वर्कप्लेस पर है तनाव तो ऐसे पा सकते हैं छुटकारा, आज से शुरू करें ये काम

वर्कप्लेस पर है तनाव तो ऐसे पा सकते हैं छुटकारा, आज से शुरू करें ये काम



<p style="text-align: justify;">आजकल के डिजिटली एनवायरनमेंट में वर्क प्लेस पर स्ट्रेस बढ़ रहा है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार स्ट्रेस संबंधी डिसऑर्डर अब दुनियाभर में प्रोफेशन दिक्कतों के बीच बड़ी समस्या बनकर उभरा है. लगातार वर्क, डेडलाइन, जाॅब सिक्योरिटी जैसी कुछ वजहों से कर्मचारियों में निराशा बढ़ रही है. ऐसे में इसका असर उनकी प्रोड​​क्टिविटी के साथ फैमिली पर भी देखने को मिल सकता है. ऐसे में किस तरह इसको बैलेंस किया जा सकता है. आइए जानते हैं</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसलिए बढ़ रहा स्ट्रेस</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>हमेशा काम से जुड़े रहना:</strong> डिजिटली फ्रेमवर्क में कंपनी की कर्मचा​री तक पहुंच आसान हो गई है. स्मार्टफोन पर चैट से बातचीत और मोबाइल से ही ईमेल आदि सुविधाएं इतनी आम हो गई हैं कि वह लगातार इनसे जुड़ा रहता है. व्य​क्ति जाॅब पर हो या नहीं, लेकिन वह कंपनी के काम से हमेशा जुड़ा रहता है. इससे प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में डिस्टर्बेंस बढ़ता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>जाॅब जाने का डर:</strong> आ​र्टिफि​शियल इंटेलिजेंसी का दाैर और कंपनियों की ओर से लगातार कम की जा रही कर्मचारियों की संख्या के चलते हमेशा फ्यूचर को लेकर डर सताता रहता है. इससे स्ट्रेस लेवल बढ़ता है, जिसका हेल्थ पर असर पड़ता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>कमजोर साबित होने का डर:</strong> वर्कप्लेस पर स्ट्रेस और मेंटल हेल्थ से जूझने के बाद भी कंपनी मैनेजमेंट से इसको लेकर डिस्कस करने से कर्मचारी बचते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी समस्या को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें कमजोर करार दे दिया जाएगा.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>वर्कप्लेस पर स्ट्रेस दूर करने के लिए उठाने होंगे ये कदम</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>फ्लेक्सी वर्क पाॅलिसी:</strong> वर्कप्लेस पर कर्मचारियों को ऐसा माहाैल मिलना चाहिए, जिसमें वह काम करने की आजादी महसूस करें. ऐसे में उन्हें अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में बैलेंस बनाने में मदद मिलगी. वह घर पर बच्चों, बुजुर्गों आदि की देखभाल की जिम्मेदारी निभा सकेंगे, जिससे उनका स्ट्रेस लेवल कम होगा.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>वेलनेस प्रोग्राम शुरू होने चाहिए:</strong> कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ के लिए कुछ इनी​​शिएटिव शुरू होने चाहिए. जैसे 24 घंटे वर्क करने वाली मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन, कर्मचारियों की काउंसलिंग, मेंटल हेल्थ एप आदि. इनको इस तरह डेवलप किया जाएगा कि ये सभी की पहुंच में आसानी से हों. इसको लेकर कर्मचारियों को प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>मेंटल हेल्थ के ट्रेनिंग सेशन:</strong> किसी भी शारीरिक संकट की चुनाैतियों से निपटने के लिए वर्कप्लेस पर ट्रेनिंग सेशन होते रहते हैं. इसमें हार्ट अटैक या फिर अन्य किसी हेल्थ प्राॅब्लम से किस तरह निपटा जाए, जरूरत पड़ने पर किस फर्स्ट एड दी जाए आदि के बारे में बताया जाता है. इसी तरह मेंटल हेल्थ के भी सेशन होने चाहिएं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>कर्मचारियों से निरंतर बातचीत:</strong> कंपनी में टाॅप लीडर को कर्मचारियों से लगातार बातचीत करती रहती चाहिए. कर्मचारियेां के लिए सहायता ग्रुप बनाने चाहिए और ऐसा माहाैल बनाना चाहिए जिसमें कर्मचारी खुलकर अपनी बात रख सके. बिहेवियर को लेकर न सिर्फ एक खास दिन ब​ल्कि डेली चर्चा चाहिए.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>गुड परफाॅर्मेंस पर मिले रिवाॅर्ड:</strong> वर्कप्लेस पर अच्छा काम करने पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. टीम भावना को बढ़ावा देना चाहिए.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/every-hour-100-people-die-of-loneliness-related-causes-un-health-agency-reports-2972212">हर घंटे 100 लोगों की जान ले रहा अकेलापन, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक और लोगों को कैसे बनाती है अपना शिकार?</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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मिर्गी का दौरा पड़ते ही क्यों कट जाती है लोगों की जीभ, जानें शरीर में क्या होता है

