न्यूरोग्रिट गोल्ड: पार्किंसंस के इलाज में जागी नई उम्मीद,अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल में छपा शोध

न्यूरोग्रिट गोल्ड: पार्किंसंस के इलाज में जागी नई उम्मीद,अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल में छपा शोध



<p style="text-align: justify;">पतंजलि आयुर्वेद ने बताया है कि कंपनी के वैज्ञानिकों द्वारा C. Elegans पर किए गए नवीन शोध ने यह पुष्टि की है कि आयुर्वेदिक औषधि न्यूरोग्रिट गोल्ड न केवल पार्किंसंस बीमारी के कारण हुए स्मृति लोप को सुधारने में मदद करती है, बल्कि यह जीवों की आयु को बढ़ाने में भी सहायक है. वहीं इनकी लम्बाई और प्रजनन क्षमता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालती है. पतंजलि का दावा है कि यह अनुकरणीय शोध अंतरराष्ट्रीय Wiley प्रकाशन के रिसर्च जर्नल CNS Neuroscience &amp; Therapeutics में प्रकाशित हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">पतंजलि आयुर्वेद के अध्यक्ष आचार्य बालकृष्ण ने कहा, ”पार्किंसंस बीमारी में व्यक्ति मानसिक रूप से तो अस्वस्थ्य होता ही है, उसका सामाजिक दायरा भी छोटा होने लगता है, लेकिन क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे अस्वस्थ्य व्यक्ति पुनः ठीक हो सके और अपने दैनिक कार्यकलाप भली भांति बिना किसी सहायता के कर सके. अब हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि हां, अब यह संभव है.”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का अनुपम मेल है न्यूरोग्रिट गोल्ड- बालकृष्ण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आचार्य बालकृष्ण ने आगे कहा, ”न्यूरोग्रिट गोल्ड हमारी धरोहर आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का अनुपम मेल है. यह शोध प्रदर्शित करता है कि अगर प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए तो इस आधुनिक युग की समस्याओं को दूर करने में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं.” उन्होंने बताया कि न्यूरोग्रिट गोल्ड ज्योतिष्मती और गिलोय आदि प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के साथ ही एकांगवीर रस, मोती पिष्टी, रजत भस्म, वसंत कुसुमाकर रस, रसराज रस आदि से निर्मित है जोकि मस्तिष्क विकारों में लाभकारी मानी गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं, पतंजलि अनुसंधान संस्थान के उपाध्यक्ष और प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अनुराग वार्ष्णेय ने कहा, ”C. elegans पर यह अभिनव प्रयोग पहली बार किसी आयुर्वेदिक औषधि के साथ किया गया है और इसके परिणाम न केवल विज्ञान जगत के लिए रोमांचक हैं, बल्कि आने वाले समय में मानव स्वास्थ्य पर इसके गहरे प्रभाव पड़ सकते हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पार्किंसंस किसे कहते हैं?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने बताया, ”Dopamine हमारे मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण Neurotransmitter और Hormone है, जो हमारे Body Functions और Movements को कण्ट्रोल करता है, लेकिन जब यह Dopamine किसी कारणवश अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाता है, तब शरीर अपना संतुलन खो देता है और हमारा मस्तिष्क वह कार्य भी भूलने लगता है, जिनको हम भली&ndash;भांति कर पाते थे. इस अवस्था को पार्किंसंस कहते हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;">पतंजलि का दावा है, ”न्यूरोग्रिट गोल्ड के सेवन से इन जीवों में Oxidative Stress के स्तर को कम किया, साथ ही Mitochondrial Autophagy के कारक pink&ndash;1, pdr&ndash;1 और Dopamine synthesis के कारक cat-2 &nbsp;genes के Expression को बढ़ाया, जोकि पार्किंसंस बीमारी के कारण कम हो गए थे.”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें-</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://www.abplive.com/business/how-patanjali-new-ventures-are-shaping-india-future-in-wellness-and-sustainability-2964620"><strong>पतंजलि के नए वेंचर स्वास्थ्य और स्थिरता में भारत के भविष्य को कैसे दे रहे हैं आकार?</strong></a></p>



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बॉडी को अंदर से सड़ा देता है यह फंगस, इस देश में मचा रहा तबाही

