पीरियड्स के दर्द का देसी इलाज, इन 6 चीजों को खाने से मिलेगी राहत
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पीरियड्स के दर्द का देसी इलाज, इन 6 चीजों को खाने से मिलेगी राहत
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<p style="text-align: justify;">प्रेग्नेंसी किसी भी महिला के लिए एक खास पल होता है. इस दाैरान महिला के शरीर में कई तहर के बदलाव देखने को मिलते हैं. ऐसे में कई बातों का ध्यान रखने की भी जरूरत होती है. कपल्स के बीच एक सवाल को लेकर मन में हमेशा शंका रहती है कि इस दाैरान संबंध बनाने चाहिए या नहीं. क्या इससे गर्भ में पल रहे बच्चे पर कोई असर तो नहीं पड़ेगा? या मां को कुछ नुकसान तो नहीं पहुंचेगा? आइए जानते हैं कि हेल्थ एक्सपर्ट्स इस बारे में क्या कहते हैं…</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या प्रेग्नेंसी में संबंध बना सकते हैं?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो प्रेग्नेंसी के दाैरान बाॅडी में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर प्रेग्नेंसी में कोई दिक्कत नहीं है तो इस दौरान दौरान संबंध बना सकते हैं. यह सुरक्षित या कम जोखिम वाला माना जाता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो प्रेग्नेंसी के दाैरान शरीर में कुछ हार्मोनल बदलाव हो सकते हैं, जिससे संबंध बनाने की इच्छा हो सकती है. लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है. क्योंकि गर्भ में शिशु पर इसका कोई निगेटिव असर नहीं पड़ता है. शिशु गर्भाशय में सुरक्षित रहता है. हालांकि, कुछ स्थितियों में बिना डॉक्टर की सलाह के संबंध बनाना जोखिम भरा हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पार्टनर के मन को समझें</strong></p>
<p style="text-align: justify;">प्रेग्नेंसी के पहले तिमाही में थकान, मिचली और हार्मोनल बदलाव के कारण इच्छा कम हो सकती है. वहीं दूसरी तिमाही में बहुत सी महिलाएं ज्यादा आराम महसूस करती हैं. तीसरी तिमाही में पेट का आकार बढ़ जाने से पोजिशन चुनने में सावधानी रखनी चाहिए. ऐसे में प्रेग्नेंसी के दाैरान संबंध बनाने से पहले पार्टनर के मन की बात को समझना भी जरूरी होता है. इस दौरान फिजिकल इंटीमेसी से ज्यादा जरूरी है, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना. अगर किसी वजह से मन नहीं है या शरीर तैयार नहीं है, तो जोर डालना गलत है. कपल्स को खुलकर बात करनी चाहिए और एक-दूसरे की सहमति का सम्मान करना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रेग्नेंसी में कब नहीं बनाने चाहिए संबंध?</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>प्लेसेंटा प्रिविया:</strong> प्लेसेंटा प्रिविया को निचला प्लेसेंटा भी कहा जाता है. गर्भावस्था के दाैरान ये स्थिति कॉम्पलिकेशन बनाती है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>प्रीमैच्योर डिलीवरी का रिस्क:</strong> अगर किसी प्रेग्नेंसी कॉम्पलिकेशन के चलते प्री-मैच्योर डिलीवरी का रिस्क रहता है तो भी संबंध बनाने से बचना चाहिए. इससे रिस्क बढ़ सकता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>मिसकैरेज:</strong> अगर पूर्व में मिसकैरेज की कोई हिस्ट्री रही है तो ऐसे में सतर्कता बरतनी चाहिए. इस स्थिति में संबंध बनाना रिस्की हो सकता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>जुड़वा बच्चे:</strong> अगर गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं तो हेल्थ एक्सपर्ट्स संबंध बनाने से बचने की सलाह दे सकते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी:</strong> गर्भावस्था की इस स्थिति में संबंध बनाना रिस्क भरा हो सकता है. ऐसे में इस दाैरान सतर्क रहना चाहिए.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/can-drinking-too-much-ro-water-make-you-sick-2972718">साफ पानी के लिए RO करते हैं इस्तेमाल, जानें कितनी बीमारियों को लगाते हैं गले?</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>
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Digestive System in Space: जब कोई अंतरिक्ष यात्री धरती से हजारों किलोमीटर दूर जीवन बिताता है तो वहां का हर अनुभव न सिर्फ अनोखा होता है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है. ऐसे ही एक खास मिशन पर गए हैं भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, जो फिलहाल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर मौजूद हैं और वे कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध और शैक्षणिक गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं.