मिर्गी का दौरा पड़ते ही क्यों कट जाती है लोगों की जीभ, जानें शरीर में क्या होता है


Epileptic Attack Tongue Bite: कोई व्यक्ति अचानक जमीन पर गिरता है, उसका पूरा शरीर कांपने लगता है और कुछ ही पल में उसके मुंह से झाग निकलने लगता है. अक्सर देखा गया है कि मिर्गी के दौरे के दौरान ऐसे ही दृश्य सामने आते हैं और सबसे चौंकाने वाली बात होती है कि जीभ का कट जाना. यह न केवल पीड़ित के लिए दर्दनाक होता है, बल्कि देखने वालों के लिए भी डरावना अनुभव बन जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मिर्गी के दौरे के दौरान जीभ क्यों कट जाती है? यह केवल एक दुर्घटना है या फिर इसका कोई वैज्ञानिक कारण भी है? 

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दौरे के दौरान शरीर में क्या होता है?

मिर्गी का दौरा पड़ने पर मस्तिष्क से अचानक और अनियंत्रित विद्युत सिग्नल्स निकलते हैं, जिससे पूरे शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं. खासकर पूरे शरीर में झटके आते हैं और जबड़े की मांसपेशियां भी कसकर बंद हो जाती हैं. 

जीभ क्यों कट जाती है?

जब मिर्गी का दौरा पड़ता है, तब व्यक्ति अपने होश में नहीं होता. इस दौरान जबड़े इतने तेजी से बंद होते हैं कि जीभ बीच में आ जाए तो वह कट जाती है. जीभ में नसें और रक्त धमनियां अधिक होती हैं, इसलिए कटते ही खून बहने लगता है. 

दौरे के समय क्या नहीं करना चाहिए

पीड़ित के मुंह में कोई चीज डालना– जैसे चम्मच, कपड़ा 

जबरन मुंह खोलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए

दौरे के समय उसे हिलाने या उठाने की कोशिश न करें

सही देखभाल क्या है

व्यक्ति को बाईं करवट लिटाएं, ताकि जीभ या लार गले में न फंसे 

आसपास की चीजें हटा दें, ताकि वह खुद को चोट न पहुंचा सके

दौरा रुकने के बाद उसे अस्पताल लेकर जाएं 

मिर्गी के दौरे के दौरान जीभ का कट जाना शरीर की अनियंत्रित प्रतिक्रियाओं का परिणाम होता है. यह खतरनाक हो सकता है, लेकिन सही जानकारी और प्राथमिक उपचार से इसकी गंभीरता को कम किया जा सकता है. यदि आपके आसपास किसी को मिर्गी की समस्या है, तो यह जानना जरूरी है कि दौरे के समय कैसे मदद करें. 

