Sea Buckthorn: ‘सी बकथॉर्न’ छोटा फल लेकिन बड़े फायदे, जानिए इसके स्वास्थ्य लाभ

Sea Buckthorn: ‘सी बकथॉर्न’ छोटा फल लेकिन बड़े फायदे, जानिए इसके स्वास्थ्य लाभ


सी बकथॉर्न के फायदे: आज के भाग भरी रेस में हम अपनी-अपनी जगह को अंतिम रूप दे सकते हैं. समय की कमी और असंतुलित भोजन की वजह से हमारे शरीर में विटामिन, पोषक तत्वों और पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिससे हमारी सेहत धीरे-धीरे बढ़ती है.

सी बकथॉर्न क्या है?

बक सीथॉर्न एक औषधीय पौधा है. बकथॉर्न का नाम पता ही है अगर आप सोच रहे हैं कि इस समुद्र में कोई पौधा है, तो आप गलत हैं. असल, समुद्र में नहीं बल्कि भारत के पहाड़ी इलाकों जैसे हिमाचल, उत्तराखंड, लेह और नींद में पाया जाता है. इसके छोटे-छोटे पोषक तत्व पोषक तत्वों की अधिकता होती है. इसका उपयोग फल आयुर्वेद, ग्रीक और आधुनिक चिकित्सा में लंबे समय से किया जा रहा है. दिखने में छोटा होने के बावजूद यह सेहत के लिए बेहद खतरनाक है और शरीर को जरूरी पोषण देता है.

बक सीथॉर्न: दिल, पारा और शुगर के लिए पागल

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, सी बकथॉर्न में बायोऑक्साइक कंपनी के यौगिक पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए काफी चमत्कारी होते हैं. यह फल दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम हो सकता है. साथ ही, यह ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में भी सहायक है और कैंसर से बचाव की क्षमता रखता है. इसके अलावा, लॉन्च की रक्षा करना भी बहुत जरूरी माना गया है.

त्वचा और सेहत के लिए वरदान है सी बकथॉर्न
सी बकथॉर्न में विटामिन C, E, बीटा-कैरोटीन, ओमेगा फैटी एसिड और कई एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर को बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं. यह फल खासकर त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद है — यह झुर्रियों को कम करता है, त्वचा को निखारता है और ड्राई स्किन या एक्जिमा जैसी समस्याओं में राहत देता है. साथ ही, यह सूरज की हानिकारक किरणों से भी रक्षा पकरता है.

इम्यूनिटी और पाचन तंत्र को मजबूत करता है

सी बकथॉर्न पाचन की परेशानी जैसे गैस, कब्ज और अपच में भी राहत देता है. यह आंतों की सूजन को कम करता है और खाना पचाने में मदद करता है. इसमें मौजूद ओमेगा-7 आंखों की सूखापन की समस्या में भी बहुत उपयोगी है.

महिलाओं के लिए खास फायदेमंद

सी बकथॉर्न महिलाओं के हार्मोन को संतुलित करने में मदद करता है. खासतौर पर मेनोपॉज के समय होने वाले मूड स्विंग, गर्मी लगना और थकान जैसी समस्याओं में राहत देता है. यह शरीर को ताकत और ऊर्जा देने का भी काम करता है.

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प्रियंगु: आपकी सेहत का रखवाला, त्वचा और पेट की बीमारियों में असरदार

प्रियंगु: आपकी सेहत का रखवाला, त्वचा और पेट की बीमारियों में असरदार


Benefits of Priyangu: आयुर्वेद में इसके कई औषधीय गुण बताए गए हैं जिनमें इसके औषधीय गुण भी शामिल हैं. मित्रो में से एक उपयोगी पौधा है प्रियंगु, जिसे हिंदी में बिरमोली या धैया के नाम से भी जाना जाता है. यह पौधा प्राकृतिक गुणों से भरपूर होता है और कई प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी प्रश्न माने जाते हैं.

