ये 5 लक्षण दिखें तो समझ जाएं हो गया बोन कैंसर, 95 पर्सेंट लोग कर देते हैं इग्नोर
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<p>शराब के जाम छलकाने का माैका हो तो गिलास बहुत मैटर करता है. अधिकतर कांच के गिलास का यूज किया जाता है. कई बार मजबूरी में लोग प्लास्टिक गिलास में भी इस शाैक को पूरा कर लेते हैं. लेकिन स्टील के गिलास में शराब पीते हुए किसी को नहीं देखा होगा. आखिर ऐसा क्या है कि स्टील के गिलास में शराब नहीं पी जाती? क्या ऐसा करना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है? आपके दिमाग में भी अब ये कंफ्यूजन नहीं रहेगा. आइए इसके बारे में जानते हैं….</p>
<p><strong>शराब बनने के तरीके में छिपा है राज</strong></p>
<p>स्टील के गिलास में शराब नहीं पीने का कारण जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि ये बनती कैसे है. असल में शराब जब बनती है तो उसके लिए फरमेंटिंग टैंक से लेकर फिल्टरिंग यूनिट तक स्टील के बने होते हैं. आसान भाषा में समझें तो शराब को स्टील के बर्तनों में तैयार किया जाता है. जानकारों की मानें तो स्टील के बर्तनों में शराब रखने से किसी तरह का नुकसान नहीं होता है.</p>
<p><strong>फिर स्टील के गिलास से दूरी क्यों?</strong></p>
<p>एक बात तो साफ हो गई है कि स्टील के बर्तनों में शराब रखने का कोई नुकसान नहीं है. अब सवाल उठता है कि आखिर इसको पीने के लिए स्टील के गिलास से क्यों दूरी बनाई जाती है. असल में शाैक करने वाले इसे महसूस करना भी चाहते हैं. स्टील के गिलास में इस चीज कमी रहती है. जबकि कांच के गिलास में हर सिप के साथ शराब को फील करने का माैका मिलता है. शाैकीनों को ये पता लगता रहता है कि उनका पेग कितना रह गया है. ऐसे में शराब पीने के दाैरान इसका सुरूर दोगुना हो जाता है.</p>
<p><strong>मामला स्टेट्स सिंबल का भी</strong></p>
<p>असल मे जो हम देखते हैं, वही करते हैं. फिल्में इसका प्रमुख जरिया बनती हैं. फिल्म से लेकर हाई प्रोफाइल पार्टी, बार से लेकर होटल्स तक में शराब को कांच के गिलास में सर्व करते हुए दिखाया जाता है. ऐसे में ये स्टेट्स सिंबल के ताैर पर भी देखा जाता है. लोगों का लगता है कि कांच के गिलास में शराब पीना अमीरी भी दिखाता है. जबकि फिल्में हों या फिर पार्टी, शराब कहीं भी स्टील के गिलास में नहीं परोसी जाती है. इसलिए आम ताैर पर लोग स्टील के गिलास में शराब पीने को ओहदे से कम समझते हैं. </p>
<p><strong>साइकोलाॅजी असर भी</strong></p>
<p>जानकारों की मानें तो शराब को पीने के दाैरान इसको देखने का मनोवैज्ञानिक असर बहुत बड़ा होता है. किसी भी शाैक का संबंध स्वाद से भी होता है. स्टील के गिलास में ये अहसास सीमित हो जाता है. ये वैसा ही महसूस होता है, जैसे आंखों पर पट्टी बांधकर चीज कोई चीज खिलाना. ऐसे में स्वाद तो जाएगा लेकिन आप उस चीज को फील नहीं कर पाएंगे.</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/frequent-nosebleeds-connection-to-these-serious-diseases-2962982">बार-बार नाक से आ रहा है खून तो हो जाएं सावधान, हो सकती हैं ये बीमारियां</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>
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Eating Banana in Empty Stomach: सुबह उठते ही भूख लगी हो और सामने केला रखा हो, तो हाथ बढ़ाना लाज़मी है. लेकिन खाली पेट इसे खाना शरीर के लिए सही है या नहीं. कई लोग इसे सुपरफूड मानते हैं, तो कुछ कहते हैं कि इससे गैस, एसिडिटी या ब्लड शुगर लेवल बिगड़ सकता है. इसलिए हम आपको बताएंगे कि, खाली पेट केला खाना सही है या नहीं और किन हालात में यह आपके लिए फायदेमंद या नुकसानदायक हो सकता है.
