दवाओं का पूरा कोर्स करना क्यों होता है जरूरी? जानें बीच में छोड़ने पर क्या होता है नुकसान

दवाओं का पूरा कोर्स करना क्यों होता है जरूरी? जानें बीच में छोड़ने पर क्या होता है नुकसान


Complete Antibiotc Course: आपको बुखार हुआ, डॉक्टर ने दवा दी, 5 दिन की. आप दो दिन में ठीक महसूस करने लगे और दवा लेना बंद कर दी. यही सबसे बड़ी भूल है, जो हम में से अधिकतर लोग करते हैं. बीमारी तो गई नहीं होती, बस उसके लक्षण दब जाते हैं और जैसे ही आपने दवा बीच में छोड़ी, वो दुश्मन फिर से ताक में लग जाता है. 

बता दें, दवाएं सिर्फ लक्षणों को नहीं, बीमारी की जड़ को खत्म करती हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें समय चाहिए और जब हम दवा का कोर्स पूरा नहीं करते, तो हम शरीर के अंदर अधूरी जंग छोड़ देते हैं. इस लेख में समझते हैं कि दवा का कोर्स पूरा करना क्यों जरूरी है और बीच में छोड़ देने से क्या गंभीर नुकसान हो सकते हैं. 

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बीच में दवा छोड़ने से क्या होता है?

बीमारी दोबारा लौट आती है: जब आप दवा अधूरी छोड़ते हैं, तो बैक्टीरिया या वायरस पूरी तरह खत्म नहीं होते. कुछ बचे हुए जीवाणु दोबारा सक्रिय हो जाते हैं. 

रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर: अधूरा इलाज आपकी इम्यून सिस्टम पर जोर डालता है. आपका शरीर थक जाता है बार-बार उसी बीमारी से लड़ते हुए. 

एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस का खतरा: ये सबसे खतरनाक समस्या है. जब बैक्टीरिया बार-बार अधूरी दवा के संपर्क में आते हैं, तो वो उस दवा के प्रति प्रतिरोधक हो जाते हैं. 

लंबा और महंगा इलाज:फिर से बीमार पड़ने पर आपको ज्यादा दवाएं, ज्यादा समय और कभी-कभी हॉस्पिटल तक की जरूरत पड़ सकती है. 

कुछ लोग कहते हैं कि, “दवा से नींद आती है या पेट खराब होता है, इसलिए छोड़ दी।” दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, लेकिन डॉक्टर को बताकर दवा बदलवाई जा सकती है. 

डॉक्टर के निर्देश का पालन करें

पूरा डोज लें: जितने दिन की दवा दी गई है, उतने दिन तक लें, चाहे आप पहले ही ठीक क्यों न लगें. 

दवा समय पर लें: समय से दवा लेना उतना ही जरूरी है जितना कोर्स पूरा करना होता है.  

बिना डॉक्टर से पूछे दवा बंद न करें

दवाएं बीमारी की जड़ पर वार करती हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें समय और अनुशासन चाहिए. बीच में दवा छोड़ना मतलब बीमारी को दोबारा बुलाना और इस बार वो ज्यादा ताकतवर होकर लौट सकती है. इसलिए दवा का पूरा डोज लेना महत्वपूर्ण है. चाहे आपको सबकुछ ठीक लग रहा हो, फिर भी दवा को बंद न करें. 

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किडनी की बीमारी का लगाना है पता तो तुरंत कराएं ये टेस्ट, सिर्फ इतने रुपये में बन जाएगा काम

किडनी की बीमारी का लगाना है पता तो तुरंत कराएं ये टेस्ट, सिर्फ इतने रुपये में बन जाएगा काम