नाम और वैज्ञानिक परिचय

प्रियंगु का वैज्ञानिक नाम कैलीकारपा ग्रेफिला है, और इसे अंग्रेजी में ‘सुगंधित चेरी’ या ‘ब्यूटी बेरी’ कहा जाता है. भारत के अलग-अलग इलाकों में यह अलग-अलग जंगलों से जाना जाता है. संस्कृत में इसे वनिता, लता, शुभा, सुमांगा और प्रियंगु कहते हैं. इसे हिंदी में बिरमोली या धैया के नाम से जाना जाता है. बंगाली में इसे मथारा, मराठी में गुहुला, तमिल में नल्लू, मलयालम में चिंपोपिल, गुजराती में घनूला और नेपाली में दयालो कहा जाता है.

त्रिदोषनाशक गुण (वात-पित्त-कफ का संतुलन)

चरक संहिता के अनुसार प्रियंगु एक ऐसा औषधीय पौधा है जो शरीर के तीन दोष – वात, पित्त और कफ – को संतुलन में बनाए रखने में सहायक होता है. प्रियंगु का वैज्ञानिक नाम कैलीकार्पा फिशिला है. अंग्रेजी में इसे सुपरमार्केट चेरी या ब्यूटी बेरी कहा जाता है.

विक्रय में उपयोग और औषधीय लाभ

आयुर्वेद के मुताबिक प्रियंगु एक प्रभावशाली औषधीय पौधा है जिसका उपयोग कई रोगों के उपचार में किया जाता है. इसे खासतौर पर पेट दर्द, दस्त, पेचिश और मूत्र संक्रमण (UTI) जैसी परेशानियों में खास माना गया है. साथ ही यह त्वचा संबंधी रोगों जैसे खुजली, लाल चकत्ते और फोड़े-फुंसियों में भी राहत देता है. चरक संहिता में बताया गया है कि प्रियंगु वात और पित्त को शांत करने में मदद करता है, चेहरे की त्वचा की रंगत निखारता है और घावों को जल्दी भरने में मदद होता है. दांतों की समस्याओं के लिए भी यह बहुत उपयोगी है. त्रिफला, नागरमोथा और प्रियंगु को मिलाकर बनाया गया चूर्ण मसूड़ों की सूजन (शीताद) में आराम देने के लिए दांतों पर लगाया जाता है.

सेवन से पहले सावधानी

खानपान की गड़बड़ी से होने वाले रक्तातिसार और पित्त विकार में शल्लकी, तिनिश, सेमल, प्लक्ष छाल व प्रियंगु का चूर्ण शहद और दूध के साथ सेवन करना लाभकारी होता है. प्रियंगु के फूल और फल अपच, दस्त, पेट दर्द और पेचिश में भी उपयोगी हैं. इसके पत्ते, फूल, फल और जड़ औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं. उपयोग से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है.

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अधोमुख श्वानासन के चमत्कारी फायदे, जानें कैसे पाए तनाव और अनिद्रा से छुटकारा, अपनाएं ये उपाय

अधोमुख श्वानासन के चमत्कारी फायदे, जानें कैसे पाए तनाव और अनिद्रा से छुटकारा, अपनाएं ये उपाय