केला एक ऐसा फल है जो पोटैशियम, मैग्नीशियम, फाइबर और विटामिन B6 से भरपूर होता है. यह शरीर को एनर्जी देने का बेहतरीन स्रोत है, खासकर सुबह-सुबह जब शरीर को ईंधन की सबसे अधिक जरूरत होती है. इसलिए अगर इसे खाली पेट खाया जाए, तो कुछ लोगों को गैस, सूजन या एसिडिटी जैसी समस्या हो सकती है.
ये भी पढ़े- पीले रंग की सब्जी खाने से यूरिक एसिड होगा कंट्रोल, दर्द और सूजन की परेशानी भी होगी कम
खाली पेट कब खा सकते हैं?
तेज एनर्जी की जरूरत हो: केले में मौजूद प्राकृतिक शुगर (ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़ और सुक्रोज़) शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है. वर्कआउट से पहले यह परफेक्ट स्नैक है.
अगर आपके पेट की पाचनशक्ति मजबूत है: केला आपको नुकसान नहीं करेगा और सुबह का एक अच्छा विकल्प बन सकता है.
केला के साथ कुछ और खाया जाए: केला को दही, ओट्स या नट्स के साथ मिलाकर खाना आपके पेट पर कम असर करता है और पोषण संतुलन बनाए रखता है.
नुकसानदायक कब हो सकता है?
एसिडिटी या पेट में गैस की समस्या हो तब केला खाली पेट खाने से तकलीफ़ बढ़ सकती है.
ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव होता हो, केला हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला फल है, इसलिए डायबिटीज या इंसुलिन इम्बैलेंस वालों को खाली पेट इससे बचना चाहिए.
अगर सुबह का पहला भोजन सिर्फ केला है और उसके बाद देर तक कुछ नहीं खाते, तो शरीर को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता.
क्या है सही तरीका?
अगर आपको केला पसंद है और आप इसे सुबह खाना चाहते हैं, तो इसे अकेले न खाएं. इसे दही, पीनट बटर, ओट्स या नट्स के साथ मिलाकर खाएं. इससे शुगर का असर नहीं होगा.
केला पोषण से भरपूर फल है, लेकिन इसे खाली पेट खाना हर किसी के लिए सही नहीं होता. अगर आपका पेट मजबूत है और आप एक्टिव लाइफस्टाइल जीते हैं तो केला आपके लिए अच्छा हो सकता है. लेकिन अगर पेट की संवेदनशीलता या डायबिटीज जैसी समस्या है, तो थोड़ी समझदारी जरूरी है.
ये भी पढ़ें: कैसे होता है डीएनए टेस्ट, अहमदाबाद प्लेन क्रैश में बुरी तरह जले हुए शवों की कौन-सी चीज करेगी मदद?
Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Yellow vegetables for Joint Pain: दादी कहती थीं कि खाने में रंग जितने अधिक होंगे, सेहत उतनी ही अच्छी होगी. शायद आपने भी सुना होगा कि लाल टमाटर खाओ आंखों के लिए, हरी सब्जी खाओ ताकत के लिए, लेकिन क्या कभी आपने पीली सब्जियों को गंभीरता से लिया है? अगर आपको यूरिक एसिड की दिक्कत है या पैरों में दर्द, जोड़ों में सूजन, हलचल में तकलीफ तो आपकी थाली में रखी पीले रंग की सब्जी असरदार इलाज हो सकती है. पीली सब्जियों में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को संतुलित रखने में मदद करते हैं, साथ ही सूजन और जोड़ों के दर्द से भी राहत दिलाते हैं.
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यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है?
शरीर में जब प्यूरीन नामक तत्व टूटता है तो यूरिक एसिड बनता है. अगर यह शरीर में ज्यादा बन जाए या समय पर बाहर न निकले तो यह खून में जमा हो जाता है और जोड़ों में दर्द, सूजन और गठिया जैसी समस्याएं पैदा करता है. खासकर घुटनों, टखनों और पैरों में तेज़ जलन और सूजन महसूस होती है.
पीली सब्जियां कैसे करती हैं कमाल?