<p style="text-align: justify;">हमारी बॉडी में किडनी कितनी अहम है, यह बात किसी से छिपी नहीं है. ब्लड को साफ करने से लेकर बॉडी से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और पानी व इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस बनाने का काम किडनी का ही होता है. ऐसे में हम आज आपको उन टेस्ट के बारे में बता रहे हैं, जिनसे आसानी से किडनी की बीमारी का पता लगाया जा सकता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यूरिनालिसिस (Urinalysis)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक नॉर्मल यूरीन टेस्ट है, जिससे पेशाब में प्रोटीन, रक्त, ग्लूकोज और अन्य दिक्कतों की जांच की जाती है. अगर पेशाब में प्रोटीन ज्यादा है तो यह किडनी की बीमारी या पेशाब के रास्ते में इंफेक्शन का सिग्नल हो सकता है. यूरिनालिसिस टेस्ट डायबिटीज, किडनी की बीमारी और यूटीआई का पता लगाने में मदद करता है. यह टेस्ट महज 100 से 300 रुपये में हो जाता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">महज 500 से 1000 रुपये में होने वाला माइक्रोएल्यूमिन्यूरिया टेस्ट पेशाब में एल्ब्यूमिन (प्रोटीन) की सूक्ष्म मात्रा का पता लगाता है. हेल्दी किडनी में माइक्रोएल्ब्यूमिन काफी कम होता है, लेकिन अगर किडनी को नुकसान पहुंचा है तो पेशाब में इसकी मात्रा बढ़ सकती है. यह टेस्ट क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) का शुरुआती संकेत दे सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (BUN) टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस टेस्ट से ब्लड में यूरिया का लेवल पता चलता है, जिसे किडनी हमारे शरीर से बाहर निकालती है. अगर BUN का लेवल नॉर्मल से ज्यादा है तो यह किडनी की कार्यक्षमता में कमी का सिग्नल हो सकता है. इस टेस्ट को कराने में 200 से 500 रुपये तक लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस टेस्ट से ब्लड में क्रिएटिनिन के लेवल की जानकारी मिलती है, जो मांसपेशियों के मेटाबॉलिज्म का अपशिष्ट प्रॉडक्ट है. किडनी की कार्यक्षमता कम होने पर ब्लड में क्रिएटिनिन का लेवल बढ़ जाता है. सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट 150 से 400 रुपये में हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">eGFR टेस्ट किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का आकलन करता है. इससे ब्लड में क्रिएटिनिन के लेवल की गणना उम्र, लिंग और वजन के आधार पर की जाती है. eGFR का कम स्तर क्रॉनिक किडनी डिजीज का संकेत हो सकता है. यह टेस्ट 300 से 700 रुपये तक में करा सकते हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">KFT में BUN, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटाशियम, क्लोराइड) और अन्य मापदंडों की जांच की जाती है. इससे किडनी की पूरी कार्यक्षमता का पता चलता है. KFT औसतन 500 से 1500 रुपये में हो जाता है, जिसकी कीमत अलग-अलग लैब और शहर के हिसाब से अलग हो सकता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी अल्ट्रासाउंड</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक इमेजिंग टेस्ट है, जो किडनी और पेशाब के रास्ते में पथरी, गांठ, रुकावट या अन्य दिक्कतों का पता लगाने में मदद करता है. यह अल्ट्रासाउंड 800 से 2000 रुपये तक में हो जाता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्रिएटिनिन क्लीयरेंस टेस्ट</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह टेस्ट ब्लड और यूरीन में क्रिएटिनिन के लेवल की तुलना करके किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का आकलन करता है. यह 24 घंटे के यूरीन स्टोरेज के साथ किया जाता है और ज्यादा सटीक नतीजे देता है. इस टेस्ट की कीमत 1000 से 2500 रुपये तक हो सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किडनी बायोप्सी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह एक स्पेशल टेस्ट है, जिसमें किडनी के टिशूज का सैंपल लेकर उसकी माइक्रोस्कोपिक जांच की जाती है. यह टेस्ट तब किया जाता है, जब अन्य टेस्ट से बीमारी की सटीक वजह पता न चले. किडनी बायोप्सी 5000 से 15000 रुपये में हो सकती है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/severe-pain-face-during-cluster-headache-and-trigeminal-neuralgia-2964767">कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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क्या चिया सीड्स से डिटॉक्स हो जाता है लिवर? जानें इस बात में कितनी हकीकत