<p style="text-align: justify;"><strong>AdhoMukhaSvanas:</strong> योग सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक तरीका है. यह हमारे शरीर को मजबूत और लचीला बनाता है, मन को शांत करता है और आत्मा को संतुलन देता है. आज के तनाव भरे माहौल में योग अपनाना बहुत जरूरी हो गया है, क्योंकि यह न केवल शारीरिक थकान को दूर करता है, बल्कि मानसिक तनाव को भी कम करता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अधोमुख श्वानासन क्या है?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अधोमुख श्वानासन योग का एक प्रमुख आसन है, जो अष्टांग योग का हिस्सा है और सूर्य नमस्कार की प्रक्रिया में भी आता है. संस्कृत में ‘अधोमुख’ का मतलब होता है ‘नीचे की ओर चेहरा’ और ‘श्वान’ का अर्थ है ‘कुत्ता’. इस आसन में शरीर की आकृति कुत्ते की तरह हो जाती है, इसलिए इसे अंग्रेज़ी में ‘डाउनवर्ड फेसिंग डॉग पोज’ कहा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शारीरिक लाभ</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह आसन शरीर के कई हिस्सों को फायदा पहुंचाता है. इसे रोजाना करने से कंधे, हाथ, टांगें और रीढ़ की हड्डी मजबूत बनती हैं. यह थकान को दूर करता है और शरीर में नई ऊर्जा भरता है. खिलाड़ियों और एथलीट्स के लिए यह एक बेहतरीन आसन माना जाता है, जो उनकी फिटनेस और लचीलापन दोनों को बढ़ाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मानसिक शांति और तनाव से राहत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अधोमुख श्वानासन शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद है. यह रोज़ करने से मानसिक तनाव कम होता है, चिंता दूर होती है और मन शांत रहता है. यह आसन सिर की ओर रक्त प्रवाह बढ़ाकर दिमाग को सुकून देता है, जिससे नींद बेहतर होती है. इसलिए यह अच्छी नींद और मानसिक शांति के लिए एक प्रभावी योगासन है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पाचन और आंतरिक अंगों पर असर</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अधोमुख श्वानासन पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करता है. इस आसन को करने से पेट पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिलती है. इसे रोज करने से पाचन क्रिया सुधरती है और पेट साफ रहता है. यह योगासन आंतरिक अंगों को सक्रिय करता है, जिससे पेट से जुड़ी बीमारियाँ दूर होती हैं और शरीर स्वस्थ बना रहता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैसे करें अधोमुख श्वानासन?</strong></p>
<ul>
<li style="text-align: justify;">सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं और पैरों के बीच थोड़ा फासला रखें.</li>
<li style="text-align: justify;">अब गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं.</li>
<li style="text-align: justify;">फिर सांस छोड़ते हुए शरीर को धीरे-धीरे आगे झुकाएं और हाथों को जमीन पर टिकाएं.</li>
<li style="text-align: justify;">शरीर को इस तरह से रखें कि वह एक उल्टे ‘V’ की आकृति में आ जाए.</li>
<li style="text-align: justify;">इस स्थिति में 3 से 5 मिनट तक सांस पर ध्यान केंद्रित करते हुए टिके रहें.</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये भी पढ़ें-</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="https://www.abplive.com/lifestyle/health/signs-of-diabetes-that-most-people-ignore-after-35-2961159">35 के बाद दिखें ये लक्षण, तो हो जाएं सावधान! डायबिटीज की हो सकती है शुरुआत</a></strong></p>



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Cancer News: गर्भाशय कैंसर से पीड़ित मरीजों के साथ लापरवाही, ठीक से नहीं हो पा रही जांच- रिसर्च

Cancer News: गर्भाशय कैंसर से पीड़ित मरीजों के साथ लापरवाही, ठीक से नहीं हो पा रही जांच- रिसर्च


Uterine Cancer: एक नए रिपोर्ट से यह सामने आया है कि गर्भाशय कैंसर से पीड़ित कई महिलाओं की लिंच सिंड्रोम नामक आनुवंशिक स्थिति की सही तरीके से जांच नहीं की जा रही है. यह स्थिति न केवल गर्भाशय, बल्कि आंतों के कैंसर का खतरा भी काफी हद तक बढ़ा देती है.

लिंच सिंड्रोम : गंभीर लेकिन अनदेखा खतरा

लिंच सिंड्रोम हर 300 में से एक व्यक्ति को प्रभावित करता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से केवल 5% लोग ही इसके बारे में जानते हैं. यह एक आनुवंशिक स्थिति है जो व्यक्ति को गर्भाशय और कोलन (बड़ी आंत) के कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है.

