2008-2017 के बीच जन्मे 1.5 करोड़ बच्चों में अस्थमा का खतरा, जानें क्यों बढ़ रही यह बीमारी?

2008-2017 के बीच जन्मे 1.5 करोड़ बच्चों में अस्थमा का खतरा, जानें क्यों बढ़ रही यह बीमारी?


हाल ही में हुई एक रिसर्च में पूरी दुनिया में बच्चों की सेहत को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से 2017 के बीच जन्मे बच्चों में अस्थमा का खतरा काफी बढ़ गया है और अनुमान है कि लगभग 1.5 करोड़ बच्चों को अस्थमा हो सकता है. यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रही है.

क्या है अस्थमा और क्यों बढ़ रहा है खतरा?

अस्थमा फेफड़ों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जिसमें सांस की नली सूज जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं. इससे सांस लेने में दिक्कत, खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाजें आती हैं.

बच्चों में अस्थमा के बढ़ते मामलों के पीछे कई वजहें हो सकती हैं:

  • बढ़ता वायु प्रदूषण: भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है. हवा में मौजूद बारीक कण और जहरीली गैसें बच्चों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है.
  • एलर्जी और पर्यावरणीय कारक: धूल के कण, पोलेन (कण), पालतू जानवरों की रूसी, फफूंद और कुछ केमिकल बच्चों में एलर्जी पैदा करते हैं, जो अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं.
  • लाइफस्टाइल में बदलाव: बच्चों का बाहर खेलने के बजाय घर के अंदर, खासकर मोबाइल और टीवी पर ज़्यादा समय बिताना, उनकी शारीरिक गतिविधियों को कम कर रहा है इससे उनकी रोग इम्यूनिटी कमजोर होती है.
  • बदलता खानपान: जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड) का ज्यादा सेवन भी बच्चों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहा है, जिससे एलर्जी और अस्थमा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है.
  • जेनेटिक्स: अगर माता-पिता में से किसी को अस्थमा या कोई और एलर्जी संबंधी बीमारी है, तो बच्चों में अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है.

बच्चों पर अस्थमा का असर

अस्थमा सिर्फ सांस की बीमारी नहीं है, यह बच्चों के पूरे जीवन को प्रभावित कर सकती है.

  • पढ़ाई पर असर: अस्थमा के कारण बच्चों को स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ सकती है, जिससे उनकी पढ़ाई छूट जाती है. सा.स लेने में दिक्कत होने पर वे क्लास में ध्यान भी नहीं लगा पाते.
  • फिजिकल एक्टिविटीज में कमी: अस्थमा से पीड़ित बच्चे अक्सर खेलकूद या अन्य शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने से कतराते हैं, जिससे उनका शारीरिक विकास प्रभावित होता है.
  • मेंटल हेल्थ पर असर: बार-बार अस्थमा के अटैक आना या सांस लेने में दिक्कत महसूस होना बच्चों में एन्जाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं को भी जन्म दे सकता है.
  • अस्पताल में भर्ती होने का खतरा: अस्थमा का गंभीर अटैक होने पर बच्चों को अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ सकता है.

यह आंकड़े हमें चेतावनी दे रहे हैं कि हमें तुरंत कदम उठाने होंगे.

  • जागरूकता बढ़ाएं: माता-पिता, शिक्षकों और समाज को अस्थमा के लक्षणों और बचाव के तरीकों के बारे में जागरूक होना चाहिए.
  • प्रदूषण कम करें: सरकार और समाज दोनों को मिलकर वायु प्रदूषण कम करने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे
  • हेल्दी लाइफस्टाइल: बच्चों को पौष्टिक आहार लेने और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करने के लिए प्रोत्साहित करें.
  • डॉक्टर से सलाह: अगर आपके बच्चे में अस्थमा के कोई भी लक्षण दिखें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से मिलें. सही समय पर इलाज और प्रबंधन से अस्थमा को नियंत्रित किया जा सकता है.

यह जरूरी है कि हम इस गंभीर समस्या को पहचानें और अपने बच्चों को एक स्वस्थ भविष्य देने के लिए मिलकर काम करें.

