खांसी के साथ खून आना कैंसर का ही नहीं है लक्षण, हो सकती है ये दिक्कत

खांसी के साथ खून आना कैंसर का ही नहीं है लक्षण, हो सकती है ये दिक्कत


Cough with Blood Symptoms: आप खांसते हैं और अचानक मुंह से खून निकलता है. एक पल को सब थम जाता है दिमाग में सबसे पहला ख्याल आता है किकहीं ये कैंसर तो नहीं?” जैसे ही किसी को खांसी के साथ खून आता है, डर और घबराहट लगने लगती है. लोग खुद ही फैसला कर लेते हैं कि, ये फेफड़ों का कैंसर है. लेकिन क्या ये हमेशा सच होता है?

इस मसले पर सर्जन डॉ. हर्षवर्धन पुरी का कहना है कि, खांसी में खून आना यानी हेमोप्टाइसिस का कारण हो सकता है और हर बार इसका मतलब कैंसर नहीं होता. यह कई तरह की सांस संबंधी बीमारियों, संक्रमणों या ब्लड वेसेल्स की समस्या का भी संकेत हो सकता है.

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क्या है हेमोप्टाइसिस?

हेमोप्टाइसिस एक चिकित्सा स्थिति है जिसमें खांसी करते समय खून या खून मिला बलगम निकलता है. यह खून हल्के लाल रंग से लेकर गहरे रंग का हो सकता है. कभी-कभी ये मात्रा बेहद कम होती है, तो कभी काफी ज्यादा.

क्या ये कैंसर का संकेत है?

डॉ. हर्षवर्धन पुरी बताते हैं कि, हर मरीज में यह जरूरी नहीं कि कैंसर ही वजह हो. यह कई अन्य कारणों से भी हो सकता है.

हेमोप्टाइसिस के अन्य कारण

टीबी: भारत में हेमोप्टाइसिस के सबसे आम कारणों में से एक

ब्रोंकाइटिस: लंबे समय तक चलने वाली सूजन भी बलगम में खून ला सकती है

निमोनिया: फेफड़ों में इंफेक्शन होने पर खून आ सकता है

ब्रोंकैक्टेसिस: फेफड़ों की पुरानी बीमारी जिसमें एयरवेज फैल जाते हैं और खून आने लगता है

फेफड़ों में चोट या ब्लड वेसल का फटना

फंगल इंफेक्शन या हार्ट से जुड़ी समस्याएं

कब बनता है यह खतरनाक?

  • अगर खून की मात्रा ज्यादा हो
  • बार-बार खांसी में खून आए
  • वजन घटने लगे
  • सांस लेने में तकलीफ हो
  • बुखार लंबे समय तक बना रहे

खांसी में खून आना निश्चित रूप से एक गंभीर संकेत हो सकता है, लेकिन इसका मतलब हर बार कैंसर नहीं होता. इसलिए घबराएं नहीं, बल्कि जागरूक बनें. शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि सही समय पर उठाया गया कदम जिंदगी की दिशा बदल सकता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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छोटे नवजात बच्चे की कौन से तेल से करनी चाहिए मालिश? ये रहा जवाब

छोटे नवजात बच्चे की कौन से तेल से करनी चाहिए मालिश? ये रहा जवाब


Baby Massage Oil: मां की गोद में जब एक नन्हा सा जीवन पहली बार करवट बदलता है, तो उसका हर स्पर्श, हर एहसास खास होता है. नवजात शिशु की देखभाल किसी कला से कम नहीं है और उसमें सबसे अहम होता है, उसकी नरम त्वचा की मालिश. भारत में पीढ़ियों से मालिश को सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि बच्चे के विकास का आधार माना गया है. लेकिन आज के समय में जब बाजार में सैकड़ों तरह के तेल मौजूद हैं, तो सवाल उठता है किकौन सा तेल नवजात के लिए सबसे सही है?”

क्या नारियल तेल बेहतर है या बादाम का तेल? क्या सरसों का तेल आज भी उतना ही फायदेमंद है? क्या हर मौसम के लिए एक ही तेल ठीक है? इसका जबाव बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. इमरान पटेल बता रहे हैं कि, शिशु की मालिश के लिए कौन सा तेल चुनना चाहिए और क्यों. आइए जानते हैं वो जरूरी बातें, जो हर नए माता-पिता को मालूम होनी चाहिए,

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नवजात शिशु की मालिश क्यों जरूरी है?

