने के 20-30 मिनट बाद ही पानी पीना चाहिए. इस दौरान, आप कुछ देर बैठ कर या हल्का स्ट्रेचिंग करके अपनी बॉडी को कूल डाउन होने दें. जब आपकी पल्स रेट नॉर्मल हो जाए और पसीना आना बंद हो जाए, तब पानी पीना सही होता है.

फॉलो करें ये टिप्स

  • धीरे-धीरे पिएं: एक साथ ज़्यादा पानी गटकने की बजाय, धीरे-धीरे घूंट-घूंट करके पानी पिएं.
  • रूम टेंपरेचर पानी: ठंडा पानी पीने से बचें. रूम टेंपरेचर वाला पानी या हल्का गुनगुना पानी पीना ज्यादा फायदेमंद होता है.
  • हाइड्रेटेड रहें. सिर्फ वॉक के बाद ही नहीं, पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं ताकि आपकी बॉडी हमेशा हाइड्रेटेड रहे. अगर आप बहुत ज्यादा पसीना बहाते हैं, तो सादे पानी की जगह नारियल पानी या नींबू पानी भी पी सकते हैं.
  • सही टाइमिंग और तरीके से पानी पीने से आपकी बॉडी को रिकवर होने में मदद मिलती है और आपको हेल्थ बेनिफिट्स भी मिलते हैं. तो अगली बार जब आप वॉक से वापस आएं, तो थोड़ी देर रुकें और फिर आराम से पानी पिएं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर दे रहा है प्रोटीन की कमी के संकेत, जानिए लक्षण

शरीर दे रहा है प्रोटीन की कमी के संकेत, जानिए लक्षण


लगातार थकान और कमजोरी: दिन भर सुस्ती, भारीपन और बिना काम किए भी थकावट महसूस होना प्रोटीन की कमी का पहला संकेत हो सकता है. मसल्स को एनर्जी मिलना बंद हो जाती है, जिससे कमजोरी महसूस होती है.

बालों का गिरना और पतला होना: अगर आपके बाल अचानक झड़ने लगे हैं या बहुत ज्यादा पतले हो रहे हैं, तो ये शरीर में प्रोटीन की कमी का संकेत हो सकता है. बालों को मजबूत और हेल्दी बनाए रखने के लिए प्रोटीन जरूरी है.

बालों का गिरना और पतला होना: अगर आपके बाल अचानक झड़ने लगे हैं या बहुत ज्यादा पतले हो रहे हैं, तो ये शरीर में प्रोटीन की कमी का संकेत हो सकता है. बालों को मजबूत और हेल्दी बनाए रखने के लिए प्रोटीन जरूरी है.

त्वचा का रूखा और बेजान होना: स्किन पर नमी की कमी, पपड़ीदार त्वचा या समय से पहले झुर्रियां, ये सब संकेत हो सकते हैं कि, आपकी स्किन को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल रहा.

त्वचा का रूखा और बेजान होना: स्किन पर नमी की कमी, पपड़ीदार त्वचा या समय से पहले झुर्रियां, ये सब संकेत हो सकते हैं कि, आपकी स्किन को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल रहा.

मसल्स मास का कम होना: अगर बिना किसी कोशिश के आपके मसल्स घट रहे हैं, तो ये भी एक संकेत है. शरीर जब पर्याप्त प्रोटीन नहीं पाता, तो मसल्स को तोड़कर एनर्जी बनाने लगता है.

मसल्स मास का कम होना: अगर बिना किसी कोशिश के आपके मसल्स घट रहे हैं, तो ये भी एक संकेत है. शरीर जब पर्याप्त प्रोटीन नहीं पाता, तो मसल्स को तोड़कर एनर्जी बनाने लगता है.

बार-बार बीमार पड़ना: इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए प्रोटीन ज़रूरी होता है. अगर आप बार-बार इंफेक्शन, सर्दी-जुकाम या बुखार के शिकार हो रहे हैं, तो वजह प्रोटीन की कमी हो सकती है.

बार-बार बीमार पड़ना: इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए प्रोटीन ज़रूरी होता है. अगर आप बार-बार इंफेक्शन, सर्दी-जुकाम या बुखार के शिकार हो रहे हैं, तो वजह प्रोटीन की कमी हो सकती है.

मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ापन: प्रोटीन दिमाग को स्थिर रखने वाले न्यूरोट्रांसमीटर बनाने में मदद करता है. इसकी कमी से मूड बार-बार बदल सकता है, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ापन: प्रोटीन दिमाग को स्थिर रखने वाले न्यूरोट्रांसमीटर बनाने में मदद करता है. इसकी कमी से मूड बार-बार बदल सकता है, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

Published at : 15 Jul 2025 04:56 PM (IST)

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govt fix prices of 71 key medicines for public relief

govt fix prices of 71 key medicines for public relief


Medicine Fix Price: जब बीमारी दस्तक देती है, तो इलाज की चिंता के साथ दवा की कीमतें भी जेब पर बोझ बन जाती हैं. खासकर गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, डायबिटीज या जानलेवा इंफेक्शन के इलाज में दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती हैं. लेकिन अब केंद्र सरकार ने एक अहम फैसला लिया है जो मरीजों को बड़ी राहत देगा. सरकार ने 71 दवाओं की कीमत तय करने का फैसला लिया है. इसमें कैंसर, डायबिटीज और इंफेक्शन जैसी बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख दवाएं शामिल हैं.

बता दें, मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर, एलर्जी, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियों की दवाएं अब आपको सस्ती मिलने वाली हैं. राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अब केवल उसी स्थिति में GST जोड़ सकेंगे, जब वह सरकार को भुगतान किया गया हो. इन दवाओं में रिलायंस लाइफ साइंसेज की ‘ट्रास्टुज़ुमैब’ शामिल है, जिसका उपयोग मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर और गैस्ट्रिक कैंसर के इलाज में किया जाता है. इसकी कीमत अब ₹11,966 प्रति वायल निर्धारित कर दी गई है.

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बाकी दवाओं की कीमत कितनी है

इसके अलावा, जानलेवा संक्रमण के इलाज में प्रयोग होने वाले सेफ्ट्रियाक्सोन, डिसोडियम एडेटेट और सल्बैक्टम पाउडर की कीमत 626 रुपये कर दी गई है, वहीं कॉम्बीपैक की कीमत 515 रुपये कर दी गई है. NPPA ने अपनी नई अधिसूचना में 25 एंटी-डायबिटिक फॉर्मूलेशंस की कीमत भी अधिसूचित की है, जिनमें सिटाग्लिप्टिन प्रमुख घटक के रूप में शामिल है. इसके अलावा एंपाग्लिफ्लोज़िन संयोजन वाली कई अन्य मधुमेह की दवाएं भी इस सूची में शामिल हैं.

पारदर्शिता लाने की दिशा में सरकार

यह कदम मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देने के साथ-साथ पारदर्शिता लाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है. कुछ समय पहले NPPA ने एक आदेश जारी कर कहा था कि, सभी दवा निर्माता अपने उत्पादों की कीमतों की सूची डीलरों, राज्य औषधि नियंत्रकों और सरकार को भेजें और यह उल्लेख करें कि, यह कीमत सरकार के किसी अधिसूचना या आदेश के अंतर्गत निर्धारित या संशोधित की गई है.

यह फैसला ना केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि दवा उद्योग में पारदर्शिता और जवाबदेही को भी बढ़ावा देगा. अब लोगों को दवा खरीदते वक्त यह जानने का अधिकार होगा कि, क्या वे दवाएं उचित और निर्धारित दाम पर मिल रही हैं. सरकार का यह कदम स्वास्थ्य के अधिकार की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है.

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यूथ को दिखें ये 5 लक्षण तो समझ लें हो गया कोलन कैंसर, टॉप यूएस डॉक्टर्स ने किया अलर्ट

यूथ को दिखें ये 5 लक्षण तो समझ लें हो गया कोलन कैंसर, टॉप यूएस डॉक्टर्स ने किया अलर्ट


पहले कोलन कैंसर को अक्सर बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन आजकल एक अलार्मिंग ट्रेंड देखने को मिल रहा है. ये बीमारी यंगस्टर्स में भी तेज़ी से बढ़ रही है, जिसमें मिलेनियल्स और जेन ज़ी भी शामिल हैं. यूएस के एक टॉप डॉक्टर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सालहाब ने इस पर अलर्ट किया है और पांच ऐसे वॉर्निंग साइंस बताए हैं, जिन्हें इग्नोर नहीं करना चाहिए.

