बच्चों को स्विमिंग करवाने से क्या वाकई बढ़ जाती है हाइट? ये रहा जवाब

बच्चों को स्विमिंग करवाने से क्या वाकई बढ़ जाती है हाइट? ये रहा जवाब



<p style="text-align: justify;">बच्चों को स्विमिंग करवाने से क्या उनकी हाइट सच में बढ़ती है? यह सवाल कई पैरेंट्स के मन में आता है, और इसके बारे में कई बातें भी सुनने को मिलती हैं. स्विमिंग सीधे तौर पर बच्चों की हाइट नहीं बढ़ाती है. बच्चों की हाइट मुख्य रूप से उनके जेनेटिक्स पर निर्भर करती है. हालांकि, स्विमिंग को जीवनशैली का हिस्सा बनकर बच्चों को उनकी निर्धारित अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचने में मदद की जा सकती है. आइए जानते हैं, क्या है सच्चाई?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्विमिंग से बढ़ती है बच्चों की हाइट?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सीधे शब्दों में कहें तो स्विमिंग सीधे तौर पर बच्चों की हाइट नहीं बढ़ाती है. बच्चों की लंबाई मुख्य रूप से उनके जीन्स पर निर्भर करती है. यानी उन्हें अपने माता-पिता से जो जीन्स मिलते हैं. वही, उनकी अधिकतम लंबाई तय करते हैं. हालांकि, स्विमिंग एक बहुत ही बेहतरीन व्यायाम है, जो बच्चों को उनकी आनुवंशिक रूप से निर्धारित अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचने में मदद कर सकती है। आइए समझते हैं कैसे&hellip;.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शरीर में खिंचाव और लचीलापन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्विमिंग करते समय बच्चों के पूरे शरीर का इस्तेमाल होता है. हाथ और पैर पानी में लगातार फैलते और सिकुड़ते हैं, जिससे मांसपेशियों और जोड़ों में खिंचाव आता है. यह खिंचाव शरीर को लचीला बनाता है और मांसपेशियों को मजबूत करता है. एक स्वस्थ और लचीला शरीर बेहतर विकास के लिए जरूरी होता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रीढ़ की हड्डी पर कम दबाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पानी में शरीर का वजन कम महसूस होता है. इससे रीढ़ की हड्डी पर ग्रेविटी या गुरुत्वाकर्षण का दबाव कम हो जाता है. जब रीढ़ पर दबाव कम होता है, तो डिस्क (रीढ़ की हड्डियों के बीच की गद्दियां) थोड़ी फैल सकती हैं, जिससे बच्चा अस्थायी रूप से थोड़ा लंबा दिख सकता है. हालांकि, यह असर स्थायी नहीं होता है और पानी से बाहर आने पर रीढ़ सामान्य स्थिति में आ जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ग्रोथ हार्मोन का बढ़ना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किसी भी तरह की नियमित कसरत, और स्विमिंग भी इसमें शामिल है, शरीर में ग्रोथ हार्मोन (वृद्धि हार्मोन) के स्राव को बढ़ाती है. ये हार्मोन हड्डियों के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. इसलिए, जो बच्चे सक्रिय रहते हैं, उनमें अपनी आनुवंशिक क्षमता के अनुसार अधिकतम लंबाई पाने की संभावना ज्यादा होती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बेहतर पोस्चर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्विमिंग से पेट और पीठ की मांसपेशियां मजबूत होती हैं. ये मांसपेशियां शरीर की मुद्रा (पोस्चर) को ठीक रखने में मदद करती हैं. अच्छी मुद्रा वाला बच्चा सीधा खड़ा होता है और इससे वह अपनी वास्तविक लंबाई से ज़्यादा लंबा और आत्मविश्वासी दिख सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>होलिस्टिक ग्रोथ और न्यूट्रीशियन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्विमिंग एक ऐसा व्यायाम है, जो बच्चों के समग्र स्वास्थ्य और फिटनेस को बढ़ाता है. यह उनकी हड्डियों को मजबूत करती है, मांसपेशियों का विकास करती है, दिल को स्वस्थ रखती है और पाचन क्रिया को बेहतर बनाती है. एक स्वस्थ शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बेहद ज़रूरी हैं. &nbsp;स्विमिंग से बच्चों को अच्छी भूख भी लगती है, जिससे वे पर्याप्त पोषक तत्व ले पाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में हम समझ सकते हैं कि बच्चों की हाइट उनके जीन्स पर ही निर्भर करती है. स्विमिंग सीधे तौर पर हड्डियों की लंबाई नहीं बढ़ाती, लेकिन यह एक शानदार व्यायाम है, जो बच्चों के संपूर्ण शारीरिक विकास, बेहतर मुद्रा, मांसपेशियों और हड्डियों की मजबूती और सही हार्मोन स्राव में मदद करता है. &nbsp;ये सभी मिलकर बच्चों को उनकी आनुवंशिक क्षमता के अनुसार अधिकतम ऊंचाई प्राप्त करने में सहायक हो सकते हैं. तो अपने बच्चों को स्विमिंग ज़रूर करवाएं, क्योंकि यह उनके समग्र स्वास्थ्य और विकास के लिए बहुत फायदेमंद है, भले ही यह सीधे तौर पर उनकी हाइट न बढ़ाए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/eyes-detect-diabetes-or-cancer-do-not-ignore-these-signs-2976157">आंखें बताती हैं इन खतरनाक बीमारियों का पता, गलती से भी न करें नजरअंदाज</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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नींद से अचानक उठने के बाद आ सकता है हार्ट अटैक? ये रहा जवाब