  • रक्त संचार बेहतर होता है
  • हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है
  • बच्चा शांत और बेहतर नींद लेता है
  • मां और बच्चे के बीच का बंधन गहरा होता है

कौन से तेल का इस्तेमाल करें?

नारियल तेल: हल्का, जल्दी सोखने वाला और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर, ये तेल गर्मियों के लिए सबसे उपयुक्त है. ड्राई स्किन और रैशेज में फायदेमंद भी है.

बादाम का तेल: विटामिन E से भरपूर, त्वचा को पोषण देने वाला है. ये तेल सर्दियों में त्वचा को मॉइस्चराइज करता है. हल्की खुशबू और नॉन-स्टिकी भी रहता है.

मेडिकेटेड बेबी ऑयल्स: बाजार में उपलब्ध फार्मूलेटेड बेबी ऑयल्स होते हैं. लेकिन इसमें. डॉक्टर द्वारा सुझाए गए विकल्प ही चुनें.

किस बात का ध्यान रखें?

  • मालिश हमेशा हल्के गर्म कमरे में करें
  • तेल को हल्का गर्म करके लगाएं
  • बच्चे की त्वचा पर अगर कोई रिएक्शन दिखे तो तुरंत तेल बदलें
  • हर नए तेल को पहले पैच टेस्ट जरूर करें

हर शिशु अलग होता हैऔर उसकी त्वचा की जरूरतें भी अलग होती है. इसलिए सही तेल चुनना बहुत जरूरी है. माता-पिता बिना ब्रांड या दिखावे के पीछे न भागे, तेल की शुद्धता, मौसमी उपयुक्तता और बच्चे की त्वचा की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए निर्णय लें.

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ब्रेन हैमरेज होने के कितने देर तक जिंदा रहता है इंसान, जानें सबसे पहले क्या करें

ब्रेन हैमरेज होने के कितने देर तक जिंदा रहता है इंसान, जानें सबसे पहले क्या करें


Brain Hemorrhage Survival Time: जिंदगी में कई बार एक पल सबकुछ बदल देता है. एक हंसता-खेलता इंसान अचानक बेहोश हो जाता है और जब तक लोग समझ पाते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है. ऐसे ही चुपचाप जान लेने वाली एक खतरनाक स्थिति है, ब्रेन हैमरेज. ब्रेन हैमरेज न कोई चेतावनी देता है, न कोई मौका. यह सीधा दिमाग पर हमला करता है और वक्त के साथ सबकुछ खराब कर देता है. एक मिनट की देरी, जिंदगी और मौत का फासला तय कर सकती है. यही वजह है कि, जब भी ब्रेन हैमरेज की आशंका हो तो तुरंत सही कदम उठाना जरूरी हो जाता है.

अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि, अगर किसी को ब्रेन हैमरेज हो जाए तो वह कितनी देर तक जिंदा रह सकता है?” क्या अस्पताल पहुंचने का गोल्डन टाइम होता है और सबसे जरूरी, ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? इस पर अहम जानकारी देते हुए डॉक्टर मनीश बता रहे हैं कि किस परिस्थिति में जान बचाई जा सकती है और कब खतरा बढ़ जाता है.

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कितनी देर तक जिंदा रह सकता है मरीज?

डॉ. मनीश के अनुसार, ब्रेन हैमरेज के बाद पहले एक से तीन घंटे सबसे नाजुक होते हैं. अगर इस समय इलाज शुरू न हो तो जान बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है. कुछ मामलों में मरीज 24 से 48 घंटे तक जीवित रह सकता है, लेकिन ब्रेन डैमेज की संभावना काफी बढ़ जाती है. हर मिनट के साथ मस्तिष्क के हिस्से क्षतिग्रस्त होते जाते हैं. यही कारण है कि, पहले एक घंटे को जीवन रक्षक समय कहा जाता है.

सबसे पहले क्या करें?