क्या चिया सीड्स से डिटॉक्स हो जाता है लिवर? जानें इस बात में कितनी हकीकत


Chia Seeds Benefits: चिया सीड्स आजकल हर तरफ छाए हुए हैं, कभी स्मूदी में, कभी सलाद में, तो कभी हेल्दी पुडिंग में. सोशल मीडिया पर इन्हें एक सुपरफूड की तरह पेश किया जा रहा है. इनके बारे में सबसे ज्यादा चर्चित दावों में से एक यह है कि ये लिवर को “डिटॉक्स” कर सकते हैं, खासतौर पर अगर आपको फैटी लिवर की समस्या हो. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ एक बड़ा चम्मच चिया सीड्स आपके लिवर को सच में साफ कर सकता है?

फैटी लिवर क्या है और यह कैसे होता है?

फैटी लिवर को मेडिकल टर्म में हेपेटिक स्टेटोसिस कहते हैं. यह दिक्कत उस वक्त होती है, जब लिवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है. यह शराब के अधिक सेवन (अल्कोहोलिक फैटी लिवर) या खराब खानपान और कम शारीरिक गतिविधि (गैर-अल्कोहोलिक फैटी लिवर या NAFLD) की वजह से हो सकता है. शुरुआत में इसके कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन आगे चलकर यह थकान, लिवर सूजन और यहां तक कि सिरोसिस का कारण बन सकता है.

क्या सलाह देते हैं डॉक्टर?

इस परेशानी से निपटने के लिए डॉक्टर सबसे पहले लाइफस्टाइल बदलने की सलाह देते हैं. इनमें वजन कम करना, एक्सरसाइज करना, चीनी और फास्ट फूड से दूरी बनाना आदि शामिल है.

चिया सीड्स क्यों माने जाते हैं लिवर के लिए फायदेमंद?

चिया सीड्स भले ही आकार में छोटे हों, लेकिन ये पोषण से भरपूर होते हैं. इनमें फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड (खासतौर पर ALA), एंटीऑक्सिडेंट्स और प्लांट-बेस्ड प्रोटीन अच्छी मात्रा में पाया जाता है. ये सभी तत्व हमारे शरीर की संपूर्ण सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो खासतौर पर लिवर की सेहत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं.

  • ओमेगा-3: यह फैटी एसिड लिवर में जमा होने वाली चर्बी और सूजन को कम करने में सहायक होता है, जो फैटी लिवर जैसी परेशानियों के इलाज में अहम भूमिका निभाता है.
  • फाइबर: यह ब्लड शुगर और इंसुलिन लेवल को संतुलित रखने में मदद करता है.जब इनका नियंत्रण सही रहता है, तो लिवर में अतिरिक्त वसा का जमाव कम होता है.
  • एंटीऑक्सिडेंट्स: ये शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव को घटाते हैं, जिससे लिवर की कोशिकाओं को क्षति पहुंचने से बचाया जा सकता है और फैटी लिवर से NASH जैसी गंभीर बीमारियों की प्रगति को रोका जा सकता है.

क्या कहती है रिसर्च?

चिया सीड्स को लेकर वैज्ञानिक रिसर्च में कुछ अच्छे नतीजे जरूर सामने आए हैं, लेकिन ये अब तक पूरी तरह निर्णायक नहीं हैं. 2014 के एक रिपोर्ट में देखा गया कि हाई-फैट डाइट वाले चूहों को जब चिया सीड्स दिए गए तो उनके लिवर की चर्बी कम हुई. इंसानों पर हुई कुछ रिपोर्ट्स में भी देखा गया कि चिया सीड्स से पेट की चर्बी घटी, ट्राइग्लिसराइड्स कम हुए और इंसुलिन प्रतिरोध में सुधार हुआ. हालांकि, अब तक कोई बड़ा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, जो यह साबित करे कि सिर्फ चिया सीड्स से फैटी लिवर पूरी तरह ठीक हो सकता है. इसका फायदा ज्यादातर वजन घटाने, सूजन कम करने और मेटाबॉलिज्म सुधारने के जरिए होता है.

