वॉटर बॉटल के सिपर में फंसी कक्षा 3 की छात्रा की जीभ, जानें बिना जीभ काटे कैसे निकाला ढक्कन?

वॉटर बॉटल के सिपर में फंसी कक्षा 3 की छात्रा की जीभ, जानें बिना जीभ काटे कैसे निकाला ढक्कन?


यूपी के गोरखपुर में हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां एक स्‍कूल में कक्षा 3 में पढ़ने वाली छात्रा की जीभ वॉटर बॉटल के ढक्‍कन के सिपर में एयर प्रेशर से फंस गई. ढाई घंटे तक छात्रा ढक्‍कन में फंसी जीभ को लेकर चिल्‍लाती रही. स्‍कूल मैनेजमेंट ने पहले जीभ निकालने का प्रयास किया. जब जीभ बाहर नहीं निकली तो उसे डॉक्‍टर के पास ले जाया गया. वहां डॉक्‍टर ने ढक्‍कन को कटर से काटकर निकाला. जरा भी देर होती तो जीभ का नीला पड़ रहा हिस्‍सा बेकार हो जाता और उसे काटना पड़ सकता था. आइए जानते हैं कि डॉक्टरों ने बिना जीभ काटे ढक्कन कैसे निकाला? 

यह है पूरा मामला

गोरखनाथ के सेंट जोसेफ स्कूल की कक्षा तीन की छात्रा अदित्री की जीभ वॉटर बॉटल से पानी पीते समय उसके ढक्‍कन के सिपर में फंस गई. अदित्री ने बताया कि वह दूसरे पीरियड में बॉटल से पानी पी रही थी. एयर प्रेशर की वजह से पहले उसका होंठ बॉटल के सिपर में फंस गया. उसने जीभ से दबाव बनाकर उसे निकाला. इस प्रक्रिया में उसकी जीभ का अगला हिस्‍सा बॉटल के सिपर में फंस गया. बॉटल में पानी होने और प्रेशर की वजह से आधी जीभ अंदर की ओर फंस गई. उसने जीभ निकालने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इसके बाद वह चिल्‍लाने लगी तो टीचर्स उसे अस्‍पताल ले गए. दो अस्‍पताल ने तो ऑपरेट करने से इनकार कर दिया. तीसरे डॉक्‍टर ने ढक्‍कन को काटकर बाहर निकाला.  

जीभ में क्या हुई दिक्कत?

बीमा कंपनी में काम करने वाले विनीत सिंह ने बताया कि वह रामजानकीनगर के गंगा टोला में परिवार के साथ रहते हैं. उनकी आठ साल की बेटी अदित्री सिंह सेंट जोसेफ स्कूल गोरखनाथ में कक्षा तीन में पढ़ती है. अदित्री शनिवार को स्कूल गई थी. क्लास रूम में बोतल (सिपर) से पानी पी रही थी. वह ढक्कन में जीभ डालकर पानी पी रही थी, जिससे उसकी जीभ ढक्कन में फंस गई. एयर प्रेशर की वजह से बॉटल भी नहीं खुल रही थी. किसी तरह बॉटल को खोलकर निकाला गया. जीभ के आगे के हिस्से में स्‍वेलिंग आने लगी. वहीं, ब्लड फ्लो रुकने की वजह से जीभ काली पड़ने लगी थी. 

सिपर वाली बॉटल कितनी खतरनाक?

अदित्री के पिता विनीत सिंह ने बताया कि राजेंद्र नगर में ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. पीएन जायसवाल बच्ची को ऑपरेशन थियेटर में ले गए और उन्होंने कटर से ढक्कन को काट दिया, जिससे उसकी जीभ बच गई. उन्‍होंने अन्य अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि सिपर वाली पानी की बॉटल बच्‍चों के लिए नहीं खरीदें. ऐसा हादसा किसी के साथ भी हो सकता है.

पहली बार देखा ऐसा केस

डॉ. जायसवाल ने बताया कि यह अपने आप में अलग तरह का केस था. वॉटर बॉटल के ढक्‍कन के सिपर में बच्‍ची की जीभ फंसी हुई थी. काफी सावधानी से ढक्कन को दो तरफ से काटकर निकाला गया. उन्‍होंने अपनी प्रैक्टिस में ऐसा केस कभी नहीं देखा था. बच्‍ची को बेहोशी का इंजेक्‍शन नहीं दे सकते थे. वह दर्द से कराहने के साथ डर भी रही थी. ढक्कन काटते वक्त ध्यान रखा गया कि जीभ को कोई नुकसान नहीं पहुंचे. अगर और देर होती तो ब्लड फ्लो रुकने से जीभ के अगला हिस्सा डेड हो सकता था.