रिसर्च बताती है कि 1990 में पैदा हुए लोगों को 1950 में पैदा हुए लोगों की तुलना में कोलन कैंसर होने का रिस्क दोगुना है. इसका मतलब है कि आज के यंग एडल्ट्स उन हेल्थ रिस्क का सामना कर रहे हैं, जो पहले उनके ग्रैंडपेरेंट्स की जेनरेशन में देखे जाते थे. अर्ली डिटेक्शन ही सक्सेसफुल ट्रीटमेंट के लिए जरूरी है.

कोलन कैंसर के पांच वॉर्निंग साइंस

  • रेक्टल ब्लीडिंग: डॉ. सालहाब के अनुसार, स्टूल में या टॉयलेट पेपर पर ब्लड  दिखना कोलन कैंसर का सबसे अलार्मिंग साइन है. यह ब्राइट रेड या डार्क कलर का हो सकता है. भले ही यह हेमरॉइड्स (बवासीर) जैसी कम सीरियस कंडीशन के कारण हो सकता है, लेकिन अगर ब्लीडिंग लगातार या बार-बार हो, तो इमीडिएट मेडिकल अटेंशन  जरूरी है.
  • अनएक्सप्लेन्ड एब्डोमिनल पेन: पेट दर्द को कभी भी हल्का नहीं लेना चाहिए, खासकर अगर इसका कोई क्लियर कारण न हो और यह ठीक न हो या बहुत ज्यादा दर्द करे. पर्सिस्टेंट एब्डोमिनल डिस्कम्फर्ट जो डाइट या लाइफस्टाइल में चेंज के बावजूद बनी रहती है. एक रेड फ्लैग है. यह दर्द क्रैम्पिंग या ब्लोटिंग जैसा फील हो सकता है. अगर डिस्कम्फर्ट लंबा चले, तो डॉक्टर से बात करें.
  • वीकनेस या थकान: हमेशा थका हुआ फील करना अच्छा साइन नहीं है. प्रॉपर रेस्ट के बाद भी थकान या वीकनेस (कमजोरी) किसी अंडरलाइंग इश्यू का संकेत हो सकती है. यंग एडल्ट्स अक्सर इसे स्ट्रेस या नींद की कमी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक की थकावट को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह एनीमिया के कारण भी हो सकता है, जो इंटरनल ब्लीडिंग का एक पॉसिबल साइन है.
  • चेंजेस इन बाउल हैबिट्स: आपके बाउल मूवमेंट्स (मल त्याग की आदतों) में कोई भी सिग्निफिकेंट चेंज, खासकर जो कुछ हफ्तों से ज्यादा रहे, कंसर्न पैदा करना चाहिए. इसमें कॉन्स्टिपेशन, डायरिया  या यहां तक कि स्टूल की कंसिस्टेंसी (मल की बनावट) में बदलाव भी शामिल हो सकता है. अगर ये चेंज दिखें, तो डॉक्टर से बात करना जरूरी है.
  • अन्य वार्निंग साइंस: डॉ. सालहाब ने कुछ और अर्ली साइंस भी बताए हैं. इनमें अनएक्सप्लेन्ड वेट लॉस (बिना कारण वजन कम होना), लॉस ऑफ एपेटाइट (भूख न लगना), नाइट स्वेट्स (रात में पसीना आना), या बार-बार होने वाला लो-ग्रेड फीवर (हल्का बुखार) शामिल है. भले ही ये सिम्टम्स दूसरे हेल्थ इश्यूज के कारण भी हो सकते हैं, लेकिन जब ये कंबाइंड दिखें, तो कोलन कैंसर की ओर इशारा कर सकते हैं. इसलिए, इन्हें चेक करवाना इंपॉर्टेंट है.

क्यों बढ़ रहा है यंगस्टर्स में कोलन कैंसर?

हालांकि इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है, रिसर्च कुछ फैक्टर्स को जिम्मेदार मानती है.