बता दें, अंतरिक्ष में जहां हर चीज तैरती हुई नजर आती है, वहीं शरीर के अंदर की प्रक्रियाएं भी उसे प्रभावित करती हैं. खासकर पाचन तंत्र, जो शरीर को ठीक रखने के लिए अहम भूमिका निभाता है. आइए जानते हैं कि अंतरिक्ष में पाचन कैसे प्रभावित होता है और वहां मौजूद अंतरिक्ष यात्री अपने पेट और आंतों की सेहत को कैसे बनाए रखते हैं.
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अंतरिक्ष में पाचन पर पड़ता है गुरुत्वाकर्षण की कमी का असर
धरती पर हमारा पाचन तंत्र एक प्राकृतिक प्रक्रिया पर काम करता है जिसे पेरिस्टैलसिस कहते हैं. यह एक लहर जैसी मांसपेशियों की गति होती है, जो भोजन को धीरे-धीरे पेट और आंतों में आगे बढ़ाती है. लेकिन अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण न होने के कारण यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है.
अंतरिक्ष में गट माइक्रोबायोम में आता है बदलावट
अंतरिक्ष में एक और बड़ी चुनौती होती है गट माइक्रोबायोम यानी हमारे पेट में मौजूद अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का संतुलन. अलग तरह की डाइट के कारण यह संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण और शरीर की इम्युनिटी प्रभावित हो सकती है.
अंतरिक्ष यात्री कैसे रखते हैं अपनी आंतों को स्वस्थ?
प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स: अंतरिक्ष यात्री अच्छे बैक्टीरिया प्रोबायोटिक्स लेते हैं और ऐसा भोजन करते हैं, जिसमें प्रीबायोटिक्स हो जैसे फाइबर युक्त चीजें.
स्पेशल डाइट: अंतरिक्ष यात्रियों की डाइट खास होती है, जिसमें आंतों को सपोर्ट करने वाले खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं.
गट चेकअप: वैज्ञानिक अंतरिक्ष यात्रियों के गट बैक्टीरिया की नियमित जांच करते हैं और जरूरत के अनुसार डाइट या दवाओं में बदलाव करते हैं.
नियमित एक्सरसाइज: व्यायाम न केवल मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखता है, बल्कि पाचन में भी मदद करता है.
अतिरिक्त विटामिन्स और मिनरल्स: अंतरिक्ष में पोषक तत्वों का अवशोषण कठिन होता है, इसलिए अंतरिक्ष यात्री सप्लिमेंट्स लेते हैं.
स्पेस में जाने से पहले तैयारी: मिशन से पहले ही अंतरिक्ष यात्री अपने पाचन तंत्र की विशेष तैयारी करते हैं, जिससे आगे जाकर समस्याएं कम हों.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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<p style="text-align: justify;"><strong>Ayurved News:</strong> पतंजलि आयुर्वेद का दावा है कि कंपनी के उत्पादों ने भारतीय घरों में अपनी खास जगह बनाई है. आज के दौर में जब लोग रासायनिक उत्पादों से दूर प्राकृतिक और समग्र स्वास्थ्य समाधानों की ओर बढ़ रहे हैं, पतंजलि के उत्पाद और वेलनेस प्रोग्राम लोगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">कंपनी का दावा है, ”पतंजलि की सफलता का राज इसके उत्पादों की गुणवत्ता और प्राकृतिक सामग्री में है. लोगों ने पतंजलि का एलोवेरा जेल आज़माया और जल्द ही सब इसके प्रशंसक बन गए. लोगों ने बताया कि यह जेल उनकी त्वचा के लिए रासायनिक उत्पादों से कहीं बेहतर साबित हुआ. इसी तरह लोगों ने पतंजलि के दंत कांति टूथपेस्ट का उपयोग शुरू किया और उनके मसूड़ों की समस्या में सुधार हुआ. ये कहानियां दर्शाती हैं कि पतंजलि के उत्पाद न केवल प्रभावी हैं, बल्कि लोगों का भरोसा भी जीत रहे हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पंचकर्म और नेचुरोपैथी से मिल रहा फायदा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कंपनी ने बताया है, ”पतंजलि वेलनेस सेंटर भी लोगों को आयुर्वेदिक उपचार, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के ज़रिए स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर रहे हैं. पंचकर्म और नेचुरोपैथी जैसी थेरेपीज़ शरीर को डिटॉक्स करने और मानसिक शांति देने में मदद करती हैं. उदाहरण के लिए हाइड्रोथेरेपी और मड थेरेपी जैसी तकनीकों ने लोगों को तनाव और पुरानी बीमारियों से