ये भी पढ़ें: सेहत के लिए कितना खतरनाक है डिब्बा बंद खाना, क्यों है खतरे की घंटी?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये देसी ड्रिंक्स बनाएंगे आपको फिट और ताजगी से भरपूर, हर रोज पिएं

ये देसी ड्रिंक्स बनाएंगे आपको फिट और ताजगी से भरपूर, हर रोज पिएं


हल्दी दूध: हल्दी में मौजूद करक्यूमिन एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुणों से भरपूर होता है. रात में सोने से पहले गर्म हल्दी वाला दूध पीने से इम्युनिटी मजबूत होती है और मानसून के संक्रमण से बचाव होता है.

तुलसी-अदरक काढ़ा: तुलसी, अदरक, काली मिर्च और दालचीनी से बना काढ़ा शरीर को भीतर से गर्म रखता है और सर्दी-जुकाम से लड़ने में मदद करता है. इसे दिन में एक बार पीना बेहद फायदेमंद होता है.

तुलसी-अदरक काढ़ा: तुलसी, अदरक, काली मिर्च और दालचीनी से बना काढ़ा शरीर को भीतर से गर्म रखता है और सर्दी-जुकाम से लड़ने में मदद करता है. इसे दिन में एक बार पीना बेहद फायदेमंद होता है.

सौंफ का पानी: मानसून में अपच और गैस की समस्या आम हो जाती है. ऐसे में रातभर भीगी हुई सौंफ को उबालकर उसका पानी पीना न केवल पेट को शांत करता है, बल्कि डाइजेशन भी सुधारता है.

सौंफ का पानी: मानसून में अपच और गैस की समस्या आम हो जाती है. ऐसे में रातभर भीगी हुई सौंफ को उबालकर उसका पानी पीना न केवल पेट को शांत करता है, बल्कि डाइजेशन भी सुधारता है.

मुनक्का पानी: मुनक्का को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उसका पानी पीने से शरीर को आयरन और नेचुरल मिठास मिलती है. यह मानसून में थकावट और कमजोरी से लड़ने में मदद करता है.

मुनक्का पानी: मुनक्का को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उसका पानी पीने से शरीर को आयरन और नेचुरल मिठास मिलती है. यह मानसून में थकावट और कमजोरी से लड़ने में मदद करता है.

मसाला छाछ: हींग, भुना जीरा और पुदीने से तैयार मसाला छाछ मानसून में पेट को हल्का और पाचन को दुरुस्त रखती है. ये ड्रिंक स्वाद और सेहत दोनों में कमाल है.

मसाला छाछ: हींग, भुना जीरा और पुदीने से तैयार मसाला छाछ मानसून में पेट को हल्का और पाचन को दुरुस्त रखती है. ये ड्रिंक स्वाद और सेहत दोनों में कमाल है.

आंवला पानी: आंवला न सिर्फ इम्युनिटी बढ़ाता है, बल्कि शरीर से टॉक्सिन भी निकालता है. मानसून में आंवला शरबत पीने से स्किन पर ग्लो आता है और बालों की सेहत भी सुधरती है.

आंवला पानी: आंवला न सिर्फ इम्युनिटी बढ़ाता है, बल्कि शरीर से टॉक्सिन भी निकालता है. मानसून में आंवला शरबत पीने से स्किन पर ग्लो आता है और बालों की सेहत भी सुधरती है.

Published at : 15 Jul 2025 07:02 AM (IST)

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सेहत के लिए कितना खतरनाक है डिब्बा बंद खाना, क्यों है खतरे की घंटी?

सेहत के लिए कितना खतरनाक है डिब्बा बंद खाना, क्यों है खतरे की घंटी?


आजकल की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में डिब्बा बंद खाना हमारे लिए एक आसान और तेज ऑप्शन बन गया है. ये चीजें बेशक हमारा टाइम बचाती हैं, लेकिन हेल्थ के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं. आइए जानते हैं कि डिब्बा बंद खाना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है और क्यों.

डिब्बा बंद खाना क्यों है खतरे की घंटी?