ये भी पढ़ें: कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान

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बवासीर का दर्द हो जाएगा छूमंतर, बस रोजाना डाइट में शामिल कर लें ये चीजें

बवासीर का दर्द हो जाएगा छूमंतर, बस रोजाना डाइट में शामिल कर लें ये चीजें


खराब लाइफस्टाइल और गलत डाइट की वजह से बवासीर बेहद आम समस्या हो चुकी है. इसकी वजह से मल त्याग के दौरान काफी ज्यादा दर्द, जलन, खुजली और ब्लीडिंग तक की दिक्कत रहती है. आइए आपको बताते हैं कि डाइट सही करके बवासीर के दर्द को ठीक किया जा सकता है? 

बवासीर के लिए क्यों जरूरी है सही डाइट?

बवासीर होने की मुख्य वजह कब्ज है. दरअसल, कठोर मल और मल त्याग के दौरान ज्यादा प्रेशर पड़ता है. ऐसे में कब्ज को रोकने और मल को नरम रखने के लिए फाइबर युक्त आहार, पर्याप्त पानी और पाचन तंत्र को हेल्दी रखने वाले फूड्स का सेवन बेहद जरूरी है. बायोमेड रिसर्च इंटरनेशनल और जर्नल ऑफ इन्फ्लेमेशन में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, हाई फाइबर और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों वाले फूड्स से बवासीर की सूजन, दर्द और जलन कम होती है. 

इस तरह की डाइट फायदेमंद

बवासीर के दर्द को कम करने के लिए ज्यादा फाइबर वाले फल खाने चाहिए. इसके लिए पपीता बेहद कारगर है. दरअसल, पपीता में पपेन एंजाइम होता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है और कब्ज से राहत दिलाता है. रात को पपीता खाने से मल त्याग में आसानी होती है. वहीं, केला पेक्टिन नामक घुलनशील फाइबर से भरपूर होता है, जो मल को मुलायम बनाता है. अगर कब्ज से परेशान हैं तो रोजाना एक पका केला जरूर खाना चाहिए. सेब के छिलके में अघुलनशील फाइबर होता है, जो आंतों को साफ रखता है. ऐसे में सेब को छिलके समेत खाना चाहिए. संतरा और अंगूर भी विटामिन सी और फाइबर से भरपूर होते हैं, जो पाचन तंत्र को मजबूत करते हैं.

ये सब्जियां बेहद मददगार

हरी और पत्तेदार सब्जियां बवासीर के लक्षणों को कम करने में बेहद फायदेमंद हैं. इनमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन्स होते हैं, जो सूजन कम करते हैं. पालक में मैग्नीशियम होता है, जो आंतों की मोबिलिटी बढ़ाता है. ब्रोकली में फाइबर और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो गुदा की सूजन कम करते हैं. पत्तागोभी भी कब्ज कम करती है और पाचन तंत्र को हेल्दी रखती है. करेला में फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो बवासीर का दर्द कम करते हैं.

साबुत अनाज भी बेहद कारगर

साबुत अनाज में भी काफी ज्यादा फाइबर होता है, जो मल त्याग को आसान बनाता है और कब्ज रोकता है. ओट्स में घुलनशील फाइबर (बीटा-ग्लूकन) होता है, जो मल को नरम रखता है. सुबह नाश्ते में ओटमील खाना चाहिए. सफेद चावल की जगह ब्राउन राइस खाने चाहिए, क्योंकि इसमें फाइबर ज्यादा होता है. ज्वार और रागी भी फाइबर से भरपूर होते हैं और बवासीर में फायदेमंद होते हैं. 

ईसबगोल की भूसी

ईसबगोल (Psyllium Husk) बवासीर के मरीजों के लिए रामबाण है. इसमें घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह के फाइबर होते हैं, जो मल को भारी और नरम बनाते हैं. रात को सोने से पहले एक चम्मच ईसबगोल की भूसी को गुनगुने पानी या दूध के साथ लेना चाहिए. यह कब्ज को दूर करता है और मल त्याग के दौरान दर्द कम करता है.

मूली और उसका रस

मूली में फाइबर और पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जो कब्ज को दूर करती है. सुबह और रात के वक्त एक चौथाई कप मूली का रस पीने से बवासीर के लक्षणों में राहत मिलती है. आप मूली के पेस्ट में शहद मिलाकर प्रभावित हिस्से पर भी लगा सकते हैं, जिससे जलन और सूजन कम होती है.