  • इमरजेंसी सेवा को तुरंत कॉल करें, 108 या नजदीकी अस्पताल का नंबर डायल करें
  • व्यक्ति को सीधा लिटाएं, सिर को थोड़ा ऊंचा रखें
  • मुंह में कुछ न डालें, न पानी और न ही दवा
  • सांस की जांच करें, अगर नहीं ले रहा हो तो CPR जानने वाला व्यक्ति शुरू करें
  • तेजी से अस्पताल पहुंचाएं, खासतौर पर न्यूरोलॉजी फैसिलिटी वाले हॉस्पिटल में लेकर जाएं
  • हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें, धूम्रपान व शराब से दूर रहें, और नियमित हेल्थ चेकअप करवाएं. ये छोटे कदम आपको या आपके प्रियजनों को बड़े खतरे से बचा सकते हैं.

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सुबह की सैर फ्रेश होकर करें या नहीं? जानें सही समय

सुबह की सैर फ्रेश होकर करें या नहीं? जानें सही समय


Morning Walk Best Time: सुबह-सुबह ठंडी हवा, चिड़ियों की चहचहाहट और हल्की धूप के बीच वॉक करना एक ताजगी भरा अनुभव होता है. यही कारण है कि मॉर्निंग वॉक को फिटनेस की शुरुआत और स्वस्थ जीवनशैली की पहली सीढ़ी माना जाता है. लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के मन में घूमता है कि, क्या सुबह की सैर फ्रेश होकर करनी चाहिए या नहीं? कुछ लोग उठते ही चल पड़ते हैं, तो कुछ पहले फ्रेश होकर, नहाकर या कम से कम टॉयलेट जाने के बाद वॉक पर जाते हैं.

इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. रजनीश कुमार पटेल की मानें तो सही समय और तरीका न केवल आपकी वॉक को ज्यादा असरदार बनाता है, बल्कि कई गंभीर बीमारियों से बचाव में भी मदद करता है. तो आइए जानें कि मॉर्निंग वॉक का सबसे बेहतर समय और तरीका क्या होना चाहिए.

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क्यों जरूरी है फ्रेश होकर वॉक करना?

डॉ. रजनीश कुमार पटेल के अनुसार, सुबह की वॉक से पहले शरीर को पूरी तरह फ्रेश करना बेहद जरूरी है. रातभर की नींद के बाद शरीर में टॉक्सिन्स जमा हो जाते हैं, जो वाशरूम जाने के बाद ही बाहर निकलते हैं. यदि आप बिना फ्रेश हुए वॉक पर निकलते हैं, तो शरीर के भीतर गैस, अपच या भारीपन की समस्या हो सकती है, जिससे वॉक का पूरा असर कम हो जाता है.

खाली पेट या कुछ खाकर?

सुबह की सैर खाली पेट करना अधिक फायदेमंद माना जाता है, लेकिन यह भी हर व्यक्ति के शरीर पर निर्भर करता है. अगर आपको कमजोरी या चक्कर जैसा महसूस होता है, तो एक केला या भीगा हुआ बादाम खाकर वॉक पर जाना अच्छा रहेगा. हल्के पेट और हल्की एनर्जी के साथ की गई वॉक फैट बर्न करने में ज्यादा असरदार होती है.

सुबह का सबसे सही समय क्या है वॉक के लिए?

सबसे अच्छा समय सुबह 5:30 से 7:00 बजे के बीच माना जाता है, जब प्रदूषण कम होता है और ऑक्सीजन स्तर सबसे ज्यादा होता है. इस समय की वॉक न केवल फेफड़ों को मजबूती देती है, बल्कि ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है.

वॉक से पहले क्या करें?

  • हल्का स्ट्रेचिंग जरूर करें
  • थोड़ा पानी पिएं
  • मोबाइल और भारी बैग साथ न रखें
  • वॉक के दौरान गहरी सांस लें और धीमी गति से शुरुआत करें

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लखनऊ में अब धड़कते दिल को मिलेगा सुकून, केजीएमयू में एडवांस्ड कार्डियोलॉजी विंग शुरू

लखनऊ में अब धड़कते दिल को मिलेगा सुकून, केजीएमयू में एडवांस्ड कार्डियोलॉजी विंग शुरू


उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हृदय रोगियों के इलाज के लिए बड़ी हेल्थ फैसिलिटी की शुरुआत हुई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार (14 जुलाई) को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में 105 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित नई कार्डियोलॉजी विंग का उद्घाटन किया. इस एडवांस्ड मेडिकल यूनिट से न सिर्फ मरीजों को बेहतर इलाज मिलेगा, बल्कि लारी-एसजीपीजीआई और अन्य बड़े मेडिकल ऑर्गनाइजेशन पर इलाज का दबाव भी कम होगा.