समय पर पहचान से मिल सकता है जीवनदान

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के विशेषज्ञों का कहना है कि इस सिंड्रोम की समय पर पहचान होने से मरीज अपने स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं और कैंसर से बचाव के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं. साथ ही, इससे इलाज पर होने वाला खर्च भी काफी हद तक कम किया जा सकता है.

रिसर्च में मिली जांच प्रणाली की खामियां

बीएमजी ऑन्कोलॉजी जर्नल में छपे रिसर्च कि मुताबिक, 2022 से 2023 के बीच यूके और आयरलैंड में 2,500 से ज्यादा गर्भाशय कैंसर मामलों का रिसर्च किया गया. इसमें पाया गया कि 91% मामलों में ट्यूमर की लिंच सिंड्रोम के लक्षणों के लिए जांच की गई, लेकिन जांच के नतीजे डॉक्टरों की पूरी टीम तक नहीं पहुंचे. परिणामस्वरूप, आवश्यक जेनेटिक काउंसलिंग और ब्लड टेस्ट की प्रक्रिया अधूरी रह गई.

अधूरी प्रक्रिया, अधूरी पहचान

जिन मरीजों को जेनेटिक काउंसलिंग की जरूरत थी, उनमें से केवल दो-तिहाई को ही इसके लिए भेजा गया, और लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण महज 48% मरीजों की ही जांच हो सकी. इसका सीधा असर यह हुआ कि कई मरीजों में लिंच सिंड्रोम की पहचान नहीं हो पाई और उनका कैंसर का खतरा बढ़ा रहा.

जागरूकता और बेहतर व्यवस्था की जरूरत

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के क्लिनिकल लेक्चरर डॉ. नील रयान ने कहा, “दिशानिर्देश और जांच दर अच्छी होने के बावजूद, यदि मरीजों को ब्लड टेस्ट के लिए समय पर नहीं भेजा जाता तो यह पूरी प्रक्रिया बेकार हो जाती है. यह न सिर्फ मरीज के लिए, बल्कि उनके परिवार के लिए भी बड़ा खतरा है.

शोधकर्ता कहते हैं कि यदि समय पर पहचान हो जाए तो एस्पिरिन जैसी दवाओं, नियमित कोलोनोस्कोपी और हिस्टेरेक्टॉमी जैसे उपायों से भविष्य में कैंसर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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इम्यूनिटी बढ़ाएं और शरीर को करें अंदर से रिचार्ज, ये आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां आएंगी आपके काम

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Ayurvedic Benefits: अगर आप ऐसी आयुर्वेदिक दवा की तलाश में हैं जिसमें गोखरू, शिलाजीत, कौंच बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा जैसी शक्तिशाली औषधियाँ हों, तो आप सही जगह पर हैं. ये जड़ी-बूटियाँ आयुर्वेद में वर्षों से जानी-पहचानी हैं और शरीर को मजबूती, स्टैमिना और बेहतर सेहत देने में बेहद असरदार मानी जाती हैं.

 ये हर्ब्स कैसे करते हैं काम?

इन आयुर्वेदिक हर्ब्स का सेवन मांसपेशियों को मजबूत करता है, शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाता है और थकान को दूर करता है. ये दवाएं अंदर से शरीर को ताकत देती हैं और जीवनशैली को बेहतर बनाने में मदद करती हैं.

जड़ी-बूटियों के फायदे

गोखरू- यह मूत्र मार्ग और किडनी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, साथ ही टेस्टोस्टेरोन को संतुलित रखने में सहायक है.
शिलाजीत- यह ऊर्जा बढ़ाने, मानसिक और शारीरिक थकान दूर करने, और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है.
कौंच बीज- यह हार्मोन संतुलन, यौन स्वास्थ्य और मूड बेहतर करने में सहायक होता है. डोपामाइन का स्तर बढ़ा कर मानसिक स्थिति को सुधारता है.
सफेद मूसली- शरीर की कमजोरी दूर कर मांसपेशियों को ताकत देती है और पुरुषों के स्वास्थ्य को मजबूती देती है.
अश्वगंधा- तनाव कम करती है, नींद की गुणवत्ता सुधारती है और मांसपेशियों की रिकवरी में मदद करती है. यह एक बेहतरीन प्राकृतिक एडाप्टोजेन है.

