एंग्जायटी, डिप्रेशन और स्लीप मेडिसिन से बिगड़ रही मेंटल हेल्थ, इस स्टडी में हुआ खुलासा

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हाल ही में हाल ही में जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन ( जामा/ JAMA) में प्रकाशित एक गंभीर अध्ययन ने हमारे सामने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है. यह शोध बताता है कि 2008 से 2017 के बीच जन्मे बच्चों में अस्थमा और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जो भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है.

बचपन में सांसों पर संकट

स्टडी के अनुसार, पिछले कुछ साल के दौरान जन्मे बच्चों में अस्थमा की व्यापकता में वृद्धि देखी गई है. यह एक ऐसी पुरानी सांस संबंधी बीमारी है, जो बच्चों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती है. हालांकि अध्ययन में सीधे 1.5 करोड़ बच्चों में अस्थमा की आशंका का सटीक आंकड़ा नहीं बताया गया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि अस्थमा एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बन गई है और इसकी व्यापकता बढ़ रही है.

अस्थमा बढ़ने के संभावित कारण

  • बढ़ता वायु प्रदूषण: गाड़ियों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन और अन्य प्रदूषक तत्व बच्चों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.
  • एलर्जी और पर्यावरणीय ट्रिगर्स: धूल के कण, पालतू जानवरों की रूसी, पराग और फफूंद जैसे एलर्जेन अस्थमा के हमलों को ट्रिगर कर सकते हैं.
  • हेरिडिटी: अगर परिवार में अस्थमा या एलर्जी की हिस्ट्री रही है तो बच्चों में इसका खतरा बढ़ जाता है.
  • बदलती लाइफस्टाइल: कम शारीरिक गतिविधि और घर के अंदर ज़्यादा समय बिताने से बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर पड़ सकता है.

मेंटल हेल्थ पर भी खतरा

जामा अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण पहलू बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ता बोझ है.

  • स्ट्रेस और डिप्रेशन: बच्चों और किशोरों में स्ट्रेस और डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. आज के बच्चों पर पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया का तनाव और बदलती सामाजिक परिस्थितियां उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही हैं. यह मानसिक तनाव न केवल उनके मन को प्रभावित करता है, बल्कि उनके शारीरिक स्वास्थ्य को भी बिगाड़ सकता है.
  • स्लीप मेडिसिन: बच्चों में नींद से जुड़ी दिक्कतें भी सामने आ रही हैं. कुछ मामलों में तो उन्हें नींद लाने वाली दवाओं का सहारा भी लेना पड़ रहा है. पर्याप्त और अच्छी नींद न मिलने से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुकता है, उनकी एकाग्रता बिगड़ती है और वे चिड़चिड़े हो सकते हैं.

यह खतरे की घंटी

जामा स्टडी हमें एक गहरी चिंता की ओर धकेलती है. हमारे बच्चे, जो देश का भविष्य हैं, अगर बचपन से ही इतनी गंभीर बीमारियों से जूझेंगे, तो हम कैसे एक स्वस्थ और मजबूत पीढ़ी की उम्मीद कर सकते हैं? इस स्थिति को बदलने के लिए हमें तुरंत कदम उठाने होंगे.

  • बच्चों में शारीरिक गतिविधियों को बढ़ाना: उन्हें खेलकूद के लिए प्रेरित करना और खेलने के लिए सुरक्षित जगहें उपलब्ध कराना.
  • मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता: स्कूलों और घरों में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना और ज़रूरत पड़ने पर मदद लेना सिखाना.
  • संतुलित आहार: बच्चों को पौष्टिक भोजन खाने की आदत डालना.
  • प्रदूषण कम करना: पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिए सामूहिक प्रयास करना.

ये भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी के इन महीनों में बना सकते हैं शारीरिक संबंध, ज्यादातर लोग नहीं जानते ये बात

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खांसी-जुकाम से परेशान हैं? ये घरेलू उपाय देंगे फौरन आराम

खांसी-जुकाम से परेशान हैं? ये घरेलू उपाय देंगे फौरन आराम


अदरक-शहद का जादू: एक छोटा चम्मच अदरक का रस लें और उसमें आधा चम्मच शहद मिलाएं. दिन में दो बार सेवन करें. अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं और शहद गले को कोमल बनाता है. यह मिश्रण सूखी और कफ वाली दोनों प्रकार की खांसी में राहत देता है.