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कितनी मात्रा में शराब पीना बाॅडी के लिए सेफ? जान लें ये बात, फिर कभी नहीं पूछेंगे ऐसा सवाल

कितनी मात्रा में शराब पीना बाॅडी के लिए सेफ? जान लें ये बात, फिर कभी नहीं पूछेंगे ऐसा सवाल


कितनी में मात्रा शराब पीना सेफ है? ये एक ऐसा सवाल है कि जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है. लेकिन इससे पहले ये जानना जरूरी है कि इसके सेवन से शरीर पर क्या असर पड़ता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार शरीर के महत्वपूर्ण ऑर्गन पर शराब का असर पड़ता है. ये असर कितना खतरनाक हो सकता है और शराब के सेवन पर दुनिया के प्रमुख हेल्थ संगठनों की क्या सलाह है? आइए जानते हैं…

अल्कोहल कितना सेफ?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने अल्कोहल को ग्रुप 1 कार्सिनोजेन (कैंसर का जो​खिम बढ़ाने वाले तत्व) में रखा है. इस हाईएस्ट रिस्क ग्रुप में एस्बेस्टस, रेडिएशन और टोबैको भी शामिल हैं. जब बाॅडी में अल्कोहल पहुंचता है तो इथेनॉल डाजे​स्टिव सिस्टम में एसीटैल्डिहाइड में बदल जाता है, जो कैंसर के जो​खिम को बढ़ा सकता है.

कितनी मात्रा में शराब का सेवन करें?

रिचर्स रिपोर्ट्स की मानें तो काफी स्टडी के बाद भी इस सवाल का जवाब संदेह से भरा है. एक्सपर्ट्स की मानें तो कम मात्रा में शराब का सेवन करने वालों में भी हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ जाता है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार अल्कोहल से होने वाले कैंसर में आधे केसेज कम और सीमित मात्रा में शराब के सेवन से सामने आते हैं.

शराब से रिस्क

शराब पीने के जो​खिम को इस कदर समझा जा सकता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर कोई व्य​क्ति हफ्ते में 14 यूनिट शराब पीता है, ऐसे लोगों में माैत का रिस्क कम होता है. अल्कोहल से होने वाली 1000 माैतों में से एक व्य​क्ति 14 यूनिट शराब पीने वाला होता है. अगर कोई शराब का सेवन इससे अ​धिक करता है, तो अल्कोहल से होने वाली हर 300 माैतों में से एक व्य​क्ति 14 यूनिट से अ​धिक शराब पीने वाला होता है.

शराब से होने वाले नुकसान

  • बातों को भूलने लगते हैं: शराब के सेवन से डिप्रेशन, एंक्जाइटी और नींद की समस्या हो सकती है. इसका असर याददाश्त पर भी पड़ने लगता है. निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होने लगती है. लंबे समय तक ऐसा रहने से ​स्थिति गंभीर हो सकती है.
  • हार्ट पर असर: शराब पीने से बाॅडी में ब्लड प्रेशर अनकंट्रोल्ड हो सकता है. हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है. हार्ट रेट अनियमित होने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.
  • लिवर खराब हो जाता है: शराब का लिवर पर प्रभाव पड़ेता है. फैटी लिवर की प्राॅब्लम से जूझना पड़ता है. ध्यान नहीं देने पर ये हेपेटाइटिस और सिरोसिस के रूप में सीवियर हेल्थ प्राॅब्लम बन जाती है.
  • कैंसर का खतरा: डब्ल्यूएचओ ने शराब को ग्रुप 1 कार्सिनोजेन में रखा है. इससे ब्रेस्ट, बाउल, मुंह, खाने की नली, अपर थ्रोट, स्वरयंत्र (वाॅयस बाॅक्स) और लिवर में कैंसर होने का जो​खिम रहता है.
  • बिगड़ जाता है डाइजेशन: शराब का असर शरीर के डाइजे​स्टिव सिस्टम पर भी पड़ता है. भूख कम लगना, पेट में जलन, अल्सर, पै​न्कि्रयाज पर सूजन आदि प्राॅब्लम का सामना करना पड़ सकता है.

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भारत के इस राज्य में 40 दिन में हार्ट अटैक से 22 की मौत, क्या यह किसी बड़े खतरे का सिग्नल?