नींद से अचानक उठने के बाद आ सकता है हार्ट अटैक? ये रहा जवाब



<p style="text-align: justify;">नींद से अचानक जागने के बाद क्या हार्ट अटैक आ सकता है? यह सवाल कई लोगों के मन में होता है. सीधे शब्दों में कहें तो नींद से अचानक उठना खुद हार्ट अटैक का कारण नहीं बनता, लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं जो नींद से जुड़ी समस्याओं और दिल के दौरे के खतरे को आपस में जोड़ती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्लीप और हार्ट अटैक में क्या है संबंध?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गाजियाबाद स्थित यशोदा हॉस्पिटल में मेडिसिन और जनरल फिजिशियन डॉ. एपी सिंह ने बताया कि नींद या स्लीप हमारे शरीर के लिए बहुत ज़रूरी है और इसकी कमी या खराब गुणवत्ता हमारे दिल पर बुरा असर डाल सकती है. आइए समझते हैं कैसे:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>स्लीप एपनिया बड़ी वजह:</strong> स्लीप एपनिया एक गंभीर नींद की समस्या है, जहां सोते समय आपकी सांस बार-बार रुकती और चलती है. जब सांस रुकती है, तो शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है. इससे दिल और खून की नसों पर बहुत दबाव पड़ता है. स्लीप एपनिया वाले लोगों को हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित दिल की धड़कन, हार्ट फेलियर और हार्ट अटैक का खतरा काफी ज़्यादा होता है. जब सांस रुकने के कारण अचानक नींद खुलती है, तो यह शरीर पर तनाव पैदा करता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>स्ट्रेस हार्मोन का बढ़ना:</strong> अगर आपको ठीक से नींद नहीं आती या आपकी नींद बार-बार टूटती है, तो शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाइन जैसे तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं. ये हार्मोन दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर को बढ़ा सकते हैं, जिससे दिल पर ज़्यादा ज़ोर पड़ता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>सुबह के समय ज्यादा खतरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कुछ रिसर्च बताती हैं कि हार्ट अटैक सुबह के समय, खासकर सुबह 4 बजे से 10 बजे के बीच, ज़्यादा आते हैं. ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि इस समय हमारे शरीर की प्राकृतिक लय (सर्कैडियन रिदम) के कारण ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन बढ़ जाती है, और स्ट्रेस हार्मोन का स्तर भी ऊपर होता है. अगर किसी को पहले से ही दिल की बीमारी का खतरा है और वह इस समय अचानक जागता है, तो जोखिम बढ़ सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>खराब नींद की गुणवत्ता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सिर्फ नींद की अवधि ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी अहम है. अगर आपको गहरी और आरामदायक नींद नहीं मिलती, या आपकी नींद बार-बार टूटती है, तो यह दिल की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या करें?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अगर आपको अक्सर रात में अचानक नींद खुल जाती है. सांस लेने में दिक्कत होती है या दिन में बहुत ज़्यादा थकान महसूस होती है, तो डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें. वे आपकी समस्या की सही वजह पता लगा सकते हैं और आपको सही इलाज या लाइफस्टाइल में बदलाव की सलाह दे सकते हैं. बता दें कि अपनी नींद की आदतों पर ध्यान देना और अगर कोई समस्या है, तो उसका इलाज करवाना आपके दिल को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/eyes-detect-diabetes-or-cancer-do-not-ignore-these-signs-2976157">आंखें बताती हैं इन खतरनाक बीमारियों का पता, गलती से भी न करें नजरअंदाज</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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क्या आपको भी आ रही है बार-बार पेशाब? इस खतरनाक बीमारी के हो सकते हैं संकेत