नट्स और बीज

नट्स और बीज फाइबर और हेल्दी फैट के अच्छे सोर्स हैं, जो पाचन तंत्र को मजबूत करते हैं. चिया सीड्स में घुलनशील फाइबर होता है, जो मल को नरम रखता है. इन्हें पानी या जूस में भिगोकर पिएं. अलसी में ओमेगा-3 और फाइबर होता है, जो सूजन को कम करता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान

कौन सी बीमारी में होता है सबसे ज्यादा दर्द? खुद मौत मांगने लगता है इंसान



<p style="text-align: justify;">कई बार शरीर में ऐसी बीमारी घर कर जाती है कि उनको सहन करना आसान नहीं होता. अक्सर दिमाग में इस असहनीय ​स्थिति के रूप में कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की ओर ध्यान जाता है. लेकिन दो बीमारी ऐसी हैं, जिनसे उठा दर्द लोग सह नहीं पाते. हालत ये हो जाती है कि इस दर्द को झेलने वाले खुद भगवान से माैत मांगने लगते हैं. ये बीमारी हैं क्लस्टर हेडेक और ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया. इन दोनों बीमारियों के दाैरान मरीजों का होने वाला दर्द देखकर किसी की भी रूह कांप सकती है. इन बीमारियों के लक्षण किस तरह दिखते हैं और कैसे इससे बचाव किया जा सकता है. आइए जानते हैं…</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्लस्टर हेडेक</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सिर दर्द होना सामान्य बात है. थकान या अ​धिक काम के दाैरान ये दिक्कत अक्सर महसूस हो जाती है. लेकिन क्लस्टर हेडेक इससे अलग है. इसमें तेज जलन और चुभने वाला असहनीय दर्द होता है. यह एकबार में एक आंख के आसपास या चेहरे के एक हिस्से में हो सकता है. हर बार सिरदर्द 15 मिनट से तीन घंटे तक रह सकता है. इसे मेडिकल भाषा में प्राइमरी हेडेक डिसऑर्डर कहते हैं. दर्द के कारण आंखों में सूजन और नाक चाैक जैसी शिकायत होती है. अक्सर यह दर्द आंख के इर्द-गिर्द कनपटी और चेहरे पर महसूस होता है. इस दर्द में रात की नींद और दिन का चैन गायब हो जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्लस्टर हेडेक से ऐसे करें बचाव</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;"><strong>गर्म वातावरण से बचें:</strong> क्लस्टर हेडेक की दिक्कत से जूझ रहे हैं तो अ​धिक समय तक धूप में रहने और गर्म वातावरण वाली जगहों पर जाने से बचें.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>एक्सरसाइज:</strong> इंटेंस एक्सरसाइज करने से बचें. ऐसा करने से बाॅडी में हीट पैदा होती है, जिससे फिर से क्लस्टर हेडेक के अटैक का रिस्क बढ़ जाता है.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>स्लीपिंग पैटर्न:</strong> प्राॅपर नींद लें.इसका रूटीन तय करें.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>डाइट:</strong> प्रोटीन से भरपूर फूड शामिल करें.</li>
<li style="text-align: justify;"><strong>स्मोकिंग और अल्कोहल:</strong> ये दोनों गंदी आदतें क्लस्टर हेडेक के रिस्क को बढ़ाती हैं. इनसे दूरी बनाएं.</li>
</ul>
<p><strong>क्या है ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस बीमारी को जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि ट्राइजेमिनल नर्व क्या होती है? ये नर्व ह्यूमन बाॅडी में चेहरे और दिगाम के बीच संदेश वाहक के रूप में काम करती है. यानी चेहरे से लेकर दिमाग तक में दर्द, किसी के स्पर्श और टेंपरेचर से संबंधित संवेदनाओं को भेजती है. ट्राइजेमिनल नर्व पर प्रेशर पड़ता है या &nbsp;फिर ये डैमेज होना शुरू होती है तो ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया की ​स्थिति बनती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस बीमारी की वजह से काफी ज्यादा दर्द होता है. दर्द इस कदर असहनीय होता है कि दांत तक साफ करने में तकलीफ होती है. चेहरे की स्किन इतनी ज्यादा सेंसटिव हो जाती है कि छूने से भी करंट जैसा झटका लगने लगता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया एक तरह की क्राॅनिक पेन डिजीज है. इसकी वजह फिलहाल पता नहीं लग पाई है. बता दें कि बॉलीवुड एक्टर सलमान खान भी इस खतरनाक बीमारी से जूझ चुके हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/eat-green-leaf-every-day-foam-disappear-from-urine-and-kidney-2963121">रोजाना एक हरा पत्ता खा लिया तो पेशाब से गायब हो जाएंगे सारे झाग, किडनी की सेहत बनी रहेगी</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>