भाप लेना: एक बड़े बर्तन में गर्म पानी लें, उसमें अजवाइन या नीलगिरी का तेल डालें और तौलिए से सिर ढककर भाप लें. नाक की जकड़न, गले की खराश और छाती में जमा बलगम को बाहर निकालने में बेहद असरदार है.

भाप लेना: एक बड़े बर्तन में गर्म पानी लें, उसमें अजवाइन या नीलगिरी का तेल डालें और तौलिए से सिर ढककर भाप लें. नाक की जकड़न, गले की खराश और छाती में जमा बलगम को बाहर निकालने में बेहद असरदार है.

तुलसी-काली मिर्च काढ़ा: तुलसी की 10 पत्तियों को पानी में उबालें, उसमें 3 काली मिर्च और थोड़ा सा अदरक डालें. स्वाद के लिए शहद मिला सकते हैं. यह काढ़ा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और वायरस से लड़ने में मदद करता है.

तुलसी-काली मिर्च काढ़ा: तुलसी की 10 पत्तियों को पानी में उबालें, उसमें 3 काली मिर्च और थोड़ा सा अदरक डालें. स्वाद के लिए शहद मिला सकते हैं. यह काढ़ा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और वायरस से लड़ने में मदद करता है.

नमक के पानी से गरारे: गुनगुने पानी में एक चुटकी नमक डालें और दिन में 2 बार गरारे करें. गले की खराश, इन्फेक्शन और सूजन में तुरंत आराम देता है. बैक्टीरिया को खत्म करने में सहायक है.

नमक के पानी से गरारे: गुनगुने पानी में एक चुटकी नमक डालें और दिन में 2 बार गरारे करें. गले की खराश, इन्फेक्शन और सूजन में तुरंत आराम देता है. बैक्टीरिया को खत्म करने में सहायक है.

हल्दी वाला दूध: रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं.हल्दी में मौजूद करक्यूमिन शरीर में इंफ्लेमेशन को कम करता है और इम्युनिटी बढ़ाता है.

हल्दी वाला दूध: रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं.हल्दी में मौजूद करक्यूमिन शरीर में इंफ्लेमेशन को कम करता है और इम्युनिटी बढ़ाता है.

पुदीना और शहद का मिश्रण: पुदीना के पत्तों को उबालकर उसका अर्क निकालें और उसमें शहद मिलाएं. दिन में एक बार पिएं. पुदीना नाक बंद होने पर खोलता है और गले को ठंडक देता है. शहद सूखी खांसी में राहत देता है.

पुदीना और शहद का मिश्रण: पुदीना के पत्तों को उबालकर उसका अर्क निकालें और उसमें शहद मिलाएं. दिन में एक बार पिएं. पुदीना नाक बंद होने पर खोलता है और गले को ठंडक देता है. शहद सूखी खांसी में राहत देता है.

Published at : 10 Jul 2025 05:00 PM (IST)

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प्रेग्नेंसी के इन महीनों में बना सकते हैं शारीरिक संबंध, ज्यादातर लोग नहीं जानते ये बात

प्रेग्नेंसी के इन महीनों में बना सकते हैं शारीरिक संबंध, ज्यादातर लोग नहीं जानते ये बात


प्रेग्नेंसी एक ऐसा समय होता है, जब महिलाएं कई बदलावों से गुजरती हैं. इस दौरान शारीरिक संबंध बनाने को लेकर कई कपल्स के मन में सवाल और डर रहते हैं. ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता होता कि प्रेग्नेंसी के दौरान कब और कैसे शारीरिक संबंध बनाना सुरक्षित है. तो आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से.

क्या प्रेग्नेंसी में शारीरिक संबंध बनाना सुरक्षित है?

हां, ज़्यादातर मामलों में पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान शारीरिक संबंध बनाना बिल्कुल सुरक्षित है, जब तक कि डॉक्टर ने आपको मना न किया हो. गर्भ में बच्चा एमनियोटिक फ्लूइड की थैली में सुरक्षित रहता है और गर्भाशय ग्रीवा एक म्यूकस प्लग से बंद होती है, जो बच्चे को बाहरी संक्रमण से बचाता है. संभोग के दौरान लिंग बच्चे तक नहीं पहुंच पाता. हालांकि, कुछ खास स्थितियों में डॉक्टर आपको संबंध बनाने से मना कर सकते हैं.