भारत के इस राज्य में 40 दिन में हार्ट अटैक से 22 की मौत, क्या यह किसी बड़े खतरे का सिग्नल?


कर्नाटक के हासन जिले में हार्ट अटैक से मौतों के मामलों ने चिंता बढ़ा दी है. सिर्फ 30 जून को ही यहां चार लोगों की मौत हार्ट अटैक की वजह से हुई, जबकि पिछले 40 दिन में 22 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. गौर करने वाली बात यह है कि इन 22 लोगों में ज्यादातर युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग शामिल हैं. इसके बाद कर्नाटक के इस इलाके में गंभीर हेल्थ क्राइसिस का खतरा मंडरा रहा है. आइए जानते हैं कि क्या यह किसी बड़े खतरे का सिग्नल है? 

किन आयु वर्ग के लोगों ने गंवाई जान?

कर्नाटक के हासन जिले में जान गंवाने वाले 22 लोगों पर गौर करें तो 5 की उम्र 19 से 25 साल के बीच थी, जबकि 8 लोगों की उम्र 25 से 25 साल के बीच थी. इनमें कुछ ही लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा मिली. युवाओं पर अचानक आए इस खतरे ने मेडिकल कम्युनिटी और आम जनता दोनों को चिंता में डाल दिया है.

किसने कैसे गंवाई जान?

जानकारी के मुताबिक, सिर्फ 30 जून को ही हासन जिले में 4 लोगों की मौत हुई. इनमें 50 साल की लेपाक्षी शामिल हैं. वह बेलूर के जेपी नगर में रहती थीं और थकान की शिकायत करने के बाद अचानक उनकी मौत हो गई. 58 साल के प्रोफेसर मुत्तैया होलेनरसिपुरा स्थित गवर्नमेंट फर्स्ट ग्रेड कॉलेज में अंग्रेजी के लेक्चरर थे. चाय पीते वक्त उन्हें अचानक हार्ट अटैक आया. चन्नारायपट्टना में रहने वाले 57 साल के कुमार ग्रुप डी के कर्मचारी थे. उन्होंने मौत से एक दिन पहले सीने में दर्द की शिकायत की थी. वहीं, रंगोलीहल्ली कॉलोनी में रहने वाले 63 साल के सत्यनारायण राव की भी अचानक मौत हो गई. 

डरा रहे हैं इस इलाके के आंकड़े

हार्ट से संबंधित इन मामलों के बीच बेंगलुरु के जयदेव हॉस्पिटल में मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. डॉक्टरों का कहना है कि पिछले 2 हफ्तों के दौरान बाहर से आने वाले मरीजों की संख्या 8 पर्सेंट तक बढ़ी है. इनमें हासन और उसके आसपास से आने वालों की तादाद काफी ज्यादा है. इनमें से ज्यादातर लोग एहतियातन जांच और डर की वजह से आ रहे हैं. वहीं, डिस्ट्रिक्ट हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट के डेटा के मुताबिक, पिछले 2 साल के दौरान हासन हार्ट अटैक के 507 केस दर्ज किए गए, जिनमें 190   लोगों ने जान गंवाई. गौर करने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र में दिल से संबंधित बीमारियां काफी समय से चिंता का विषय हैं, लेकिन युवाओं की मौत के नए ट्रेंड ने परेशानी बढ़ा दी है.

इतने युवा गंवा चुके अपनी जान

इससे पहले जान गंवाने वालों में कई स्टूडेंट्स और वर्किंग प्रोफेशनल शामिल हैं. 20 मई को अरकलागुडु के अभिषेक और होल नरसिपुरा की 20 वर्षीय स्टूडेंट संध्या की मौत हो गई. वहीं, केलावट्टी की कवाना (20), मैगे के नागप्पा (55), हसन के नीलकंठप्पा (58) और डुमगेरे के देवराज (43) की भी इसी दौरान मौत हो गई. इसके अलावा अर्सिकेरे के नवीन कुमार (31), रंगोलीहल्ली के चेतन (38) और होन्नेनाहल्ली के योगेश एम. (30) कम उम्र में जान गंवाने वालों में शामिल हैं.