बॉडी को अंदर से सड़ा देता है यह फंगस, इस देश में मचा रहा तबाही



<p style="text-align: justify;">अमेरिका के कई हिस्सों में खतरनाक फंगस एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स तेजी से फैल रहा है. हवा से फैलने वाला यह फंगस कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए घातक साबित हो सकता है, क्योंकि यह बॉडी को अंदर से सड़ा देता है. फ्लोरिडा, लुइसियाना, टेक्सास, जॉर्जिया और कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. यही वजह है कि डब्ल्यूएचओ ने इसे क्रिटिकल प्रायॉरिटी पैथोजेन कैटिगरी में रखा है. आइए जानते हैं कि यह वायरस कितना खतरनाक है? इसके लक्षण क्या हैं और इससे बचने का क्या तरीका है?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अमेरिका में तेजी से बढ़ रहे केसेज</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका के गर्म और नम जलवायु वाले इलाकों में एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स के केसेज काफी तेजी से बढ़े हैं. सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक, यह फंगस खासकर उन लोगों को प्रभावित कर रहा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है. इनमें कैंसर पेशेंट्स, ऑर्गन ट्रांसप्लांट कराने वाले और HIV/AIDS से पीड़ित लोग शामिल हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण यह फंगस नए इलाकों में फैल रहा है. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के मुताबिक, साल 2100 तक यह फंगस यूरोप के 77.5% अधिक इलाकों में फैल सकता है. वहीं, नॉर्थ अमेरिका में भी इसका असर बढ़ेगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स एक सैप्रोट्रॉफिक फंगस है, जो मिट्टी, सड़ते पौधों और कम्पोस्ट में पाया जाता है. यह छोटे-छोटे स्पोर्स (कॉनिडिया) बनाता है, जो हवा में तैरते हैं और सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं. सामान्य रूप से हेल्दी इम्यून सिस्टम इन स्पोर्स को नष्ट कर देता है, लेकिन कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में यह फंगस टिशूज को नष्ट कर सकता है, जिससे गंभीर बीमारी हो सकती है. यह फंगस न केवल फेफड़ों को, बल्कि दिमाग, हार्ट और किडनी जैसे अंगों को भी प्रभावित कर सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैसे होते हैं इस फंगस के लक्षण?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स से होने वाली बीमारी कई तरह की हो सकती है. इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि यह शरीर के किस हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं और मरीज का इम्यून सिस्टम कैसा है. जानते हैं इसके लक्षण कैसे होते हैं.</p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>एलर्जिक ब्रोन्कोपल्मोनरी एस्परगिलोसिस (ABPA):</strong> यह अस्थमा या सिस्टिक फाइब्रोसिस के मरीजों में कॉमन है. लक्षणों में सांस लेने में तकलीफ, खांसी और छाती में दर्द शामिल हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>क्रॉनिक पल्मोनरी एस्परगिलोसिस (CPA):</strong> इसमें लगातार खांसी, वजन घटना, थकान, और सांस की तकलीफ होती है. अगर फंगस खून की धमनियों को नुकसान पहुंचाता है तो खून की उल्टी (हेमोप्टिसिस) भी हो सकती है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>इनवेसिव एस्परगिलोसिस:</strong> यह सबसे गंभीर रूप है, जो कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में होता है. इसके लक्षणों में बुखार, सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. अगर यह फंगस दिमाग में फैलता है तोस्ट्रोक या दौरे पड़ सकते हैं.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>साइनस इंफेक्शन:</strong> नाक बंद होना, चेहरे में दर्द और सिरदर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं. इन लक्षणों को पहचानना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि ये अन्य बीमारियों जैसे निमोनिया या टीबी से मिलते-जुलते होते हैं.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>बचाव के तरीके</strong></p>
<p style="text-align: justify;">एस्परगिलस फ्यूमिगेट्स से बचाव पूरी तरह मुमकिन नहीं है, क्योंकि यह हवा में हर जगह मौजूद है. हालांकि, कुछ सावधानियां बरतकर इससे बचा सकता है. धूल भरे इलाकों में जाने से बचें. इसके लिए निर्माण स्थलों या बगीचों में काम करते समय सावधानी बरतें. अगर धूल या मोल्ड के कॉन्टैक्ट में आना पड़े तो N95 मास्क पहनें. लंबी आस्तीन के कपड़े पहनें. बगीचे में काम करते समय स्किन जरूर ढंकें. अगर स्किन में कट या घाव हो तो उसे तुरंत साबुन और पानी से धोएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/severe-pain-face-during-cluster-headache-and-trigeminal-neuralgia-2964767">कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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क्या योग से दूर हो सकता है बवासीर का दर्द, जानें यह तरीका कितना कारगर?