प्रेग्नेंसी के किस महीने में बना सकते हैं शारीरिक संबंध?

ग्वालियर में गायनोकॉलजिस्ट डॉ. नमिता अग्रवाल के मुताबिक, अगर आपकी प्रेग्नेंसी में कोई दिक्कत नहीं है तो आप तीनों तिमाही में संबंध बना सकते हैं.

  • पहली तिमाही: इस दौरान अक्सर महिला को मतली, थकान और मूड स्विंग्स की समस्या होती है, जिससे शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा कम हो सकती है. लेकिन, अगर आप सहज महसूस करती हैं, तो यह पूरी तरह सुरक्षित है. इस दौरान मिसकैरेज (गर्भपात) का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन यह संभोग के कारण नहीं होता, बल्कि अन्य आंतरिक कारणों से होता है.
  • दूसरी तिमाही: यह प्रेग्नेंसी का सबसे आरामदायक समय माना जाता है. मतली की समस्या कम हो जाती है और एनर्जी का स्तर बढ़ता है. पेट भी इतना बड़ा नहीं होता कि परेशानी हो. इस दौरान सेक्स ड्राइव (यौन इच्छा) भी बढ़ सकती है. यह समय शारीरिक संबंध बनाने के लिए काफी सुरक्षित और आरामदायक हो सकता है.
  • तीसरी तिमाही: इस तिमाही में पेट काफी बढ़ जाता है, जिससे कुछ पोजीशन असहज हो सकती हैं. बच्चा नीचे की ओर खिसकना शुरू कर देता है, लेकिन फिर भी वह सुरक्षित रहता है. इस दौरान कुछ महिलाओं को संभोग के बाद हल्के कांट्रेक्शंस महसूस हो सकते हैं, जिन्हें ब्रेक्सटन हिक्स कॉन्ट्रैक्शंस कहते हैं. ये सामान्य होते हैं और असली लेबर पेन नहीं होते. डिलीवरी की तारीख पास आने पर डॉक्टर से सलाह जरूर लें.

किन स्थितियों में शारीरिक संबंध बनाने से बचना चाहिए?

कुछ खास परिस्थितियां होती हैं, जब डॉक्टर आपको शारीरिक संबंध बनाने से मना कर सकते हैं.

  • ब्लीडिंग या स्पॉटिंग: अगर आपको कभी भी योनि से रक्तस्राव या स्पॉटिंग हो रही हो.
  • प्लेसेंटा प्रिविया: जब प्लेसेंटा गर्भाशय ग्रीवा को आंशिक या पूरी तरह से ढक लेता है.
  • गर्भाशय ग्रीवा की कमजोरी: अगर गर्भाशय ग्रीवा समय से पहले खुलने का खतरा हो.
  • पानी की थैली फूटना: अगर पानी की थैली फट गई हो या पानी आ गया हो.
  • समय से पहले प्रसव का इतिहास: अगर पहले कभी समय से पहले डिलीवरी हुई हो.
  • गर्भ में एक से अधिक बच्चे: जुड़वा या इससे ज़्यादा बच्चे होने पर डॉक्टर अक्सर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.
  • योनि में संक्रमण: किसी भी तरह का संक्रमण होने पर संभोग से बचना चाहिए.

ये हैं ध्यान रखने योग्य बातें

  • आरामदायक पोजीशन: पेट पर दबाव न पड़े, इसके लिए कुछ पोजीशन ज्यादा आरामदायक हो सकती हैं.
  • साफ-सफाई: संक्रमण से बचने के लिए साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें.
  • बातचीत में खुलापन: अपने पार्टनर और डॉक्टर से खुलकर बात करें. अपनी भावनाओं और आशंकाओं को साझा करें.
  • संवेदनशीलता: प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर में कई बदलाव आते हैं, इसलिए पार्टनर को संवेदनशीलता से पेश आना चाहिए.