सरकार ने क्या कदम उठाया?

कर्नाटक के इस इलाके में अचानक होने वाली मौतों और युवाओं के चपेट में आने से चिंता काफी ज्यादा बढ़ चुकी है. ऐसे में कर्नाटक हेल्थ डिपार्टमेंट ने कोविड या वैक्सीन से संबंधित दिक्कतों की संभावित कनेक्शन की जांच के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई है. जयदेव इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में NIMHANS, राजीव गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ चेस्ट डिजीज, सेंट जॉन्स, BMCRI, मणिपाल हॉस्पिटल्स और ICMR-NCDIR के एक्सपर्ट्स शामिल हैं. यह कमेटी अचानक हार्ट अटैक, स्ट्रोक और नर्वस सिस्टम की समस्याओं से संबंधित मामलों की स्टडी करेगी और ऐसी मौतों को रोकने में मदद करने के लिए सिफारिशें पेश करेगी. 

ये भी पढ़ें: हर घंटे 100 लोगों की जान ले रहा अकेलापन, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक और लोगों को कैसे बनाती है अपना शिकार?

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हर घंटे 100 लोगों की जान ले रहा अकेलापन, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?

हर घंटे 100 लोगों की जान ले रहा अकेलापन, जानें यह बीमारी कितनी खतरनाक?


मॉडर्न दौर में लाइफस्टाइल हद से ज्यादा बदल चुकी है. कई जगह हालात ऐसे हैं कि लोग अकेले रहने को मजबूर हैं, लेकिन यही अकेलापन अब लोगों की सांसें छीन रहा है. यह खुलासा हुआ है डब्ल्यूएचओ की हालिया रिपोर्ट फ्रॉम लोनलीनेस टू सोशल कनेक्शन में, जिसमें बताया गया है कि अकेलेपन के कारण दुनिया में हर घंटे 100 लोगों की मौत हो रही है. यह कितना खतरनाक है और क्या है इससे बचने का तरीका, आइए जानते हैं? 

अकेलेपन से क्या पड़ता है फर्क?

डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट के मुताबिक, अकेलेपन का असर न सिर्फ मेंटल हेल्थ पर पड़ता है, बल्कि इससे फिजिकल हेल्थ भी बुरी तरह प्रभावित होती है. इसकी वजह से हार्ट डिजीज, डायबिटीज, स्ट्रोक और असमय मौत का खतरा बढ़ जाता है. नई रिसर्च के मुताबिक, कोविड-19 महामारी के बाद यह समस्या ज्यादा गंभीर हो गई है. युवा और शहरों में रहने वाले लोग इसकी चपेट में ज्यादा आ रहे हैं. 

कितना खतरनाक है अकेलापन?

जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, कोरोना महामारी के दौरान भारत में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स काफी तेजी से बढ़ी हैं. शहरी इलाकों में यह यह आंकड़ा ज्यादा चिंताजनक है, जहां 22% लोग अकेलेपन का अनुभव कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 16-24 आयु वर्ग के 40% युवा अकेलापन महसूस करते हैं, जो 65-74 साल आयु वर्ग के 29 पर्सेंट बुजुर्गों की तुलना में कहीं ज्यादा है. इसके अलावा आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में भी जिक्र है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या, जिनमें अकेलापन शामिल है, 2012-2030 के बीच भारत को 1.03 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है. 

भारत में अकेलेपन का लगातार बढ़ रहा खतरा

भारत में अकेलेपन की स्थिति भी चिंताजनक है. रिपोर्ट के अनुसार, देश में 10.1% लोग अकेलेपन से जूझ रहे हैं, और शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत काफी ज्यादा है. रिसर्च में यह बात सामने आई है कि कोविड-19 के बाद बढ़ती सामाजिक दूरी और डिजिटल कनेक्शन से अकेलेपन में इजाफा हुआ है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि परिवारों के छोटे होने, शहरीकरण और बिजी लाइफस्टाइल के कारण यह समस्या गंभीर रूप ले रही है. दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में युवाओं में तनाव और अकेलेपन की दिक्कतें बढ़ी हैं.