क्या आपको भी आ रही है बार-बार पेशाब? इस खतरनाक बीमारी के हो सकते हैं संकेत


Frequent Urination Diabetes: सफर पर हैं या किसी पार्टी में शामिल हैं और हर थोड़ी देर में पेशाब जाने की तलब आपको बार-बार उठने पर मजबूर कर रही है. पहले-पहल आपको ये आम बात लग सकती है. शायद ज्यादा पानी पी लिया होगा या ठंड का असर है. लेकिन अगर यही समस्या रोजाना और लगातार हो रही है तो ये आपके शरीर के भीतर चल रही किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है.

यूरोलॉजिस्ट डॉ. ओंकार सिंह अपने यूट्यूब चैनल के जरिए बताते हैं कि, बार-बार पेशाब आना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जब यह आदत बन जाए और दिन के साथ-साथ रात को भी चैन से सोने न दे तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. उन्होंने इसके लक्षण का भी जिक्र किया है. 

ये भी पढ़े- हाथ पर भी दिखते हैं फैटी लिवर के लक्षण, पता लगते ही भागें डॉक्टर के पास

मधुमेह

अगर बार-बार पेशाब आ रही है और साथ में बहुत ज्यादा प्यास भी लग रही है, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है. इस स्थिति में शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को यूरिन के माध्यम से बाहर निकालता है, जिससे पेशाब की मात्रा और बारंबारता बढ़ जाती है.

मूत्र संक्रमण

महिलाओं में UTI एक आम कारण है बार-बार पेशाब आने का, इस संक्रमण में पेशाब करते समय जलन महसूस होती है और बार-बार पेशाब आने की इच्छा होती है, भले ही मूत्र की मात्रा कम हो.

ओवरएक्टिव ब्लैडर

यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें मूत्राशय बार-बार संकुचन करता है, भले ही वह पूरी तरह भरा न हो. इसके कारण पेशाब की इच्छा अचानक और तीव्र होती है.

प्रोस्टेट ग्रंथि की समस्या

बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्रमार्ग पर दबाव डाल सकती है, जिससे मूत्र का संपूर्ण प्रवाह बाधित होता है और व्यक्ति को बार-बार पेशाब की जरूरत महसूस होती है.

गर्भावस्था

महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान बच्चेदानी का दबाव मूत्राशय पर पड़ता है, जिससे पेशाब बार-बार आती है. हालांकि यह एक सामान्य स्थिति होती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा बढ़े तो जांच करवाना जरूरी होता है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है?

जब बार-बार पेशाब आने के साथ-साथ जलन हो

यूरिन में खून या असामान्य रंग दिखे

बहुत ज्यादा प्यास लगे और वजन तेजी से घटने लगे

रात को कई बार पेशाब की वजह से नींद टूटे

उपचार और बचाव के उपाय

शुगर लेवल की नियमित जांच कराएं

अधिक पानी पीने और बहुत कम पानी पीने दोनों से बचें

टॉयलेट जाने में देरी न करें

कैफीन और अल्कोहल से परहेज करें

साफ-सफाई का ध्यान रखें, खासकर जननांगों की

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हाथ पर भी दिखते हैं फैटी लिवर के लक्षण, पता लगते ही भागें डॉक्टर के पास

हाथ पर भी दिखते हैं फैटी लिवर के लक्षण, पता लगते ही भागें डॉक्टर के पास


Symptoms of Fatty Liver in Hands: कुछ लोग अपने व्यस्त जीवन की वजह से सेहत पर ध्यान नहीं दे पाते, खाने-पीने का समय नहीं, जंक फूड खाते-खाते ऑफिस का काम करना, यहीं सब आपको एक दिन बड़ी बीमारियों की तरफ लेकर चला जाता है. उन्हीं बीमारियों में से एक है फैटी लीवर, इसके संकेत कई बार आपकी हथेलियों और उंगलियों में नजर आते हैं. एक बार एक लड़की के साथ ऐसा ही कुछ हुआ था, तब उसने डॉक्टर से मिलने का फैसला किया था. जांच के बाद चौंकाने वाला खुलासा हुआ, उनके पता चला कि, फैटी लीवर की समस्या ने उसे जकड़ लिया है.

गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी की मदद से जानिए कि, हाथों में दिखने वाले फैटी लिवर के लक्षण कौन-कौन से होते हैं और क्यों इन लक्षणों को नजरअंदाज करना आपकी सेहत के लिए भारी पड़ सकता है.

ये भी पढ़े- बिना देर किए पहचानें लिवर सिरोसिस के संकेत, ये लक्षण कर सकते हैं परेशान

पामर एरिथेमा

हथेलियों का लाल हो जाना. यह तब होता है जब लिवर ठीक से काम नहीं कर रहा होता और शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं.

डुप्युट्रेन कॉन्ट्रैक्चर

हथेली की त्वचा मोटी हो जाती है और उंगलियां मुड़ने लगती हैं. यह फैटी लिवर या लिवर से जुड़ी अन्य बीमारियों का संकेत हो सकता है.

नाखूनों में बदलाव

नाखूनों पर सफेद धब्बे, या नाखूनों के नीचे नीला रंग दिखाई देना, ये संकेत लिवर के कमजोर होने से जुड़े हो सकते हैं.

हथेलियों में अत्यधिक पसीना आना

अगर बिना कारण हथेलियां पसीने से भीगती रहती हैं, तो यह शरीर में मेटाबॉलिज्म गड़बड़ी या लिवर स्ट्रेस का लक्षण हो सकता है.

हथेलियों की खुजली या जलन

लिवर में सूजन के कारण शरीर में बाइल साल्ट्स का जमाव होता है, जिससे हथेलियों में खुजली और जलन हो सकती है.

कब डॉक्टर के पास जाएं?

अगर ये लक्षणों में से कोई भी लगातार बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) और अल्ट्रासाउंड के जरिए समय पर निदान और इलाज संभव है.

बचाव के उपाय

हेल्दी और संतुलित आहार लें

फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं

शराब से बचें

समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराएं

शरीर हर समय हमें संकेत देता है, बस जरूरत है उन्हें समझने की, हाथों में दिखने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि ये आपके लिवर की कहानी बयान कर रहे होते हैं. समय रहते डॉक्टर से संपर्क कर आप बड़ी बीमारी से खुद को बचा सकते हैं.

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भारतीय वैज्ञानिक ने ढूंढ ली इस खतरनाक बीमारी की काट, अंग्रेज भी सुनेंगे तो हो जाएंगे खुश

भारतीय वैज्ञानिक ने ढूंढ ली इस खतरनाक बीमारी की काट, अंग्रेज भी सुनेंगे तो हो जाएंगे खुश


यह खबर वाकई दिल खुश कर देने वाली है. भारतीय वैज्ञानिकों ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज और इसे रोकने के लिए एक नई वैक्सीन बनाई है. उम्मीद की जा रही है कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2030 तक इस भयानक बीमारी को खत्म किया जा सकता है. यह हमारे देश के लिए और दुनिया भर की महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है.

यह नया टीका क्या है और कैसे काम करेगा?

आजकल जब कैंसर होता है तो उसका इलाज सर्जरी, कीमोथेरेपी या रेडिएशन से होता है, इसमें काफी दर्द और साइड इफेक्ट होते हैं. हालांकि, जिस नए टीके की बात हो रही है, उसका मकसद सिर्फ कैंसर का इलाज करना नहीं है, बल्कि उसे होने से रोकना भी है. यह ठीक वैसे ही है जैसे पोलियो या चेचक जैसी बीमारियों को टीके से खत्म किया गया था. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वैक्सीन शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करेगा. 

यह शरीर को ऐसे खास तत्व बनाने के लिए कहेगा जो कैंसर की कोशिकाओं को पहचान कर उन्हें खत्म कर सकें या उन्हें बढ़ने से रोक सकें. अगर यह सफल होता है, तो कैंसर के इलाज में एक बड़ा बदलाव आ जाएगा. मरीजों को कम दर्द सहना पड़ेगा और वे बेहतर तरीके से ठीक हो पाएंगे.इस टीके को बनाने में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार जैसे शोधकर्ता खास भूमिका निभा रहे हैं. उनका यह काम विज्ञान के क्षेत्र में भारत की एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है.

2030 तक का लक्ष्य: क्या यह मुमकिन है?

2030 तक ब्रेस्ट कैंसर को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य सुनने में थोड़ा बड़ा लग सकता है, लेकिन यह वैज्ञानिकों को और तेज़ी से काम करने के लिए हिम्मत दे रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इस टीके के इंसानों पर होने वाले टेस्ट (क्लिनिकल ट्रायल) सफल होते हैं और अच्छे नतीजे देते हैं, तो यह मुमकिन हो सकता है.