राहत दिलाई है. पतंजलि के योग और ध्यान सत्र भी लोगों को शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;">पतंजलि का दावा है कि उनकी दुकानों में आयुर्वेदिक डॉक्टर मुफ्त सलाह देते हैं, जो ग्राहकों की स्थिति के अनुसार उत्पाद सुझाते हैं. यह दृष्टिकोण ग्राहकों के बीच विश्वास पैदा करता है और आयुर्वेद को और भी लोकप्रिय बनाता है. चाहे वह केश कांति शैंपू हो, गुलाब शरबत हो, या च्यवनप्राश, पतंजलि के उत्पाद भारतीय परंपराओं पर आधारित हैं और आधुनिक ज़रूरतों को पूरा करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देता आयुर्वेद</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कंपनी ने कहा, ”पतंजलि की ये कहानियां बताती हैं कि आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचार न केवल बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं, बल्कि एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देते हैं. जैसे-जैसे लोग प्राकृतिक उत्पादों की ओर बढ़ रहे हैं, पतंजलि का योगदान आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण है.”</p>
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<p style="text-align: justify;">कोरोना संक्रमण के बाद हार्ट प्राॅब्लम में इजाफा देखने को मिला. युवाओं में तेजी से हार्ट अटैक के केस सामने आए. इसको अक्सर वैक्सीन से जोड़कर देखा गया. इसे लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे, लेकिन अब इन सभी आशंकाओं को आईसीएमआर और एम्स की स्टडी ने दूर कर दिया है. स्टडी में दावा किया गया है कि देश में हो रहीं अचानक मौतों की वजह कोरोना वैक्सीन नहीं है. देश में 40 साल से कम उम्र के लोगों में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं और खासकर कोरोना महामारी के बाद इनमें खासा इजाफा हुआ है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि कोरोना वैक्सीन और युवाओं में दिल का दौरा पड़ने में कोई संबंध नहीं है.<br /> <br /><strong>क्यों उठ रहे सवाल?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">देश में कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए वैक्सीन लगाई गई. वैक्सीन के प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे. वैक्सीनेशन के बाद हार्ट अटैक के मामले तेजी से देशभर में सामने आए. इसमें युवाओं में भी हार्ट अटैक के केस देखे गए. इसे कोरोना वैक्सीन के असर से जोड़कर बताया गया. हाल ही में कर्नाटक के हासन जिले में दिल का दौरा पड़ने से कई युवाओं की मौत हुई है, जिसके बाद कर्नाट के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने एक बयान में दिल का दौरा पड़ने के लिए कोरोना वैक्सीन को जिम्मेदार बताया था, लेकिन केंद्र सरकार ने उनके दावे को खारिज कर दिया है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्टडी ने शंकाओं को किया दूर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">देश में 18 से 45 साल के बीच के लोगों की अचानक माैत की वजह जानने के लिए आईसीएमआर और एनसीडीसी मिलकर काम कर रहे हैं. इसको लेकर अब तक दो स्टडीज की गई हैं. इनमें पहली स्टडी पिछले डाटा पर आधारित थी. इसे आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (एनआईई) ने अंजाम दिया. जिसमें 18-45 वर्ष की आयु के एडल्ट में अचानक होने वाली मौतों की वजह जानने का प्रयास किया गया. मई से अगस्त 2023 तक 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 47 क्षेत्रीय अस्पतालों में ये स्टडी की गई. स्टडी में ऐसे व्यक्तियों को शामिल किया गया जो स्वस्थ दिख रहे थे, लेकिन अक्टूबर 2021 और मार्च 2023 के बीच अचानक उनकी माैत हो गई. स्टडी में सामने आया कि कोविड वैक्सीनेशन युवाओं में अचानक होने वाली मौतों का रिस्क नहीं बढ़ाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरी स्टडी में ये सामने आई जानकारी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">दूसरी स्टडी एम्स और आईसीएमआर ने की. ये स्टडी वर्तमान की जांच