बाजार में मौजूद सप्लीमेंट्स

आज के समय में कई आयुर्वेदिक सप्लीमेंट्स मौजूद हैं जो इन सभी जड़ी-बूटियों का मिश्रण एक ही कैप्सूल या चूर्ण में उपलब्ध कराते हैं. लेकिन कोई भी दवा या सप्लीमेंट शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या आयुर्वेदाचार्य से सलाह लेना जरूरी है — खासकर यदि आप पहले से कोई दवाइयाँ ले रहे हैं.

सही इस्तेमाल से ही मिलेगा पूरा फायदा

ध्यान रखें कि आयुर्वेदिक दवाएं धीरे-धीरे असर दिखाती हैं. इसलिए इन्हें नियमित रूप से, सही मात्रा में और एक स्वस्थ जीवनशैली के साथ लें. साथ ही संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम और भरपूर नींद को भी अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं — तभी इन जड़ी-बूटियों का पूरा लाभ मिलेगा.

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Cancer News: कैंसर के जोखिम का प्रमुख कारण वह नहीं है जो आप सोचते हैं!

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Cause of Cancer Risk: अगर आप लोगों से पूछें कि कैंसर किस वजह से होता है, तो शायद ज्यादातर अपने जवाब में धूम्रपान, शराब पीने, सूरज की किरणों और बालों को रंगने वाली डाई जैसी चीजों को गिनाएंगे. लेकिन कैंसर के लिए सबसे प्रमुख जोखिम वाला कारक कुछ और है और वह है उम्र बढ़ना या बुढ़ापा आना (एजिंग). यह बात सही है, कैंसर से जुड़ा सबसे बड़ा कारक अपरिहार्य है और यह एक ऐसी स्थिति है जिसका हम सभी अनुभव करेंगे.

यह क्यों महत्वपूर्ण है? कनाडा और दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वृद्ध लोगों की है. 2068 तक, लगभग 29 फीसदी कनाडाई 65 साल से ज्यादा उम्र के होंगे. वृद्ध लोगों में कैंसर सबसे आम बीमारियों और कनाडा में सबसे आम बीमारियों में से एक है, इसका मतलब है कि हमें वृद्ध लोगों के लिए सबसे अच्छी कैंसर देखभाल प्रदान करने के बारे में सोचना होगा.

क्यो होता है कैंसर?

तो अब तक हम किस तरह काम कर रहे हैं? जवाब है: बहुत अच्छा नहीं. यह आश्चर्यजनक हो सकता है, लेकिन हमारे पास कैंसर देखभाल में इस जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए कुछ नया करने और तैयारी करने का एक शानदार अवसर भी है.

अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी के दिशानिर्देश समेत अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश कहते हैं कि सभी वृद्ध लोगों को अपने कैंसर इलाज के बारे में निर्णय लेने से पहले बुढ़ापे का (जरिएट्रिक) मूल्यांकन करवाना चाहिए.

किसी वृद्ध के लिए जेरियाट्रिसियन से परामर्श ऑन्कोलॉजिस्ट और वृद्ध को जानकारी के साथ कैंसर इलाज के बारे में बातचीत करने की अनुमति देता है. इलाज उनके संज्ञान, उनके कार्य, उनकी मौजूदा बीमारियों (जो कि अधिकांश वृद्ध लोगों में कैंसर का निदान होने पर होती हैं) और शेष जीवन के सालों को कैसे प्रभावित कर सकता है.

रोगियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है?