ये भी पढ़ें: सरसों का तेल मिलावटी सेहत के लिए कितना खतरनाक? इतनी बीमारियों को देता है दावत

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

लगातार एक महीने से पहले ही आ रहे हैं पीरियड्स तो हो जाएं सावधान, ये हो सकती है बीमारी

लगातार एक महीने से पहले ही आ रहे हैं पीरियड्स तो हो जाएं सावधान, ये हो सकती है बीमारी


अगर आपको हर महीने तय समय से पहले ही पीरियड्स आ जाते हैं और यह सिलसिला एक महीने से ज़्यादा चल रहा है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें. आमतौर पर महिलाओं का मासिक धर्म चक्र (पीरियड्स साइकल) 21 से 35 दिनों का होता है. अगर आपके पीरियड्स बार-बार, यानी हर 21 दिन से पहले ही आ रहे हैं, तो इसे पोलिमेनोरिया कहते हैं। यह किसी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है।

क्यों बार-बार आते हैं पीरियड्स?

पीरियड्स का जल्दी-जल्दी आना कई वजहों से हो सकता है. कुछ कारण सामान्य होते हैं, लेकिन कुछ गंभीर बीमारियों की तरफ इशारा करते हैं.

हार्मोन्स का असंतुलन (हार्मोनल इम्बैलेंस)

  • एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन: ये दो मुख्य हार्मोन हैं, जो पीरियड्स को कंट्रोल करते हैं. अगर इनमें गड़बड़ी होती है, तो पीरियड्स की टाइमिंग बिगड़ सकती है.
  • पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम: यह आजकल की एक आम हार्मोनल समस्या है, जिसमें अंडाशय (ओवरी) में छोटी-छोटी गांठें (सिस्ट) बन जाती हैं. इससे पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और जल्दी-जल्दी भी आ सकते हैं.
  • थायरॉइड की समस्या: थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन भी पीरियड्स पर असर डालता है. अगर थायरॉइड ठीक से काम नहीं कर रहा, तो पीरियड्स जल्दी और गड़बड़ हो सकते हैं.

तनाव और लाइफस्टाइल

  • मानसिक और शारीरिक तनाव: बहुत ज़्यादा स्ट्रेस लेने से हार्मोन पर असर पड़ता है, जिससे पीरियड्स समय से पहले आ सकते हैं.
  • वजन का बदलना: अचानक वजन बढ़ना या कम होना भी हार्मोन का संतुलन बिगाड़ सकता है, जिससे पीरियड्स की साइकल बिगड़ जाती है.
  • ज्यादा कसरत: बहुत ज्यादा और मुश्किल वाली एक्सरसाइज़ भी पीरियड्स को अनियमित कर सकती है.

गर्भाशय (बच्चेदानी) की समस्याएं

  • गर्भाशय फाइब्रॉइड्स (गांठें): ये बच्चेदानी में होने वाली बिना कैंसर वाली गांठें होती हैं, जो पीरियड्स को अनियमित कर सकती हैं और ज्यादा ब्लीडिंग का कारण बन सकती हैं.
  • पॉलिप्स: बच्चेदानी की अंदरूनी परत पर होने वाली छोटी, बिना कैंसर वाली ग्रोथ भी बार-बार ब्लीडिंग या पीरियड्स का कारण बन सकती हैं.

इंफेक्शन (संक्रमण)

  • पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज : यह प्रजनन अंगों का संक्रमण है, जिससे अनियमित ब्लीडिंग और बार-बार पीरियड्स आ सकते हैं.
  • यौन संचारित संक्रमण: कुछ यौन संचारित रोग भी अनियमित ब्लीडिंग का कारण बन सकते हैं.

गर्भनिरोधक तरीके

  • गर्भनिरोधक गोलियां: कुछ तरह की गर्भनिरोधक गोलियां या इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्शन आपके पीरियड्स साइकल को कुछ समय के लिए गड़बड़ कर सकते हैं.
  • मेनोपॉज के आसपास (पेरिमेनोपॉज): मेनोपॉज (पीरियड्स बंद होने) से कुछ साल पहले, महिलाओं के हार्मोन लेवल में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है. इस दौरान पीरियड्स की साइकल छोटी या अनियमित हो सकती है.