अगर आपको कोई भी शंका या चिंता है, तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें. वह आपकी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार सबसे अच्छी सलाह दे सकते हैं. याद रखें, प्रेग्नेंसी का यह सफर आप दोनों का है और एक-दूसरे के साथ प्यार और समझदारी से हर पल को जीना महत्वपूर्ण है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्लेटलेट्स बढ़ाने के आसान और असरदार तरीके, जल्द से जल्द कैसे करें ठीक

प्लेटलेट्स बढ़ाने के आसान और असरदार तरीके, जल्द से जल्द कैसे करें ठीक


How to Increase Platelets: हमारे शरीर में खून के तीन मुख्य घटक होते हैं, रेड ब्लड सेल्स, वाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स। इन तीनों का संतुलन अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने में बेहद जरूरी होता है. खासतौर पर प्लेटलेट्स का काम शरीर में खून का थक्का बनाकर अत्यधिक रक्तस्राव को रोकना होता है. लेकिन कई बार वायरल बुखार, डेंगू, टाइफाइड या कमजोर इम्युनिटी के कारण शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या अचानक गिर जाती है.

ऐसी स्थिति में व्यक्ति को कमजोरी, थकान, नाक या मसूड़ों से खून आना, स्किन पर लाल चकत्ते या बार-बार चोट लगने पर अधिक खून बहने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. डॉक्टर लोकेन्द्र गौड़ के अनुसार, ऐसी स्थिति में सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहना ही नहीं, बल्कि कुछ खास नेचुरल फूड्स और घरेलू उपायों को अपनाकर भी प्लेटलेट्स की संख्या को तेजी से बढ़ाया जा सकता है.

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बकरी का दूध

डॉ. गौड़ बताते हैं कि बकरी का दूध प्लेटलेट्स बढ़ाने में बेहद असरदार होता है. इसमें सेलेनियम, जिंक, और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं और प्लेटलेट्स को रिपेयर करने में मदद करते हैं. सुबह खाली पेट एक गिलास बकरी का दूध पीने से लाभ मिलता है.

पपीते के पत्ते का रस

प्लेटलेट्स बढ़ाने की बात हो और पपीते के पत्ते का रस न लिया जाए, तो बात अधूरी रह जाती है. यह एक ऐसा देसी इलाज है जिसे डॉक्टर भी मान्यता देते हैं. पपीते के पत्तों को पीसकर उनका रस निकालें और दिन में 2 बार आधा कप सेवन करें. यह प्लेटलेट्स को तेजी से बढ़ाता है और शरीर की कमजोरी भी दूर करता है.

चुकंदर और गाजर

चुकंदर और गाजर आयरन, फोलिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट्स के बेहतरीन स्रोत हैं, जो रक्त निर्माण में सहायक होते हैं. इनका जूस बनाकर रोज पीने से खून की गुणवत्ता सुधरती है और प्लेटलेट्स की संख्या भी संतुलित रहती है. आप चाहें तो सलाद के रूप में भी इन्हें शामिल कर सकते हैं.

कीवी, अनार और पपीता

फल जैसे कीवी, अनार और पपीता शरीर को विटामिन C, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रदान करते हैं, जिससे प्लेटलेट्स बढ़ने में मदद मिलती है. रोजाना एक कीवी या आधा अनार खाने से लाभ होता है. पपीता पेट को भी स्वस्थ रखता है और डाइजेशन में मदद करता है.

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2008-2017 के बीच जन्मे 1.5 करोड़ बच्चों में अस्थमा का खतरा, जानें क्यों बढ़ रही यह बीमारी?

2008-2017 के बीच जन्मे 1.5 करोड़ बच्चों में अस्थमा का खतरा, जानें क्यों बढ़ रही यह बीमारी?


हाल ही में हुई एक रिसर्च में पूरी दुनिया में बच्चों की सेहत को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से 2017 के बीच जन्मे बच्चों में अस्थमा का खतरा काफी बढ़ गया है और अनुमान है कि लगभग 1.5 करोड़ बच्चों को अस्थमा हो सकता है. यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रही है.

क्या है अस्थमा और क्यों बढ़ रहा है खतरा?

अस्थमा फेफड़ों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जिसमें सांस की नली सूज जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं. इससे सांस लेने में दिक्कत, खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाजें आती हैं.

बच्चों में अस्थमा के बढ़ते मामलों के पीछे कई वजहें हो सकती हैं:

  • बढ़ता वायु प्रदूषण: भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है. हवा में मौजूद बारीक कण और जहरीली गैसें बच्चों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है.
  • एलर्जी और पर्यावरणीय कारक: धूल के कण, पोलेन (कण), पालतू जानवरों की रूसी, फफूंद और कुछ केमिकल बच्चों में एलर्जी पैदा करते हैं, जो अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं.
  • लाइफस्टाइल में बदलाव: बच्चों का बाहर खेलने के बजाय घर के अंदर, खासकर मोबाइल और टीवी पर ज़्यादा समय बिताना, उनकी शारीरिक गतिविधियों को कम कर रहा है इससे उनकी रोग इम्यूनिटी कमजोर होती है.
  • बदलता खानपान: जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड) का ज्यादा सेवन भी बच्चों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहा है, जिससे एलर्जी और अस्थमा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है.
  • जेनेटिक्स: अगर माता-पिता में से किसी को अस्थमा या कोई और एलर्जी संबंधी बीमारी है, तो बच्चों में अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है.

बच्चों पर अस्थमा का असर

अस्थमा सिर्फ सांस की बीमारी नहीं है, यह बच्चों के पूरे जीवन को प्रभावित कर सकती है.

  • पढ़ाई पर असर: अस्थमा के कारण बच्चों को स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ सकती है, जिससे उनकी पढ़ाई छूट जाती है. सा.स लेने में दिक्कत होने पर वे क्लास में ध्यान भी नहीं लगा पाते.
  • फिजिकल एक्टिविटीज में कमी: अस्थमा से पीड़ित बच्चे अक्सर खेलकूद या अन्य शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने से कतराते हैं, जिससे उनका शारीरिक विकास प्रभावित होता है.
  • मेंटल हेल्थ पर असर: बार-बार अस्थमा के अटैक आना या सांस लेने में दिक्कत महसूस होना बच्चों में एन्जाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं को भी जन्म दे सकता है.
  • अस्पताल में भर्ती होने का खतरा: अस्थमा का गंभीर अटैक होने पर बच्चों को अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ सकता है.

यह आंकड़े हमें चेतावनी दे रहे हैं कि हमें तुरंत कदम उठाने होंगे.

  • जागरूकता बढ़ाएं: माता-पिता, शिक्षकों और समाज को अस्थमा के लक्षणों और बचाव के तरीकों के बारे में जागरूक होना चाहिए.
  • प्रदूषण कम करें: सरकार और समाज दोनों को मिलकर वायु प्रदूषण कम करने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे
  • हेल्दी लाइफस्टाइल: बच्चों को पौष्टिक आहार लेने और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करने के लिए प्रोत्साहित करें.
  • डॉक्टर से सलाह: अगर आपके बच्चे में अस्थमा के कोई भी लक्षण दिखें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से मिलें. सही समय पर इलाज और प्रबंधन से अस्थमा को नियंत्रित किया जा सकता है.

यह जरूरी है कि हम इस गंभीर समस्या को पहचानें और अपने बच्चों को एक स्वस्थ भविष्य देने के लिए मिलकर काम करें.

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लगातार एक महीने से पहले ही आ रहे हैं पीरियड्स तो हो जाएं सावधान, ये हो सकती है बीमारी

लगातार एक महीने से पहले ही आ रहे हैं पीरियड्स तो हो जाएं सावधान, ये हो सकती है बीमारी


अगर आपको हर महीने तय समय से पहले ही पीरियड्स आ जाते हैं और यह सिलसिला एक महीने से ज़्यादा चल रहा है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें. आमतौर पर महिलाओं का मासिक धर्म चक्र (पीरियड्स साइकल) 21 से 35 दिनों का होता है. अगर आपके पीरियड्स बार-बार, यानी हर 21 दिन से पहले ही आ रहे हैं, तो इसे पोलिमेनोरिया कहते हैं। यह किसी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है।

क्यों बार-बार आते हैं पीरियड्स?

पीरियड्स का जल्दी-जल्दी आना कई वजहों से हो सकता है. कुछ कारण सामान्य होते हैं, लेकिन कुछ गंभीर बीमारियों की तरफ इशारा करते हैं.

हार्मोन्स का असंतुलन (हार्मोनल इम्बैलेंस)

  • एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन: ये दो मुख्य हार्मोन हैं, जो पीरियड्स को कंट्रोल करते हैं. अगर इनमें गड़बड़ी होती है, तो पीरियड्स की टाइमिंग बिगड़ सकती है.
  • पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम: यह आजकल की एक आम हार्मोनल समस्या है, जिसमें अंडाशय (ओवरी) में छोटी-छोटी गांठें (सिस्ट) बन जाती हैं. इससे पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और जल्दी-जल्दी भी आ सकते हैं.
  • थायरॉइड की समस्या: थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन भी पीरियड्स पर असर डालता है. अगर थायरॉइड ठीक से काम नहीं कर रहा, तो पीरियड्स जल्दी और गड़बड़ हो सकते हैं.

तनाव और लाइफस्टाइल

  • मानसिक और शारीरिक तनाव: बहुत ज़्यादा स्ट्रेस लेने से हार्मोन पर असर पड़ता है, जिससे पीरियड्स समय से पहले आ सकते हैं.
  • वजन का बदलना: अचानक वजन बढ़ना या कम होना भी हार्मोन का संतुलन बिगाड़ सकता है, जिससे पीरियड्स की साइकल बिगड़ जाती है.
  • ज्यादा कसरत: बहुत ज्यादा और मुश्किल वाली एक्सरसाइज़ भी पीरियड्स को अनियमित कर सकती है.

गर्भाशय (बच्चेदानी) की समस्याएं

  • गर्भाशय फाइब्रॉइड्स (गांठें): ये बच्चेदानी में होने वाली बिना कैंसर वाली गांठें होती हैं, जो पीरियड्स को अनियमित कर सकती हैं और ज्यादा ब्लीडिंग का कारण बन सकती हैं.
  • पॉलिप्स: बच्चेदानी की अंदरूनी परत पर होने वाली छोटी, बिना कैंसर वाली ग्रोथ भी बार-बार ब्लीडिंग या पीरियड्स का कारण बन सकती हैं.

इंफेक्शन (संक्रमण)

  • पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज : यह प्रजनन अंगों का संक्रमण है, जिससे अनियमित ब्लीडिंग और बार-बार पीरियड्स आ सकते हैं.
  • यौन संचारित संक्रमण: कुछ यौन संचारित रोग भी अनियमित ब्लीडिंग का कारण बन सकते हैं.

गर्भनिरोधक तरीके

  • गर्भनिरोधक गोलियां: कुछ तरह की गर्भनिरोधक गोलियां या इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्शन आपके पीरियड्स साइकल को कुछ समय के लिए गड़बड़ कर सकते हैं.
  • मेनोपॉज के आसपास (पेरिमेनोपॉज): मेनोपॉज (पीरियड्स बंद होने) से कुछ साल पहले, महिलाओं के हार्मोन लेवल में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है. इस दौरान पीरियड्स की साइकल छोटी या अनियमित हो सकती है.

कब हों सावधान और डॉक्टर को दिखाएं?

अगर आपको लगातार एक महीने से पहले ही पीरियड्स आ रहे हैं या इसके साथ कुछ और लक्षण भी दिख रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.

  • बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना या ज्यादा दिनों तक ब्लीडिंग चलना.
  • पीरियड्स के साथ बहुत ज्यादा दर्द होना.
  • चक्कर आना, कमजोरी या बहुत ज्यादा थकान महसूस होना (खून की कमी के लक्षण).
  • वजन में तेजी से बदलाव आना.
  • गर्दन में सूजन या चेहरे पर अनचाहे बाल आना जैसे हार्मोनल बदलाव के लक्षण.
  • अगर आपको लग रहा है कि आप प्रेग्नेंट हो सकती हैं और फिर भी ब्लीडिंग हो रही है.

समय रहते डॉक्टर से सलाह लेने से सही वजह का पता चल पाएगा और जरूरत पड़ने पर सही इलाज शुरू हो सकेगा, जिससे आप किसी भी गंभीर बीमारी से बच सकती हैं. अपनी सेहत को लेकर कोई भी लापरवाही न करें.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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