क्या योग से दूर हो सकता है बवासीर का दर्द, जानें यह तरीका कितना कारगर?



<p style="text-align: justify;">आजकल की लाइफस्टाइल में सभी का खान-पान अनियमित रहता है, जिसकी वजह से कब्ज की समस्या रहती है. यही दिक्कत आगे चलकर बवासीर का कारण बनती है. बवासीर को पाइल्स भी कहते हं. दरअसल, गुदा और मलाशय के आसपास की नसों में सूजन आने को बवासीर कहा जाता है. यह सूजन गुदा के अंदर या बाहर हो सकती है. इसके कारण दर्द, खुजली और ब्लीडिंग की दिक्कत होती है. आप इन तीन योगासन से बवासीर के दर्द को दूर कर सकते हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बवासीर क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गुदा या मलाशय की नसों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ने के साथ-साथ अनियमित मल त्याग के कारण बवासीर हो जाता है. बवासीर को ‘बादी बवासीर’ और ‘खूनी बवासीर’ में बांटा गया है. बादी बवासीर में मस्से होते हैं और खून नहीं आता है, जबकि खूनी बवासीर में मलत्याग के समय खून आता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बवासीर के लक्षण क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बवासीर के मुख्य लक्षण हैं गुदा क्षेत्र में दर्द, खुजली, खून आना और मल त्याग करने में कठिनाई. इसके अतिरिक्त गुदा के आसपास सूजन, गांठ या चिपचिपा तरल पदार्थ निकलना भी बवासीर के लक्षण हो सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बवासीर कितना आम है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में बवासीर एक आम समस्या है, खासकर शहरी क्षेत्र में. भारत में, लगभग 11 प्रतिशत लोग बवासीर से पीड़ित है. कुछ अनुमानों के अनुसार, हर साल 10 लाख से अधिक नए मामले सामने आते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बवासीर का इलाज</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बवासीर एक आम समस्या है, लेकिन इसका इलाज किया जा सकता है. बवासीर के इलाज के लिए योग एक प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है. योग, शरीर को लचीला बनाकर, पाचन क्रिया को सुधारकर और मांसपेशियों को मजबूत करके बवासीर के लक्षणों को कम करने में मदद करता है. तो आइए जानें तीन आसन जो बवासीर के दर्द को कम करें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1.अश्विनी मुद्रा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अश्विनी मुद्रा बवासीर के दर्द से तुरंत राहत देता है. इस मुद्रा में योग करने से बवासीर की सूजन से छुटकारा पाया जा सकता है. अश्विनी आसन का अभ्यास करने से गुदा क्षेत्र में होने वाली खुजली और जलन दूर हो जाते हैं. इस योग का उपयोग टीवी देखते, चलते या किसी से बात करते समय भी किया जा सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अश्विनी मुद्रा करने का तरीका:</strong> किसी आरामदायक मुद्रा में बैठे. अपने रीढ़ को साधा और लंबा रखें. आप इस संकुचन को कुछ सांसों तक रोक कर रख सकते हैं या फिर कुछ सांसों के बाद छोड़ दें और आराम करें. अश्विनी योग मुद्रा को 5-10 मिनट तक कर सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>2. वज्रासन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वज्रासन, जिसे हीरा मुद्रा भी कहा जाता है, बवासीर के लिए एक फायदेमंद योगासन है. यह पाचन में सुधार करता है, श्रोणि क्षेत्र में रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है औऱ कब्ज से राहत दिलाता है, जो बवासीर के लक्षणों को कम करने में मदद करता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वज्रासन करने का तरीका:</strong> योगा मैट पर घुटने के बल लेट जाएं. अपने पैरों को एक साथ रखें और पंजों को पीछे की ओर रखें, एड़ियों पर बैठें. अपने हाथों को अपने घुटने पर रखें, हथेलियां नीचे की ओर हों. कुछ सांसों के लिए इस मुद्रा में रहें, फिर धीरे-धीरे छोड़ें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>3. बलासन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बलासन बवासीर के लिए फायदेमंद योगासन है. यह गुदा क्षेत्र में रक्त संचार को बेहतर बनाने और कब्ज से राहत दिलाने में मदद करता है, जिससे बवासीर के लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बलासन करने का तरीका:</strong> फर्श पर घुटना टेके और एड़ियों के बल बैठ जाएं. आगे की ओर झुकें. अपनी भुजाओं को सामने की ओर फैलाएं या उसे अपने शरीर के साथ टिकाएं. अपने माथे &nbsp;को चिटाई पर टिकाएं और गहरी सांस लें. 1-3 मिनट तक रुकें तथा धीमी, शांत सांसों पर ध्यान केंद्रित करें.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/severe-pain-face-during-cluster-headache-and-trigeminal-neuralgia-2964767">कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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कैंसर से जल्दी इंसान की जान ले लेती हैं ये खतरनाक बीमारियां, जान लीजिए नाम