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रोजाना कितने पुशअप्स करने से होगा वजन कम, सेहत को मिलेंगे कई फायदे

रोजाना कितने पुशअप्स करने से होगा वजन कम, सेहत को मिलेंगे कई फायदे


Pushups for Weight Loss: क्या आप वजन घटाने के लिए दिनभर डाइट चार्ट्स और कैलोरी काउंटिंग में उलझे रहते हैं? क्या जिम की मेंबरशिप लेकर भी वहां जाने का वक्त नहीं निकाल पाते? अगर हां, तो आपके लिए एक आसान, फ्री और बेहद असरदार उपाय है. पुशअप्स एक ऐसी एक्सरसाइज है जिसे बिना किसी मशीन, उपकरण या खास जगह के, आप कहीं भी कर सकते हैं. यह न सिर्फ आपकी चेस्ट और आर्म्स को मजबूत करता है, बल्कि मेटाबॉलिज्म बढ़ाकर फैट बर्निंग में भी मदद करता है. लेकिन सवाल ये है कि रोज कितने पुशअप्स करने से वजन कम होगा और शरीर को असली फायदा मिलेगा? 

ये भी पढ़े- गर्म पानी के साथ 1 चीज को मिलाकर पीने से खराब कोलेस्ट्रॉल होगा बाहर, हार्ट भी रहेगा स्वस्थ

वजन घटाने के लिए रोज कितने पुशअप्स करें?

शुरुआती लोग: रोजाना 10 से 15 पुशअप्स से शुरुआत करें

मध्यम स्तर: 20 से 30 पुशअप्स रोजाना 2 सेट में करें

एडवांस लेवल: 40 से 50 पुशअप्स 3 सेट में करें

पुशअप्स करने के फायदे

वजन घटाने में मदद: कैलोरीज़ बर्न होती हैं और बॉडी फैट कम होता है

मसल्स टोन होते हैं: चेस्ट, आर्म्स और कंधे मजबूत बनते हैं

कोर स्ट्रेंथ बढ़ती है: पेट की चर्बी घटती है और कोर मसल्स मजबूत होती हैं

हड्डियां और जोड़ों को मजबूती:बिना वजन उठाए, शरीर का वजन ही कसरत के लिए काफी होता है

हृदय स्वास्थ्य बेहतर होता है: पुशअप्स शरीर की सहनशक्ति और कार्डियोवेस्कुलर हेल्थ को बढ़ाते हैं 

सावधानियां बरतनी जरूरी है

शुरुआत में सही पोस्चर से करें, वरना पीठ और कंधे में दर्द हो सकता है

ओवरडू न करें, मांसपेशियों को भी आराम चाहिए

अगर पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें

वजन कम करना अब मुश्किल नहीं, अगर आप रोजाना 20 मिनट पुशअप्स को अपनी दिनचर्या में शामिल करें. यह सरल लेकिन प्रभावी व्यायाम आपके शरीर को फिट रखने, वजन घटाने और आत्मविश्वास बढ़ाने में बेहद मददगार हो सकता है. वैसे तो हम वजन कम करने के लिए कई तरह के योगा या एक्सरसाइज करते हैं. लेकिन कई बार इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर आप एक बार पुशअप्स करके देखेंगे तो शायद आपका वजन कम हो सके और आप सेहतमंद भी रहें. 

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