  • हाई सोडियम और शुगर: डिब्बा बंद खाने में टेस्ट और प्रिजर्वेशन) के लिए सोडियम और शुगर की क्वांटिटी बहुत ज्यादा होती है. ज्यादा सॉल्ट हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ाता है. वहीं, ज्यादा शुगर से ओबेसिटी , टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस जैसी प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.
  • अनहेल्दी फैट्स: इन प्रोडक्ट्स में अक्सर ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट का यूज होता है, जो हेल्थ के लिए बेहद हार्मफुल हैं. ये बैड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाते हैं और गुड कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं, जिससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.
  • प्रिजर्वेटिव्स और आर्टिफिशियल एडिटिव्स: डिब्बा बंद खाने को लॉन्ग टाइम तक फ्रेश रखने और कलर व टेस्ट बेहतर करने के लिए केमिकल प्रिजर्वेटिव्स, आर्टिफिशियल कलर्स और फ्लेवर मिलाए जाते हैं. ये केमिकल्स बॉडी में इनर इम्बैलेंस क्रिएट कर सकते हैं और एलर्जी , डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स और कुछ केसेज मामलों में कैंसर जैसी सीरियस डिजीज से भी जुड़े हो सकते हैं.
  • न्यूट्रिएंट्स की कमी: प्रोसेसिंग के दौरान डिब्बा बंद खाने में मौजूद कई जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर कम हो जाते हैं या फिनिश हो जाते हैं. न्यूट्रिएंट्स की कमी से बॉडी में वीकनेस आती है, इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और लॉन्ग टाइम में मालन्यूट्रिशन का खतरा बढ़ता है. वहीं, फाइबर की कमी से डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स जैसे कॉन्स्टिपेशन और ब्लोटिंग हो सकती हैं.
  • बिस्फेनॉल ए का रिस्क: कई डिब्बाबंद फूड प्रोडक्ट्स के कंटेनर की इनर लेयर पर बीपीण् नामक केमिकल का यूज होता है. स्टडीज से पता चला है कि बीपीए बॉडी में हार्मोनल इम्बैलेंस क्रिएट कर सकता है और कुछ हेल्थ प्रॉब्लम्स जैसे ओबेसिटी, डायबिटीज और रिप्रोडक्टिव प्रॉब्लम्स से जुड़ा हो सकता है.
  • अस्थमा और एलर्जी का रिस्क: कुछ रिसर्च बताती हैं कि डिब्बाबंद प्रोसेस्ड मीट में नाइट्राइट की क्वांटिटी ज्यादा होती है, जिससे ब्रीदिंग पाइप में स्वेलिंग हो सकती है और अस्थमा की प्रॉब्लम बढ़ सकती है.
  • डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स: डिब्बा बंद खाना हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम पर ज्यादा प्रेशर डालता है, जिससे यह नॉर्मली वर्क करने में  असमर्थ हो सकता है. इससे पेट से रिलेटेड प्रॉब्लम्स जैसे इनडाइजेशन, गैस, और इर्रेगुलर बाउल मूवमेंट की प्रॉब्लम हो सकती है.
  • अर्ली एजिंग: कुछ रिसर्च बताती हैं कि अत्यधिक प्रोसेस्ड और डिब्बाबंद फूड का कंजम्पशन सेल्स और टिश्यूज को तेजी से बूढ़ा कर सकता है, जिससे बायोलॉजिकल एज या जैविक उम्र बढ़ जाती है.

ऐसे में क्या करें आप?

  • जितना हो सके फ्रेश और होममेड (घर का बना) खाना खाएं.
  • पैकेज्ड फूड के लेबल को केयरफुली पढ़ें और कम सोडियम, शुगर और अनहेल्दी फैट वाले प्रोडक्ट्स चूज करें.
  • फ्रूट्स, वेजिटेबल्स, पल्सेस और होल ग्रेन को अपनी डाइट का मेन पार्ट बनाएं.
  • अगर डिब्बा बंद खाना खाना ही पड़े, तो उसे मॉडरेशन या कम मात्रा में खाएं.
  • कुल मिलाकर, डिब्बा बंद खाना हमारी सुविधा के लिए तो अच्छा है, लेकिन हमारी हेल्थ के लिए यह साइलेंट किलर साबित हो सकता है. इसलिए, हमें अपनी डाइट के प्रति सचेत रहना चाहिए और नेचुरल व होल फूड्स  को प्रेफरेंस देनी चाहिए.