किसी भी नए टीके या दवा को बाजार में आने से पहले कई कड़े टेस्ट से गुजरना पड़ता है. इसमें कई साल लग सकते हैं. लेकिन, इस क्षेत्र में जिस तेज़ी से काम हो रहा है और भारत के वैज्ञानिकों की कोशिशों को देखते हुए यह उम्मीद बढ़ी है कि यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. हाल ही में, केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने भी महिलाओं के लिए एक खास कैंसर वैक्सीन के अगले पांच-छह महीनों में मिलने की बात कही है. हालांकि, वो सर्वाइकल कैंसर के एचपीवी वैक्सीन से जुड़ा हो सकता है, जो पहले से मौजूद है. ब्रेस्ट कैंसर की वैक्सीन अभी शुरुआती टेस्ट में है.

भारत के लिए यह क्यों अहम है?

भारत में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, चाहे वे शहरों में हों या गांवों में. अगर यह टीका सफल होता है, तो यह न सिर्फ लाखों महिलाओं की जान बचाएगा, बल्कि देश पर पड़ने वाले स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ को भी कम करेगा. इससे भारत चिकित्सा रिसर्च और नई खोजों में दुनिया का लीडर भी बन सकता है.

ये भी पढ़ें: आंखें बताती हैं इन खतरनाक बीमारियों का पता, गलती से भी न करें नजरअंदाज

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आंखें बताती हैं इन खतरनाक बीमारियों का पता, गलती से भी न करें नजरअंदाज