पर आधारित रही. ‘युवाओं में अचानक होने वाली मौतों के कारणों का पता लगाना’ नामक शीर्षक से की गई इस स्टडी का फोकस भी अचानक होने वाली माैतों पर रहा. स्टडी में सामने आया कि हार्ट अटैक या मायोकार्डियल इंफार्क्शन (एमआई) 18 से 45 आयु वर्ग में अचानक मौत का प्रमुख कारण बना है. स्टडी के अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में इन कारणों के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया. स्टडी में पाया गया है कि जेनेटिक म्यूटेशन के चलते दिल का दौरा पड़ने जैसी घटनाएं बढ़ी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>देश में इस तरह सामने आए कोरोना के केस</strong></p>
<p style="text-align: justify;">देश में 31 जनवरी 2020 से पांच मई 2023 तक 44965569 कोरोना संक्रमण के केस सामने आए. कोविड 19 डैशबोर्ड के अनुसार इस दाैरान 531642 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. वहीं छह मई 2023 से 31 दिसंबर 2024 तक 76096 केस सामने आए. इस दाैरान 2002 लोगों इस संक्रमण की चपेट में आकर माैत हो गई. देश में एकबार फिर कोरोना संक्रमण के केस सामने आ रहे हैं. जनवरी 2025 से अब तक देश में कोरोना के 26 हजार से अधिक केस सामने आ चुके हैं. इनमें 146 लोगों की माैत हुई है. एक हजार से अधिक एक्टिव केस हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/can-drinking-too-much-ro-water-make-you-sick-2972718">साफ पानी के लिए RO करते हैं इस्तेमाल, जानें कितनी बीमारियों को लगाते हैं गले?</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>
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Fear of Ventilator: अगर किसी मरीज के इलाज के दौरान डॉक्टर कह दें कि अब वेंटिलेटर की जरूरत है, तो ज्यादातर लोगों के चेहरे का रंग फीका पड़ जाता है. घरवाले घबरा जाते हैं, मरीज की हालत को लेकर डर और चिंता और भी बढ़ जाती है. दरअसल, “वेंटिलेटर” शब्द सुनते ही मन में एक डर बैठ जाता है कि अब स्थिति बेहद गंभीर है या शायद अब बचना मुश्किल है. लेकिन क्या वाकई वेंटिलेटर का मतलब हमेशा यही होता है? क्या यह सिर्फ अंतिम चरण का इलाज होता है या फिर एक जरूरी मेडिकल सपोर्ट सिस्टम है? इसलिए हम जानेंगे कि वेंटिलेटर का असली मतलब क्या होता है, यह कब और क्यों इस्तेमाल किया जाता है और क्यों इससे जुड़ा डर हमें दूर कर देना चाहिए.
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वेंटिलेटर की कब जरूरत पड़ती है ?
सर्जरी के दौरान या बाद में, जब मरीज बेहोश हो और खुद से सांस न ले पा रहा हो
कोमा या ब्रेन हेमरेज जैसी स्थिति में, जब मस्तिष्क सांस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित नहीं कर पा रहा हो
गंभीर निमोनिया, कोरोना, या फेफड़ों की बीमारी में, जब फेफड़े ऑक्सीजन को सही तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाते
एक्सीडेंट या ट्रॉमा के बाद, जब शरीर को स्थिर रखने के लिए कृत्रिम सांस की जरूरत होती है
लोग वेंटिलेटर से क्यों डरते हैं?
मनोवैज्ञानिक डर: आम लोगों के बीच वेंटिलेटर को अंतिम समय का संकेत मान लिया गया है. जब किसी को वेंटिलेटर पर रखा जाता है, तो लोगों को लगता है कि अब उम्मीद कम है.
अज्ञानता: बहुत से लोग नहीं जानते कि वेंटिलेटर केवल एक सपोर्ट सिस्टम है, न कि मृत्यु की पुष्टि. यह एक अस्थायी सहायता है, जिससे शरीर को रिकवर करने का समय दिया जाता है.
मीडिया और फिल्मों का प्रभाव: फिल्मों और टीवी शोज़ में वेंटिलेटर को अकसर मौत से जोड़कर दिखाया गया है, जिससे लोगों की सोच प्रभावित होती है.
वेंटिलेटर का सही नजरिया
हकीकत ये है कि वेंटिलेटर ने लाखों लोगों की जान बचाई है. यह एक मेडिकल सहारा है जो शरीर को सांस लेने में मदद करता है, ताकि मरीज की हालत स्थिर हो सके और उसे इलाज का समय मिल सके. कई बार मरीज कुछ दिनों में ही वेंटिलेटर से हट जाता है और पूरी तरह ठीक हो जाता है.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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