कई महिलाओं में पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान नहीं दिखता बेबी बंप, ऐसा होना कितना खतरनाक?

कई महिलाओं में पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान नहीं दिखता बेबी बंप, ऐसा होना कितना खतरनाक?


Baby Bump During Pregnancy: कल्पना कीजिए कि आपकी सहेली अचानक एक दिन आपको ये कहे कि वह 8 महीने की प्रेग्नेंट है और आप चौंक जाएं क्योंकि उसके शरीर पर इसका कोई निशान तक नहीं दिखा. न बेबी बंप, न बदला हुआ शरीर, क्या ऐसा मुमकिन है? हां, यह सुनकर अजीब लग सकता है. लेकिन यह पूरी तरह असंभव नहीं है. कुछ महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान बेबी बंप बहुत हल्का दिखाई देता है या कभी-कभी बिल्कुल भी नहीं दिखाई देता. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह स्थिति सामान्य है या इसके पीछे कोई जोखिम छिपा होता है?

बता दें, हर महिला की प्रेग्नेंसी यात्रा अलग होती है. किसी का बेबी बंप चौथे महीने से ही उभर आता है, तो किसी का आठवें महीने तक भी बमुश्किल दिखता है. यह अंतर सिर्फ शारीरिक बनावट तक सीमित नहीं, बल्कि कई मेडिकल कारणों पर भी निर्भर करता है.

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क्यों नहीं दिखता कुछ महिलाओं का बेबी बंप?

बॉडी टाइप: जिन महिलाओं की हाइट ज्यादा होती है या जिनके पेट की मसल्स मज़बूत होती हैं, उनमें बंप कम दिखाई देता है क्योंकि भ्रूण अंदर की ओर विकसित होता है.

पहली या दूसरी प्रेग्नेंसी: पहली प्रेग्नेंसी में पेट की मसल्स अधिक टाइट होती हैं, जिससे बंप कम नजर आता है. दूसरी या तीसरी बार प्रेग्नेंट महिलाओं में बंप जल्दी और स्पष्ट दिखता है.

बच्चे की पोज़िशन: अगर बेबी पीठ की तरफ यानी रीढ़ की ओर स्थित हो तो बाहर की ओर उभार नहीं बनता.

ओवरवेट या प्लस-साइज: ज्यादा वजन होने पर बंप उतना स्पष्ट नहीं दिखाई देता क्योंकि फैट लेयर बेबी बंप को ढंक देती है.

क्या यह स्थिति खतरनाक हो सकती है?

सामान्य रूप से, बेबी बंप का न दिखना अपने-आप में खतरनाक नहीं है जब तक अल्ट्रासाउंड और अन्य चेकअप में सब कुछ सामान्य हो. लेकिन कुछ मामलों में यह स्थिति स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा कर सकती है. 

इन्ट्रायूटराइन ग्रोथ रिटार्डेशन (IUGR): जिसमें बच्चा गर्भ में ठीक से विकसित नहीं हो रहा होता

अम्नियोटिक फ्लूइड की कमी: अगर पेट में पानी की मात्रा कम हो जाए तो बंप छोटा लगता है

हार्मोनल इम्बैलेंस: प्रोजेस्टेरोन या अन्य हार्मोन्स का असंतुलन भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकता है

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

अगर 5वें महीने के बाद भी कोई बंप दिखाई न दे

अगर मूवमेंट कम महसूस हो या उल्टी, थकावट जैसी सामान्य प्रेग्नेंसी सिम्पटम्स भी न हों

अगर पहले की तुलना में पेट सिकुड़ा-सिकुड़ा लगे

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Bhastrika Pranayama: शरीर को डिटॉक्स करता है भस्त्रिका प्राणायाम, मोटापा घटाने में भी कारगर

Bhastrika Pranayama: शरीर को डिटॉक्स करता है भस्त्रिका प्राणायाम, मोटापा घटाने में भी कारगर


Bhastrika Pranayama Detoxifies the Body: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में सेहत का ध्यान रखना काफी जरूरी हो गया है. शरीर की थकावट, मानसिक तनाव और दिनभर की भागमभाग से अक्सर हम खुद को थका हुआ और ऊर्जा से खाली महसूस करते हैं. ऐसे में अगर आप अपने दिन की शुरुआत कुछ मिनटों के योग और प्राणायाम से करें, तो न सिर्फ शरीर फिट रहता है बल्कि दिमाग भी शांत और ताजा महसूस करता है. खासतौर पर भस्त्रिका प्राणायाम, ये एक ऐसा अभ्यास है जो आपके शरीर और दिमाग दोनों को ताकत देता है.