कब हों सावधान और डॉक्टर को दिखाएं?

अगर आपको लगातार एक महीने से पहले ही पीरियड्स आ रहे हैं या इसके साथ कुछ और लक्षण भी दिख रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.

  • बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना या ज्यादा दिनों तक ब्लीडिंग चलना.
  • पीरियड्स के साथ बहुत ज्यादा दर्द होना.
  • चक्कर आना, कमजोरी या बहुत ज्यादा थकान महसूस होना (खून की कमी के लक्षण).
  • वजन में तेजी से बदलाव आना.
  • गर्दन में सूजन या चेहरे पर अनचाहे बाल आना जैसे हार्मोनल बदलाव के लक्षण.
  • अगर आपको लग रहा है कि आप प्रेग्नेंट हो सकती हैं और फिर भी ब्लीडिंग हो रही है.

समय रहते डॉक्टर से सलाह लेने से सही वजह का पता चल पाएगा और जरूरत पड़ने पर सही इलाज शुरू हो सकेगा, जिससे आप किसी भी गंभीर बीमारी से बच सकती हैं. अपनी सेहत को लेकर कोई भी लापरवाही न करें.

ये भी पढ़ें: सरसों का तेल मिलावटी सेहत के लिए कितना खतरनाक? इतनी बीमारियों को देता है दावत

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

घर में हैं पुरानी दवाएं…कौन सी फ्लश करें, कौन सी नहीं? सरकार ने जारी की नई गाइडलाइन

घर में हैं पुरानी दवाएं…कौन सी फ्लश करें, कौन सी नहीं? सरकार ने जारी की नई गाइडलाइन