कैंसर से जल्दी इंसान की जान ले लेती हैं ये खतरनाक बीमारियां, जान लीजिए नाम


Dangerous Diseases Than Caner: जब भी हम “जानलेवा बीमारी” का नाम सुनते हैं, दिमाग में सबसे पहले कैंसर का ख्याल आता है और क्यों न आए? ये एक खतरनाक बीमारी है जिसने अनगिनत जिंदगियों को छीन लिया है.लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं जो कैंसर से भी तेज इंसान की जान ले सकती हैं? समस्या ये है कि हम इन्हें गंभीरता से नहीं लेते और जब तक समझ में आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. आज हम उन बीमारियों के बारे में जानेंगे जो ना सिर्फ तेजी से शरीर को कमजोर करती हैं, बल्कि सही समय पर इलाज न मिलने पर कैंसर से भी पहले जान ले सकती हैं. 

ये भी पढ़े- क्या होता है डाउन सिंड्रोम, जानिए लक्षण और पूरी तरह इसे ठीक क्यों नहीं किया जा सकता?

सेप्सिस 

यह एक मेडिकल इमरजेंसी है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम संक्रमण से लड़ते हुए अपने ही अंगों पर हमला करने लगता है. 

कुछ ही घंटों में मरीज की हालत बिगड़ सकती है.

समय पर इलाज न मिले तो 24-48 घंटे में मौत संभव है. 

तेज बुखार, सांस लेने में तकलीफ, ब्लड प्रेशर गिरना. 

सडन कार्डियक अरेस्ट 

दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक से अलग, कार्डियक अरेस्ट में दिल की धड़कन अचानक रुक जाती है. 

व्यक्ति कुछ ही मिनटों में बेहोश होकर गिर जाता है. 

अगर तुरंत CPR और मेडिकल हेल्प न मिले, तो10 मिनट में मौत हो सकती है. 

ब्रेन स्ट्रोक 

जब दिमाग को खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है या नस फट जाती है, तो स्ट्रोक होता है. 

ये स्थिति मिनटों में परालिसिस या मौत का कारण बन सकती है. 

समय पर इलाज न हो तो मस्तिष्क को स्थायी क्षति हो सकती है. 

मेनिन्जाइटिस 

दिमाग और रीढ़ की हड्डी की झिल्ली में सूजन. 

ये बीमारी बैक्टीरिया, वायरस या फंगस से हो सकती है. 

अगर बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस समय पर न पकड़ा जाए, तो 24 घंटे के अंदर मौत तक हो सकती है. 

तेज सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, बुखार, उल्टी, चक्कर. 

एनोरेक्सिया नर्वोसा 

यह एक मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति खाने से डरने लगता है और जानबूझकर भूखा रहता है. 

धीरे-धीरे शरीर की मांसपेशियाँ और अंग फेल होने लगते हैं. 

यह बीमारी खासतौर पर युवाओं और महिलाओं में तेजी से जानलेवा बन सकती है. 

हर बीमारी की पहचान और समय पर इलाज जरूरी है. हमें सिर्फ कैंसर से नहीं, उन बीमारियों से भी सतर्क रहना चाहिए जो चुपचाप, तेजी से और अक्सर बिना चेतावनी के शरीर पर हमला करती हैं. 

ये भी पढ़ें: कैसे होता है डीएनए टेस्ट, अहमदाबाद प्लेन क्रैश में बुरी तरह जले हुए शवों की कौन-सी चीज करेगी मदद?

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दवाओं का पूरा कोर्स करना क्यों होता है जरूरी? जानें बीच में छोड़ने पर क्या होता है नुकसान

दवाओं का पूरा कोर्स करना क्यों होता है जरूरी? जानें बीच में छोड़ने पर क्या होता है नुकसान


Complete Antibiotc Course: आपको बुखार हुआ, डॉक्टर ने दवा दी, 5 दिन की. आप दो दिन में ठीक महसूस करने लगे और दवा लेना बंद कर दी. यही सबसे बड़ी भूल है, जो हम में से अधिकतर लोग करते हैं. बीमारी तो गई नहीं होती, बस उसके लक्षण दब जाते हैं और जैसे ही आपने दवा बीच में छोड़ी, वो दुश्मन फिर से ताक में लग जाता है. 

बता दें, दवाएं सिर्फ लक्षणों को नहीं, बीमारी की जड़ को खत्म करती हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें समय चाहिए और जब हम दवा का कोर्स पूरा नहीं करते, तो हम शरीर के अंदर अधूरी जंग छोड़ देते हैं. इस लेख में समझते हैं कि दवा का कोर्स पूरा करना क्यों जरूरी है और बीच में छोड़ देने से क्या गंभीर नुकसान हो सकते हैं. 

ये भी पढ़े- क्या होता है डाउन सिंड्रोम, जानिए लक्षण और पूरी तरह इसे ठीक क्यों नहीं किया जा सकता?

बीच में दवा छोड़ने से क्या होता है?

बीमारी दोबारा लौट आती है: जब आप दवा अधूरी छोड़ते हैं, तो बैक्टीरिया या वायरस पूरी तरह खत्म नहीं होते. कुछ बचे हुए जीवाणु दोबारा सक्रिय हो जाते हैं. 

रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर: अधूरा इलाज आपकी इम्यून सिस्टम पर जोर डालता है. आपका शरीर थक जाता है बार-बार उसी बीमारी से लड़ते हुए. 

एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस का खतरा: ये सबसे खतरनाक समस्या है. जब बैक्टीरिया बार-बार अधूरी दवा के संपर्क में आते हैं, तो वो उस दवा के प्रति प्रतिरोधक हो जाते हैं. 

लंबा और महंगा इलाज:फिर से बीमार पड़ने पर आपको ज्यादा दवाएं, ज्यादा समय और कभी-कभी हॉस्पिटल तक की जरूरत पड़ सकती है. 

कुछ लोग कहते हैं कि, “दवा से नींद आती है या पेट खराब होता है, इसलिए छोड़ दी।” दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, लेकिन डॉक्टर को बताकर दवा बदलवाई जा सकती है. 

डॉक्टर के निर्देश का पालन करें

पूरा डोज लें: जितने दिन की दवा दी गई है, उतने दिन तक लें, चाहे आप पहले ही ठीक क्यों न लगें. 

दवा समय पर लें: समय से दवा लेना उतना ही जरूरी है जितना कोर्स पूरा करना होता है.  

बिना डॉक्टर से पूछे दवा बंद न करें

दवाएं बीमारी की जड़ पर वार करती हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें समय और अनुशासन चाहिए. बीच में दवा छोड़ना मतलब बीमारी को दोबारा बुलाना और इस बार वो ज्यादा ताकतवर होकर लौट सकती है. इसलिए दवा का पूरा डोज लेना महत्वपूर्ण है. चाहे आपको सबकुछ ठीक लग रहा हो, फिर भी दवा को बंद न करें. 

ये भी पढ़ें: कैसे होता है डीएनए टेस्ट, अहमदाबाद प्लेन क्रैश में बुरी तरह जले हुए शवों की कौन-सी चीज करेगी मदद?