ये भी पढ़ें: महिलाओं के लिए खतरे की घंटी, हार्ट और लिवर में जहर घोल सकते हैं ये 5 फेमस सप्लीमेंट्स!

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल को आती है बच्चा पैदा करने में दिक्कत?

क्या सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल को आती है बच्चा पैदा करने में दिक्कत?


अक्सर लोगों में यह मिसकंसेप्शन होता है कि अगर कपल का ब्लड ग्रुप सेम हो तो उन्हें बच्चा पैदा करने में दिक्कत आती है. रियलिटी में ऐसा नहीं है. सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल्स को बेबी कंसीव करने में आमतौर पर कोई इश्यू नहीं होता है.

क्या सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल को बच्चा पैदा करने में दिक्कत आती है?

  • नहीं, सेम ब्लड ग्रुप होने से बेबी कंसीव करने में कोई प्रॉब्लम नहीं आती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, स्पर्म और एग पर ब्लड ग्रुप एंटीजन नहीं होते हैं. इसलिए फर्टिलाइजेशन और भ्रूण के डेवलपमेंट पर इसका कोई डायरेक्ट असर नहीं पड़ता.
  • मुख्य प्रॉब्लम ब्लड ग्रुप के आरएच फैक्टर से जुड़ी होती है, न कि ब्लड ग्रुप के मेन टाइप (ए, बी, एबी, ओ) से.

आरएच इम्कम्पेटिबिलिटी की प्रॉब्लम कब आती है?

यह प्रॉब्लम तब आती है जब मां का ब्लड ग्रुप आरएच-नेगेटिव हो और पिता का ब्लड ग्रुप आरएच-पॉजिटिव हो. इस सिचुएशन में, अगर बेबी आरएव-पॉजिटिव होता है, तो मां की बॉडी बेबी के ब्लड को “फॉरेन” मान सकती है और एंटीबॉडी बनाना स्टार्ट कर सकती है.

  • इफेक्ट: फर्स्ट प्रेग्नेंसी में यूजुअली यह बड़ी प्रॉब्लम नहीं होती, लेकिन फ्यूचर की प्रेग्नेंसी में ये एंटीबॉडीज बेबी की रेड ब्लड सेल्स को डिस्ट्रॉय  कर सकती हैं, जिससे आरएच इम्कम्पेटिबिलिटी नामक सीरियस कंडीशन पैदा हो सकती है.
  • बेबी पर असर: इससे बेबी में एनीमिया, जॉन्डिस या कुछ मामलों में ब्रेन रिलेटेड प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं.
  • ट्रीटमेंट: आजकल इस प्रॉब्लम को एंटी-डी इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन के जरिए आसानी से मैनेज किया जा सकता है, जो आरएच-नेगेटिव प्रेग्नेंट वीमेन को दिया जाता है.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट पर क्यों जोर देते हैं डॉक्टर्स?

डॉक्टर्स शादी से पहले ब्लड टेस्ट पर जोर इसलिए देते हैं ताकि पोटेंशियल हेल्थ प्रॉब्लम्स को डिटेक्ट करके उन्हें रोका या मैनेज किया जा सके. इसका मेन रीजन ब्लड ग्रुप की इम्कम्पेटिबिलिटी से कहीं ज़्यादा है.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट से कई इम्पोर्टेंट बातें पता चलती हैं,

  • आरएच फैक्टर इम्कम्पेटिबिलिटी: जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह सबसे इम्पोर्टेंट रीजन्स में से एक है. मां के आरएच-नेगेटिव और पिता के आरएच-पॉजिटिव होने पर बेबी की हेल्थ पर पड़ने वाले प्रभावों को प्रिवेंट करने के लिए इसे पहले ही जानना जरूरी) होता है.
  • थैलेसीमिया: यह एक सीरियस ब्लड डिसऑर्डर है. अगर पेरेंट्स दोनों थैलेसीमिया के कैरियर हैं, तो उनके बेबी में थैलेसीमिया मेजर होने की 25% पॉसिबिलिटी होती है, जो बेबी के लिए लाइफ-थ्रेटनिंग हो सकता है. इस टेस्ट से इसका पता लगाया जा सकता है.
  • सिकल सेल एनीमिया: यह भी एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसकी जांच भी मैरिज से पहले की जाती है.
  • सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इन्फेक्शन्स: एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, सिफलिस, गोनोरिया आदि जैसे इन्फेक्शन्स की जांच की जाती है, ताकि उनका ट्रीटमेंट किया जा सके और पार्टनर या बेबी में इन्फेक्शन फैलने से रोका जा सके.
  • जनरल हेल्थ चेकअप: हीमोग्लोबिन लेवल (एनीमिया), ब्लड शुगर, किडनी और लिवर फंक्शन आदि की जनरल जांच भी की जाती है, ताकि कोई अंडरलाइंग हेल्थ प्रॉब्लम हो तो उसका पता चल सके.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट का उद्देश्य फ्यूचर संतान की हेल्थ को प्रोटेक्ट और कपल की हैप्पी और हेल्दी मैरिड लाइफ को सुनिश्चित करना है. यह किसी भी पोटेंशियल खतरे को पहले ही आइडेंटिफाई कर उसे प्रभावी ढंग से मैनेज करने का मौका देता है.