<p style="text-align: justify;">आपके घर में पड़ी एक्सपायर हो चुकी या इस्तेमाल न की गई दवाएं अब कूड़ेदान में फेंकने वाली चीज़ नहीं रहीं. भारत की सबसे बड़ी दवा नियामक संस्था, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) ने इन्हें ठिकाने लगाने के लिए नए नियम बताए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इन 17 दवाओं को सीधे फ्लश करें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सीडीएससीओ ने 17 ऐसी दवाओं की लिस्ट जारी की है, जिन्हें घर में बेकार पड़े रहने या एक्सपायर होने पर सीधे सिंक या टॉयलेट में फ्लश करने को कहा है. इनमें दर्द निवारक दवाएं जैसे फेंटानिल, ट्रामाडोल और घबराहट कम करने वाली दवा डायजेपाम शामिल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्यों फ्लश करें?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सीडीएससीओ का कहना है कि ये दवाएं बहुत खतरनाक हो सकती हैं. अगर इन्हें गलती से कोई ऐसा व्यक्ति ले ले जिसके लिए ये लिखी नहीं गई थीं तो एक खुराक भी जानलेवा हो सकती है. घर में बच्चों या पालतू जानवरों को इनसे कोई खतरा न हो, इसलिए इन्हें फ्लश करना ही सबसे सुरक्षित तरीका है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बाकी दवाओं का क्या करें?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ज्यादातर दूसरी सामान्य दवाओं के लिए सीडीएससीओ ने कहा है कि उन्हें फ्लश नहीं करना चाहिए. पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के लिए उनका वैज्ञानिक तरीके से निपटारा जरूरी है. इसके लिए एक नई पहल शुरू करने का सुझाव दिया गया है, जिसे ‘ड्रग टेक बैक’ नाम दिया गया है. शुरुआत में, राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग और स्थानीय केमिस्ट मिलकर कुछ खास जगहों पर सेंटर बना सकते हैं, जहां लोग अपने घर की एक्सपायर या बची हुई दवाएं जमा कर सकें. इसके बाद में, राज्य सरकारों को स्थानीय निकायों के साथ मिलकर इन दवाओं को इकट्ठा करने और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के हिसाब से ठिकाने लगाने की सुविधा बनानी होगी.</p>
<p style="text-align: justify;">सीडीएससीओ का कहना है कि शुरू में राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग और केमिस्ट एसोसिएशन मिलकर ‘ड्रग टेक बैक’ कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं. लोग अपने घरों से एक्सपायर या न इस्तेमाल हुई दवाएं वहां जमा कर सकते हैं और फिर ये एसोसिएशन लाइसेंस वाली एजेंसियों की मदद से उनका सुरक्षित निपटारा करेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्यों पड़ी इस गाइडलाइन की जरूरत?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह नई गाइडलाइन कई रिसर्च और रिपोर्ट्स के बाद आई है, जिनमें दिखाया गया था कि दवाओं का गलत तरीके से निपटारा कैसे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है. एम्स के डॉ. टी वेलपंडियन के एक अध्ययन में 2018 में यमुना नदी के पानी और दिल्ली-एनसीआर के बोरवेल के नमूनों की जांच की गई थी. इसमें पाया गया कि कूड़ेदान में फेंकी गई दवाएं अंत में पर्यावरण में पहुंच जाती हैं. इतना ही नहीं, इससे ऐसी बीमारियां पैदा करने वाले बैक्टीरिया भी बढ़ रहे हैं, जिन पर दवाएं असर नहीं करतीं. इस स्टडी में यमुना नदी और गाजीपुर लैंडफिल के पास के इलाकों के पानी में एंटीबायोटिक्स और दूसरी दवाएं पाई गई थीं.</p>
<p style="text-align: justify;">मैक्स हेल्थकेयर की फार्मेसी प्रमुख देवरति मजूमदार ने सरकार के इस कदम की सराहना की है. उन्होंने बताया कि मैक्स हेल्थकेयर भी एक पर्चा तैयार करने की योजना बना रही है, जो अस्पताल से छुट्टी मिलने पर मरीजों को दिया जाएगा, ताकि उन्हें दवाओं के निपटान के सही तरीकों के बारे में जागरूक किया जा सके. उन्होंने यह भी बताया कि फ्लश की जाने वाली दवाओं की लिस्ट में ज्यादातर ऐसी दवाएं हैं, जिनकी लत लग सकती है या जिनका दुरुपयोग हो सकता है, इसलिए सरकार ने उन्हें फ्लश करने की सलाह दी है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/photo-gallery/lifestyle/health-adulterated-mustard-oil-causes-of-many-diseases-liver-damage-heart-attack-2976709">सरसों का तेल मिलावटी सेहत के लिए कितना खतरनाक? इतनी बीमारियों को देता है दावत</a><br /></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



Source link

डिलीवरी के कितने महीने बाद तक खानी चाहिए दवाएं, बेहद जरूरी है ये बात

डिलीवरी के कितने महीने बाद तक खानी चाहिए दवाएं, बेहद जरूरी है ये बात


Medicines after Delivery: मां बनना हर महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत अहसास होता है, लेकिन डिलीवरी के बाद शरीर काफी कमजोर हो जाता है और मां को न सिर्फ बच्चे की देखभाल करनी होती है, बल्कि खुद के स्वास्थ्य का भी खास ख्याल रखना पड़ता है. ऐसे में एक बड़ा सवाल जो नई माताओं के मन में उठता है, वह यह है, डिलीवरी के बाद कितने महीने तक दवाएं लेना जरूरी है?”

बाजार में मिलने वाले तरह-तरह के सप्लीमेंट, डॉक्टर की सलाह से दी जाने वाली आयरन, कैल्शियम और मल्टीविटामिन गोलियां, इन सबको कब तक लेना चाहिए? क्या सभी दवाएं एक जैसी होती हैं और क्या दवाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के अचानक बंद कर देना सही है? इन तमाम सवालों का जवाब जानना हर नई मां के लिए बेहद जरूरी है। इसी पर डॉ. सुप्रिया पुराणिक, जो स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, अपने यूट्यूब चैनल पर इस विषय में विस्तार से जानकारी देती हैं. उनके अनुसार आइए जानते हैं डिलीवरी के बाद दवाओं का सही समय, महत्व और सावधानियां.