इसे संपूर्ण डिटॉक्स प्राणायाम बताया है- आयुष मंत्रालय

भस्त्रिका शब्द संस्कृत से आया है, जिसका मतलब होता है ‘धौंकनी’. जैसे लोहार धौंकनी से तेज हवा छोड़कर लोहे को गर्म करता है और उसकी सारी अशुद्धियां निकाल देता है, वैसे ही भस्त्रिका प्राणायाम हमारे शरीर की धौंकनी बन जाता है. यह तेज और गहरी सांसों के जरिए अंदर की गंदगी, चाहे वो थकान हो, तनाव हो या नकारात्मक सोच, सबको बाहर फेंक देता है. आयुष मंत्रालय ने इसे संपूर्ण डिटॉक्स प्राणायाम बताया है. यह वात, पित्त और कफ की समस्याओं के लिए राम-बाण इलाज है.

आयुष मंत्रालय के मुताबिक, यह एक ऐसा अभ्यास है जो शरीर की गहराई से सफाई करता है. यह शरीर के अंदर जमा हुए विषैले पदार्थ को बाहर निकालता है. इससे शरीर हल्का और ताजा महसूस होता है. आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर में तीन दोष होते हैं—कफ, पित्त और वात. अगर ये असंतुलित हो जाएं, तो कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं. भस्त्रिका प्राणायाम इन तीनों दोषों को संतुलन में लाने में मदद करता है. यह पाचन को ठीक करता है, सांस को बेहतर बनाता है और दिमाग को शांत करता है.

गले से जुड़ी समस्याओं के लिए बहुत फायदेमंद

भस्त्रिका प्राणायाम गले से जुड़ी समस्याओं में भी बहुत फायदेमंद माना जाता है. जब आप तेज और गहरी सांस लेते हैं, तो यह गले की सफाई में मदद करता है और वहां जमा कफ को बाहर निकालता है. इससे गले में जमा बलगम कम होता है और सूजन भी धीरे-धीरे घटने लगती है. गले में अगर खराश या भारीपन है, तो यह प्राणायाम उसमें भी राहत देता है. नियमित अभ्यास से सांस की नली साफ रहती है और गले की तकलीफें कम हो जाती हैं.

यह हमारे तंत्रिका तंत्र को संतुलित करने में मदद करता है. जब आप गहरी और तेज सांस लेते हैं, तो दिमाग तक ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है. यह प्राणायाम शरीर और दिमाग के बीच बेहतर तालमेल बनाता है. इससे चिड़चिड़ापन, घबराहट और बेचैनी जैसी समस्याएं दूर होती हैं, जिससे मन शांत बना रहता है और नींद भी बेहतर होती है. तंत्रिका तंत्र मजबूत होगा तो शरीर भी अच्छा काम करेगा और मानसिक संतुलन बना रहेगा.

मोटापा कम करने में भी मददगार

इसके अलावा, यह मोटापा कम करने में भी मददगार होता है. तेज सांसों की प्रक्रिया से शरीर की कैलोरी घटती है और वजन कम होने लगता है. इसके साथ ही यह फेफड़ों की ताकत बढ़ाता है, जिससे दमा, टीबी और सांस से जुड़ी बीमारियों में राहत मिलती है. लगातार अभ्यास करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर होती है.

भस्त्रिका प्राणायाम सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि आंख, कान और नाक के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है. गहरी सांसों से सिर के हिस्से में ताजगी और ऊर्जा पहुंचती है. इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, कानों की क्षमता सुधरती है, और नाक की सफाई अच्छी तरह होती है.

ऐसे करें भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास

भस्त्रिका प्राणायाम करने के लिए सबसे पहले आराम से पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाएं. फिर धीरे-धीरे गहरी सांस लें और उसे जोर से बाहर छोड़ें. इस दौरान अपनी छाती को फुलाना और फिर पिचकाना जरूरी होता है. शुरुआत में धीरे-धीरे सांस लें और छोड़ें. इस तरीके को 4 से 5 बार दोहराएं.

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मानसून में गुनगुना पानी है अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी, जानिए कब-कब पीने से मिलेगा फायदा

मानसून में गुनगुना पानी है अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी, जानिए कब-कब पीने से मिलेगा फायदा


Drink Lukewarm Water in Monsoon: मानसून जैसे ही दस्तक देता है, वह अपने साथ मौसम में नमी और ह्यूमिडिटी लेकर आता है. इस मौसम में वायरस और बैक्टीरिया भी तेजी से पनपते हैं जो कई बीमारियां लेकर आते हैं. ऐसे में गुनगुना पानी पीने की आदत आपके स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी ढाल बन सकती है. “उष्णं जलं पचति आमं तेन रोगा न जायते.” इस श्लोक के मुताबिक, गरम जल टॉक्सिन्स को पचाता है, जिससे रोग नहीं होते.

गुनगुना पानी पीने से कई फायदे

चरक संहिता के मुताबिक, मानसून में शरीर की पाचन अग्नि धीमी होती है. इस वजह से जो हम खाते हैं, वह ठीक से नहीं पचता और शरीर में टॉक्सिन बनने लगता है. शरीर में जमा टॉक्सिन पसीने और मूत्र के माध्यम से बाहर निकलते हैं. इसी के साथ ही यह इम्यूनिटी को बढ़ाने में मददगार रहता है, जिससे सर्दी- जुकाम, खांसी से राहत मिलती है.

नमी के कारण गले में खराश, कफ और कई तरह के इन्फेक्शन हो सकते हैं. ऐसे में गुनगुना पानी पीने से इन समस्याओं से काफी राहत मिलती है और इन्फेक्शन को दूर करने में भी मदद मिलती है. मानसून के दौरान नमी के कारण शरीर में अक्सर जकड़न महसूस होती है. रोजाना गुनगुना पानी पीने से मांसपेशियों में होने वाली जकड़न कम होती है और आराम महसूस होता है.

गुनगुना पानी पीने से शरीर के टॉक्सिन्स बाहर

आयुर्वेद के मुताबिक, गुनगुना पानी पीने से शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं, जिससे स्किन पर होने वाले कील-मुहांसे की समस्या से भी राहत मिलती है और स्किन ग्लोइंग और शाइनी नजर आने लगती है.

सुश्रुत संहिता के मुताबिक, सुबह खाली पेट खाना खाने से आधे घंटे पहले, खाने के आधे घंटे बाद और रात में सोने से पहले गुनगुना पानी पीना चाहिए. जब आप सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीते हैं, तो पाचन तंत्र सक्रिय होता है और मल त्याग में आसानी होती है. वहीं, खाने के आधा घंटे पहले पानी पीने से पाचन बेहतर होता है. खाना खाने के आधे घंटे बाद दो-तीन ग्लास पानी पीने से खाना आसानी से पचता है, रात को सोने से पहले गुनगुना पानी पीने से नींद अच्छी आती है.

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सलाद खाना सही है या नहीं? जानें इसे कितना सेहतमंद बताता है आयुर्वेद

सलाद खाना सही है या नहीं? जानें इसे कितना सेहतमंद बताता है आयुर्वेद


Salad Health Benefits or Not: जब भी सेहत की बात आती है, सबसे पहला सुझाव होता है सलाद जरूर खाइए. चाहे वजन घटाना हो, पेट साफ रखना हो या स्किन ग्लोइंग बनानी हो, सलाद को सुपरफूड की तरह देखा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आयुर्वेद, जो हजारों साल पुरानी भारतीय चिकित्सा प्रणाली है, सलाद के बारे में क्या कहता है?

हमारे दादी-नानी अक्सर कच्ची सब्जियों से बनी चीजों को लेकर थोड़ी सतर्क रहती थीं. वहीं मॉडर्न डाइटिशियन हर मील में सलाद शामिल करने की सलाह देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सलाद वाकई सभी के लिए सेहतमंद है? क्या इसे किसी भी समय खाया जा सकता है और क्या हर किसी को कच्ची सब्जियां खानी चाहिए? आयुर्वेद के अनुसार, हमारा पाचन तंत्र  शरीर की सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली है. जो चीज इस अग्नि को सहारा देती है, वही शरीर के लिए हितकारी मानी जाती है.

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कच्ची सब्जियां और पाचन अग्नि

आयुर्वेद मानता है कि कच्ची सब्जियों को पचाना अपेक्षाकृत कठिन होता है. यदि व्यक्ति की पाचन शक्ति कमजोर है या वह कफ से ग्रस्त है, तो कच्चा सलाद गैस, अपच और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है. 