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स्पेस से लौटने के बाद किस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं शुभांशु शुक्ला, जानें क्या होता है खतरा

स्पेस से लौटने के बाद किस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं शुभांशु शुक्ला, जानें क्या होता है खतरा


इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन यानी आईएसएस पर 18 दिन बिताने के बाद भारतीय एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला 14 जुलाई को दोपहर 3 बजे पृथ्वी के लिए रवाना हो गए. वह 15 जुलाई को पृथ्वी पर लैंड करेंगे. हालांकि, सवाल यह उठता है कि स्पेस में इतने दिन बिताने के बाद शुभांशु शुक्ला किस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं? अब पृथ्वी के वातावरण में उनके लिए क्या-क्या खतरे होंगे?

सेहत के लिए कितनी खतरनाक है स्पेस यात्रा?

अंतरिक्ष यात्रा इंसान के शरीर के लिए असाधारण अनुभव है, लेकिन इससे कई फिजिकल और मेंटल प्रॉब्लम्स होने का खतरा भी रहता है. यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) के फ्लाइट सर्जन डॉ. ब्रिगिट गोडार्ड के मुताबिक, अंतरिक्ष यात्रियों को माइक्रोग्रैविटी के कारण कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं. इनमें फ्लूड शिफ्ट, हड्डियों की डेंसिटी में कमी, मसल्स लॉस और स्पेस मोशन सिकनेस आदि चीजें शामिल हैं. शुभांशु शुक्ला को भी इन खतरों का सामना करना पड़ सकता है. 

स्पेस मोशन सिकनेस (Space Motion Sickness)

डॉ. गोडार्ड के मुताबिक, शुभांशु शुक्ला को स्पेस में शुरुआती दिनों में स्पेस मोशन सिकनेस का अनुभव हुआ था, जिसमें सिर में भारीपन और चक्कर जैसी दिक्कतें शामिल थीं. यह कंडीशन माइक्रोग्रैविटी के कारण होती है, जहां शरीर का संतुलन और दिशा-ज्ञान प्रभावित होता है. वहीं, अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद भी इस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं. आमतौर पर ये परेशानियां कुछ दिनों में ठीक हो जाती हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह कंडीशन लंबे समय तक बनी रह सकती है.

नासा के हालिया रिसर्च के मुताबिक, करीब 70 पर्सेंट अंतरिक्ष यात्रियों को इस कंडीशन से जूझना पड़ता है. हालांकि, शुभांशु  फाइटर पायलट हैं. ऐसे में उनका अनुभव इस कंडीशन से निपटने में मददगार रहा है. इसके बावजूद पृथ्वी पर आने के बाद सात दिन के पुनर्वास कार्यक्रम में उन पर नजर रखी जाएगी.

बोन और मसल्स लॉस

अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों पर खराब असर पड़ता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान ‘मायोजेनेसिस’ नामक प्रयोग किया, जिसमें माइक्रोग्रैविटी में मांसपेशियों के कमजोर होने की प्रक्रिया की स्टडी की गई. अंतरिक्ष में हड्डियों की डेंसिटी में 1-2% प्रति माह की दर से कमी आ सकती है. इससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी दिक्कतें होने का खतरा रहता है. 

रेडिएशन का खतरा

अंतरिक्ष में रेडिएशन का खतरा भी रहता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान रेडिएशन के खतरे से निपटने को लेकर एक्सपेरिमेंट किए, जो भविष्य के लंबे मिशनों के लिए अहम हैं. ह्यूस्टन, टेक्सास के नासा जॉनसन स्पेस सेंटर में कार्यरत डॉ. एलिजाबेथ जॉन्स के मुताबिक, अंतरिक्ष में कॉस्मिक रेज और सोलर रेडिएशन के कारण डीएनए लॉस और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. शुभांशु और उनके साथी एस्ट्रेनॉट्स ने ‘रेड नैनो डोसीमीटर’ का इस्तेमाल करके रेडिएशन चेक किया, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी. 

मेंटल हेल्थ और टेंशन

अंतरिक्ष में काफी वक्त तक रहने से मेंटल हेल्थ पर भी असर पड़ता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान कई एक्सपेरिमेंट किए, जिनमें ब्रेन के ब्लड फ्लो और आंखों की गति पर स्टडी की गई. ये रिसर्च मेंटल हेल्थ और न्यूरोलॉजिकल इफेक्ट को समझने में मदद करेंगे.

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तारक मेहता के जेठालाल की तरह आप भी कम कर सकते हैं कई किलो वजन, ये है आसान तरीका

तारक मेहता के जेठालाल की तरह आप भी कम कर सकते हैं कई किलो वजन, ये है आसान तरीका


Jethalal weight loss Journey: जेठालाल” यानी दिलीप जोशी को आपने हमेशा कॉमिक अंदाज और हल्के-फुल्के लुक में देखा होगा, लेकिन इस बार उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जिसने उनके फैन्स को हैरान कर दिया. जी हां, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के प्यारे जेठालाल ने मात्र 45 दिनों में 16 किलो वजन कम करके सभी को चौंका दिया है.

वजन घटाना जहां कई लोगों के लिए एक मुश्किल और थकाऊ सफर लगता है, वहीं दिलीप जोशी ने दिखा दिया कि अगर सही तरीके और शुरुआत की जाए तो कुछ भी असंभव नहीं है. खास बात ये है कि उन्होंने कोई डाइट प्लान या महंगे सप्लीमेंट्स नहीं अपनाए, बल्कि एक सिंपल और नेचुरल रूटीन के जरिए ये बदलाव हासिल किया है.

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रोजाना 45 मिनट की दौड़

दिलीप जोशी ने अपने वेट लॉस प्लान की नींव रखी कार्डियो एक्सरसाइज से. उन्होंने हर दिन कम से कम 45 मिनट तक दौड़ने का नियम अपनाया. दौड़ने से न सिर्फ कैलोरी बर्न होती है, बल्कि मेटाबॉलिज्म भी तेज होता है, जिससे शरीर की चर्बी तेजी से घटने लगती है. अगर आप शुरुआत कर रहे हैं, तो तेज वॉक या जॉगिंग से शुरुआत करें और धीरे-धीरे दौड़ने की आदत बनाएं.

खानपान में सादगी और संयम

  • उन्होंने जंक फूड, तली-भुनी चीजें और चीनी से दूरी बना ली
  • उबली सब्जियां
  • सलाद खाना
  • कम तेल वाला खाना
  • ज्यादा पानी और हेल्दी स्नैक्स जैसे ड्राई फ्रूट्स और फल
  • खास बात ये रही कि उन्होंने भूखा रहना नहीं चुना, बल्कि हेल्दी खाकर वजन घटाया
  • मेंटल फिटनेस का रखा खास ख्याल

वजन कम करने के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी होता है. दिलीप जोशी ने स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए ध्यान और पॉजिटिव सोच को अपनी दिनचर्या में शामिल किया. तनाव से दूर रहकर और लक्ष्य पर फोकस करके उन्होंने पूरे सफर को आसान बना दिया.

लगातार और अनुशासित दिनचर्या

वजन घटाने के इस सफर में सबसे अहम रहा, डिसिप्लिन. कोई भी बदलाव एक दिन में नहीं होता. उन्होंने हर दिन एक रूटीन को फॉलो किया है. दिलीप जोशी की यह फिटनेस जर्नी हम सभी के लिए प्रेरणादायक है. उन्होंने दिखा दिया कि अगर सच्ची लगन, नियमित एक्सरसाइज और संयमित खानपान हो, तो वजन घटाना नामुमकिन नहीं. अगर आप भी अपने पुराने कपड़े फिर से पहनना चाहते हैं, खुद को हल्का और ऊर्जावान महसूस करना चाहते हैं, तो आज से ही इस आसान व फिटनेस-फ्रेंडली रूटीन की शुरुआत करें.

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