ये भी पढ़े- बरसात के मौसम में क्या वाकई नहीं खानी चाहिए दही? जान लीजिए क्या है सच

डिलीवरी के बाद शरीर की जरूरतें बदलती हैं

डिलीवरी के बाद महिला का शरीर बहुत कुछ झेलता है, खून की कमी, हॉर्मोनल बदलाव, थकान, और प्रसव के बाद आई शारीरिक कमजोरी. ऐसे में शरीर को पोषण की जरूरत होती है, जो सामान्य भोजन से तुरंत नहीं मिल पाता. इसलिए डॉक्टर आयरन, कैल्शियम और मल्टीविटामिन जैसी दवाएं लेने की सलाह देते हैं.

डॉक्टर की सलाह से लें दवाएं

डॉ. सुप्रिया पुराणिक के अनुसार, डिलीवरी के बाद कम से कम 3 से 6 महीने तक दवाएं नियमित रूप से लेनी चाहिए. अगर मां स्तनपान करवा रही है, तो दवाएं उसके दूध के जरिए भी शिशु को पोषण देती हैं. इसलिए दवाओं का सही समय पर और सही मात्रा में सेवन बहुत जरूरी होता है.

कौन-कौन सी दवाएं जरूरी होती हैं?

  • आयरन सप्लीमेंट प्रसव के बाद खून की कमी को पूरा करने के लिए
  • कैल्शियम टैबलेट्स हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए
  • मल्टीविटामिन्स ऊर्जा और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए

दवाएं बंद कब करें?

कई महिलाएं बिना डॉक्टर की सलाह के 2 महीने में दवाएं बंद कर देती हैं, जो गलत है. दवाओं की अवधि आपकी शारीरिक स्थिति, प्रसव के प्रकार (नॉर्मल या सी-सेक्शन) और रिकवरी की रफ्तार पर निर्भर करती है. इसलिए डॉक्टर से रेगुलर फॉलो-अप बहुत जरूरी है.

ये भी पढ़ें: किस बीमारी से जूझ रहीं पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की दोनों बेटियां, जानें ये कितनी खतरनाक?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

बरसात के मौसम में क्या वाकई नहीं खानी चाहिए दही? जान लीजिए क्या है सच

बरसात के मौसम में क्या वाकई नहीं खानी चाहिए दही? जान लीजिए क्या है सच


Eating Curd in Monsoon: बरसात की टिप-टिप करती फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू और गरमागरम पकौड़ों की खुशबू हर किसी का मन मोह लेती है. इस मौसम में खान-पान को लेकर हमारी आदतें भी बदल जाती हैं. लेकिन जब बात आती है दही खाने की, तो अक्सर घरों में एक सवाल उठता है किक्या बरसात में दही खाना सही है?” कुछ लोग इसे सर्द-गर्म का कारण मानते हैं तो कुछ कहते हैं कि इससे पेट खराब हो सकता है. लेकिन क्या वाकई मानसून में दही से दूरी बना लेनी चाहिए या कुछ सावधानियों के साथ इसका सेवन करना फायदेमंद हो सकता है?

बता दें, दही में प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन बी और प्रोबायोटिक्स पाए जाते हैं, जोकेवल पाचन तंत्र को बेहतर बनाते हैं, बल्कि इम्यून सिस्टम को भी मजबूत करते हैं गर्मियों में तो दही को शरीर को ठंडक देने वाला माना जाता है, लेकिन मानसून में इसका ये थोड़ा अलग हो जाता है. वहीं इस मसले पर डॉ. नजर होम्योपैथी का मानना है कि मानसून के मौसम में वातावरण में नमी अधिक होती है, जिससे बैक्टीरिया जल्दी पनपते हैं. ऐसे में अगर दही ताजाहो, तो उसमें हानिकारक बैक्टीरिया विकसित हो सकते हैं, जो पेट की समस्याएं जैसे गैस, अपच, या फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं.

ये भी पढ़े- एक कप और’ की आदत कहीं ले न जाए हॉस्पिटल तक, गर्मागर्म चाय आपको न कर दे बीमार

ताजा दही खाना चाहिए

अगर आप दही खाना चाहते हैं, तो यह जरूरी है कि आप इसे ताजे दूध से घर पर ही बनाएं और उसी दिन सेवन करें बाजार की पुरानी या पैक्ड दही से परहेज करें, क्योंकि उसमें बैक्टीरिया के पनपने की आशंका अधिक होती है.