मरीजों को नहीं करना होगा इंतजार

अभी तक लखनऊ में हार्ट पेशेंट के इलाज के लिए सीमित संसाधनों के चलते मरीजों को काफी इंतजार करना पड़ता था या उन्हें दूसरे संस्थानों में रेफर किया जाता था. लारी कार्डियोलॉजी में महज 84 बेड थे, जो अधिकतर समय फुल रहते थे. अब 92 नए आईसीसीयू बेड की सुविधा जुड़ने से कुल क्षमता 176 बेड की हो गई है. इससे भर्ती प्रक्रिया आसान होगी और गंभीर मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा.

एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से लैस विंग

नई कार्डियोलॉजी विंग मॉडर्न मेडिकल टेक्नोलॉजी से पूरी तरह लैस है. यहां दो स्टेट-ऑफ-द-आर्ट कैथ लैब, हाई एंड इकोकार्डियोग्राफी सिस्टम, छह थ्री-डी ईको मशीनें, 96 बेड साइड मॉनिटर, 120 सीरिंज इन्फ्यूजन पंप, 25 टेंपरेरी पेसमेकर, ओसोटोमी मशीन और टीएमटी (ट्रेडमिल टेस्ट) मशीन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं. इससे हार्ट पेशेंट की पहचान और इलाज पहले से कहीं अधिक सटीक और कारगर हो सकेगा.

एक ही छत के नीचे सभी सुविधाएं

अब मरीजों को हार्ट संबंधी जांच, एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और अन्य जटिल प्रक्रियाओं के लिए अलग-अलग विभागों में भटकना नहीं पड़ेगा. यह विंग वन-स्टॉप सेंटर के रूप में काम करेगी, जहां मरीजों को संपूर्ण हृदय रोग संबंधी सेवाएं एक ही जगह पर मिलेंगी.

प्रदेशभर के मरीजों को होगा फायदा

केजीएमयू की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि नई विंग से लखनऊ के साथ-साथ प्रदेशभर के मरीजों को फायदा होगा. अब तक एसजीपीजीआई, लोहिया संस्थान, लारी कार्डियोलॉजी और सीटीवीएस विंग पर हार्ट पेशेंट का बेहद दबाव रहता था. सीमित बेड की वजह से कई मरीजों को रेफर किया जाता था, लेकिन इस विंग के शुरू होने से मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा और वेटिंग लिस्ट में भी भारी कमी आएगी.

सीएम योगी ने बताया फ्यूचर प्लान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को उत्तम स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस करने के लिए लगातार काम कर रही है. उन्होंने इस नई विंग को प्रदेश के अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों के लिए मॉडल यूनिट बताया और संकेत दिया कि इसी तरह की सुविधाएं अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी विकसित की जाएंगी. उन्होंने कहा कि नई कार्डियोलॉजी विंग न केवल तकनीकी दृष्टि से एडवांस्ड है, बल्कि उत्तर प्रदेश के चिकित्सा क्षेत्र को नई दिशा देगी. हमारी कोशिश है कि प्रदेश के हर नागरिक को समय पर सुलभ और विश्वस्तरीय इलाज मिले.

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वॉटर बॉटल के सिपर में फंसी कक्षा 3 की छात्रा की जीभ, जानें बिना जीभ काटे कैसे निकाला ढक्कन?

वॉटर बॉटल के सिपर में फंसी कक्षा 3 की छात्रा की जीभ, जानें बिना जीभ काटे कैसे निकाला ढक्कन?


यूपी के गोरखपुर में हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां एक स्‍कूल में कक्षा 3 में पढ़ने वाली छात्रा की जीभ वॉटर बॉटल के ढक्‍कन के सिपर में एयर प्रेशर से फंस गई. ढाई घंटे तक छात्रा ढक्‍कन में फंसी जीभ को लेकर चिल्‍लाती रही. स्‍कूल मैनेजमेंट ने पहले जीभ निकालने का प्रयास किया. जब जीभ बाहर नहीं निकली तो उसे डॉक्‍टर के पास ले जाया गया. वहां डॉक्‍टर ने ढक्‍कन को कटर से काटकर निकाला. जरा भी देर होती तो जीभ का नीला पड़ रहा हिस्‍सा बेकार हो जाता और उसे काटना पड़ सकता था. आइए जानते हैं कि डॉक्टरों ने बिना जीभ काटे ढक्कन कैसे निकाला? 

यह है पूरा मामला

गोरखनाथ के सेंट जोसेफ स्कूल की कक्षा तीन की छात्रा अदित्री की जीभ वॉटर बॉटल से पानी पीते समय उसके ढक्‍कन के सिपर में फंस गई. अदित्री ने बताया कि वह दूसरे पीरियड में बॉटल से पानी पी रही थी. एयर प्रेशर की वजह से पहले उसका होंठ बॉटल के सिपर में फंस गया. उसने जीभ से दबाव बनाकर उसे निकाला. इस प्रक्रिया में उसकी जीभ का अगला हिस्‍सा बॉटल के सिपर में फंस गया. बॉटल में पानी होने और प्रेशर की वजह से आधी जीभ अंदर की ओर फंस गई. उसने जीभ निकालने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इसके बाद वह चिल्‍लाने लगी तो टीचर्स उसे अस्‍पताल ले गए. दो अस्‍पताल ने तो ऑपरेट करने से इनकार कर दिया. तीसरे डॉक्‍टर ने ढक्‍कन को काटकर बाहर निकाला.  

जीभ में क्या हुई दिक्कत?

बीमा कंपनी में काम करने वाले विनीत सिंह ने बताया कि वह रामजानकीनगर के गंगा टोला में परिवार के साथ रहते हैं. उनकी आठ साल की बेटी अदित्री सिंह सेंट जोसेफ स्कूल गोरखनाथ में कक्षा तीन में पढ़ती है. अदित्री शनिवार को स्कूल गई थी. क्लास रूम में बोतल (सिपर) से पानी पी रही थी. वह ढक्कन में जीभ डालकर पानी पी रही थी, जिससे उसकी जीभ ढक्कन में फंस गई. एयर प्रेशर की वजह से बॉटल भी नहीं खुल रही थी. किसी तरह बॉटल को खोलकर निकाला गया. जीभ के आगे के हिस्से में स्‍वेलिंग आने लगी. वहीं, ब्लड फ्लो रुकने की वजह से जीभ काली पड़ने लगी थी. 

सिपर वाली बॉटल कितनी खतरनाक?

अदित्री के पिता विनीत सिंह ने बताया कि राजेंद्र नगर में ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. पीएन जायसवाल बच्ची को ऑपरेशन थियेटर में ले गए और उन्होंने कटर से ढक्कन को काट दिया, जिससे उसकी जीभ बच गई. उन्‍होंने अन्य अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि सिपर वाली पानी की बॉटल बच्‍चों के लिए नहीं खरीदें. ऐसा हादसा किसी के साथ भी हो सकता है.

पहली बार देखा ऐसा केस

डॉ. जायसवाल ने बताया कि यह अपने आप में अलग तरह का केस था. वॉटर बॉटल के ढक्‍कन के सिपर में बच्‍ची की जीभ फंसी हुई थी. काफी सावधानी से ढक्कन को दो तरफ से काटकर निकाला गया. उन्‍होंने अपनी प्रैक्टिस में ऐसा केस कभी नहीं देखा था. बच्‍ची को बेहोशी का इंजेक्‍शन नहीं दे सकते थे. वह दर्द से कराहने के साथ डर भी रही थी. ढक्कन काटते वक्त ध्यान रखा गया कि जीभ को कोई नुकसान नहीं पहुंचे. अगर और देर होती तो ब्लड फ्लो रुकने से जीभ के अगला हिस्सा डेड हो सकता था.

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