सेहत पर क्या पड़ता है असर?

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अकेलेपन से हार्ट डिजीज, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है. साथ ही, इसका कनेक्शन मेमोरी लॉस, डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों से बताया गया है. मेंटल हेल्थ पर इसका असर काफी ज्यादा पड़ता है, जिसकी वजह से डिप्रेशन, चिंता और आत्महत्या का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. अकेलेपन से जूझ रहे लोग शारीरिक और मानसिक दोनों लेवल पर कमजोर हो जाते हैं.

डॉक्टर क्या देते हैं सलाह?

दिल्ली एम्स के डॉ. संजय राय कहते हैं कि अकेलेपन को कम करने के लिए नियमित फिजिकल एक्टिविटीज और सोशल कनेक्शन बेहद जरूरी है. घर के अंदर रहने की जगह पार्क में टहलना या दोस्तों से मिलना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है. वहीं, युवाओं को स्क्रीन टाइम कम करना चाहिए और ऑफलाइन एक्टिविटीज में शामिल होना चाहिए. बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

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बारिश के मौसम में लेते हैं चाय और पकोड़े के चटकारे, सेहत को पहुंच रहा नुकसान

बारिश के मौसम में लेते हैं चाय और पकोड़े के चटकारे, सेहत को पहुंच रहा नुकसान


Monsoon Diet Mistakes: बारिश की रिमझिम फुहारें, खिड़की से आती ठंडी हवा और हाथ में एक कप गरमागरम चाय और साथ में क्रिस्पी पकोड़े, ये नजारा ही कुछ ऐसा होता है जो हर दिल को भा जाता है. बरसात का मौसम मानो चाय-पकोड़े का त्योहार बन जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस स्वाद भरे आनंद के पीछे आपकी सेहत की ‘कड़वी सच्चाई’ भी छुपी हो सकती है? बारिश में ये तला-भुना कॉम्बिनेशन जितना स्वाद देता है, उतना ही शरीर को अंदर से नुकसान भी पहुंचा सकता है. आइए जानें कि क्यों मानसून में चाय और पकोड़ों का अधिक सेवन आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है.

पाचन तंत्र पर असर

मानसून के समय हमारी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है. पकोड़े जैसे डीप फ्राई आइटम भारी होते हैं और इन्हें पचाना मुश्किल हो जाता है. इससे एसिडिटी, गैस, पेट दर्द और अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं. 

डिहाइड्रेशन और एसिडिटी

चाय में मौजूद कैफीन शरीर में पानी की मात्रा कम कर सकती है, जिससे डिहाइड्रेशन होता है. साथ ही खाली पेट या बार-बार चाय पीने से एसिडिटी बढ़ सकती है, जो बारिश के मौसम में और भी ज़्यादा परेशान करती है. 

तेल में बार-बार तलना

घर में अक्सर एक ही तेल में कई बार पकोड़े तले जाते हैं, जिससे उसमें ट्रांस फैट्स बढ़ जाते हैं. ये ट्रांस फैट्स शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ाकर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. 

इंफेक्शन का खतरा

बरसात के मौसम में नमी के कारण बैक्टीरिया और फंगस जल्दी पनपते हैं. सड़क किनारे या खुले में तले गए पकोड़े खाने से फूड पॉइजनिंग, डायरिया और अन्य संक्रमण होने का खतरा रहता है. 

वजन बढ़ना और सुस्ती

तेल और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर पकोड़े शरीर में फैट जमा करते हैं, जिससे वजन बढ़ता है और शरीर सुस्त महसूस करता है. चाय में अतिरिक्त चीनी भी वजन बढ़ाने में योगदान देती है.

चाय की जगह क्या पीएं? 

चाय की जगह हर्बल या ग्रीन टी का विकल्प चुनें

डीप फ्राई के बजाय एयर फ्राई या ग्रिल्ड स्नैक्स लें

मौसमी फल, भुना चना या मूंग दाल जैसे हेल्दी स्नैक्स का सेवन करें

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