कब और कैसे करें दही का सेवन?

  • दही को दिन में खाना बेहतर है, रात में नहीं खाना चाहिए
  • इसमें काली मिर्च या अदरक मिलाकर सेवन करें, ताकि इसकी तासीर संतुलित हो
  • ठंडी दही खाने से गला खराब हो सकता है, इसलिए इसे कमरे के तापमान पर आने के बाद खाएं
  • कढ़ी या रायता के रूप में पकाकर दही लेना ज्यादा सुरक्षित विकल्प हो सकता है

किन लोगों को दही से परहेज करना चाहिए?

जिन लोगों को सर्दी-जुकाम, एलर्जी या पाचन संबंधी समस्याएं रहती हैं, उन्हें बरसात के मौसम में दही से थोड़ी दूरी बनाकर रखनी चाहिए या चिकित्सक की सलाह से ही सेवन करना चाहिए.

ये भी पढ़ें: किस बीमारी से जूझ रहीं पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की दोनों बेटियां, जानें ये कितनी खतरनाक?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

एक कप और’ की आदत कहीं ले न जाए हॉस्पिटल तक, गर्मागर्म चाय आपको न कर दे बीमार

एक कप और’ की आदत कहीं ले न जाए हॉस्पिटल तक, गर्मागर्म चाय आपको न कर दे बीमार


Side Effects of Drinking Tea: (चाय) एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही थकान दूर हो जाती है, मूड रिफ्रेश हो जाता है और बातें खुद-ब-खुद चल पड़ती हैं. भारत में तो चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि एक भावना है. सुबह की शुरुआत हो या शाम की राहत, बारिश का मौसम हो या ऑफिस ब्रेक, “एक कप चाय” हर मौके पर जरूरी सी लगती है. लेकिन ये ‘एक कप और’ की आदत आपकी सेहत को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती है.

डॉ. सरीन के मुताबिक, बहुत अधिक गर्म चाय पीने से गले में जलन और घाव हो सकते हैं. जब यह जलन बार-बार होती है तो इससे इसोफेगल कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा चाय में मौजूद कैफीन, बार-बार सेवन करने पर एसिडिटी, अनिद्रा, हाई ब्लड प्रेशर और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं भी उत्पन्न कर सकता है.

ये भी पढ़े- क्या आपको भी आ रही है बार-बार पेशाब? इस खतरनाक बीमारी के हो सकते हैं संकेत

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

अगर आप जरूरत से ज्यादा चाय पीते हैं तो आपके शरीर में ये संकेत दिखाई दे सकते हैं

पेट में जलन या गैस

गले में लगातार खिचखिच या जलन

नींद की कमी

बार-बार थकान महसूस होना

दिल की धड़कन तेज होना

अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं, तो यह चाय की अधिकता का नतीजा हो सकता है

क्या करें और क्या न करें

दिन में 1 कप से अधिक चाय न पिएं

चाय को थोड़ा ठंडा करके पिएं, बहुत गर्म न पिएं

चाय के साथ बिस्किट, नमकीन या तैलीय चीजें कम खाएं, इससे पाचन गड़बड़ हो सकता है

चाय की जगह हर्बल टी, ग्रीन टी या गर्म पानी का विकल्प चुनें

चाय की आदत को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश करें

चाय जरूर हमारे जीवन का अहम हिस्सा है, लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. “एक कप और” की आदत अगर रोजाना की लत बन जाए, तो वही कप आपकी सेहत के लिए खतरनाक बन सकता है. डॉ. शिव कुमार सरीन की सलाह को गंभीरता से लें और चाय को सिर्फ एक लिमिट तक ही एन्जॉय करें. याद रखें, सेहत है, तो हर स्वाद है.

ये भी पढ़ें: किस बीमारी से जूझ रहीं पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की दोनों बेटियां, जानें ये कितनी खतरनाक?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp