प्लास्टिक के गिलास में शराब पीना ज्यादा खतरनाक या स्टील के गिलास में? जानें सेहत की बात

प्लास्टिक के गिलास में शराब पीना ज्यादा खतरनाक या स्टील के गिलास में? जानें सेहत की बात


Drink Alcohol in Plastic Glass : शराब का सेवन स्वास्थ्य के लिए पहले से ही हानिकारक माना जाता है, लेकिन अगर इसे गलत बर्तन में परोसा जाए, तो यह खतरा और बढ़ सकता है. अक्सर पार्टियों, आयोजनों या खुले स्थानों पर लोग प्लास्टिक के गिलास में शराब पीना पसंद करते हैं, वहीं कुछ लोग घर पर स्टील के गिलास का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन दोनों में से कौन-सा विकल्प सेहत के लिहाज से ज्यादा सुरक्षित है? आइए जानते हैं विस्तार से.

प्लास्टिक के गिलास में शराब पीने के खतरे

प्लास्टिक को हल्का और डिस्पोजेबल समझकर लोग इसे प्राथमिकता देते हैं, लेकिन यह सेहत के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है. खासतौर पर सस्ते और घटिया क्वालिटी के प्लास्टिक गिलासों में बीपीए (Bisphenol A) और फ्थैलेट्स जैसे केमिकल्स होते हैं जो शराब के संपर्क में आकर लीच (घुलकर) सकते हैं.

शराब में अल्कोहल की मात्रा अधिक होती है, और यह एक सॉल्वेंट की तरह काम करता है, जो प्लास्टिक के हानिकारक तत्वों को घोलकर शरीर के अंदर पहुंचा सकता है. ये  कई परेशानी के कारण बन सकते हैं, जैसे-

  • हार्मोनल गड़बड़ी
  •  प्रजनन संबंधी समस्याएं
  • कैंसर
  • लिवर डैमेज, इत्यादि. 

इतना ही नहीं, लंबे समय तक प्लास्टिक से रिसने वाले माइक्रोपार्टिकल्स शरीर में जमा हो जाते हैं, जिससे क्रॉनिक डिजीज का खतरा बढ़ जाता है. 

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स्टील के गिलास में शराब पीना कितना सुरक्षित?

स्टेनलेस स्टील एक नॉन-रिएक्टिव धातु होती है यानी यह आमतौर पर शराब या अन्य एसिडिक पेय पदार्थों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करती. इसका मतलब है कि स्टील के गिलास में शराब पीने से उसमें से कोई हानिकारक केमिकल नहीं घुलता.

हालांकि कुछ लोगों को स्टील में पीने से टेस्ट में बदलाव महसूस हो सकता है, लेकिन यह केवल स्वाद का मामला है, सेहत का नहीं. अगर स्टील साफ और जंग रहित है, तो यह शराब पीने के लिए एक सुरक्षित विकल्प माना जाता है. यह टिकाऊ भी होता है और बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे पर्यावरणीय नुकसान भी कम होता है.

कौन-सा बेहतर?

स्वास्थ्य के लिहाज से स्टील का गिलास प्लास्टिक से कहीं ज्यादा सुरक्षित है. प्लास्टिक में शराब पीने से जहरीले केमिकल शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. स्टील न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर विकल्प है.

जरूरी सलाह

  • शराब का सेवन कम करें या बिलकुल न करें.
  • अगर कभी पीना हो, तो ग्लास, स्टील या सेरामिक गिलास का ही इस्तेमाल करें.
  • प्लास्टिक के गिलास सिर्फ इमरजेंसी या डिस्पोजेबल परिस्थिति में ही इस्तेमाल करें.
  • स्वास्थ्य के लिए सावधानी हमेशा जरूरी होती है. एक छोटी-सी आदत बड़े नुकसान से बचा सकती है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर 5 में से 1 परिवार के वयस्क व्यक्ति मोटापे का हो रहे हैं शिकार, रिसर्च में हुआ हैरान करने वाल

हर 5 में से 1 परिवार के वयस्क व्यक्ति मोटापे का हो रहे हैं शिकार, रिसर्च में हुआ हैरान करने वाल


Overweight in India : इन दिनों मोटापा काफी ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. हाल में एक चौंका देने वाला खुलासा हुआ है. इस  नए अध्ययन में पाया गया है कि लगभग 10 में से दो घरों के सभी वयस्क या तो अधिक वजन वाले या मोटे हैं. बता दें कि अधिक वजन को आमतौर पर बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) का उपयोग करके आंका जाता है. यदि किसी व्यक्ति का बीएमआई 25 से 29.9 किलोग्राम/मी2 के बीच है, तो उसे अधिक वजन वाला माना जाता है. दूसरी ओर मोटापे को 30.0 किलोग्राम/मी2 या उससे अधिक के बीएमआई के रूप में परिभाषित किया जाता है.

6 लाख से अधिक घरों के लोगों पर किया गया अध्ययन

आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च (एनआईसीपीआर), टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज और सिम्बायोसिस इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं ने 6 लाख से अधिक घरों में अधिक वजन और मोटापे की व्यापकता का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के पांचवें दौर के आंकड़ों का विश्लेषण किया. 

उन्होंने देखा कि लगभग 20% घरों में सभी वयस्क सदस्यों को अधिक वजन के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जबकि 10% घरों में सभी वयस्कों को मोटे के रूप में वर्गीकृत किया गया था. पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, मणिपुर, केरल, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों में 30% से अधिक घरों में सभी वयस्कों का वजन अधिक था. तमिलनाडु और पंजाब में पांच में से दो घरों में सभी वयस्कों को मोटे के रूप में वर्गीकृत किया गया था.

मोटापा कई बीमारियों का बनता है कारक

आईसीएमआर-एनआईसीपीआर के प्रमुख शोधकर्ता प्रशांत कुमार सिंह ने कहा कि जब परिवार का एक सदस्य अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त होता है, तो अन्य लोगों के भी मोटे होने की संभावना काफी अधिक होती है. इसके साथ ही निदेशक शालिनी सिंह ने कहा कि मोटापे और अधिक वजन का घरेलू क्लस्टरिंग मोटापे को समझने के हमारे तरीके में एक आदर्श बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है. यह अध्ययन हमें बताता है कि परिवार इकाई इस स्वास्थ्य चुनौती का केंद्र है.

इतना ही नहीं चेतावनी दी गई है कि इन पारिवारिक मोटापा समूहों में व्यक्तियों को कई गैर-संचारी रोगों के विकास के उच्च जोखिम का सामना करना पड़ता है. यह पहले से ही ज्ञात है कि मोटापा खराब कार्डियो-मेटाबोलिक स्वास्थ्य के लिए एक मार्कर के रूप में कार्य करता है और इसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और दिल की विफलता जैसी कई पुरानी बीमारियों का प्रवेश द्वार माना जाता है. यह 13 प्रकार के कैंसर से भी जुड़ा हुआ है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

 

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ये लोग चाहकर भी डोनेट नहीं कर सकते ब्लड, जान बचानी है तो समझ लें वजह

ये लोग चाहकर भी डोनेट नहीं कर सकते ब्लड, जान बचानी है तो समझ लें वजह


Blood Donation : ब्लड डोनेट करना एक जीवनदायी कार्य है, जो किसी की जान बचा सकता है. हर साल लाखों लोगों को दुर्घटनाओं, सर्जरी, थैलेसीमिया, एनीमिया, कैंसर जैसे कई कारणों से खून की जरूरत पड़ती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो चाहकर भी ब्लड डोनेट नहीं कर सकते? इसके पीछे का कारण चाहे स्वास्थ्य से जुड़ा हो या संक्रमण से संबंधित, यह जानना हर किसी के लिए जरूरी है ताकि समय रहते सही निर्णय लिया जा सके.

उम्र और वजन की सीमा

भारत में ब्लड डोनेशन के लिए न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और न्यूनतम वजन 45 किलोग्राम होना जरूरी है. यदि कोई व्यक्ति इससे कम उम्र या वजन का है तो वह रक्तदान के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता, क्योंकि ऐसा करने से उसकी खुद की सेहत पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

एनीमिया या लो हीमोग्लोबिन

अगर किसी व्यक्ति के खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम होती है (पुरुषों में 13 ग्राम/डीएल से कम और महिलाओं में 12.5 ग्राम/डीएल से कम), तो उन्हें ब्लड डोनेट करने की अनुमति नहीं दी जाती. क्योंकि उनका खुद का शरीर पहले से ही ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा होता है.

गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं

गर्भावस्था के दौरान या डिलीवरी के बाद कुछ महीनों तक महिलाओं को ब्लड डोनेट करने से मना किया जाता है, क्योंकि इस समय शरीर कमजोर होता है और ब्लड लॉस का सामना पहले से ही कर चुका होता है. इससे महिला की सेहत पर असर पड़ सकता है.

संक्रमण या बुखार के समय

यदि किसी को वायरल फीवर, टाइफाइड, मलेरिया, डेंगू, या कोई अन्य संक्रामक बीमारी है तो वह तब तक रक्तदान नहीं कर सकता जब तक पूरी तरह से ठीक न हो जाए. इससे रक्त प्राप्त करने वाले को संक्रमण फैलने का खतरा होता है.

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हैपेटाइटिस B, C, HIV या अन्य गंभीर संक्रमण

अगर किसी को HIV/AIDS, हेपेटाइटिस B या C, सिफलिस, या टीबी जैसी बीमारियां हैं तो वे आजीवन ब्लड डोनेट नहीं कर सकते. इन रोगों के वायरस खून के ज़रिये फैल सकते हैं और दूसरों की जान को खतरे में डाल सकते हैं.

ड्रग्स या एल्कोहल की लत वाले लोग

जो लोग इंजेक्टेबल ड्रग्स लेते हैं या जिन्हें एल्कोहल की लत है, उनका ब्लड डोनेट करना सुरक्षित नहीं होता. उनके खून में संक्रमण या विषैले पदार्थ हो सकते हैं जो किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में जाकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं.

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क्या बिना ट्रांसप्लांट ठीक हो सकता है सना मकबूल का लिवर सिरोसिस, ऐसा होना कितना पॉसिबल?

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Liver Cirrhosis : टीवी एक्ट्रेस और मॉडल सना मकबूल के लिवर सिरोसिस से पीड़ित होने की खबर सामने आने के बाद फैंस चिंतित हैं और यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस गंभीर बीमारी का इलाज बिना लिवर ट्रांसप्लांट के संभव है? बता दें कि लिवर सिरोसिस एक क्रॉनिक और प्रोग्रेसिव बीमारी है, जिसमें लिवर की कोशिकाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होकर फाइब्रोसिस में बदल जाती हैं. यह स्थिति लिवर के सामान्य कार्य जैसे टॉक्सिन को बाहर निकालना, पाचन में सहायता करना और खून को साफ करने की क्षमता को प्रभावित करती है. अब सवाल यह उठता है कि क्या यह बीमारी बिना लिवर ट्रांसप्लांट के ठीक हो सकती है? इसका जवाब आसान नहीं है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस स्टेज पर है.

लिवर सिरोसिस के स्टेज

कम्पेन्सेटेड सिरोसिस (Compensated Cirrhosis)

यह बीमारी की शुरुआती अवस्था होती है, जहां लिवर क्षतिग्रस्त होता है लेकिन अभी भी अपना काम किसी हद तक कर रहा होता है. इस स्टेज पर मरीज को अधिक लक्षण नहीं दिखते, और सही इलाज, जीवनशैली में बदलाव, और दवाइयों के सहारे स्थिति को स्थिर रखा जा सकता है. इस स्टेज पर बिना ट्रांसप्लांट इलाज संभव है.

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डी-कम्पेन्सेटेड सिरोसिस (Decompensated Cirrhosis)

जब लिवर पूरी तरह काम करना बंद कर देता है और व्यक्ति को पीलिया, पेट में पानी भरना, उल्टी में खून, भ्रम जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं, तो इसे डी-कम्पेन्सेटेड कहा जाता है. इस स्टेज पर मरीज की जान बचाने के लिए अक्सर लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प रह जाता है.

बिना ट्रांसप्लांट इलाज कब संभव है?

  • अगर लिवर सिरोसिस का पता समय पर लग जाए और वह कम्पेन्सेटेड स्टेज पर हो. यदि रोगी शराब या हेपेटाइटिस जैसी वजहों से ग्रसित है और उस कारण को समय रहते रोक लिया जाए.
  • हाई-प्रोटीन डाइट, नमक की कमी, नियमित व्यायाम, दवाइयों और लिवर सपोर्टिव थैरेपी से सुधार हो सकता है.
  • जीवनशैली में सुधार (जैसे शराब न पीना, वजन नियंत्रित रखना, कम नमक खाना, नियमित जांच कराना) बहुत जरूरी है.

क्या कहता है मेडिकल साइंस?

कई बार सिरोसिस की प्रगति को धीमा किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह रिवर्स करना मुश्किल होता है. नई रिसर्च में कुछ दवाइयों और स्टेम सेल थैरेपी से उम्मीदें हैं, लेकिन ये अभी पूरी तरह सफल नहीं हुई हैं. ट्रांसप्लांट की जरूरत तब होती है जब लिवर की क्षति इस स्तर पर पहुंच जाए कि शरीर को बचाना संभव न हो.

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10500 साल पहले मर चुकी महिला का चेहरा बनाया, वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह ‘जादू’?

10500 साल पहले मर चुकी महिला का चेहरा बनाया, वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह ‘जादू’?


क्या हजारों साल पहले मृत किसी व्य​क्ति का चेहरा दोबारा बनाया जा सकता है? आपको ये अजीब लगे, लेकिन वैज्ञानिकों ने ये कमाल कर दिखाया है. गेन्ट विश्वविद्यालय के रिसर्चर्स ने एक ऐसी ही महिला का चेहरा बनाया है, जिसकी माैत करीब 10500 साल पहले हो चुकी है. वैज्ञानिकों को इस महिला के अवशेष मिले. इससे डीएनए हासिल कर वैज्ञानिकों ने ये कारनामा कर दिखाया. आ​खिर किस तरह ये चेहरा बनाया गया, आइए जानते हैं…

जिसका चेहरा बनाया, वह महिला काैन थी?

ऐसे सवाल उठता है कि जिस महिला का चेहरा बनाया गया है, वह काैन थी. बे​ल्जियम की ये महिला करीब 10500 साल पहले मीयूज घाटी में रहती थी. 1988 में इस मेसोलिथिक महिला के अवशेष मार्गोक्स गुफा में पाए गए, जो डिनैंट के करीब है. वह पश्चिमी यूरोप के ​एक ​शिकारी समूह से ताल्लुक रखती थी. इसी तरह का समूह ग्रेट ब्रिटेन में चेडर मैन के रूप में लोकप्रिय था. वैज्ञानिकों ने न सिर्फ महिला का चेहरा बनाया, ब​ल्कि प्राचीन समय में महिला की लाइफस्टाइल किस तरह की थी, किस तरह के आभूषण पहनती ​थी, इस पर भी प्रकाश डाला है.

डीएनए स्टडी से सामने आई जानकारी

डीएनए स्टडी से पता चला है कि मार्गो महिला की आंखें नीली थीं, बिल्कुल चेडर मैन की तरह. हालांकि, पश्चिमी यूरोप में अब तक जांचे गए अधिकांश अन्य मेसोलिथिक व्यक्तियों की तुलना में उसका रंग कुछ हल्का था. रिसर्चर्स की मानें तो ये छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी थी. रिसर्चर्स की मानें तो महिला के चेहरे और रहने की स्थितियों का पुनर्निर्माण शारीरिक, आनुवंशिक और पुरातात्विक डेटा के मिश्रण से संभव हुआ.

इस तरह नजर आया महिला का चेहरा

रिसर्चर्स ने बताया कि महिला की खोपड़ी से अच्छी गुणवत्ता का डीएनए निकाला गया, जिससे विस्तृत पुनर्निर्माण संभव हो सका. रिसर्चर्स की मानें तो महिला की उम्र करीब 35 से 60 वर्ष की थी. इससे प्राचीन समय में महिला के रहन-सहन के साथ महिला के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकी. महिला के आभूषण और टैटू जैसी कुछ विशेषताएं रिवर मीयूज बेसिन में पिछली खुदाई से इकट्ठा किए गए पुरातात्विक डेटा पर आधारित हैं. इससे रिसर्चर्स को महिला के दैनिक जीवन की तस्वीर बनाने में मदद मिली. रिसर्चर्स ने जो महिला का चेहरा बनाया है, उसमें उसका रंग, बाल और आंखें सभी प्राचीन डीएनए पर आधारित हैं.

हर पल को किया पुनर्जीवित

इसके बाद रिसर्चर्स की क्रिएटिम टीम ने महिला के चेहरे को लास्ट टच दिया. क्रि​एटिव टीम ने पुरातात्विक साक्ष्य जैसे उपकरण, शेल्स, पेंट और शिविर के अवशेष का भी उपयोग किया. इससे महिला का चेहरा और उसकी दुनिया पूरी तरह से जीवंत हो गई. शिकार के तरीकों से लेकर परिवहन तक, पौधों से लेकर जानवरों तक, हर छोटी-छोटी जानकारी का इसमें ध्यान रखा गया. जिससे महिला का चेहरा एकदम जीवंत होता नजर आया.

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