  • लाइफस्टाइल फैक्टर्स: पुअर डाइट (खराब खानपान) (प्रोसेस्ड फूड्स, रेड मीट, शुगर), सेडेंटरी लाइफस्टाइल (कम फिजिकल एक्टिविटी), ओबेसिटी (मोटापा), अल्कोहल कंजम्पशन (शराब का सेवन) और स्मोकिंग (धूम्रपान).
    जेनेटिक प्रेडिस्पोजिशन: कुछ जेनेटिक म्यूटेशन भी रिस्क बढ़ा सकते हैं.
  • डिलेड डायग्नोसिस: यंग एज में कैंसर का कम एक्सपेक्टेड होना भी एक रीजन है, जिससे सिम्टम्स को अक्सर मिस कर दिया जाता है.
  • आज के टाइम में कोलन कैंसर अब सिर्फ एज रिलेटेड बीमारी नहीं रही. डॉक्टर्स हमें सिम्टम्स को सीरियसली लेने और अर्ली मेडिकल एडवाइस लेने की अपील करते हैं, क्योंकि टाइम पर डिटेक्ट होने पर कोलन कैंसर ट्रीटेबल होता है.

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बारिश में खांसी-जुकाम से हो रहे परेशान? अपनाएं ये देसी नुस्खे

बारिश में खांसी-जुकाम से हो रहे परेशान? अपनाएं ये देसी नुस्खे


Home Remedies for Cold and Cough: बारिश की पहली बूंदें जहां मन को सुकून देती हैं, वहीं बदलते मौसम के साथ सर्दी, खांसी और जुकाम का झंझट भी शुरू हो जाता है. भीगी सड़कें, ठंडी हवा और नमी भरा वातावरण हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर देता है, और नतीजा होता है, नाक बहना, गले में खराश और बार-बार खांसी. खासकर बच्चों और बुजुर्गों में मानसून की यह आम समस्या जल्दी पकड़ लेती है.

इस पर डॉ. उपासना वोहरा का कहना है कि अगर शुरुआत में ही सर्दी-खांसी का देसी इलाज किया जाए, तो ना सिर्फ राहत जल्दी मिलती है, बल्कि शरीर पर कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता. आयुर्वेद और घरेलू नुस्खों में वह ताकत है, जो मानसून की बीमारियों को जड़ से मिटा सकते हैं.

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अदरक और शहद का इस्सेमाल

  • अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं और शहद गले को राहत देता है.
  • एक छोटा चम्मच अदरक का रस निकालें
  • उसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएं
  • दिन में दो बार सेवन करें

गुनगुना पानी पीएं

यह उपाय न केवल खांसी को शांत करता है, बल्कि नींद भी बेहतर देता है. इसलिए पूरा दिन आप गुनगुना पानी करके पीएं, ठंडा पानी पीने से बचें.

भाप लेना न भूलें

  • बरसात में बंद नाक और जकड़न आम समस्या है. भाप लेना फेफड़ों की सफाई में मदद करता है.
  • गर्म पानी में पुदीने की कुछ पत्तियां या विक्स डालें
  • सिर को तौलिए से ढक कर 7 मिनट तक भाप लें
  • दिन में 2 बार यह करें

तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा

  • तुलसी इम्युनिटी बूस्टर है और काली मिर्च इंफेक्शन से लड़ती है.
  • एक कप पानी लें और उसमें 5 तुलसी की पत्तियां और 3 काली मिर्च और थोड़ा सा अदरक डाल सकते हैं.
  • 5 मिनट तक उबालें, फिर छानकर हल्का गर्म पीएं
  • अगर स्वाद बढ़ाने है तो थोड़ा सा शहर डाल सकते हैं.

बारिश के मौसम में सर्दी-खांसी से डरने की जरूरत नहीं है, बस थोड़ा समझदारी और पुराने देसी नुस्खों का सहारा लें. घरेलू उपाय न सिर्फ सुरक्षित हैं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों में शामिल करके हम खुद को मानसून में फिट रख सकते हैं.

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क्या था 114 साल के फौजा सिंह की लंबी उम्र का राज, जानें रनिंग से कितना मिलता है फायदा?

क्या था 114 साल के फौजा सिंह की लंबी उम्र का राज, जानें रनिंग से कितना मिलता है फायदा?