कब और कैसे खाएं सलाद

दोपहर का समय सबसे उत्तम माना जाता है सलाद खाने के लिए, क्योंकि उस समय पाचन अग्नि सबसे प्रबल होती है.

रात में या खाली पेट सलाद खाना आयुर्वेद में अनुचित माना गया है.

सलाद को हल्का भाप में पका कर या थोड़ा सा घी/नींबू डालकर खाने की सलाह दी जाती है.

सलाद के फायदे 

शरीर को फाइबर, विटामिन्स और मिनरल्स मिलते हैं

वजन घटाने में मदद करता है

त्वचा और बालों के  लिए फायदेमंद है 

डाइजेशन को बेहतर बनाता है, बशर्ते पाचन शक्ति ठीक हो

किन लोगों को सलाद से बचना चाहिए?

गैस, एसिडिटी या कब्ज की समस्या 

बुजुर्ग या बच्चे जिनकी पाचन क्रिया कमजोर हो

कच्ची सब्जियों से एलर्जी वाले लोग

जो कफ से पीड़ित हैं

सलाद सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति का शरीर और पाचन शक्ति अलग होती है. आयुर्वेद हमें यही सिखाता है कि कोई भी चीज ‘एक जैसा सबके लिए’ नहीं होता. अगर सही समय, सही मात्रा और शरीर के अनुकूल तरीके से सलाद खाया जाए, तो यह न सिर्फ स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि जीवनशैली को भी संतुलित करता है.

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दुनिया में इस साल 1.57 करोड़ बच्चों को नहीं लगा टीका, जानें इसमें भारत के कितने मासूम?

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Vaccination of Children: जब एक नन्हा बच्चा अपनी मां की गोद में पहली बार दुनिया को देखता है तो उसके जीवन की शुरुआत आशाओं और संभावनाओं से भरी होती है. मां-बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा स्वस्थ रहे, बड़े होकर कुछ बने. लेकिन कल्पना कीजिए, अगर इस मासूम की जिंदगी उन बुनियादी सुरक्षा कवचों से भी वंचित रह जाए जो उसे जानलेवा बीमारियों से बचा सकते हैं. तो क्या हम एक सुरक्षित और संवेदनशील समाज की कल्पना कर सकते हैं? टीकाकरण सिर्फ एक स्वास्थ्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की पहली ढाल होती है. दुख की बात है कि साल 2023 तक दुनिया भर में 1.57 करोड़ बच्चे ऐसे रहे जिन्हें जीवन रक्षक टीके तक नहीं मिल पाए और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 14 लाख मासूम भारत के भी शामिल हैं.

द लांसेट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में वैश्विक स्तर पर करीब 1.57 करोड़ बच्चों को वैक्सीन की पहली डोज तक नहीं मिल पाई. ये आंकड़े न सिर्फ स्वास्थ्य तंत्र की विफलता को दर्शाते हैं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करते हैं.

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किन-किन देशों में टीकाकरण नहीं हो पाया 

भारत जो दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाता है, वह भी इस संकट से अछूता नहीं रहा. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 14 लाख बच्चे ऐसे रहे जिन्हें कोई भी वैक्सीन नहीं दी गई. यह संख्या एक बड़े जनसंख्या वाले देश के लिए चिंता का विषय है, खासकर तब जब सरकार मिशन इंद्रधनुष जैसे कार्यक्रमों के जरिए शत-प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य लेकर चल रही है. अन्य देशों की बात करें तो नाइजीरिया, कांगो, इथियोपिया, सोमालिया, सूडान, इंडोनेशिया और ब्राजील में भी बड़ी संख्या में बच्चे टीकाकरण से वंचित रहे.

टीका क्यों है जरूरी?

टीकाकरण बच्चों को डिप्थीरिया, टिटनस, खसरा, पोलियो, निमोनिया जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाता है. 

भारत में टीकाकरण से वंचित होने के कारण:

ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी

जागरूकता की कमी और सामाजिक भ्रांतियां

कुछ क्षेत्रों में वैक्सीनेशन को लेकर डर या गलतफहमी

कोविड-19 के कारण स्वास्थ्य तंत्र की प्राथमिकताओं में बदलाव

क्या है समाधान?

जनजागरूकता अभियानों को और मजबूती देना

स्वास्थ्यकर्मियों को ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सुविधाएं और प्रशिक्षण

माता-पिता को प्रोत्साहित करने के लिए योजनाएं

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