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किडनी की बीमारी का लगाना है पता तो तुरंत कराएं ये टेस्ट, सिर्फ इतने रुपये में बन जाएगा काम

किडनी की बीमारी का लगाना है पता तो तुरंत कराएं ये टेस्ट, सिर्फ इतने रुपये में बन जाएगा काम



<p style="text-align: justify;">हमारी बॉडी में किडनी कितनी अहम है, यह बात किसी से छिपी नहीं है. ब्लड को साफ करने से लेकर बॉडी से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और पानी व इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस बनाने का काम किडनी का ही होता है. ऐसे में हम आज आपको उन टेस्ट के बारे में बता रहे हैं, जिनसे आसानी से किडनी की बीमारी का पता लगाया जा सकता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यूरिनालिसिस (Urinalysis)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक नॉर्मल यूरीन टेस्ट है, जिससे पेशाब में प्रोटीन, रक्त, ग्लूकोज और अन्य दिक्कतों की जांच की जाती है. अगर पेशाब में प्रोटीन ज्यादा है तो यह किडनी की बीमारी या पेशाब के रास्ते में इंफेक्शन का सिग्नल हो सकता है. यूरिनालिसिस टेस्ट डायबिटीज, किडनी की बीमारी और यूटीआई का पता लगाने में मदद करता है. यह टेस्ट महज 100 से 300 रुपये में हो जाता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">महज 500 से 1000 रुपये में होने वाला माइक्रोएल्यूमिन्यूरिया टेस्ट पेशाब में एल्ब्यूमिन (प्रोटीन) की सूक्ष्म मात्रा का पता लगाता है. हेल्दी किडनी में माइक्रोएल्ब्यूमिन काफी कम होता है, लेकिन अगर किडनी को नुकसान पहुंचा है तो पेशाब में इसकी मात्रा बढ़ सकती है. यह टेस्ट क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) का शुरुआती संकेत दे सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (BUN) टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस टेस्ट से ब्लड में यूरिया का लेवल पता चलता है, जिसे किडनी हमारे शरीर से बाहर निकालती है. अगर BUN का लेवल नॉर्मल से ज्यादा है तो यह किडनी की कार्यक्षमता में कमी का सिग्नल हो सकता है. इस टेस्ट को कराने में 200 से 500 रुपये तक लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस टेस्ट से ब्लड में क्रिएटिनिन के लेवल की जानकारी मिलती है, जो मांसपेशियों के मेटाबॉलिज्म का अपशिष्ट प्रॉडक्ट है. किडनी की कार्यक्षमता कम होने पर ब्लड में क्रिएटिनिन का लेवल बढ़ जाता है. सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट 150 से 400 रुपये में हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">eGFR टेस्ट किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का आकलन करता है. इससे ब्लड में क्रिएटिनिन के लेवल की गणना उम्र, लिंग और वजन के आधार पर की जाती है. eGFR का कम स्तर क्रॉनिक किडनी डिजीज का संकेत हो सकता है. यह टेस्ट 300 से 700 रुपये तक में करा सकते हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">KFT में BUN, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटाशियम, क्लोराइड) और अन्य मापदंडों की जांच की जाती है. इससे किडनी की पूरी कार्यक्षमता का पता चलता है. KFT औसतन 500 से 1500 रुपये में हो जाता है, जिसकी कीमत अलग-अलग लैब और शहर के हिसाब से अलग हो सकता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी अल्ट्रासाउंड</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक इमेजिंग टेस्ट है, जो किडनी और पेशाब के रास्ते में पथरी, गांठ, रुकावट या अन्य दिक्कतों का पता लगाने में मदद करता है. यह अल्ट्रासाउंड 800 से 2000 रुपये तक में हो जाता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्रिएटिनिन क्लीयरेंस टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह टेस्ट ब्लड और यूरीन में क्रिएटिनिन के लेवल की तुलना करके किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का आकलन करता है. यह 24 घंटे के यूरीन स्टोरेज के साथ किया जाता है और ज्यादा सटीक नतीजे देता है. इस टेस्ट की कीमत 1000 से 2500 रुपये तक हो सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी बायोप्सी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक स्पेशल टेस्ट है, जिसमें किडनी के टिशूज का सैंपल लेकर उसकी माइक्रोस्कोपिक जांच की जाती है. यह टेस्ट तब किया जाता है, जब अन्य टेस्ट से बीमारी की सटीक वजह पता न चले. किडनी बायोप्सी 5000 से 15000 रुपये में हो सकती है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/severe-pain-face-during-cluster-headache-and-trigeminal-neuralgia-2964767">कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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