हल्दी, पीली शिमला मिर्च, कद्दू, पीला गाजर, और पीले टमाटर जैसे विकल्पों में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट्स, फाइबर, विटामिन C और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो यूरिक एसिड को कम करने में मदद करते हैं.
विशेष रूप से फायदेमंद सब्जियां
कद्दू: फाइबर और पोटैशियम से भरपूर, यूरिक एसिड को शरीर से बाहर निकालने में सहायक.
पीली शिमला मिर्च: विटामिन C का स्रोत, सूजन और दर्द से राहत दिलाती है.
हल्दी: शरीर में सूजन कम करती है और लिवर की कार्यक्षमता को बढ़ाकर यूरिक एसिड का संतुलन बनाए रखती है.
डाइट में कैसे शामिल करें?
कद्दू की सब्ज़ी को जीरे के तड़के और हल्दी के साथ बनाएं.
सलाद में पीली शिमला मिर्च के स्लाइस जोड़ें.
हल्दी वाला दूध या पानी दिन में एक बार जरूर लें.
सब्जियों का हल्का-सा भाप में पका सूप यूरिक एसिड रोगियों के लिए लाभकारी होता है.
जोड़ों का दर्द और यूरिक एसिड की समस्या सुनने में भले आम लगे, लेकिन अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह चलने-फिरने की क्षमता तक सीमित कर सकती है. ऐसे में रंग-बिरंगी डाइट में पीली सब्जियों को खास स्थान देना न सिर्फ स्वाद बढ़ाता है बल्कि शरीर को रोगों से लड़ने की ताकत भी देता है.
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Green Leaf Benefits: सुबह-सुबह जब आप टॉयलेट जाते हैं और पेशाब में झाग देखते हैं, तो क्या आप उस पर ध्यान नहीं देते, अगर हां, तो यह आदत बदलने की जरूरत है. पेशाब में झाग आना एक मामूली बात नहीं है, बल्कि यह संकेत हो सकता है कि आपकी किडनी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं है. शरीर में ज़हर और फालतू तत्वों को निकालने का काम किडनी करती है और जब ये अंग दबाव में होते हैं तो उनके संकेत हमें इसी तरह के छोटे-छोटे लक्षणों के रूप में दिखते हैं.
क्या आप जानते हैं कि सिर्फ एक साधारण हरा पत्ता रोजाना खाकर आप अपनी किडनी को तंदरुस्त बना सकते हैं? ये भारतीय रसोई और धार्मिक परंपराओं में खास जगह रखती है. आइए जानते हैं कि यह छोटा-सा हरा पत्ता कैसे बन सकता है आपकी किडनी का रक्षक और कैसे रोजाना इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करके आप खुद को बड़ी बीमारियों से बचा सकते हैं.
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पेशाब में झाग क्यों आता है?
शरीर में प्रोटीन की कमी होना
कम पानी पीना
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI)
किडनी पर बढ़ता दबाव
डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर
तुलसी पत्ता क्यों है फायदेमंद?
एंटीऑक्सिडेंट्स: शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालते हैं
एंटीबैक्टीरियल गुण: पेशाब में संक्रमण को रोकते हैं
डाययुरेटिक गुण: मूत्र की मात्रा बढ़ाकर किडनी की सफाई करते हैं
कैसे करें तुलसी का सेवन?
सुबह खाली पेट तीन तुलसी के पत्ते खाएं
इसे गुनगुने पानी के साथ ले सकते हैं
तुलसी की चाय बनाकर पी सकते हैं
आयुर्वेदिक पाउडर या जूस भी बाजार में उपलब्ध हैं
किन चीज़ों का रखें ध्यान?
दिनभर में कम से कम 80 गिलास पानी पिएं
नमक और तला-भुना भोजन कम करें
नियमित व्यायाम करें
साल में एक बार किडनी फंक्शन टेस्ट करवाएं
कई बार हमारे शरीर के संकेत बहुत साधारण लगते हैं, लेकिन उनके पीछे छुपा संदेश गंभीर हो सकता है. पेशाब में झाग आना ऐसा ही एक संकेत है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. सौभाग्य से प्रकृति ने हमें तुलसी जैसा आसान, सस्ता और कारगर उपाय दिया है. तो क्यों न आज से ही एक छोटा-सा कदम उठाएं और अपनी किडनी को दें रोजाना एक हरियाली का तोहफा.
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<p style="text-align: justify;">गर्मियों में काफी लोगों की नाक से बार-बार खून आ जाता है. आम भाषा में इसे नकसीर फूटना भी कहते हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को यह दिक्कत हो सकती है. ज्यादातर मामलों में इसे सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, लेकिन अगर यह दिक्कत बार-बार हो रही है तो यह गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम का सिग्नल भी हो सकती है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नाक से खून आने के कारण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">नाक में खून की कई नाजुक धमनियां होती हैं, जो नाक के आगे और पीछे की सतह के करीब होती हैं. ये धमनियां काफी आसानी से डैमेज हो सकती हैं, जिसके कारण नकसीर फूटने की दिक्कत होती है. ज्यादा गर्मी या सर्दी के मौसम में यह दिक्कत कई बार हो जाती है. दरअसल, गर्मियों और सर्दियों में शुष्क हवा नाक की झिल्ली को सुखा सकती है, जिससे खून की धमनियों के फटने का खतरा बढ़ जाता है. कई बच्चे नाक में उंगली डालते हैं और कुछ लोग जोर से नाक साफ करते हैं. इसकी वजह से भी खून की धमनियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे नकसीर फूट जाती है. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इन वजहों से भी होता है ऐसा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा साइनसाइटिस या एलर्जी के कारण नाक की झिल्ली में सूजन आ सकती है, जिससे ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है. वहीं, सर्दी-जुकाम या राइनोवायरस के कारण भी नाक से खून आ सकता है. कुछ लोग खून को पतला करने वाली दवाएं जैसे एस्पिरिन, वारफेरिन या नॉन-स्टेरॉयडल आदि इस्तेमाल करते हैं, जिससे ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है. साथ ही, हाई ब्लड प्रेशर की वजह से भी नकसीर फूटने का खतरा रहता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नकसीर फूटने से मिलता है इन गंभीर बीमारियों का संकेत</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हीमोफीलिया:</strong> यह एक जेनेटिक बीमारी है, जिसमें खून के थक्के बनने के प्रोसेस में रुकावट आती है. इसकी वजह से छोटी-सी चोट या मामूली दबाव से भी काफी देर तक ब्लीडिंग हो सकती है. नाक से बार-बार खून आना हीमोफीलिया का प्रमुख लक्षण हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर):</strong> ल्यूकेमिया अस्थि मज्जा में बनने वाला कैंसर है, जो ब्लड प्लेटलेट्स की संख्या को कम कर सकता है. इससे ब्लीडिंग की दिक्कत बढ़ जाती है और नाक से बार-बार खून आना इसका लक्षण हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लिवर सिरोसिस और फैटी लिवर:</strong> लिवर सिरोसिस या फैटी लिवर होने पर भी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिसके कारण नाक से खून आने की समस्या हो सकती है. यह परेशानी उन लोगों में देखी जाती है, जो ज्यादा शराब या हाई कैलोरी वाली डाइट लेते हैं. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हाई ब्लड प्रेशर:</strong> हाई ब्लड प्रेशर नाक में मौजूद खून की धमनियों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे बार-बार नकसीर की दिक्कत होती है. यह परेशानी खासकर बुजुर्गों में देखी जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेजल ट्यूमर:</strong> नाक या साइनस में ट्यूमर होने पर नाक से खून आने की दिक्कत हो सकती है. इस कंडीश का कनेक्शन कैंसर से होता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इडियोपैथिक थ्रॉम्बोसाइटोपेनिक परप्यूरा (ITP):</strong> इस दिक्कत में खून में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है, जिसके कारण ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है. नाक से बार-बार खून आना इसका लक्षण हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हेरेडिटरी हैमोरेजिक टेलैंगिएक्टेसिया (HHT):</strong> यह दुर्लभ जेनेटिक डिसऑर्डर है, जिसमें खून की धमनियां असामान्य रूप से विकसित होती हैं. इसकी वजह से नकसीर की समस्या बार-बार हो सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें: <a href="https://www.abplive.com/photo-gallery/lifestyle/health-how-pregnancy-can-be-detect-after-having-intercourse-or-physical-relation-know-the-first-sign-2962629">शारीरिक संबंध बनाने के कितने दिन बाद चलता है प्रेग्नेंसी का पता, क्या होती है सबसे पहली पहचान?</a></strong></p>
<p><strong>Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>
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