महत्वपूर्ण रूप से,जेरियाट्रिसियन अपने मूल्यांकन को इस बात पर केंद्रित करते हैं कि रोगियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है. यह दृष्टिकोण वृद्ध लोगों की इच्छाओं और उनकी समर्थन प्रणाली के इर्द-गिर्द कैंसर के बारे में कोई भी निर्णय लेने में सहायक होता है. जब कैंसर का निदान किया जाता है, तो वयस्कों को कई परीक्षणों और उपायों से गुजरना पड़ता है, लेकिन साक्ष्य इस बात का समर्थन करते हैं कि उन समस्याओं की पहचान करने के लिए जेरियाट्रिक मूल्यांकन जितना सटीक नहीं हैं जो सतह के नीचे यानी अप्रकट हो सकती हैं.

कनाडा में हुई रिसर्च से क्या पता चला?

कनाडा में, वर्तमान में केवल मुट्ठी भर विशेष जेरियाट्रिक ऑन्कोलॉजी क्लीनिक हैं. सबसे पुराना क्लिनिक मॉन्ट्रियल में यहूदी जनरल अस्पताल में है, इसके बाद टोरंटो में प्रिंसेस मार्गरेट कैंसर सेंटर में ओल्डर एडल्ट विद कैंसर क्लीनिक है, जिसका नेतृत्व इस आलेख के लेखकों में शामिल शब्बीर अलीभाई करते हैं.

रिसर्चर के रूप में, हम ओंटारियो और अल्बर्टा के क्लीनिकों के संपर्क में हैं, जिन्होंने हमें बताया है कि उनके पास जेरिएट्रिक ऑन्कोलॉजी सेवाएं विकसित की जा रही हैं, इसलिए हमें जल्द ही नए कार्यक्रम देखने की उम्मीद है.

ये क्लीनिक सिर्फ मरीजों के लिए ही अच्छे नहीं हैं. वास्तव में, शब्बीर अलीभाई के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में इन क्लीनिकों में देखे जाने वाले प्रत्येक वृद्ध व्यक्ति के खर्च में लगभग 7,000 डॉलर की बचत होने का पता चला है.

कैंसर से पीड़ित व्यक्तियों के लिए विशेष सेवाएं नहीं

अगर हम इसे हर साल कनाडा में कैंसर से ग्रस्त पाए जाने वाले वृद्ध व्यक्तियों की संख्या से मिलाते हैं, तो यह हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी लागत बचत को दर्शाता है. ब्रिटिश कोलंबिया में, वर्तमान में कैंसर से पीड़ित वृद्ध व्यक्तियों के लिए कोई विशेष सेवाएं नहीं हैं. पिछले पांच सालों में, क्रिस्टन हासे, जो लेख की लेखिका भी हैं – सहकर्मियों के साथ यह समझने के लिए काम कर रही हैं कि क्या इन सेवाओं की जरूरत है और वे बी.सी. में कैंसर से पीड़ित वृद्ध व्यक्तियों की कैसे मदद कर सकती हैं.

अनुसंधान दल ने कैंसर का इलाज करवा रहे वृद्ध व्यक्तियों से बात की, जिन्हें कभी-कभी कैंसर के इलाज के लिए दूसरे स्थान पर जाना पड़ता था. शोध दल ने स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों से भी बात की जिनमें कैंसर रोग विशेषज्ञ, नर्स, फिजियोथेरेपिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे.

कनाडा में सेवाएं क्यों नहीं हैं? 

तो अब हम कहां हैं और हमारे पास पूरे कनाडा में सेवाएं क्यों नहीं हैं? लागत भी स्पष्ट रूप से किसी भी स्वास्थ्य देखभाल सेवा के लिए एक बाधा है. ऑन्कोलॉजी में हमारी नैदानिक ​​देखभाल मॉडल तीन दशकों से ज्यादा समय से बरकरार है. यह मुख्य रूप से एकल चिकित्सक द्वारा संचालित मॉडल है. हालांकि कैंसर के लिए आधुनिक इलाज बहुत तेजी से उभरे हैं और क्लीनिक में अपनाए गए हैं, लेकिन देखभाल के मॉडल को बदलना बहुत कठिन है, खासकर रणनीतिक रूप से.

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