दुनिया के सबसे उम्रदराज मैराथन धावक ‘टर्बन्ड टॉरनेडो’ के नाम से मशहूर फौजा सिंह का निधन 114 वर्ष की उम्र में हो गया. जालंधर-पठानकोट हाईवे पर सोमवार (14 जुलाई) को वह एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इसके बाद उन्हें जालंधर के डीएमसी अस्पताल (दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई. आइए जानते हैं कि 114 साल के फौजा सिंह की लंबी उम्र का राज क्या था और रनिंग से कितना फायदा मिलता है? 

फौजा सिंह की लंबी उम्र का राज

फौजा सिंह का जन्म 1 अप्रैल 1911 के दिन पंजाब के जालंधर जिले के ब्यास पिंड में हुआ था. बचपन में उनके पैर बेहद कमजोर थे. ऐसे में वह पांच साल की उम्र तक चल नहीं पाते थे. इसके बावजूद वह दुनिया के सबसे उम्रदराज मैराथन धावक बने. उनकी लंबी उम्र का राज उनकी पॉजिटिव लाइफस्टाइल, बैलेंस्ड डाइट और रेगुलर एक्सरसाइज में छिपा था. 

फौजा सिंह का इलाज करने वाले जालंधर के सीनियर न्यूरोसर्जन डॉ. गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, फौजा सिंह की फिजिकल और मेंटल मजबूती ही उनकी लंबी उम्र का आधार थी. दौड़, ध्यान और बैलेंस्ड डाइट उनके डेली रूटीन का हिस्सा थे. मानसिक तनाव से बचने के लिए वह हमेशा पॉजिटिव रहते थे. वहीं,  फौजा सिंह ने एक इंटरव्यू में अपनी फिटनेस का राज साझा किया था. उन्होंने कहा था कि मैं हमेशा खुश रहता हूं. रोजाना पंजाबी पिन्नी खाता हूं. इसके बाद गुनगुना पानी पीता हूं.रात में सोने से पहले एक गिलास दूध और हर मौसम में दही लेता हूं. इसके अलावा उन्होंने जंक फूड से परहेज करने और नियमित सैर व व्यायाम की सलाह दी थी.

रनिंग से बॉडी को कितना मिलता है फायदा?

रनिंग से न केवल फिजिकल हेल्थ बेहतर होती है, बल्कि मेंटल और इमोशनल हेल्थ के लिए भी फायदेमंद होती है. बता दें कि फौजा सिंह ने 89 वर्ष की उम्र में दौड़ना शुरू किया. उस वक्त वह अपनी पत्नी जियान कौर और बेटे कुलदीप की मौत के बाद डिप्रेशन से जूझ रहे थे. रनिंग ने उन्हें न केवल फिजिकली मजबूत किया, बल्कि मेंटली भी संतुलित रखा. 
 
जालंधर में कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अमरजीत कौर बताती हैं, रनिंग कार्डियोवैस्कुलर एक्सरसाइज है, जिससे हार्ट हेल्थ बेहतर होती है. ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और कोलेस्ट्रॉल का लेवल भी कम होता है. नियमित दौड़ने से मांसपेशियां मजबूत होती हैं. हड्डियों की डेंसिटी बढ़ती है. साथ ही, तनाव कम होता है. आइए जानते हैं कि रनिंग से क्या-क्या फायदे होते हैं?

  • हार्ट हेल्थ: रनिंग से हार्ट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. एक स्टडी के मुताबिक, सप्ताह में 150 मिनट की मध्यम गति की रनिंग हार्ट डिजीज के खतरे को 30 पर्सेंट तक कम कर सकती है.
  • मेंटल हेल्थ: दौड़ने से एंडोर्फिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जो तनाव और डिप्रेशन को कम करता है. फौजा सिंह ने खुद कहा था कि रनिंग ने उन्हें डिप्रेशन से उबरने में मदद की.
  • हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती: नियमित दौड़ से हड्डियों का घनत्व बढ़ता है, जो ऑस्टियोपोरोसिस जैसी दिक्कतों को रोकता है.
  • इम्यून सिस्टम: रनिंग से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, जिससे बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है.
  • उम्र में इजाफा: एक रिसर्च के अनुसार, रेगुलर एक्सरसाइज करने वाले लोगों की उम्र नॉर्मल लोगों के मुकाबले 3 से 7 साल तक ज्यादा हो सकती है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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