आंखें बताती हैं इन खतरनाक बीमारियों का पता, गलती से भी न करें नजरअंदाज



<p style="text-align: justify;">क्या आप जानते हैं कि आपकी आंखें आपकी सेहत के बारे में कितनी कुछ बता सकती हैं? यह सिर्फ आंखों की बीमारियों से कहीं बढ़कर है. दरअसल, आपके ऑप्टोमेट्रिस्ट आपकी आंखों की जांच करके कुछ बहुत ही गंभीर बीमारियां भी पकड़ सकते हैं. इनमें डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर तक शामिल हैं. आंखों में इन बीमारियों के लक्षण समझकर, उन्हें जल्दी पहचाना जा सकता है और समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है, जिससे आप अपनी सेहत पर पड़ने वाले बुरे असर को कम कर सकें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंखें हैं सेहत का आईना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कहते हैं आंखें आत्मा की खिड़की होती हैं, लेकिन सच तो यह है कि वे आपकी सेहत का भी आईना होती हैं. भले ही आप खुद अपनी आंखों में सेहत से जुड़े बदलावों को न देख पाएं, लेकिन आपके आंखों के डॉक्टर उन्हें ज़रूर पहचान सकते हैं. आंखों से जुड़ी समस्याओं को देखने के अलावा, आंखों की पूरी जांच कई बीमारियों के संकेत भी दिखा सकती है. इनमें दिमाग के ट्यूमर और कुछ दूसरे तरह के कैंसर, साथ ही डायबिटीज भी शामिल हैं. इसलिए, अपनी आंखों की जांच हर दो साल में, या हो सके तो हर साल ज़रूर करवाएं, ताकि बीमारियों के लक्षण छूट न जाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंखों की जांच से डायबिटीज का पता कैसे चलता है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डायबिटीज के लक्षणों में से एक है डायबिटिक रेटिनोपैथी. यह डायबिटीज से जुड़ी एक समस्या है जो आंखों को प्रभावित करती है. यह आंख के पिछले हिस्से में मौजूद रेटिना की खून की नसों को नुकसान पहुंचने के कारण होती है. इससे देखने में दिक्कत हो सकती है और अगर इसका इलाज न किया जाए, तो अंधापन भी हो सकता है. यह समस्या टाइप 1 या टाइप 2 डायबिटीज, दोनों में हो सकती है. खून में शुगर का स्तर ठीक से कंट्रोल न होने पर और समय के साथ इसके होने की संभावना बढ़ जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डायबिटिक रेटिनोपैथी के लक्षण:</strong> शुरुआती स्टेज में डायबिटिक रेटिनोपैथी के कोई खास लक्षण दिखते नहीं हैं. लेकिन, जैसे-जैसे यह बढ़ती है, तो कुछ निशान दिखने लगते हैं, जैसे:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;">देखने में काले धब्बे या धागे दिखना.</li>
<li style="text-align: justify;">धुंधला या बदलता हुआ दिखना.</li>
<li style="text-align: justify;">देखने में काले या खाली हिस्से दिखना.</li>
<li style="text-align: justify;">नज़र कम होना.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>पहचान और जांच:</strong> आपके आंखों के डॉक्टर नियमित आंखों की जांच के दौरान, जिसमें पुतलियों को फैलाना भी शामिल है, इसका पता लगा सकते हैं. अगर आपको डायबिटीज है, तो आपका ऑप्टोमेट्रिस्ट हर चेक-अप में इसे ज़रूर देखेगा. आंखों की पूरी जांच के ज़रिए, डॉक्टर रेटिना की सेहत का अंदाज़ा लगा सकते हैं, डायबिटिक रेटिनोपैथी के संकेतों को पहचान सकते हैं और नज़र के स्थायी नुकसान को रोकने के लिए जल्दी इलाज कर सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंखों की सेहत और कैंसर का संबंध</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आपके आंखों के डॉक्टर एक सामान्य जांच में आंखों से जुड़े कैंसर के लक्षणों को पहचान सकते हैं. यह ओकुलर मेलानोमा (एक प्रकार का आंखों का कैंसर) या आंखों से संबंधित दूसरे कैंसर हो सकते हैं. इसके अलावा, वे दिमाग के ट्यूमर के लक्षणों को भी पहचान सकते हैं, यहां तक कि आपके नियमित डॉक्टर से भी पहले. दिमाग के ट्यूमर से दिमाग में दबाव बढ़ सकता है, जिससे ऑप्टिक नर्व में बदलाव या नुकसान हो सकता है. ऑप्टोमेट्रिस्ट आँखों में इन बदलावों को पहचानने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, जो दिमाग के ट्यूमर का संकेत हो सकते हैं. वे एन्यूरिज्म (खून की नसों में सूजन) और दूसरी समस्याओं का भी पता लगा सकते हैं, जो आंखों को प्रभावित करती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैंसर से जुड़े आंखों के लक्षण:</strong> आपकी आंखों में कुछ बदलाव दिख सकते हैं, जो कैंसर का संकेत हो सकते हैं. इनमें शामिल हैं:</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;">आंखों में गहरे धब्बे, उभार, या असामान्य खून की नसें दिखना. ये ओकुलर मेलानोमा के लक्षण हो सकते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;">आंखों के अंदर असामान्य वृद्धि या घाव होना. ये इंट्राओकुलर कैंसर (आंख के अंदर का कैंसर) का संकेत हो सकते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;">अगर आपके ऑप्टोमेट्रिस्ट को इनमें से कुछ भी दिखता है और उन्हें कैंसर का शक होता है, तो वे शायद आपको आगे की जांच के लिए किसी दूसरे विशेषज्ञ के पास भेजेंगे.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरी बीमारियों के भी मिल सकते हैं संकेत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डायबिटीज और कैंसर के अलावा, ऑप्टोमेट्रिस्ट दूसरे स्वास्थ्य समस्याओं के संकेत भी पहचान सकते हैं. इनमें हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ल्यूपस और रुमेटॉयड आर्थराइटिस जैसी बीमारियां शामिल हैं. इनमें से ज़्यादातर बीमारियां रेटिना की खून की नसों में अनियमितताओं के ज़रिए पहचानी जा सकती हैं. आप खुद इन बदलावों को शायद न देख पाएं, लेकिन आपका आंखों का डॉक्टर आंखों की जांच के दौरान उन्हें देख सकता है. ये जांचें न केवल आपकी नज़र को बचाने के लिए बेहद ज़रूरी हैं, बल्कि सेहत से जुड़ी संभावित समस्याओं का पता लगाने के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जल्दी पहचान क्यों जरूरी है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ओकुलर मेलानोमा और दूसरे इंट्राओकुलर कैंसर का जल्दी पता चलना सही इलाज शुरू करने और ठीक होने की संभावना को बढ़ाने के लिए बहुत ज़रूरी है. आंखों में इन बीमारियों के संकेतों को पहचानकर, डॉक्टर मरीजों को तुरंत आगे की जांच और सही इलाज के लिए भेज सकते हैं. इसीलिए, हर छह महीने या साल में एक बार डॉक्टर के पास जाना आपकी सेहत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक अहम कदम है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/former-cji-chandrachud-daughter-priyanka-mahi-disease-nemaline-myopathy-symptoms-treatment-2975611">किस बीमारी से जूझ रहीं पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की दोनों बेटियां, जानें ये कितनी खतरनाक?</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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